स्वास्थ्य के दो पहरेदार

जवाहर लाल कौल

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

जार्जटाउन विश्वविद्यालय के संक्रामक रोग महाविद्यालय के निदेशक डाक्टर विंसेंट गर्गूसी की प्रयोगशाला में काम करने वाले सहायक काफी दिनों से परेशान थे। प्रयोगशाला का वातावरण यूं भी अनेक रसायनों की विभिन्न तरह गंधों के कारण बोझिल ही होता है, ऊपर से इस विज्ञानी की सनक ने प्रयोगशाला में काम करना मुश्किल बना डाला। गम्भीर वैज्ञानिक अनुसंधान में इस जंगली जड़ी का क्या काम जिसे आदिवासी भूत भगाने के लिए इस्तेमाल करते हैं। सठिया गया है विज्ञानी। लेकिन गर्गूसी अपनी धुन में लगे रहे। बाजार जाते, ढेर सारा लहसुन खरीद लाते, उसे पीसते और डिश में रखे बैक्टीरिया को खिलाते। बड़े मनोयाग से रोगाणुओं का मरना देखते रहते। बैक्टीरिया मरते क्या, जैसे देखते देखते गायब ही हो जाते थे।

गर्गूसी को तब भरोसा नहीं हुआ था जब उसने चीनी मेडिकल जर्नल मे किया गया यह दावा पढ़ा था कि मैननजाइटिस की एक गम्भीर महामारी में लहसुन के सेवन से अस्सी प्रतिशत रोगियों को बचा लिया गया था। इसे जर्नल में प्राचीन पूर्वी चिकित्सा प्रणाली बताया गया था। लेकिन अपने प्रयोग पात्रा में मिनटों तक उसी रोग के बैक्टीरिया की विनाश लीला देखने के बाद गर्गूसी ने मान लिया कि वाकई वे लोग सही थे।

बीसवीं शतादी में ही विभिन्न जड़ी बूटियों और शाक-सब्जियों के औषधीय गुणों की ओर चिंिकत्सा जगत का ध्यान गया था लेकिन परम्परागत चिकित्सा प्रणालियों के बारे में पूर्वाग्रह के कारण देसी औषधियों को संदेह की दृष्टि में ही देखा जाता था। इक्कीसवीं शताब्दी के अंतिम चरण में ही कुछ एलोपैथिक चिकित्सा विज्ञानियों ने इस दिशा में गम्भीर जांच और अनुसंधान करना आरम्भ कर दिया। जब एक बार दो-चार विज्ञानियों को सकारात्मक नतीजे मिले तो फिर इस क्षेत्रा में शोध करने की होड़-सी लग गई। आज लगभग उन सभी औषधीय वनस्पतियों के बारे में वे सारे दावे सही पाए गए हैं जिन्हें पूर्वी चिकित्सा प्रणालियों में सदियांे से रोगनिवारक औषधियों के रूप में प्रयोग में लाया जाता रहा है।

लेकिन अभी भी पश्चिमी विज्ञानियों का ध्यान केवल उन्हीं वनस्पतियों पर गया है जिनका सेवन आज विश्वभर में फलों या शाक-सब्जियों के रूप में किया जाता है। लोक-व्यवहार या दैनिक खानपान के प्रयोग में आने वाले हजारों पेड़-पौधे तो आज भी पश्चिमी चिकित्सा प्रणाली से दूर ही हैं। पश्चिमी चिकित्सा जगत जिसने दुनिया के बाजार के बडे़ हिस्से पर कब्जा किया हुआ है, उसमें जड़ी बूटियों से बाजार की संभावनाए ही अधिक महत्त्वपूर्ण रहती हैं।

 

गुणकारी है लहसुन

कैंसर और एड्स जैसे मारक रोगों के आतंक के कारण दो भारतीय औषधियों की छानबीन जोरों से होने लगी है। हालांकि लहसुन और अदरक के और भी अनेक गुणों के बारे मे भारत में पर्याप्त जानकारी है लेकिन इन्हें आज विज्ञानी शोध में नायक का दर्जा मिल रहा है। अभी तय नहीं हुआ है कि इस प्रतियोगिता में लहसुन नायक है कि अदरक। हम जानते हैं कि लहसुन के औषधीय गुणों की जानकारी भारत में प्राचीन काल से थी। आयुर्वेद के कई मान्य ग्रंथोें में इसका वणर््ान है जिनमें चरक संहिता भी शामिल है। यह आयुर्वेदिक चिकित्सा में एक प्रचलित औषधि रही है।

सच तो यह है कि प्राचीन विश्व में भारत ही नहीं, चीन, जापान और मध्य एशिया में भी इसका बहुत प्रचलन था। बताया जाता है कि मिश्र के प्राचीन राज्यवंशों ने इसे महत्त्वपूर्ण औषधि का दर्जा दिया था। वहीं से यह यूरोप भी पहंुचा। एलोपैथी में जिस हिपोक्रेटस के नाम से प्रतिज्ञा की जाती है, उसने भी विभिन्न रोगों के लिए लहसुन का उपयोग किया। लेकिन आधुनिक एलोपैथिक चिकित्सा में इस तथ्य को पहली बार तब स्वीकार किया गया, जब वर्ष 1944 में एक रसायन विज्ञानी चेस्टर कैविलिटो ने पाया कि लहसुन में उस समय की सबसे प्रभावी औषधि पेनिसिलिन से भी अधिक प्रकार के बैक्टीरियामारक गुण हैं। एक विज्ञानी ने तो यह तक घोषित किया कि हम जितनी औषधियों को जानते हैं, उन सबसे अधिक संख्या में लहसुन में रोगाणुमारक गुण हैं। यह बैक्टीरिया, फंगस, पैरासाइट, प्रोटोजुआ और वाइरल की नाशक जादुई वनस्पति है। यह गुण लहसुन के उस भाग में हैं जिससे तीव्र गंध पैदा होती है। इस रस को एलिसिन कहा गया।

लेकिन इससे पहले ही लहसुन से बनी औषधियों का सेवन भारत, चीन और जापान में हो रहा था। इस मामले में जापान ने ही सबसे पहले लहसुन पर आधारित अपनी एक औषधि को दुनिया में प्रचलित करा दिया। जापान की इस औषधि की लोकप्रियता का कारण यह था कि उसमें लहसुन की गंध को बहुत कम कर दिया गया है। गंधहीन औषधि ‘क्योलिक’ उस समय की किसी भी एलोपैथिक औषधि का मुकाबला कर सकती थी। कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के डाक्टर बैंजामिन लाओ ने अपने परीक्षण में इस जापानी औषधि क्योलिक के चमत्कारी परिणाम निकाले। उन्होंने पाया कि लहसुन से कुछ दिन के उपचार के पश्चात ही रक्त में अतिरिक्त कोलेस्ट्रोल में तेजी से कमी आती है। एलडीएल कम होता है और उसी अनुपात में एचडीएल बढ़ जाता है। एलडीएल नुकसानदेह कोलेस्ट्रोल होता है, जिसके कारण दिल की बीमारियां होती है और एचडीएल लाभदायक कोलेस्ट्रोल होता है।

इसमें एक समस्या भी थी। पहले दस दिन में बुरा कोलेस्ट्रोल बहुत तेजी से घटता था परंतु धीरे-धीरे घटने की दर कम होती जाती थी। इसका कारण भी उन्होंने खेाज लिया। आरम्भ में तेजी से कोलेस्ट्रोल शरीर के विभिन्न भागों से निकल कर रक्त में आता है जहां से वह बाहर चला जाता है।

भारतीय मूल के एक विज्ञानी डा. सच्चर ने अतिरिक्त कोलेस्ट्रोल वाले कई रोगियों पर अनुसंधान किया और पाया कि पच्चीस दिन के उपचार में ही सारा अतिरिक्त कोलेस्ट्रोल निकल गया। इस स्थिति को बनाए रखने के लिए रोगी को केवल लहसुन की दो कच्ची कलियां प्रतिदिन खाने की आवश्यकता है।

ऐसे ही एक प्रयोग में डा. तारिक अब्दुल्ला ने असाधारण साहस का परिचय दिया। नौ व्यक्तियों पर प्रयोग किया गया, जिनमें डा. अब्दुल्ला स्वयं भी शामिल थे। अब्दुल्ला ने कई दिन तक कच्चा लहसुन खाया, कुछ लोगों ने जापानी औषधि क्योलिक का सेवन किया और कुछने कुछ भी नहीं खाया। फिर इन सभी लोगों के शरीर में वे मारक कोशिकाएं डाल दी गई जो आरम्भिक अवस्था में रोगी को दी जाती है। ये कैंसर कोशिकाओं को मारती हैं। नतीजा चौंकाने वाला था। जिन लागों ने लहसुन खाया था, उनके शरीर में न खाने वालो की तुलना में 140 से 160 प्रतिशत अधिक कैंसर कोशिकाए नष्ट हुईं।

अदरक पीछे नहीं है

अदरक या सौंठ हमारी रसोई का अंग होता है। हम प्रायः इनका सेवन स्वाद के लिए करते हैं, लेकिन जब उनके औषधीय गुणों के लिए उनका प्रयोग होता है तो उसे नानी, दादी का नुस्खा समझ कर अनदेखा करते हैं। आयुर्वेद में इस वनस्पति का काफी महत्त्व है। भारतीय चिकित्सा प्रणाली में ही नहीं, चीनी और तिब्बती प्रणालियों में भी इसके कई गुणों का वर्णन है। लेकिन यूरोप में इसको एक विशेष गुण के लिए ही जाना जाता था। समुद्री जहाजों, गाड़ियों आदि में कई लोगों को तेज गति के कारण चक्कर आते हैं। यूरोपवासियों को कहीं से पता चला था कि अदरक खाने से गति के कारण चक्कर आना बंद होता है।

इस दावे को सिध्द करने के लिए एक गोल-गोल चक्कर लगाने वाली गाड़ी का इस्तेमाल किया गया। तेज चक्कर लगाते हुए उस पर बारह आदमी सवार थे। छह को पहले ही सौंठ खिलाई गई थी। परीक्षण का समय छह मिनट था। छह मिनट के बाद वे सभी लोग सही सलामत थे जिन्होंने सौंठ खाई थी। शेष छह का हाल बहुत बुरा था, उन्हें तीन चार मिनटों के बाद ही उतार दिया गया, क्योंकि चक्कर, सरदर्द और उल्टी से वे लोटपोट हो रहे थे।

यूरोपवासियों को सौंठ के इस गुण के बारे एशिया में उपनिवेश बनाने के बाद ही पता चला था। हिंद महासागर में छोटे-छोटे टापुओं के मछुआरे इसका इस्तेमाल करते थे। मलाया, आज के मलेशिया और हांगकांग के मछुआरों से पहली बार उन्होंने अदरक का राज जाना। बरसों बाद जो परीक्षण प्रयोगशाला में हुए, उनसे एक बात और पता चली कि जो एलोपैथी की दवाइयां उस समय दी जा रही थीं, वे न केवल बेकार साबित हुईं अपितु उनसे अक्सर यात्राी सोता ही था। सौंठ में यह कमी नहीं क्योंकि सौेंठ अंतड़ियो पर प्रभाव डालता है, जबकि एलोपैथी की दवाइयां दिमाग को ही सुला देती थी।

एक भारतीय चिकित्सक के. सी. श्रीवास्तव ने अदरक की वह खूबी खोज ली जिसके लिए दशकों से चिकित्सक परेशान थे। यूं तो खून के थक्के बनना मनुष्य की काया के लिए एक बहुत ही आवश्यक साधन है। जब कभी कोई घाव लगता है तो धमनियों से रक्त बाहर बहने लगता है। यदि रक्त हवा के संपर्क में आते ही अपने आप न जम जाए तो रक्त के बहाव को रोकना बहुत ही कठिन हो जाएगा। प्रकृति ने रक्त के इस जमने को शरीर के बचावी साधन के रूप में विकसित किया है। लेकिन यह गुण जो जान बचाने के लिए बना है, जान लेने का काम भी करता है।

कभी कभी कुछ लोगों में रक्त में थक्के पड़ने की बीमारी होती है। ऐसे रोगियो का रक्त गाढ़ा हो जाता है और ऐसे रक्त का धमनियों में सरलता से बहना मुश्किल होता है। अंग प्रत्यारोपन करने वाले चिकित्सकों को इससे विशेष रूप से परेशानी रही है। एक व्यक्ति के शरीर में किसी दूसरे स्रोत से लाया गया अंग प्रत्यारोपित करने में यह गाढ़ा रक्त बहुत बड़ी समस्या है।

पिछले एक दो दशक में कई औषधियां विकसित की गई हैं जो रक्त को पतला करती हैं। लेकिन डाक्टर श्रीवास्तव ने अत्यंत सरल और सस्ता उपाय खोजा। उन्होंने पाया कि अदरक में रक्त को पतला रखने का चमत्कारी गुण है। अदरक रक्त के प्ल्ेाटलेट को जुड़ने ही नहीं देता। कोर्नेल विश्वविद्यालय के चार्ल्स डोर्साे भी इसी निष्कर्ष पर पहंुचे। डोर्सो ने अपने ही प्लेटलेटों का उपयोग परीक्षण के लिए किया। उन्होंने पाया कि प्लेटलेट जुड़ते ही नहीं। यही प्रयोग अन्य लोगों पर भी किया तो देखा सामान्य से अधिक रक्त जमाने वाले तत्त्व डालने पर भी रक्त जमने से इन्कार करता है।

अदरक के अनेक गुणों में जापानी अनुसंधानकर्ताओं ने एक नई विशेषता जोड़ दी है, जो कालांतर में आधुनिक कायचिकित्सा में क्रंाति पैदा कर सकती है। कैंसर जैसे रोग दरअसल कहीं बाहर से नहीं आते, शरीर ही उन्हें जन्म देता है। रोगी की सामान्य कोशिकाएं ही पगला जाती हैं और मारक बन जातीं हैं। ऐसा वे इसलिए करती हैं कि उनके भीतर ही रूपांतरण होता है। वे अपना स्वरूप और स्वभाव बदल देती हैं। इसे विज्ञानी म्यूटेशन कहते हैं। जापानी विज्ञानी कहते हैं कि अदरक या सौंठ में कोशिकाओं के रूपांतरण की प्रवृत्ति पर रोक लगाने की क्षमता है। इस तरह लोक में प्रचलित और प्राचीन चिकित्सा प्रणालियों में चिन्हित विशेषताओं की पुष्टि अब सीधे विश्व की प्रसिध्द प्रयोगशालाओं से आ रही है।