बहुत कुछ कहते हैं ये लौह स्तम्भ

जवाहर लाल कौल

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

मेहरौली के पास प्राचीन लौह स्तभ आज हमें चुनौती दे रहा है कि मेरी पहचान करके दिखाओ। इसका किसने निर्माण कराया और यहां इंद्रप्रस्थ में स्थापित किया? इस पर बहस तो खूब हुई है, लेकिन प्राथमिक जांच से जो बात सामने आती है, उसे मानने का साहस प्रतिष्ठित इतिहासकारों को नहीं है। इसे आम तौर पर अशोक काल के बाद का स्तम्भ माना जाता है, लेकिन जो इबारत इस पर लिखी है उस का बड़ा भाग तो कोई और ही कहानी कहता है। मुख्य लेख किसी राजा चंद्र के साम्राज्य विस्तार के में प्रशस्ति ही है। यह चंद्र कौन था? अधिकतर इतिहासकारों का कहना है कि यह गुप्तवंश के तीसरे राजा चंद्रगुप्त विक्रमादित्य हैं। लेकिन स्तम्भ लेख में दिए गए तथ्यों का मेल तो चंद्रगुप्त प्रथम से खाता है। अगर इस बात को मान लें तो अबतक जो इतिहास हमें पढ़ाया जाता रहा है, वही ढह जाएगा। इतिहासकारों की यह लुक्का-छिपी का खेल तो चलता रहेगा लेकिन कोई यह तो बता ही सकता है कि यह लोहा कब ढलवाया गया था, धातु की ढलाई की उम्र क्या है। अगर दो हजार साल से अधिक है तो उस जमाने में ऐसे इस्पात का कैसे निर्माण किया गया था, जिस पर आज तक जंग नहीं लगा है। जंगरोधक लोहा बनाने की विधियां तो बहुत अर्वाचीन है। क्या भारत में ईसा से कई सदी पहले भी ऐसी टेक्नोलाजी थी जिससे साधारण लोहे को जंगरोधक इस्पात में बदला जा सकता था और जो कई हजार सालों तक मौसम की मार सह सके? एक बार इस बात का वैज्ञानिक स्तर पर निश्चय हो जाए तो बहुत से ऐतिहासिक तथ्य भी अपने आप तय हो जाएंगे। इतिहासकारों की व्यक्तिगत रुचि कुछ भी हो, वे विज्ञान के आदेशों का उल्लंघन नहीं कर सकते, आखिर वैज्ञानिक होने का दावा ही तो आधुनिक इतिहास लेखन को जीवित रख रहा है। मेहरौली का यह लौहङस्तम्भ अकेला नहीं कि उसे अपवाद माना जाए, इस प्रकार के उदाहरण देश के और स्थानों पर भी मिले हैं। कहीं साबूत तो कहीं, समय और आदमी की मार सहते-सहते टूटी अवस्था में हैं। इनमें से कुछ तो आंध्र जैसे तटीय इलाके में भी हैं, जहां जंग लगने का सबसे अधिक खतरा होता है। यानी प्राचीन भारत में इस्पात बनाने की टेक्नोलाजी थी तो वह व्यापक स्तर  पर थी और उसका प्रयोग दूर-दूर तक होता था। मेहरौली लौह स्तम्भ पर लिखी इबारत निश्चित रूप से अशोक कालीन तो नहीं है लेकिन उससे अधिक बाद की भी नहीं है। इस बात को मानने में कोई हर्ज नहीं है कि उस पर खुदा लेख गुप्त राजाओं के शौर्य के बारे में है। लेकिन कौन से गुप्त राजा के बारे में? आम तौर पर तीसरे गुप्त राजा चंद्रगुप्त को पराक्रमी और दूर-दूर तक साम्राज्य फैलाने वाला राजा माना जाता है। राजा को चंद्र शब्द से सम्बोधित होने के कारण यह धारणा बन जाना स्वाभाविक है कि उन्ही की यह प्रशस्ति होगी। लेकिन इसमें कई ऐसे शब्दों का भी प्रयोग किया गया है जो मौर्यकाल में प्रचलित थे औेर जिन पर चाणक्य अर्थशास्त्र का सीधा प्रभाव है। इसलिए कई इतिहासकार मानते हैें कि मेहरोली प्रशस्ति गुप्तवंश के तीसरे राजा के बारे में नही अपितु चंद्रगुप्त प्रथम के बारे में ही है जो इस वंश के संस्थापक और मौर्य काल के काफी निकट थे। यानी यह लौह स्तंभ ईसा पूर्व दूसरी सदी का है। ईसा से पूर्व अगर भारत में इस प्रकार लोहे को संशोधित किया जा सकता था तो यह कला अचानक तो विकसित नहीं हुई होगी। इसे विकसित होने में कई सदियां लग गई होंगी।

यदि इस्पात निर्माण की यह उन्नत कला भारत में ज्ञात ही नहीं थी अपितु इस का व्यापक प्रयोग भी हो रहा था तो अचानक वह कहां गायब हो गई? भारतीय विज्ञान और ज्ञान की अनेक शाखाओं को विदेशी आक्रमण और देश में भारतीय समाज के प्रभाव के काल में भारी क्षति उठानी पड़ी। आयुर्वेद उनमें से एक है। उसका अनुसंधान रुक गया और उसके ज्ञान भंडार मेें जो विस्तार होना चाहिए था, वह नहीं हो पाया। लेकिन वह न तो पूरी तरह से लुप्त ही हुआ और न उस का सैद्धांतिक आधार खो गया। इन मौलिक सिद्धांतो के रहते उसका पुनरोदय हो सकता है और हो भी रहा है। लेकिन धातु निर्माण और शोधन का ज्ञान सैद्धांतिक स्तर पर ही खो गया जबकि बहुत छोटे स्तर पर दूर दराज के गांवों में अब भी परंपरागत रीति से काम करने वाले लुहार लगभग उसी स्तर का इस्पात बना पाते हैं। लेकिन अगर उनसे आप यह पूछें कि वे किस आधार या वैज्ञानिक सिद्धांत पर ऐसा कर रहे हैं तो नहीं बता पाएंगे। उन्होंने जो कला सीखी है वह पुश्त दर पुश्त परिवारों में चली आती रही है। यह विडम्बना है कि इस तथ्य को भी दोबारा प्रकाश में लाने के लिए अंग्रेजों ने ही पहल की, वरन् पिछले हजार साल में किसी भारतीय ने इस विज्ञान के बारे में कुछ लिखा हो, इसका कोई दस्तावेज उपलब्ध नहीं है। इस उच्च कोटि के इस्पात के बारे में हमें जानकारी अक्सर विदेशों से ही मिलती रही है। मध्यकाल में दमिष्क इस्पात पूरे मध्य एशिया में प्रसिद्ध था क्योंकि इससे उम्दा प्रकार की तलवारे बनाई जाती थीं। लेकिन यह लोहा दरअसल भारत से ही आयात किया जाता था। ब्रिटिश पुस्तकालय के पुराने दस्तावेजों के आधार पर प्रसिद्ध भारतवेत्ता धर्मपाल ने अपनी पुस्तक में जिन छोटी-छोटी उपलब्धियों का वर्णन किया है उनमें इस्पात निर्माण कला भी एक है। कुछ युवा भारतीय वैज्ञानिकों ने इसे आधार बना कर यह जानने की खोज आरम्भ की कि क्या अब भी दूर वन्य क्षेत्रों में यह कला जीवित है। धर्मपाल जी ने जिन वैज्ञानिक उपलब्धियों का उल्लेख किया था, वह अठारहवीं सदी में भारत आए, अंग्रेजों के लेखों और अनुभवों के आधार पर थे। कहीं पिछले दो सौ सालों में प्राचीन विज्ञान का अधूरे ज्ञान अवशेष पूरी तरह लुप्त तो नहीं हुए हैं? लेकिन भाग्य से उन्हें पता चला कि अब भी मध्य प्रदेश के जंगलों में आदिवासी लुहार इसी प्रकार लोहा गलाते हैं जैसे उन के पूर्वज हजारों साल पहले से करते आए थे।

मध्य प्रदेश के वन्य क्षेत्रों में बसे आदिवासी अपने खेती और शिकार के औजार और हथियार कुछ विशेष प्रकार की भट्टियों में स्थानीय लोहा गलाकर बनाते हैं। इसमें ईंधन भी विशेष प्रकार से चुना जाता है ताकि लोहे को गलाने के विभिन्न चरणों में पर्याप्त मात्रा में गरमी पहुुंंचे। ईंधन के लिए स्थानीय जंगलों में उपलब्ध पेड़-पौधों का ही प्रयोग होता था लेकिन ईंधन का मिश्रण किसी पुरानी परंपरा के आधार पर ही बनाया जाता है। परीक्षा के लिए उन आदिवासियों को लोहा गलाने के लिए तैयार करना आसान नहीं था क्योंकि वे इसे पवित्र पारिवारिक विरासत मानते थे और इसे अपने ऊपर दैवी कृपा समझते थे। स्वाभाविक था कि लेाहा गलाने के लिए उनके अपने रीति रिवाज विकसित हो गए थे। सप्ताह के कुछ ही दिनों में ऐसा किया जा सकता था। वह भी तब जब कि उन्हें विश्वास हो जाए कि देवता रुष्ट नहीं है। फिर भट्टी भी हर स्थान पर नहीं बनाई जा सकती थी। वे अब भी छोटे पैमाने पर लोहा बनाते हैं। लेकिन इस प्राचीन विज्ञान पर पूरी तरह प्रकाश डालने के लिए गहन शोध की आवश्यकता है क्योंकि आदिवासी यह नहीं बता सकते कि जो भट्टी वे बनाते हैं, उसका आकार-प्रकार ऐसा क्यों होता है और ईंधन के मिश्रण और अनुपात का क्या महत्व है।

पिछली कई शताब्दियों में वे वैज्ञानिक सिद्धात खो गए हैं जिनके आधार पर प्राचीन भारतीय उन्नत प्रकार का इस्पात बना पाते थे। हमारे देश में फैले प्राचीन लौहङस्तम्भ केवल राजाओं के इतिहास के ही गवाह नहीं है अपितु वे हमारे समाज की वैज्ञानिक यात्रा का भी वृतांत देते हैं। अनपढ़ वनवासियों ने हमारे इस महत्वपूर्ण धरोहर को जीवित रखा है तो हमारा यह दायित्व है कि हम उसकी तह में जाकर उसे समकालीन बनाकर अपनी जड़ों से उनके इस लगाव को प्रासंगिक बनाए।