भारत की आर्थिक समृद्धि का स्वरूप

जब द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद की अवधि में तथाकथित तीसरी दुनिया के देशों के विकास का प्रश्न सामने लाया गया, तब तक इन बुनियादी विश्वासों की प्रामाणिकता पर प्रश्न उठाने की सोचना तक किसी के वश में नहीं बचा था। विद्वानों और राजनोताओं की इस दृष्टि का प्रमाण है-तीसरी दुनिया के देशों की विकास योजनाएँ। अधिक विस्मयप्रद एवं पीड़ाप्रद तथ्य यह है कि आज भी हमारे समाजवैज्ञानिकों के बीच ऐसी कोई जिज्ञासा एवं गवेषणा की वृत्ति सामान्यत: पाई नहीं जाती जो इन ‘स्वीकृत विश्वासोंÓ की प्रामाणिकता को जाँचने की दिशा में तत्पर हो। कुछेक अपवाद विद्वान हैं, जिनके विशिष्ट अध्ययनों द्वारा उपनिवेशीकरण से पहले की भारतीय व्यवस्थाओं के ऐसे तथ्य सामने आये हैं जो इन सर्वस्वीकृत हो चले विश्वासों पर प्रश्न खड़ा करते हैं। परन्तु अधिकांश समाजवैज्ञानिक तो उन धारणाओं की वैज्ञानिक दृष्टि से प्रामाणिकता जांचने की कभी इच्छा तक नहीं करते देखे जाते, जिन धारणाओं में वे दीक्षित हो चुके हैं।
तत्कालीन भारत का समुद्रमार्गीय व्यापार
उदाहरणार्थ, यहाँ 18वीं शती ईस्वी के भारत के केवल एक पहलू की चर्चा करें- उसके समुद्रमार्गीय व्यापार की। तत्कालीन तथ्य ये हैं कि-
(1) इस बात के प्रचुर साक्ष्य हैं कि 18वीं शताब्दी के एशियाई समुद्रमार्गीय व्यापार में यूरोप का हिस्सा नगण्य रहा है- यदि उसे समस्त व्यापार के अनुपात में तथा सही परिप्रेक्ष्य में रखकर देखा जाए।
(2) 17वीं-18वीं शती ई. में यूरोपीय जल मार्गीय व्यापारकर्ता (सरकारी और प्राइवेट दोनों ही प्रकार के) प्राय: एशियाई सौदागारों के मोहरे मात्र होते थे।
(3) वान ल्योर की टिप्पणी है कि एशिया में 18वीं शती पूरी तरह ‘एशियाई शताब्दीÓ थी, यूरोप की उसमें बहुत मामूली भूमिका थी।
(4) रादरमुंड बताते है कि भारत के समुद्र तटवर्ती इलाकों में उन दिनों पूरी तरह स्थानीय भारतीय शासकों का नियंत्रण रहता था। जलमार्गीय व्यापार पूरी तरह भारतीय व्यापारियों के नियंत्रण में ही था। यह व्यापार लगभग नि:शुल्क था और शांतिपूर्ण था। समुद्री डकैत यदा-कदा गड़बड़ी मचाते।
यूरोपीय लोग भी इन्हीं डकैतों के जैसे कार्य करते थे तथा उनकी हैसियत इन डकैतों जैसी ही थी। इसीलिए उस शताब्दी में जो यूरोपीय सक्रिय दिखते भी हैं, वे कुतूहल का ही विषय माने जाते हैं और उनके प्रति मैत्रीपूर्ण भाव और संदेह तथा अविश्वास का भाव सम्मिलित रूप में मौजूद दिखता है।
परंतु उस काल के बारे में लिखी गई इतिहास पुस्तकें तो ल्योर के शब्दों में ‘इन सभी ऐतिहासिक संदर्भों एवं तारतम्य को पूरी तरह अनदेखा करके लिखी गई हैं।Ó होल्डेन फर्बर भी यही कहते हैं कि ‘एशिया में यूरोप की दखलन्दाजी को यूरोप के आर्थिक इतिहास का अंग मानकर देखने की यूरोप में प्रथा है। परंतु एशिया के समुद्रमार्गीय व्यापार के इतिहास को भलीभाँति जाने बिना यूरोपीय दखलंदाजी का मूल्यांकन नहीं किया जा सकता। एशिया के समुद्रमार्गीय व्यापार का विषय इतना विराट है कि कई पीढिय़ों के सतत अध्यवसाय के बाद ही एशिया के व्यापार-वाणिज्य का इतिहास पूरी तरह समझा जा सकता है।Ó ‘उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद से गहरी संलग्नता के ही क्रम में यूरोप और पश्चिम को अति विकसित मानकर उसके समकक्ष एशिया को अल्पविकिसित या अविकसित मानने की धारणा सामने आई है।
वस्तुत: भारत के समुद्रमार्गीय व्यापार का यह दृष्टांत हमने सप्रयोजन चुना है इसके अनेक कारण हैं। मुख्य कारण तो यह है कि 18वीं शताब्दी के भारत पर काम करने वाले विद्वानों का इस विषय पर अत्यधिक ध्यान जाता रहा है, तथापि इसे सम्यक परिप्रेक्ष्य में रखकर नहीं देखा गया। इसका एक कारण यह है कि अगर इस एक मुद्दे को ही हम देख लें कि कैसे-कैसे विस्मयकारी विवरण उद्घाटित हो रहे हैं तो सम्बन्धित विषय-क्षेत्रों के समुद्र में गहरे गोता लगाने के परिणाम सहज ही सोचे जा सकते हैं।
यहाँ एक सजगता का आग्रह आवश्यक है। अधिकांश अनुसंधान जो इस विषय पर सामने आये हैं, वे विविध ईस्ट इंडिया कम्पनियों के अभिलेखों एवं पंजिकाओं में संग्रहीत सूचनाओं पर ही आधारित है। इन अभिलेखों एवं पंजिकाओं में वस्तुत: उन कम्पनियों के रोजाना के विचार-विमर्श, मुख्यालयों को भेजे गए ‘डिस्पैच,Ó खतो-किताबत, संस्मरण वगैरह ही है। अत: उन पर आधारित अध्ययनों की सीमाएॅं स्पष्ट है।
उदाहरणार्थ, के.एन. चौधरी की ‘टे्रडिंग वल्र्ड ऑव एशियाÓ तथा अन्य पुस्तकें अंग्रेजों की ईस्ट इंडिया कंपनी के अभिलेखों पर आधारित है। इसी प्रकार ए. दासगुप्ता की पुस्तकें ‘मलाबार इन एशियन ट्रेड 1740-1800 तथा ‘इंडियन मर्चेन्ट्स एंड द डिक्लाइन ऑव सूरत 1700-1750Ó भी (जो भारतीय सौदागरों की क्रियाशीलताओं को लेकर है) अंग्रेजों और डचों के स्रोतों पर आधारित हैं। इसी तरह, जे.सी. वान ल्योर की इंडोनेशियाई व्यापार एवं समाज संबंधी पुस्तक भी डच स्रोतों पर आधारित है। रादरमुंड ने अपनी कृति ‘एशियन टे्रड एण्ड यूरोपियन एक्सपेंशन इन द एज ऑफ मर्केंटाइलिज्मÓ में उनकी विस्तृत सूची प्रस्तुत की है। फर्बर के पूर्वोद्धृत शब्दों को यहां पुन: स्मरण कर लें: ‘यूरोपीय दृष्टिकोण एवं यूरोपीय प्रेक्षण अवस्थिति से विश्लेषित करने की प्रक्रिया प्रारंभ से ही रही। उसके कारण एशिया में यूरोप के अनधिकृत प्रवेश का सम्यक मूल्यांकन सम्भव नहीं। एशिया के व्यापार का इतिहास तो विराट है। वह पूरी तरह तो कई पीढिय़ों के अध्यवसाय के बाद ही समझा जा सकेगा।
स्पष्ट है कि ईस्ट इंडिया कम्पनियों के जिन अभिलेखों और रजिस्टरों, संस्मरणों आदि पर ये अध्ययन आधारित हैं उन सब दस्तावेजों का संदर्भ उन विदेशी सौदागरों, पर्यटकों, प्रशासकों आदि की एशिया में अपना व्यापार बढ़ाने की सम्भावनाएॅं एवं समस्याएँ ही है। स्वयं एशिया के जलमर्गीय व्यापार या आर्थिक स्थिति के विवरण प्रस्तुत करना उन दस्तावेजों का विषय ही नहीं। फिर, भारत जैसे विराट देश के जलमार्गीय व्यापार का इतिहास, रादरमुंड के शब्दों में, इन ‘फेरीवालों (पेडलर) के ब्यौरों से नहीं जाना जा सकता। यूरोपीय सौदागारों को इस विषय की जानकारी के एकमात्र स्त्रोत की तरह मानकर उन्हीं पर निर्भर हो जाने पर पर्याप्त प्राथमिक जानकारी तक सम्भव नहीं है। उनसे यथार्थ की एक झलक तो मिल सकती है, पर स्वयं यथार्थ की सम्यक जानकारी उनसे नहीं मिल सकती। वे उस विराट जानकारी को उस समय जान-समझ सकने की हैसियत में ही नहीं थे।
इस पर भी, उन विदेशी सौदागरों, पर्यटकों और प्रशासकों के आत्मकेन्द्रित एवं यूरोपीय नजरिए वाले ब्यौरों से भी, एशिया के जलमार्गीय व्यापार का, जिसमें भारत की निश्चय ही केन्द्रीय स्थिति थी जो चित्र उभर कर आता है वह एकजीवंत प्राणवान सुविकसित अर्थव्यवस्था का चित्र है, जिसमें विविध बंदरगाहों और भौगोलिक क्षेत्रों के बीच जलमार्ग से होने वाले माल और मनुष्यों के व्यापक तथा नियमित यातायात के प्रमाण मिलते हैं। इस प्रकार इन विदेशी फुटकर और सीमित संदर्भों के द्वारा भी 18वीं शताब्दी ईस्वी की भारतीय अर्थव्यवस्था के बारे में कतिपय बहुप्रचारित भ्रांत धारणाएँ ध्वस्त हो जाती हैं। आरंभ में जो यूरोपीय यात्री एशिया आए, उनमें से लगभग हर एक ने हिंद महासागर के आसपास व्याप्त अत्यन्त महत्वपूर्ण व्यापारिक वाणिज्यिक केन्द्रों की चर्चा की है और उनसे जुड़े व्यापार मार्गों, सौदागरों तथा सौदे के लिए लाई-ले जा रही वस्तुओं के पर्याप्त विवरण दिए हैं। उन पर्यटकों ने एशियाई बन्दरगाहों को जो वजन और महत्व दिया, वैसा ही वजन और महत्व डच और अंग्रेज ईस्ट इंडिया कंपनी के अफसरों-कर्मचारियों ने इन बातों के अपने विवरण में दिया।
यहाँ तक कि फ्रेंच कम्पनी- ‘द सेकंड कम्पेनी डेस इन्डेस ने भी देशी जलमार्गीय व्यापार के विवरण में खूब रुचि ली, यद्यपि यह कंपनी एशियाई व्यापार में उल्लेखनीय रूप में प्रवेश काफी देर से ही पा सकी थी। उस कंपनी के एक पदाधिकारी विन्सेन्स ने 1733 ई.में इस बारे में एक ज्ञापन तैयार किया। वह ज्ञापन 1730 के दशक में हिंद महासागर में चल रहे समुद्रमार्गीय व्यापार के सर्वाधिक विशद एवं व्यवस्थित विवरणों में से एक है।
इस विषय पर शोधकर्ताओं में से किसी ने भी मुगल रियासतों के दस्तावेजों का समुचित उपयोग नहीं किया है। जबकि कम्पनियों के ‘डिस्पैचÓ में स्पष्ट एवं निश्चित संदर्भ हैं कि सूरत, हुगली, बलसोर आदि बंदगाह से जुड़े शहरों के मुगल शाही अधिकारी बड़ी ही सावधानी से आयात-निर्यात के विशद अभिलेख सुरक्षित रखते थे। इन कम्पनियों के मुख्यालयों के स्थायी निर्देश थे कि कम्पनियॉं भारतीय बन्दरगाहों के मुगल शाही अधिकारियों द्वारा फारसी में नियमित लिखे जा रहे, जहाजों के यातायात रजिस्टरों के अनुवाद करके अपने-अपने (यूरोपीय) केंद्रीय मुख्यालयों को समय-समय पर लगातार भेजती रहें।
इन रजिस्टरों द्वारा ‘स्थानीय व्यापारÓ यानी भारत के विभिन्न क्षेत्रीय व्यापार की मात्रा और झुकाव यानी व्यापार की दिशा का ज्ञान होने की आशा थी। बंदरगाहों के मुगल अधिकारियों द्वारा फारसी में लिखित कस्टम रजिस्टर की डच प्रतियों में सूरत और हुगली बंदरगाहों के माल-जहाजों का विवरण है और हर जहाज के मूल बंदरगाह का नाम, जहाज का नाम, जहाज के मालिक का नाम आदि स्पष्ट ब्यौरेवार दर्ज है।
डच कम्पनियों के द्वारा जिनकी प्रतिलिपियाँ (नकलें) तैयार की गईं, ऐसा तत्कालीन राजकीय अभिलेखों में से कई आज भी हेग स्थिति अभिलेखगारों में सम्भत: अब भी सुलभ हैं। इन अभिलेखों को ध्यान से पढऩे पर 18वीं शताब्दी के भारत की समझ अधिक स्पष्ट हो सकती है। वे अभी भी सुरक्षित हैं या नष्ट कर डाली गईं?, पता नहीं। यदि नष्ट कर डाली गईं तब तो उन दिनों की सच्चाई का बड़ा उल्लेखनीय अंश हमारे लिए अज्ञात ही रह जायेगा।
बहरहाल, जो तथ्य उपलब्ध हैं वे भी तत्कालीन भारतीय एवं एशियाई जलमार्गीय व्यापार की विराटता, सुव्यवस्था एवं सामथ्र्य का प्रमाण हैं। उन अभिलेखों और विवरणों से ‘यूरोपीय जलमार्गीय उद्यमोंÓ के उस तथाकथित गतिशील विकास की सच्चाई प्रकट होती है जो एशियाई दृष्टि से वस्तुत: एक हाशिये की चीज भर थे परंतु आधुनिक यूरोपीय तो अपने जलमार्गीय व्यापार की गतिशीलता की चर्चा करते समय कभी-भी अरब, चीनी एवं अन्य एशियाई सौदागारों का कोई उल्लेख ही नहीं करते।
सार यह कि 18वीं शताब्दी ई. के भारत का ज्ञान, अब तक बहुत थोड़े से, चयनित दस्तावेजों पर आधारित और सीमित है। ये दस्तावेज जो तथ्य हमें सुलभ कराते है, उनके बारे में प्रसिद्ध इतिहास चिंतक ई.एच. कार द्वारा अपनी महत्वपूर्ण पुस्तक ‘वॉट इ•ा हिस्टॅरिÓ में कहे गए ये शब्द पूरी तरह लागू होते हैं-
‘तथ्य कोई मछुआरों की पटिया पर पड़ी हुई मछलियों जैसे नहीं होते। वे तो विराट और दुर्गम सागर में तैर रहीं मछलियों जैसे होते हैं। इतिहासकार उनमें से क्या कितना पकड़ पाता है, यह इस पर निर्भर है कि वह सागर के किस हिस्से में जाल डाल रहा है और किन कील-कांटों का इस्तेमाल कर रहा है। ये दोनों ही बातें, वस्तुत: इस पर निर्भर होती हैं कि वह सचमुच किस प्रकार की मछलियाँ पकडऩा चाहता है। मोटे तौर पर इतिहासकार वे ही तथ्य प्राप्त करता है जो वह पाना चाहता है।Ó
अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार और भारत
जलमार्गीय व्यापार के इसी क्रम में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में भारत की तत्कालीन स्थिति का प्रसंग उपस्थित हो जाता है। अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को अर्थव्यवस्था का विशेष परिष्कृत पहलू माना जाता है। वस्तुत: अंतर्राष्ट्रीय व्यापार मूल्य-विभेदक क्रियाकलाप है, जिसे दामों के चलन-कलन के रूप में देखा जा सकता है।
इंग्लैंड की कंगाली से चिंतित व्यापारी
यदि हम 17वीं एवं 18वीं शताब्दी ईस्वी में भारत के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के ब्यौरों का अध्ययन करें तो पाते है कि उस व्यापार की सर्वाधिक उल्लेखनीय विशेषता यह है कि भारत में सारे संसार से बहुमूल्य धातुओं का एक अंतहीन प्रवाह बहता चला आ रहा है। ये धातुएँ भारतीय व्यापारियों एवं बिचौलियों को भारत की श्रेष्ठ वस्तुएँ विश्व भर में बिक रही होने के कारण उनके दामों के भुगतान के रूप में मिल रही हंै। जहाँ तक यूरोप की बात है, यूरोप से प्राय: कोई वस्तु-विनिमय उस व्यापार में नहीं हो रहा था, बल्कि वे देश भारतीय माल का दाम-भुगतान नगद धन से ही कर रहे थे। वस्तुत: 17वीं-18वीं शती ईस्वी में एशिया के अधिकांश देश यूरोप का कोई माल नहीं खरीद रहे थे। अगर कोई एशियाई देश यूरोपियनों से उनके यहॉं अपनी चीजों के विनिमय में कुछ माल यानी वस्तुएँ खरीदता भी था तो वे एशिया के ही अन्य देशों में बनी वस्तुएॅं होती थीं। इग्लैंड के पुराने सर्राफा व्यापारी, जो सोना-चांदी आदि बहुमूल्य धातुओं को ही किसी देश की सच्ची सम्पदा मानते थे, इस बात से बेहद चिंतित थे कि एशिया समृद्धतर होता जा रहा है, जबकि इंग्लैंड और यूरोप इस तरह के (बहुमूल्य धातुओं के) हस्तांतरण के कारण कंगाल होते जा रहे हैं। 19वीं शताब्दी ईस्वी में भारत सहित एशियाई देशों के व्यापार के दो स्पष्ट विभाग थे, (1) निर्यात क्षेत्र (2) आंतरिक उत्पादक-क्षेत्र। 17वीं एवं 18वीं शती ईस्वी में भारत आदि एशियाई देश यूरोप की बनी किसी भी वस्तु को आयात के योग्य नहीं मानते थे अत: इंग्लैंड आदि से किसी भी वस्तु का आयात यहाँ किया ही नहीं जा सकता था। उन्नत समृद्ध भारत
स्पष्टत: इससे एक जीवंत समृद्ध भारतीय अर्थव्यवस्था का स्वरूप उभरकर सामने आता है, जिसमें उत्पादन की प्रक्रियाएँ, तकनीकी दक्षता एवं कौशल तथा कम लागत के श्रेष्ठ संतुलन के कारण उत्कृष्ट गतिशीलता है। दूर-दूर के व्यापार की दृष्टि से भारतीय उपमहाद्वीप की पूरे इतिहास में सदा ही प्रमुख भूमिका रही है। स्वयं उपमहाद्वीप के अपने भौगोलिक एवं राजनैतिक इलाकों के बीच एक सक्रिय अंत: क्षेत्रीय व्यापार-वाणिज्य विद्यमान था, जो आर्थिक विशेषता की उन्नत स्थिति बनाये रखने में सहायक होता था। इसी के कारण राजाओं , सम्राटों और बादशाहों के सार्वजनिक व्यय भी उच्चस्तरीय होते थे। जिसके कारण आसपास या दूरदराज के भी उन योद्धा शासकों को, जो अपेक्षाकृत कम अच्छी स्थितियों में रह रहे थे, ईष्र्या होती थी, आकर्षण होता था और आक्रमण का लोभ भी होता था। वस्तुत: यूरोप के माल की बिक्री में कितनी मुश्किलें होती थीं, इसके ब्यौरे ईस्ट इंडिया कम्पनी के अभिलेखों में भरे पड़े हैं जो अपने ऊनी कपड़ों और धातुओं की कम बिक्री का बारम्बार रोना रोती हैं-
‘अनेक यूरोपीय फैक्टरियों के मालगोदाम की देख-रेख या प्रबंध का काम ऐसा था, जिससे सभी बचना चाहते थे। जब कभी कम्पनियों का माल फैक्टरी के गेट पर खुली बोली लगाकर बेचा जाता, तब प्राय: आखिर में फैक्टरी के चपरासी-चौकीदार आदि, भारी बोझ ढोकर ‘गोदामÓ में वापस ले जाने को विवश होते थे। यह काम इतना उबाऊ था कि प्राय: लागत-दाम पर या लागत से भी कम दाम पर स्थानीय प्रमुख सौदागरों को माल बेचने में फैक्टरी वालों को कोई झिझक नहीं होती थी, बशर्ते उसके एवज में इन प्रमुख व्यापारियों का ‘सद्भावÓ मिलने की आशा हो। घड़ी से लेकर शिकारी कुत्तों तक अनेक यूरोपीय माल प्राय: मुनाफे के लिए नहीं, बल्कि अनुग्रहदृष्टि पाने के लिए दिए जाते थे। स्थानीय सौदागर भी बदले में, यूरापीयों से ऐसी कई वस्तुएँ खरीद लेते थे, जो बिकती नहीं थीं, पर वे इस आशा से खरीद लेते कि मधुर सम्बन्ध रहने पर इन यूरोपीयों से भविष्य में कभी कुछ लाभ हो सकता है। यूरोपीय व्यापारियों के जो माल उन दिनों भारत में कुछ ठीक से बिक रहे थे, वे कम्पनियों के उत्पाद बिल्कुल नहीं थे, बल्कि एशियाई सामान ही थे। वे थे- चाकू, छुरे, सुइयाँ, कैंचियाँ, भोजन पकाने के बर्तन आदि घरेलू सामान तथा सर्वाधिक बिक्री होती थीं सामरिक एवं समुद्री व्यापार के काम की चीजें। तीन शताब्दियों तक तो यूरोपीय व्यापारी एशिया में थोड़ी-सी ऐसी ही चीजें तथा धातुएँ और बड़ी मात्रा में अमेरिकी चाँदी लेकर पहुँचते तथा कई तरह के भारतीय माल लेकर वापस जाते।Ó
कनिंघम ने लिखा है – ‘जैसा कि भूमध्य सागरीय देश अज्ञात काल से करते रहे हैं, अंग्रेज भी विवश हुए कि व्यापार करना है तो सोना-चाँदी का निर्यात भारत को करो और वहाँ से चीजें तथा रूपया लाओ।Ó
पुर्तगीजों के समुद्रमार्गीय भारतीय व्यापार के जो ब्यौरे हैं, उनसे ज्ञात होता है कि एशियाई, अफ्रीकी और अमेरिकी देशों के साथ भारत का व्यापार व्यापक, सघन तथा नियमित था और विविध प्रकार की वस्तुओं का व्यापार होता था। ‘पुर्तगीजों ने आश्चर्य के साथ यह देखा कि भारत का समुद्रमार्गीय व्यापार बहुत ही जीवन्त एवं सक्रिय था तथा वह व्यापार काली मिर्च-पीपरामूल जैसी चीजों तक सीमित नहीं था वरन बहुत सारी अन्य चीजों का भी व्यापार होता था।Ó
भारत के महान व्यापारी
भारत के सौदागरों (व्यापारियों) के बारे में उनकी सम्पदा और उनके प्रतिष्ठित व्यापार के बारे में यूरोपीय कम्पनियों ने जो विवरण दिए हैं, उनमें भी इस विषय में भरपूर प्रकाश पड़ता है। ‘ये व्यापारी विशाल तादाद में व्यापार करने में सक्षम थे। यूरोपीय कम्पनियों का इनसे ही मुकाबला था।Ó ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी के अभिलेखों में भारत के महान व्यापारियों के अनेक उल्लेख एवं संदर्भ हैं। उदाहरणार्थ- दक्षिण भारतीय व्यापारी कसा वीरोना और सूरत के वीरजी वोरा का, ‘जिनकी प्रतिष्ठा दंतकथाओं का विषय बन चुकी हैं, ‘1936 में वीर जी वोरा की आर्थिक शक्ति ऐसी प्रबल थी कि इंग्लिश काउंसिल यह मानने को विवश हो गई कि यदि वीरजी वोरा किसी खास श्रेणी का व्यापार स्वयं करना तय करते हैं, तो सूरत का कोई भी अन्य व्यापारी उनके मुकाबले में खड़े होने का साहस नहीं करेगा। यहाँ तक कि कम्पनी के भारत स्थित दलाल ने भी कम्पनी के माल भारत आयातित करने के लिए वोरा के सिवाय कोई अन्य ग्राहक इंग्लैंड की फैक्टरी में लेकर आने से इनकार कर दिया यद्यपि वह दलाल वीर जी वोरा की सद्भावना का मोहताज नहीं था। दो साल पहले, बढिय़ा किस्म के मूँगा (प्रवाल) को कम्पनी वालों ने वीरजी वोरा को न बेचकर एक अन्य सौदागर को बेचा क्योंकि फैक्टरी चाहती थी कि इस तरह से महान व्यापारी वीर जी वोरा का बाजार से एकाधिपत्य तोडऩे में मदद मिलेगी। परन्तु वह सौदागर उन मँूगों को ले ही नहीं गया। माल कम्पनी के गोदाम में पड़ा रहा।Ó ऐसे दिग्गज व्यापारी देश में भरे पड़े थे।
एक अंग्रेज एलेग्जेंडर हेमिल्टन जो सूरत के व्यापारियों के बारे में जानकारी रखते थे, वहाँ के एक बड़े सौदागर का उल्लेख करते हैं, ‘जिनका मुख्यालय किसी बड़े निर्यात-केन्द्र में या देश के किसी बड़े वाणिज्य-केन्द्र में था और जिसके एजेन्टों और डीलरों का ‘नेटवर्कÓ विराट था जिससे कि वह दूर-दूर तक के उत्पादकों तक पहुँच सकता था। वह अर्थपति ‘एक बिल्कुल अलग ही वर्ग का था।Ó हेमिल्टन का संकेत अब्दुल गफूर की तरफ हैÓ, ‘जो इंग्लिश ईस्ट इंडिया कम्पनी के कुल व्यापार के बराबर का व्यापार करता था। मैं उसे साल भर से अच्छी तरह जान रहा हूँ। उसके अपने 20 से ज्यादा समुद्रीय जहाज हैं, जो 300 से 800 टन तक का। माल वहन करने की सामथ्र्य वाले हैं। उनमें से हर एक में 10,000 पौंड से अधिक का स्टाक रहता है। वह सारा स्टाक विदेश भेजने के बाद, वह देश के भीतर भी आगामी वर्ष के बाजार-व्यापार के लिए अपने पास इससे भी कहीं ज्यादा स्टाक जमा रखना जरूरी मानता था।Ó अब्दुल गफूर का खानदान 18वीं शती ईस्वी के मध्य तक फलता-फूलता रहा।
जिन अन्य बड़े व्यापारियों के नाम के उल्लेख कम्पनी अभिलेखों में मिलते हैं, वे हैं- सूरत के अहमद चेलानी, बंगाल में आर्मेनियाई मूल के खोजा सरहद और खोजा वाजिद, कोरोमंडल समुद्रतट के संघाराम चेट्टी और ‘विश्वविख्यात सौदागरÓ जगत सेठ, जो एक ही हुंडी से बंगाल का समस्त राजस्व दिल्ली हस्तांतरित कर सकते थे।
यूरोपीय सौदागरों की बहियों और टिप्पणियों में उल्लिखित ये छिटपुट सन्दर्भ भी सम्मोहक हैं, क्योंकि इनसे अनुमान होता है कि देशभर में विविध व्यापार-वाणिज्य केन्द्रों में और भी बड़े- बड़े व्यापारिक घराने रहे होंगे तथा एशिया में अन्य देशों में भी ऐसे ही सम्पन्न घराने होंगे। जॉन हेनरी ग्रोज 18वीं शती ई. के मध्य में सूरत गया था। वहाँ ‘उसने धीर प्रशांत हिन्दू सौदागर देखे, जिनमें से एक-एक अकेले ही किसी यूरोपीय जहाज का सारा माल आधे घंटे के भीतर मोल-तोल के बाद, खड़े-खड़े खरीद लेते थे और तुरन्द नगद भुगतान कर देते थे। व्यापार की दुनिया में, इतनी बड़ी धनराशि के नगद भुगतान की क्षमता रखने या माल के बड़े भंडार की खरीदी कर तत्काल भुगतान की क्षमता रखने का मतलब बहुत कुछ होता है। मोचा स्थित इंग्लिश फैक्टरी के अभिलेख बताते हैं कि 1735 ई. में कुल 42 व्यापारी कम्पनी को कॉफी की आपूर्ति कर रहे थे, जिनमें से 5 व्यापारी ही कुल आपूर्ति का 66 प्रतिशत ‘सप्लाईÓ कर रहे थे। यमन के कॉफी -व्यापार पर वस्तुत: ‘कुलीनतंत्रीय व्यापारियोंÓ का एक समूह छाया हुआ था। वीर जी वोरा और चिन्नन चेट्टी जैसे कतिपय हिन्दू-व्यापारी बड़े-बड़े वाणिज्य-पोत रखते थे तथा एशिया भर में विविध देशों में उनका कारोबार चलता था। होल्डेन फर्बर बताते हैं कि भारतीय सौदागर और व्यापारी रूस जैसे दूरस्थ देशों तक के बाजार में कारोबार करते थे। ‘भारतीय व्यापारी वोल्गा नदी घाटी क्षेत्र में 1625 में भी अपना कारोबार करते दिखते हैं। सुतूर नामक एक भारतीय सौदागर 1647 ई. में अस्त्रखान से मास्को पहुँचा था। अस्त्रखान में कई भारतीय सौदागरों ने पहले ही अपना कारोबार जमा रखा था। 1650 में रूसी बाजार में 23 किस्म की भारतीय वस्तुएँ उपलब्ध थीं।
ऐसे थे उस समय के भारतीय व्यापारी एवं अर्थपति- जो प्रचुर साधन-सम्पन्न थे तथा आवश्यकतानुसार शक्तिशाली राज्यसत्ता को भी प्रभावित कर सकते थे। प्रभावशाली व्यापारी अब्दुल गफूर के बारे में एक उल्लेख यह मिलता है कि ‘उसने सूरत के सौदागरों को इकट्ठा कर स्थानीय मुगल हुकूमत पर संयुक्त दबाव बनाया कि वह डचों से सख्ती से पेश आए, ताकि डच लोग सूरत के जहाज मालिक व्यापारियों को यूरोपीय लुटेरों द्वारा पहुँचाई गई हानि का हर्जाना देने की शर्त पर ईमानदारी से अमल करें।Ó कई भारतीय व्यापारी अपने ही जहाजों से समुद्रपारीय व्यापार करते थे और अभिजनों तथा प्रशासनतंत्र को ऋण देने का साहूकारी का कार्य भी करते थे। उनसे निचली श्रेणी में वे व्यापारी थे जो अपने जहाज प्राय: नहीं रखते थे, परन्तु देश में और विदेशों में अनेक स्थलों पर अपने एजेन्ट रखते थे तथा व्यापार के एक विस्तृत ‘नेटवर्कÓ का वित्तपोषण करते थे जो दूर-दूर तक फैले केन्द्रों से जुड़ा होता था। जैसे आगरा से यमन बन्दरगाह या फारस की खाड़ी तक। सूरत के बड़े ब्रोकर्स के एजेंट इन सभी जगहों में होते थे और हुंडियाँ जारी करते तथा उनका भुगतान करते थे एवं व्यापारिक गुप्तचरी भी सुलभ कराते थे।
मुद्दे की बात यह है कि ऐसे भारतीय दिग्गज व्यापरियों- सौदागरों के होने से यूरोपीय कम्पनियों के सौदागरों पर लगाम रहती थी। फर्बर उन दो कारणों का स्पष्ट उल्लेख करते हैं, जिनके कारण बंगाल में ब्रिटिश विस्तार असीमित नहीं हो पाया। पहला यह कि बंगाल प्रांत लगातार असाधारण योग्य वायसरायों द्वारा शासित रहा, दूसरा कारण था बंगाल के सेठों का धनाढ्य खानदान, जिसके मुखिया उन दिनों थे जगत सेठ। वायसरायों ने ‘दस्तकोंÓ के अंग्रेजों द्वारा उपयोग को दृढ़ता से नियमित रखा। सेठों ने बंगाल की मुद्रा पर नियंत्रण बनाये रखा जिससे कलकत्ता में टकसाल स्थापित करने का इंग्लिश कम्पनी का मनोरथ विफल रहा, हालांकि लंदन से जहाँ 1713 ई. के आसपास 75,000 पौंड मूल्य की चाँदी प्रति वर्ष आ रही थी, वहीं 1743 ई. के आसपास 1,00,000 पौंड मूल्य तक की चाँदी प्रतिवर्ष आने लगी।
एशियाई व्यापार में यूरोप का हिस्सा
इन यूरोपीय कम्पनियों द्वारा नियमित लिखी गई पंजिकाओं से प्रकट है कि आरम्भिक तीन सौ वर्षों (16वीं, 17वीं, 18वीं शताब्दी ई.) तक एशियाई व्यापार में यूरोपीय हिस्सा नगण्य यानी नाममात्र का रहा। हम पाते हैं कि कम्पनी के कर्मचारी-अधिकारी अपनी-अपनी सरकारों को बार-बार लिख रहे हैं कि भारत में उनकी हैसियत बढ़ नहीं रही है, स्थितियाँ प्रतिकूल हैं।
वीर जी वोरा जैसे अनेकानेक दिग्गज भारतीय व्यापारी सक्रिय थे, जिनसे पार पाना कम्पनी के लिए कठिन था। यद्यपि अपनी आरम्भिक हालत से तुलना करने पर कम्पनी के व्यापारी पाते थे कि उनका मुनाफा बहुत अधिक हो रहा है, क्योंकि लागत-पूँजी तो उन्होंने बेहद कम ही लगाई थी। तथापि, कुल भारतीय व्यापार में ईस्ट इंडिया कम्पनी का हिस्सा नगण्य था। जो भारतीय व्यापारी सागर पार दूर-दूर देशों तक जा कर व्यापार कर रहे थे, उनके व्यापार पर कोई उल्लेखनीय प्रभाव डाल पाने में कम्पनी अक्षम थी। यह अलग बात है कि बंगाल में कम्पनी ने जहाँ से शुरुआत की थी, उस तुलना में उसका हिस्सा काफी बढ़ गया था। ‘यूरोपीय प्रतिभागियों द्वारा भारतीय व्यापार में लाया गया यह परिवर्तन, भारत के विदेशी व्यापार की दिशा, संरचना और नियंत्रण से सम्बन्धित परिवर्तन था। परन्तु शेष भारतीय अर्थव्यवस्था पर उसका प्रभाव अत्यंत सीमित ही रहा। इन यूरोपीय कम्पनियों के अभिलेख ‘इसका प्रचुर साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं कि भारत के साथ उनके व्यापार की मात्रा में उल्लेखनीय वृद्धि हुई थी,…. तथापि इस व्यापार का भारतीय क्षेत्र की कुल वाणिज्यिक-व्यापारिक गतिशीलता पर जो प्रभाव था, वह आनुपातिक दृष्टि से थोड़ा ही था। इंग्लिश कम्पनी की राजनैतिक सत्ता स्थापित होने से पूर्व तक यह अनुपात कभी भी ज्यादा हुआ हो, इसमें शंका ही है। 1753 ईस्वी तक स्थिति यह थी कि ढाका से वस्त्रों का जो निर्यात प्रतिवर्ष हो रहा था, उसका एक तिहाई हिस्सा ही यूरोपीय व्यापारी खरीद रहे थे, शेष दो तिहाई हिस्सा वस्त्र-व्यापार भारत तथा विश्व के अन्य हिस्सों के व्यापारी विदेशों में कर रहे थे। दूसरी ओर, डचों के मसाला-व्यापार के फलस्वरूप भारत के अपने वस्त्र-व्यापार में भी उछाल आई और दक्षिण पूर्व एशिया में भारतीय निर्यात व्यापार लगातार बढ़ता ही गया।
राज्य की भूमिका
राज्य की भूमिका का प्रश्न भी महत्वपूर्ण है। सौभाग्य से उससे सम्बन्धित कुछ साहित्य प्रकाश में आ चुका है। विकास के सन्दर्भ मेें, बारम्बार यह दुहराया जाता है कि यूरोपीय राष्ट्र-राज्य शक्तिशाली आर्थिक हस्ती बनकर उभरे तो इसका श्रेय जाता है यूरोपीय राजाओं और रानियों के योगदान को और व्यापार के प्रति उनकी आवेगमूलक सक्रियता को। इसके विपरीत, भारतीय या एशियाई शासकों को उदासीन बताया जाता है। कहा जाता है कि एशियाई राज्यकर्ता लोग स्थानीय सैनिक अभियानों में ही मुख्य ध्यान लगाये रहते थे या फिर विकृत ऐय्याशियों में डूबे रहते थे। ‘गौरव की तलाश, ‘बड़े पैमाने पर अहं की संतुष्टि और जोखिम भरे कामों का शौकÓ, ‘अर्थव्यवस्था के प्रति लापरवाहीÓ आदि-इत्यादि शब्दों का उन राजाओं-रानियों के लिए प्रयोग ध्यान देने योग्य है। परन्तु यदि हम इन बहुप्रचारित धारणाओं के जाल में न फँसकर उन दिनों के भारतीय एवं एशियाई आर्थिक जीवन तथा अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के स्वरूप से जुड़े तथ्यों पर ध्यान दें तथा उसके सन्दर्भ में राज्य की तत्कालीन भूमिका को समझें और विवेकपूर्ण विश्लेषण करें तो इसमें बौद्धिक स्तर पर लाभ होगा।
राज्य बल ने संभव बनाया भारत का शान्तिपूर्ण व्यापार
पहली बात यह स्मरणीय है कि भारत का समुद्रमार्गीय व्यापार सघन एवं व्यापक था, साथ ही शान्तिपूर्वक गतिशील था। समद्री लुटेरे उसे बाधित नहीं कर पाते थे। उनके नियमित यातयात एवं व्यापार में भी बाधा-व्यवधान कदाचित ही कभी पड़ते हों। ये बाधाएँ यूरोपीयों के परिदृश्य पर उभरने के बाद ही पडऩे लगीं। उससे पहले, समुद्री डकैती की जो घटना यदा-कदा घटती, उसे एशियाई राज्य-सत्ताएँ निर्ममतापूर्वक कुचल डालती थीं। समुद्री मार्गों की सुरक्षा भलीभाँति सुनिश्चित की जाती थी। इसके पर्याप्त एवं विपुल सन्दर्भ मिलते हैं कि राज्यकर्ताओं की नौसेना अपने समुद्री इलाकों का नियमित गश्त करती थीं, क्योंकि समुद्री-व्यापार में व्यवधान से क्षति राजकीय राजस्व को भी उठानी पड़ती थी। यहाँ तक कि यूरोपीय समुद्री डकैतों को भी एशियाई सागरतटीय राजाओं की नौसेनाओं का पूरा ध्यान रखना होता था, यद्यपि वे इस डकैती के जरिए ही मालामाल हो रहे थे। इसीलिए वे दुर्गम समुद्री इलाकों के बीच में अवस्थित छुट-पुट द्वीपों में अपना अड्डा बनाते थे। 18वीं शती ई. तक यूरोपीय जलदस्युओं ने अपनी शक्ति बहुत बढ़ा ली थी, तब भी उन्हें ‘शाही कोपÓ का भय बना रहता था जो कि व्यापारियों से दुव्र्यवहार करने पर उन पर टूटता था। मुगल इतिहासकार शफी खान ने लिखा है कि यूरोप से व्यापार का जो तुरत वित्तीय लाभ मिलता था- उसके कारण देश से यूरोपीयों के निष्कासन का क्रांतिकारी कदम सामान्यत: नहीं उठाया जाता था। जैसा कि पहले उल्लेख हो चुका है, बड़े व्यापार एवं वित्तपति जब पाते थे कि उनके व्यापक शांतिपूर्ण समुद्रपारीय व्यापार पर कोई बाहरी चोट पड़ी है तो वे राज्य का सहयोग सरलता से माँग लेते और पा जाते थे। इसके अतिरिक्त ‘शाही अधिकारी इस बारे में सतत सजग रहते थे कि जिन व्यापारिक नगरों में भारतीय सौदागरों का यूरोपीयों से मुकाबला जोरदार होना है, वहाँ कोई सैनिक शक्ति यूरोपीय लोग न बढ़ा लेंÓ। ‘हिस्ट्री ऑव ब्रिटिश इंडियाÓ में हंटर ने बताया है कि कैसे ‘कम्पनी बंगाल से निकाल बाहर की गई तथा कैसे मुम्बई द्वीप पर मुगल नौसेना ने कब्जा कर लिया। एक अन्य उल्लेख बताता है कि, ‘मराठा एडमिरल कान्होजी आंग्रे ने 18वीं शती के आरम्भ में ईस्ट इंडिया कम्पनी के मुम्बई व्यापार को तथा समुद्री नियंत्रण को गम्भीर खतरा पैदा कर दिया था।
”प्राचीनतम भारतीय नौसेनाएँ ÓÓ
यहाँ उल्लेखनीय है कि भारत का सैनिक इतिहास विश्व में प्राचीनतम है। हजारों वर्ष पूर्व से यहाँ सेनाएँ रही हैं और भारत के सभी किसान तथा ग्रामीण भी सैन्य क्षमता से सम्पन्न रहते थे, उन्हें युद्धकला आती थी, शस्त्र संचालन आते थे और वे वीरता को एक श्रेष्ठ आदर्श मानते थे। वेदों में भी सेनाओं का उल्लेख है। भारत के दो प्राचीनतम महाकाव्य हैं- महर्षि वाल्मीकि रचित- रामायण और महर्षि वेदव्यास रचित- महाभारत। दोनों युद्धकाव्य भी हैं, धर्मकाव्य और राजनीतिशास्त्रीय काव्य भी। दोनों में हजारों प्रकार के अस्त्र शस्त्रों, विमानों और प्रक्षेप्यास्त्रों तथा भयानक संहारकारी शस्त्रों का वर्णन है। धनुर्वेद हजारों साल से भारत का एक मान्य शास्त्र है। कम से कम 5000 वर्षों से भारतीय नौसेनाओं का गौरवशाली इतिहास है। ईसा पूर्व 2300 में सारस्वत सभ्यता (सैन्धव सभ्यता) के अवशेष लोथल में मिले हैं, जिसमें नौ सेना होने का साक्ष्य है। चाणक्य ने शस्त्रोपजीवी, आयुधजीवी और राजशब्दोपजीवी समूहों का वर्णन किया है।अर्थशास्त्र का 9वां, 10वां, 12वां, 13वां और 14वां अध्याय (अधिकरण) शस्त्रास्त्रों के बारे में विस्तार से बताता है। नौभार, नौतरण और नौबलाध्यक्ष के विवरण अर्थशास्त्र में हैं। दूसरे अधिकरण के 44वें प्रकरण में 28वां अध्याय ‘नावध्यक्ष:Ó शीर्षक से है, जो नौवकाध्यक्ष के लिए है। इस प्रकार सम्राट नन्द और सम्राट चन्द्रगुप्त के समय में बहुत पहले से चली आ रही सेना और नौसेना का वर्णन मिलता है। नौसेनाओं के पास मत्स्य यंत्र भी होता था। सम्राट अशोक, सातवाहन सम्राटों, चोल सम्राटों, विजयनगर साम्राज्य के स्वामियों, कलिंग साम्राज्य के स्वामियों से लेकर मराठों तक के पास सशक्त नौसेना रही है। मराठों तथा केरल राज्य की नौसेनाओं ने अंग्रेजों तथा यूरोपीयों की नौसेनाओं को हरा दिया था। कान्होजी आंग्रे मराठा नौसेना के सेनापति थे। इस प्रकार भारत में अत्यंत प्राचीनकाल से नौसेना रही है। इसी सशक्त नौसेना के कारण भारत के व्यापारी समुद्र में दूर-दूर तक निर्भय होकर व्यापारिक यात्रा कर सकते थे।
श्री धर्मपाल ने ईस्ट इंडिया कंपनी के कतिपय अधिकारियों द्वारा किए गए सर्वेक्षणों के आधार पर 18वीं शताब्दी ईस्वी में भारत में शिक्षा, विज्ञान और प्रौद्योगिकी के बारे में प्रामाणिक आंकड़े दिए हैं। तदनुसार भारत के प्रत्येक गांव में कम से कम एक विद्यालय होता था, बड़े गांव में एक से अधिक विद्यालय होते थे और शहरों में अनेक विद्यालय होते थे। इन विद्यालयों में सभी जातियों के शिक्षक पढ़ाते थे तथा सभी जातियों के छात्र पढ़ते थे। छात्राओं के लिए अलग विद्यालय होते थे। श्री धर्मपाल ने अपनी ओर से केवल भूमिका ही लिखी है। शेष सम्पूर्ण पुस्तक अंग्रेज अधिकारियों द्वारा किए गए सर्वेक्षण की रिपोर्टों को यथावत प्रकाशित करती है। अत: वे आंकड़े पूर्णत: प्रामाणिक हैं और उनसे यह प्रचार पूरी तरह झूठा सिद्ध होता है कि भारत में शिक्षा केवल कुछ जातियों का विशेषाधिकार है और यह बात भी पूरी तरह झूठ सिद्ध होती है कि केवल ब्राह्मण ही शिक्षक होते थे, क्योंकि इंग्लैंड में केवल पादरी ही पढऩे लिखने के अधिकारी 18वीं शताब्दी तक थे और केवल पादरी ही पढ़ा सकते थे। इसीलिए उन्होंने भारत के बारे में ही यह झूठ रचा और फैलाया तथा बलप्रयोग और प्रचार के द्वारा 100 वर्षों के भीतर इसे एक सत्य की तरह स्थापित कर दिया तथा इसी के साथ सचमुच भी पढ़ाई को कुछ वर्गों तक ही सीमित बनाकर रख दिया। राज्य के हस्तक्षेप से भारत में समाज अपेक्षाकृत अधिक तेजी से बदलता है, क्योंकि यहाँ इंग्लैंड या अन्य यूरोपीय ईसाई देशों की तरह का कोई संगठित चर्चनुमा धर्मतंत्र नहीं है और राज्य के प्रति समाज में कोई प्रतिरोध भाव नहीं है।
18वीं शताब्दी में भारत में विज्ञान और प्रौद्योगिकी के बारे में भी कतिपय अंग्रेज अधिकारियों ने सर्वेक्षण कर रिपोर्टें लिखी थीं। अत: उससे यह भी प्रमाणित होता है कि 18वीं शताब्दी ईस्वी में भारत में विज्ञान और प्रौद्योगिकी की दशा इंग्लैंड से बहुत उन्नत थी। इस्पात बनाने की विधियाँ, बर्फ बनाने की विधि, खेती और सिंचाई सम्बन्धी उन्नत तकनीक, चेचक का टीका, आयुर्वेद की उन्नत वैज्ञानिक विद्या आदि अनेक क्षेत्रों में भारत विज्ञान और प्रौद्योगिकी में इंग्लैंड से बहुत आगे था।
भारत के बहुत से वैज्ञानिक ग्रंथ अंग्रेज और जर्मन चुराकर ले गए, यह बात भी समाज में बहुत प्रचलित है। यद्यपि इनका प्रामाणिक विवरण अभी तक सामने नहीं आया है। परन्तु शिक्षा, प्रौद्योगिकी, कृषि, इस्पात, तकनीकी, धातुकर्म, वस्त्र उद्योग तथा व्यापार के क्षेत्रों में भारत की समृद्धि सर्वविदित है। खगोल शास्त्र में भी भारत का ज्ञान बहुत उन्नत था। रॉबर्ट बार्कर ने रॉयल सोसायटी लंदन के समक्ष 1777 ईस्वी में उसकी जानकारी दी। एडिन बरो और जॉन प्लेफेयर ने भी अपने लेखों के द्वारा इसकी जानकारियाँ दीं। यह तो विश्वविदित है कि गणित शास्त्र में भारत ही विश्व गुरु है। रेखा गणित और त्रिकोणमिति का ज्ञान भी भारत में ही सर्वप्रथम था। इंग्लैंड तथा यूरोपीय देशों को ये जानकारियाँ बहुत बाद में मिली। इस्पात बनाने की विधि, चेचक के टीके, बर्फ बनाने की विधि और भारत में विकसित शल्य चिकित्सा तथा आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति का ज्ञान भी अंग्रेजों को 18वीं शताब्दी ईस्वी में ही पहली बार हुआ। इसके अतिरिक्त और भी विशद विवरण उपलब्ध हैं जिनसे यह सिद्धान्त खण्डित होता है कि 18वीं शती ईस्वी के भारत में किसी प्रकार का ठहराव और क्षय था। वस्तुत: उस अवधि में भारतीय समृद्धि सतत गतिशील थी जिसका प्रमुख श्रेय भारतीय राजाओं और राजकीय नीतियों को जाता है। राज्य की पहल पर ही भारतीय व्यापार-वाणिज्य नया-नया विस्तार पाते रहते थे। 1707 ई. में औरंगजेब की मृत्यु हुई। तब विविध सूबेदारों ने स्वयं को दिल्ली की गद्दी के आधिपत्य से मुक्त घोषित कर दिया। पर इससे इन सूबों में प्रगति थमी नहीं। उल्टे उत्पादन एवं वस्तु-निर्माण में तीव्र वृद्धि हुई, आर्थिक विकास हुआ तथा व्यापार का फैलाव हुआ। बंगाल उसी दौर में रेशमी वस्त्रों का प्रमुख उत्पादक तथा निर्यातक बनकर फिर उभरा। सारा देश 18वीं शती ईस्वी में प्राणवान, जीवंत तथा उच्च स्तरीय सक्रियता में संलग्न था। यहाँ के राजे-महाराजे भी आर्थिक-सामाजिक उन्नति में गहरी रुचि लेते थे तथा उसमें सक्रिय योगदान देते थे। अत: ब्रिटिशपूर्व भारत के बारे में समाजशास्त्रियों, सामाजिक विज्ञानियों को नये सिरे से सोचना चाहिए तथा स्वतंत्र बुद्धि से, भिन्न अवधारणा कोटियों में विकास की भारतीय समस्या को देखना-समझना चाहिए।