दमा और आहार विहार

प्रोफेसर अनूप कुमार गक्खड़ :कहते हैं कि दमा दम के साथ ही जाता है अर्थात् जब व्यक्ति आखिरी सांस लेता है तो ही वह इस रोग से मुक्त हो पाता है। चरक संहिता में यह रोग श्वास रोग के नाम से वर्णित है व इसे दुर्जय अर्थात् कठिनाई से जीता जा सकने वाला रोग कहा जाता है। इस रोग में रोगी को सांस लेने में कठिनाई होती है, बोलने में कष्ट होता है। बार-बार वेग आने पर रोगी बेहोश भी हो जाता है। धूल, धुआं, शीतल जल के प्रयोग से यह रोग बढ़ जाता है। कफ वर्धक आहार व आकाश में छाए बादल वाला मौसम इस रोग को और बढ़ा देता है।