स्वास्थ्य, जीवनशैली और अर्थव्यवस्था

पिछले दिनों कुछ खबरें ऐसी आई हैं जिन पर हमारे देश के अर्थनीति बनाने वालों को गंभीरता से ध्यान देना चाहिए। यह अलग बात है कि उन्हें इन खबरों का आर्थिक महत्व समझ ही नहीं आएगा। वे इसे खेती और जीवनशैली की समस्या बताकर अपना पल्ला झाड़ लेंगे। ये खबरें भारत के प्राचीन ज्ञान-विज्ञान को भी पुष्ट करती हैं। पहली खबर यह है कि राष्ट्रीय पोषण संस्थान के एक नवीनतम शोध-रिपोर्ट के अनुसार पिछले तीस वर्षों में खाद्य पदार्थों के पोषण-क्षमता में 30 प्रतिशत की कमी आई है। संस्थान ने यह शोध 1984 के नमूनों तथा आज के नमूनों पर किया। समझने की बात है कि यदि 1984 से आज तक में 30 प्रतिशत तक गुणवत्ता में कमी आई है तो 1960 से आज तक में कितनी कमी आई होगी। एक मोटा अनुमान करें तो यह कमी कम से कम 50 से 60 प्रतिशत की तो होगी ही। साफ है कि इसका सीधा असर मानव स्वास्थ्य पर पड़ता है जो कि अर्थव्यवस्था का सबसे प्रमुख अंग है। मनुष्य को ह्युमन रिसोर्स कहने का प्रचलन आखिर आज की अर्थव्यवस्था का ही तो है। यदि खाए जाने वाले पदार्थों में पोषण की क्षमता ही नहीं होगी तो इससे न केवल मनुष्य की कार्यक्षमता पर असर पड़ेगा, बल्कि उनका स्वास्थ्य भी बिगड़ेगा। खराब स्वास्थ्य कार्यक्षमता को और कम ही करेगा। समस्या यह है कि कृषि विशेषज्ञों का पूरा ध्यान केवल अधिकाधिक उत्पादन पर होता है, उसकी पोषण-क्षमता तथा स्वास्थ्यवर्धक होने पर नहीं। हरित क्रांति ने अनाज तो ढेर सारा पैदा कर दिया परंतु उसमें वह पोषण उपलब्ध ही नहीं है, उलटे कीटनाशकों के प्रयोग के कारण वह अनाज मानव स्वास्थ्य के लिए और हानिकर ही हो गया।
ऐसी ही एक और खबर आई कि मौसमी चीजें लोगों को रोगों से दूर रखेंगी। यह अध्ययन स्टैंडफोर्ड विश्वविद्यालय के एक शोध दल ने अफ्रीका की एक जनजाति पर किया। यह शोध केवल अफ्रीका पर लागू होता हो, ऐसा नहीं है। यह बात भारत समेत पूरी दुनिया के लिए सही है। आज की समस्या यह है कि आधुनिक विज्ञान के प्रकोप से सभी प्रकार के फल और सब्जियां हर मौसम में मिल जाते हैं। कुछ तो पैदा कर लिए जाते हैं और कुछ कोल्ड स्टोरेज के कारण उपलब्ध हो जाते हैं। इस प्रकार बेमौसम के फल और सब्जियां अपने देश में भी खूब खाई जाने लगी है। इन बेमौसमी फल-सब्जियों को खाकर लोगों को लगता है कि वे पौष्टिक भोजन कर रहे हैं, जबकि उनसे आपको रोग होने की संभावना ही बढ़ रही होती है। भारत की युगों पुरानी आयुर्वेद परंपरा में हमेशा से मौसमी फल और सब्जियों का सेवन करने की ही राय दी जाती है। वास्तव में हमारे पूर्वजों ने इसलिए भी ऐसी तकनीकें विकसित ही नहीं की जिससे बेमौसम के फल और सब्जियों को उपलब्ध किया जाए। तीसरा समाचार लोगों की जीवनशैली से संबंधित है, परंतु इसका प्रभाव भी हमारी अर्थव्यवस्था पर ही पडऩे वाला है। इस समाचार के अनुसार लोगों में कुछ ऐसी आदतें पड़ रही हैं, जो उन्हें बिल्कुल नहीं करनी चाहिए, यदि वे स्वस्थ रहना चाहते हैं। समाचार में भोजन के बाद चार कामों को स्पष्ट रूप से मना किया गया है। ये चार काम हैं, सोना, सिगरेट पीना, फल खाना और नहाना। आज की जीवनशैली में लोग रात को देर से भोजन करते हैं और भोजन करने के बाद सो जाते हैं, क्योंकि सुबह फिर उन्हें काम पर जाना होता है। यह बिल्कुल गलत है। ये बातें भी आयुर्वेद में प्रारंभ से ही बताई जा रही हैं।
इन तीनों समाचारों को एक साथ देखें तो हमें मानव संसाधन की कार्यक्षमता बढ़ाने का उपाय मिल सकता है। इनमें से कुछ उपाय तो लोगों के करने के हैं, परंतु कुछ उपाय सरकार को करने होंगे। चूंकि खेती और भंडारण दोनों ही सरकार ने अपने जिम्मे ले रखा है, इसलिए यह तो सरकार को सुनिश्चित करना होगा कि ऐसी खेती हो जिससे अनाजों की पोषकता बढ़े। इसमंे रासायनिक खेती एकदम से त्याज्य है। तो जितनी ताकत लगा कर सरकार ने रासायनिक खेती को बढ़ाया है, उसकी दोगुनी ताकत लगा कर गौआधारित खेती को प्रोत्साहन दे। रासायनिक खादों और कीटनाशकों पर अनुदान ही बंद न किया जाए, बल्कि उन पर इतना अधिक कर लगाया जाए कि उनका बिकना कठिन हो जाए। लोगों की जीवनशैली में एक बड़ी बाधा नौकरी की भी है। सरकार कार्यालयों के खुलने के समय को बदल कर लोगों को मौका दे सकती है कि वे स्वस्थ जीवनशैली का पालन कर सकें।
यह समझ लें कि मनुष्य को स्वस्थ रखना किसी भी आर्थिक नीति का पहला लक्ष्य होना चाहिए। मनुष्य को बीमार करके पाई गई समृद्धि किसी काम की नहीं है। इसके हरसंभव उपाय व्यक्ति, सरकार और समाज तीनों को ही करना चाहिए।