दीनदयाल जी का एकात्म चिंतन और आतंकवाद में झुलसता विश्व

पिछले दिनों दुनिया में बढ़ रहे आतंकवाद के हल के रूप में एकात्म मानववाद को प्रस्तुत किया गया है। एक तरह से देखें तो यह ठीक भी लगता है। आतंकवाद पनपता है मानवता की सही समझ के अभाव में। यदि हम लोगों को मानवता और उसके प्रति कर्तव्यों की ठीक शिक्षा दे सकें तो कट्टरता अपने आप समाप्त हो जाएगी। एकात्म मानववाद के प्रणेता पंडित दीनदयाल जी भी यही मानते थे। उन्होंने व्यक्ति, परिवार, ग्राम, समाज, देश और संसार के अलग-अलग खांचों को परस्पर जुड़ा होने की भारतीय अवधारणा की व्याख्या करते हुए सभी को अपनी चिंता करने की बजाय अपनी जिम्मेदारी की चिंता करने पर जोर दिया।
दीनदयाल जी की बात को स्मरण करने का एक विशेष कारण भी है। आज सामाजिक ढांचे की जितनी भी व्यवस्थाएं थी, सभी लगभग ढह चुकी हैं। पश्चिमी समाज की व्यक्तिकेंद्रित स्वार्थी व्यवस्था जिसे भूलवश पूंजीवादी व्यवस्था कह दिया जाता है, अमानवीय और अप्रासंगिक साबित हो चुकी है। लोगों ने इसके शोषण के खिलाफ हर संभव स्थान पर विद्रोह किया है। यह व्यवस्था समाज को सुचारू रूप से चलाने और सभी के कल्याण के लक्ष्य को पाने में पूरी तरह असफल रही है। इसकी प्रतिक्रिया में कार्ल माक्र्स ने साम्यवाद की जो अवधारणा दी, वह और उसका उदार चेहरा बने समाजवाद, दोनों ही असफल हो चुके हैं। साम्यवाद का सबसे बड़ा चेहरा तो सोवियत संघ था जो कि दो दशक पहले बिखर गया। साम्यवाद का नारा उन्हें एक नहीं रख सका और न ही उस पूरे इलाके के लोगों का कल्याण ही कर सका।
इसके अलावा पश्चिमी जगत के पास और कोई विकल्प नहीं है। यह उनकी वैचारिक जड़ता है। ऐसे में स्वाभाविक रुप से दुनिया की नजरें एशिया की ओर टिकी हैं। एशिया में भी चीन तो ऐसा साम्यवादी है कि उसके साम्यवाद पर ढेरों प्रश्न चिह्न खड़े किए जा सकते हैं। इसलिए भारत के अलावा और कोई विकल्प सुझाने की स्थिति में नहीं है। हमें यहां यह ध्यान रखना चाहिए कि लाखों वर्ष पूर्व हम एक बार यह घोषणा कर आए हैं कि पूरी दुनिया के लोग अपने चरित्र की शिक्षा ग्रहण करने यहीं इसी धरती पर आते हैं। आज फिर से दुनिया को भारत की उसी भूमिका की आवश्यकता है।
पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी की विशेषता यह है कि वे केवल दार्शनिक भर नहीं थे, वे दर्शन को जीते थे। पुस्तक की दार्शनिक व्याख्याओं की बजाय उनके जीवन प्रसंगों से हम एकात्म मानवदर्शन को बेहतर समझ सकते हैं। उन्होंने पहली बार राजनीतिक मतभेदों को दूर करते हुए देश और समाज के हित में दो भिन्न विचारधारा के दलों को साथ ला दिया था। यह उनके व्यक्तित्व का ही चमत्कार था।
वैश्विक परिप्रेक्ष्य में यदि हम देखें तो आतंकवाद के जनक देशों में भी व्यक्ति, परिवार, ग्राम, समाज, देश और दुनिया के बीच रहने वाली इसी अनिवार्य पारस्परिक सामंजस्य की समझ का अभाव दिखाई पड़ता है। इस अभाव का कारण मजहबी हो सकता है, राजनीतिक हो सकता है और सभ्यतागत भी हो सकता है। आवश्यक है कि दीनदयाल उपाध्याय जी के इस विचार और दर्शन को जो कि भारत का ही प्राचीन विचार और दर्शन ही है, को पूरे विश्व भर में फैलाया जाए। यह भारत की धरोहर है जिसका लाभ पूरी दुनिया को मिलना चाहिए।
अशान्ति, हिंसा और परस्पर वैमनस्य से भरी इस दुनिया में आपसी स्नेह और जिम्मेदारी का एकात्म भाव ही मानवता की राह दिखा सकता है।