कैसी हो आदर्श न्याय व्यवस्था ?

गुरूदत्त

लेखक प्रसिद्ध विचारक और उपन्यासकार हैं।


शासन की सर्वोच्च प्राथमिकता न्याय करना है। समाज में न्याय व्यवस्था की स्थापना के लिए ही शासन की स्थापना की गई थी। दुर्भाग्यवश अपने देश पर पिछले डेढ़-दो सौ वर्षों से विदेशी न्याय व्यवस्था ही चलाई जा रही है। वर्तमान न्याय व्यवस्था अंग्रेजों ने इस देश में स्थापित की थी और उनका उद्देश्य किसी भी दृष्टिकोण से जनता को न्याय देना नहीं ही था। उन्होंने केवल अपना शासन स्थिर करने और अपने विरोधियों का दमन करने के लिए इस व्यवस्था का सूत्रपात किया था। इसलिए इसमें न तो भारत की परिस्थितियों के अनुकूल व्यवस्थाएं हैं और न ही मानवता को ही कोई स्थान दिया गया है। यहां तक कि इंग्लैंड में भी यहां से भिन्न पुलिस और कानून व्यवस्था है। स्वाधीनता के बाद इस व्यवस्था को बदला जाना चाहिए था। वह तो हुआ नहीं। आज इसे बदलने की सोचने वाले को ही पागल बता दिया जाता है। बहरहाल, यदि यह व्यवस्था सही नहीं है तो विकल्प क्या है? इस पर बड़े ही विस्तार से चर्चा की है प्रख्यात लेखक स्व. वैद्य गुरूदत्त ने अपने उपन्यास न्यायाधिकरण में। उस उपन्यास की भूमिका में उन्होंने न्याय व्यवस्था और उसके विकल्प की भी चर्चा की है। वही भूमिका यहां प्रस्तुत है।

 स्वराज्य-प्राप्ति के उपरान्त भारत में धर्म-व्यवस्था उत्तरोत्तर बिगड़ती जाती दिखाई देती है। यहां धर्म को कानून का पर्याय माना है। करने योग्य कर्म को धर्म कहते हैं और वर्तमान काल में कानून ही करने योग्य कर्म का निर्णय करता है।

जब यह देखा जाता है कि चोरी, डाके, हत्याएं, लड़ाई-झगड़े बढ़ रहे हैं, तो इसमें कारण जानने की लालसा उत्पन्न होनी स्वाभाविक ही है। अधर्माचरण अर्थात् कानून के विरुद्ध आचरण आज समाज में व्याप्त हो रहा है, यह निरन्तर अधिक और अधिक हो रहा है। ऐसा क्यों है?

लेखक का मत है कि इसमें मुख्य कारण जीवन की भौतिकवादी कल्पना ही है। यूं तो आत्मा-परमात्मा को न मानने वाले, वैसे ही आदि काल से संसार में उपस्थित हैं, जैसे आत्मा-परमात्मा को मानने वाले। देवता और दानवों की उत्पत्ति आदिकाल में ही हुई मानी जाती है। इस पर भी यूरोप के सत्रहवीं और अठारहवीं शताब्दी के प्राय: मीमांसक (फिलौसोफर) जीवन की भौतिकवादी कल्पना पर विशेष बल देते रहे हैं। इस बल का परिणाम यह हुआ है कि यूरोप की राजनीति भौतिकवाद की भित्ति पर खड़ी हो गई है। कार्ल माक्र्स ने तो जीवन तथा संसार की गतिविधि का कारण ही भौतिक बताने का यत्न किया है और उसकी मीमांसा की संसार पर आज गहरी छाप है। भौतिकवादी मानता है कि इस घटनावश बने संसार में मनुष्य एक घटना है। इसके सब कार्य उसकी शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति के निमित्त ही हैं और मानव इतिहास इन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए किए गये प्रयत्नों का इतिहास मात्र है। दुनिया की गतिविधि इसी विचार की धुरि के चारों ओर चल रही है।

यूरोप का भौतिकवाद भारत में अंग्रेजी काल की शिक्षा के माध्यम से आया है। अब अंग्रेज तो गए, परंतु अंग्रेजी भाषा, साहित्य और जीवन-मीमांसा के अनुयायी नेताओं को पीछे छोड़ गये हैं। अत: वह नैतिक पतन, जो यहां अंग्रेजी काल में आरम्भ हुआ था, अभी तक चल रहा है और दिन-प्रतिदिन वृद्धि पा रहा है।

अंग्रेजी काल में यहां एक विशेष न्याय प्रपंच बना और स्वराज्य प्राप्ति के उपरान्त वैसा ही चल रहा है। वही डिप्टी-कमिश्नर और डिस्ट्रिक्ट मैजिस्ट्रेट, वही कचहरियां और वकील, पुुलिस तथा खुफिया पुलिस, कोर्ट फीस और वकीलों की उजरत, अपीलें और रिविजन इत्यादि चल रही हैं, जो अंग्रेजी काल में थी।

अंग्रेजी काल में तो शासक विदेशीय थे और वे जैसे-कैसे अंग्रेजी शासन बनाये रखने में ही अपना कल्याण मानते थे। अत: उनकी दृष्टि में मौलिक न्याय अंग्रेजी राज्य को यहां बनाये रखने में था। कहीं अंग्रेजी न्यायाधीश बहुत यत्न से दूध का दूध, पानी का पानी करता देखा जाता था तो इसमें भी उसका उद्देश्य वही होता था, जिससे शासितों के मन में अंग्रेजी न्याय की महिमा बनी रहे और भारतवासी यहां पर अंग्रेजी राज्य को ईश्वरीय वस्तु समझते रहें।

उनके लिये न्याय राज्य के लिए बन रहा था। राज्य न्याय की स्थापना के लिये नहीं था। जब जब भी न्याय किसी राज्यद्रोही के पक्ष में होता था, अंग्रेजी न्याय अन्याय का रूप धारण कर लेता था। उस काल में कानून अर्थात् धर्म केवल अंग्रेजी राज्य को भारत में बनाये रखने के लिए रह गया था। परिणाम यह हुआ कि राज्य का नाश हुआ। रक्षा किया हुआ धर्म रक्षा करता है। मारा हुआ धर्म मारकर ही सांस लेता है।

संसद और विधान सभाएं प्रजा से निर्वाचित प्रतिनिधियों से बनती हैं, परन्तु इन संस्थाओं की सदस्यता के लिये किसी प्रकार की योग्यता का होना आवश्यक नहीं है अर्थात् कानून वाली संस्थाओं में सदस्य बनने के लिये कानून जानने और इसके मानव-समाज पर प्रभावों के ज्ञान की आवश्यकता नहीं मानी जाती। यह ब्रिटिश पार्लियामेंट की नकल पर यहां चल रहा है।

यूरोप के प्राय: देशों में, जहां प्रजातन्त्रात्मक विधान प्रचलित हैं, यही विडम्बना चल रही है और मानवता का ह्रास हो रहा है। कारण स्पष्ट है कि कानून और शासन चलाने वालों में इन दोनों बातों का ज्ञान और अनुभव नहीं होता। कानून का ज्ञान और कानून का आधार कुछ तो होना आवश्यक ही है। पार्लियामेंट, संसद, धारा-सभाएं अपने कार्यों में सर्वथा स्वतन्त्र नहीं हो सकतीं। मौलिक न्याय को विकृत करने का अधिकार इनको भी नहीं होना चाहिए। भारत के संविधान में कुछ मौलिक बातों का उल्लेख है। वे पर्याप्त नहीं और फिर उनमें भी परिवर्तन करने का अधिकार संसद को है।

भारतीय परम्परा में कानून का आधार सत्य ज्ञान माना है और वेद सत्य विद्याओं की पुस्तक मानी गयी है। भारतीय धर्मशास्त्र में लिखा है-

‘वेदोस्खिलो धर्ममूले स्मृतिशीले च तद्विदाम।

वेद तथा वेद और स्मृति ग्रन्थों के विद्वानों का आचरण ही पूर्ण धर्म का मूल है।

‘सर्वं तु सम वेक्ष्येदं निखिलं ज्ञानचक्षुषा।

धर्म का निश्चय करते समय ज्ञान चक्षु से देखना चाहिए। धर्म व्यवस्था देने वाले, कानून बनाने वाले वेद अर्थात् सत्य ज्ञान के जानने वाले होने चाहिए।  पाश्चात्य आचार-विचार के मानने वालों को यहां वेद शब्द अरूचिकर प्रतीत होगा, परन्तु इस बात को कौन अस्वीकार कर सकता है कि समाज के लिये कानून बनाने वालों को संसार का सत्य ज्ञान होना आवश्यक है।

विवेचना इस बात की नहीं करनी कि वर्तमान लोकतांत्रिक पद्धति से संसद सदस्य निर्वाचित हों अथवा किसी अन्य प्रकार से उनकी नियुक्ति हो, बल्कि यह सोचना है कि किस प्रकार कानून बनाने वाले, धर्म के मूल आधार को जानने और मानने वाले हों।

भारत में भी संसद तथा विधान सभाओं का संगठन वैसा ही बना है, जैसा यूरोपीय प्रजातन्त्रात्मक देशों में है। अत: जो अव्यवस्था वहां पर है, वही भारत में भी उत्पन्न हो रही है। इस अव्यवस्था का व्यापक परिणाम यह हो रहा है कि जैसे संसद में सदस्यता के लिए योग्यता, चरित्र और अनुभव का होना कोई आवश्यक नहीं, वैसे ही देश की अन्य बातों में भी अधिकारी-अनधिकारी का भेद-भाव मिटता जाता है। उचित, अनुचित तथा उपकारी, अनुपकारी में भेद करने की न तो किसी में योग्यता ही रह गयी है और न ही इच्छा।

यूरोपीय न्याय व्यवस्था में वकीलों का एक महान स्थान है। इसमें लेखक का मत है कि वकील होना तो कोई बुरी बात नहीं है। हां, पेशेवर वकील होना, जो दाम लेकर किसी को सही सिद्ध करने का यत्न करता है, बुरी बात है। इसी से खराबी उत्पन्न होती है। इनसे अभियोगों में वृद्धि, इनका लम्बे काल तक चलना, न्यायाधीशों का स्वयं न्याय करते समय किसी प्रलोभन में फंस जाना, इत्यादि कितने ही अवगुण उत्पन्न होते जाते हैं। सबसे बुरा परिणाम, पेशेवर वकीलों के होने से यह हो रहा है कि न्याय दिनोंदिन महंगा होता जा रहा है।

जिन लोगों ने न्याय की समस्याओं पर कभी गम्भीरतापूर्वक विचार नहीं किया, उन्हें न्यायालय, बिना वकीलों के एक अस्वाभाविक बात प्रतीत होगी। वास्तव में पैसा लेकर पैरवी करने वाले वकील, न्याय को अप्राप्य करने में और न्याय को अन्याय में बदलने में, पूर्णतया नहीं तो बहुत अंशों में उत्तरदायी अवश्य हैं।

प्रश्न उपस्थित होता है कि बिना वकीलों के यह कैसे हो? उत्तर है जैसे होना चाहिए वैसे हो अर्थात् प्रजा को न्याय प्राप्त कराना राज्य का दायित्व है। अत: राज्य को निष्पक्ष, विद्वान्, अनुभवी और चरित्रवान न्यायकर्ता नियुक्त करने चाहिए।

जब किसी को यह अनुभव हो कि उसके साथ अन्याय हो रहा है, वह सीधा न्यायाधीश के सम्मुख उपस्थित होकर अपनी बात मौखिक रूप में बताये। कचहरी में उसकी बात को लिखा जाए और न्यायाधीश उस पर उचित आज्ञा करे। वह बताये कि क्या सत्य ही उस व्यक्ति के साथ किसी प्रकार का अन्याय हुआ है? यदि अन्याय हुआ है तो किसने किया है? अपराधी को दंडित करने से पूर्व उसको बुलाकर उसके विपरीत आरोप सुनाये। आरोप कहे जाने पर वह उस अपराधी की सफाई सुने और तदनन्तर आवश्यक हो तो साक्षी बुलाये और अंत में विधि विधानानुसार निर्णय दे।

यदि न्यायकर्ता स्वयं कानून नहीं जानता और उसे पक्ष विपक्ष के वकीलों की बहस सुनकर ही निर्णय लेने की बात समझ में आती है, तो वह व्यंिक्त न्यायकर्ता के पद के योग्य नहीं है।

इसके साथ ही कानून की भाषा सरल, स्पष्ट और सुबोध होनी चाहिए। कानून के शब्द, कानून का उद्देश्य और अर्थ, जैसे कानून बनते समय उपस्थित किये गये हो, उस उद्देश्य को ही प्रकट करें। उद्देश्य से भिन्न अर्थ अमान्य हों।

कानून का आधार व्यक्ति को अधिक से अधिक स्वतन्त्रता प्रदान करना हो। समाज की स्वतन्त्रता अथवा अधिकार व्यक्ति की स्वत्रतन्ता की उपज ही हों। जब तक किसी व्यक्ति का कार्य किसी दूसरे व्यंिक्त की स्वतंत्रता तथा अधिकारों का हनन न करे, तब तक कानून उसकी स्वतन्त्रता और इच्छा का आदर करे।

शासन स्वयं व्यापारी अथवा उद्योगपति न हो। ऐसा होने से शासन वैश्य-वृत्ति वाला बन जायेगा। वैश्य-वृत्ति वाला शासन न्याय करने के अयोग्य सिद्ध होगा। वैश्य-वर्ग प्राय: लोभी होता है। इसकी लोभ की प्रवृत्ति को नियंत्रण में रखने के लिए शासन की आवश्यकता है। जब शासन स्वयं ही वैश्य-वृत्ति करने लगेगा तो उसे नियन्त्रण में कौन रख सकेगा? यह सर्वत्र देखा गया है कि ज्यों ज्यों शासन उद्योग-धंधों को हाथ में लेता जाता है, त्यों त्यों न्याय का स्तर हीन होता जाता है।

कानून अर्थात् धर्म एक अति पवित्र वस्तु है। इसके लिये नागरिक राज्य को करोड़ों रुपये कर के रूप में देते हैं। जिस दिन जन साधारण की दृष्टि में कानून की पवित्रता लोप होगी, उसी दिन शासन और जाति का विनाश आरम्भ हो जायेगा।

देश में शान्ति, सुख और आनन्द की वृद्धि के लिये न्याय व्यवस्था स्थिर आधारों पर बननी चाहिए। वे स्थिर आधार हैं- सत्य, ज्ञान तथा निष्पक्षता और कानून को बनाने वाले कानून के ज्ञाता, अनुभवी, आस्तिक और मनुष्य को मिट्टी का ढेला न समझने वाले हों।

न्याय की उपलब्धि के लिये पेशेवर वकीलों को नि:शेष किया जाये। न्यायधीश विद्वान्, कानून के ज्ञाता और अनुभवी व्यक्ति होने चाहिए। न्याय प्राप्त करने के लिये यदि एक पैसे का भी व्यय करना पड़े तो यह राज्य पर कलंक है।