स्वास्थ्य एवं यौवन का रक्षक आयुर्वेद

Dr.Nitin agarwalआज दुनिया भर में आयुर्वेद की लोकप्रियता बढ़ रही है। एलोपैथ चिकित्सा के साइड इफेक्ट से चिंतित रोगी आयुर्वेद की चिकित्सा की ओर जाते हैं। परंतु देखा यह जाता है कि वे आयुर्वेद से भी संतुष्ट नहीं हो पाते  है। ऐसा क्यों है? क्या यह आयुर्वेद की विफलता है? अथवा इसमें रोगियों की ओर से कुछ कमी रह जाती है, या फिर वैद्य ठीक से इलाज नहीं कर रहे हैं ? इन्हीं सब सवालों पर हमने पिछले दिनों प्रख्यात आयुर्वेदाचार्य डा. नितिन अग्रवाल से बातचीत की ……..

सब स्वीकार करते हैं कि आयुर्वेद, विश्व को भारत की देन है। परंतु देखा जाता है कि अपने ही देश में आयुर्वेद के प्रति उपेक्षा का भाव है। आम तौर पर लोग आयुर्वेद का इलाज कराते नहीं हैं और यदि कराते हैं तो शीघ्र लाभ न होने की शिकायत करते हैं और फिर से एलोपैथ की शरण में चले जाते हैं। इसका क्या कारण है?
इसका सबसे पहला कारण तो यह है कि अधिकांश लोग बिना विषय को समझे केवल तात्कालिक इलाज या फिर लक्षणों के इलाज पाने का प्रयास करते हैं। आयुर्वेद के विशेषज्ञ और चिकित्सक भी लोगों को आयुर्वेद और एलोपैथ के अंतर को समझा पाने में असफल रहे हैं। एलोपैथ चिकित्सा रोग के लक्षणों पर असर करती है, आयुर्वेद की चिकित्सा रोग के मूल कारण को ठीक करती हैं। परंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि आयुर्वेद से तुरंत लाभ नहीं होता। इनसे भी तत्काल लाभ होता है।
समझने की बात यह है कि रोग के लक्षण प्रकट होना रोग का पांचवां चरण है। रोग की उत्पत्ति के पहले चार चरण निकल चुके होते हैं। दुर्भाग्य यह है कि हमें इस पांचवें चरण में पैदा हुए रोग के लक्षणों को दबाने की आदत हो गई है। फिर उसकी तुलना आयुर्वेद से की जाती है, इसमें कठिनाई तो आएगी। यदि लोगों को विषय समझा दिया जाए तो आयुर्वेद की चिकित्सा भी तुरंत परिणाम देगी।

रोगी को आयुर्वेद की चिकित्सा लेने में क्या सावधानी रखनी चाहिए या फिर किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
यह भी एक दुर्भाग्य ही है कि अधिकांश लोग पहले एलोपैथ का इलाज कर चुकने के बाद ही आयुर्वेद की ओर जाते हैं और वहां वे यह आशा करते हैं कि त्वरित इलाज हो जाए जो कि एलोपैथ से भी नहीं हो पाया है। आयुर्वेद कोई जादू-मंतर तो है नहीं। भले ही कुछ वैद्य इसे रहस्य के रूप में प्रस्तुत करें, परंतु यह तो शुद्ध विज्ञान है। इसलिए रोग प्रारंभ होते ही पहले आयुर्वेद के चिकित्सक के पास जाएं। वहां आप को इलाज करने के साथ आहार-विहार और जीवनशैली से जुड़ी अनेक सावधानियां भी बताएंगे। यदि आप रोग की प्रारंभिक अवस्था में पहुंच जाते हैं तो निराकरण बहुत शीघ्र हो जाएगा। आयुर्वेद का प्रमुख सिद्धांत है कि इलाज से परहेज बेहतर।
वास्तव में बहुत सी बीमारियां खराब जीवनशैली के कारण चयापचय की प्रक्रियाओं के बिगड़ने से पैदा होती हैं। ऐसे में लोग पूरी तरह मामला खराब होने के बाद आयुर्वेद के पास आते हैं। उदाहरण के लिए मधुमेह के रोगी तब आते हैं जब उन्हें इन्सुलीन लेना अनिवार्य हो जाता है। इसी प्रकार कोलेस्ट्राल का स्तर खतरे की सीमा पार कर जाने के बाद लोग आयुर्वेद के पास जाते हैं। लोगों को यह भ्रम रहता है कि आयुर्वेद के कारण उनका सामान्य भोजन आदि बंद हो जाएगा। ऐसा नहीं है। वह तो कुछ परहेज और व्यवस्थाएं बताएगा। जैसे, नास्ता और भोजन समय पर लें, गरम पानी पीयें, मीठा आदि कम कर दें। पूरी तरह किसी भी चीज को मना नहीं किया जाता। और कुछ आयुर्वेदिक योगों का सेवन करें।
मेरा यही कहना है कि रोग के जटिल होने से पहले उसके पाँच चरण और हैं और उनके दौरान शरीर हमें चेतावनी देता है कि शरीर में कुछ तो गड़बड़ चल रही है। हम उनकी उपेक्षा कर देते हैं।

क्या आज के आयुर्वेदाचार्य रोगियों को अपने शरीर की चेतावनियों को पहचानना सिखाते हैं?
यदि वे नहीं सिखाते हैं तो सिखाना चाहिए। परंतु कई बातें तो हम स्वयं भी पहचान सकते हैं। देखिए, रोग के सामान्य लक्षणों की उपेक्षा करते हुए हम अपने दैनंदिन कार्यों को जारी रखते हैं। जैसे कि बार-बार सर्र्दीी-जुकाम होता रहता है और हम कोई एक गोली लेकर काम पर चले जाते हैं। बच्चे स्कूल चले जाते हैं। हम यह ध्यान नहीं देते कि यह हमारे इम्यून यानी कि रोगप्रतिरोधक क्षमता के कम होने का संकेत है। जल्दी-जल्दी सरदर्द होना, बुखार आ जाना, शरीर में सुस्ती बने रहना, कब्ज होना, बार-बार एसिडिटी होना आदि ऐसे ही लक्षण हैं जो शरीर में चल रही गड़बड़ियों को बताते हैं। इन गड़बड़ियों के दौरान आप परीक्षण करवाएंगे तो उसमें कुछ नहीं निकलेगा क्योंकि रोग अभी प्रारंभिक अवस्था में है। जब वह पांचवे चरण में पहुंचेगा, तब जाँच में कुछ निकल कर आएगा। परंतु आयुर्वेद इन्हीं अवस्थाओं को ठीक करने का उपाय करता है। स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता तो आयुर्वेद का प्रमुख विषय है। स्वास्थ्य का संरक्षण, परहेज और इलाज, आयुर्वेद के ये तीन स्तंभ हैं।
स्वास्थ्य के संरक्षण के लिए ही वाजीकरण और रसायनों का विधान है। बताइए और किस चिकित्सा विधा में इनकी चर्चा पाई जाती है? रसायन यानी कि टॉनिक। इन्हें लगातार लेने से आपका यौवन हमेशा बना रहता है और इसका आपकी आयु से कोई लेना-देना नहीं होता। आप चालीस वर्ष के हों या साठ के, आपके शरीर में ऊर्जा बनी रहे, चेहरे पर ओज रहे, यह इनका काम है। वाजीकरण को लोगों ने यौनक्षमता से जोड़ दिया है परंतु इसका संबंध शुक्र धातु से है। शुक्र धातु मजबूत रहेगी तो शरीर के अंदर क्षमता भी बनी रहेगी। वाजीकरण के लिए तो ब्रह्मचर्य भी आवश्यक है। चिकित्सा की यह विधा दुनिया के किसी चिकित्सा प्रणाली में नहीं पाई जाती। और यदि कहीं पाई भी जाती है, जैसे कि ग्रीस में तो वह भी भारत से ही गई है।

एक बात और आम लोग अनुभव करते हैं कि आयुर्वेद भी काफी मंहगा है। एलोपैथ से अधिक मंहगा न भी हो तो कम भी नहीं है। ऐसा क्यों है?
यह बात काफी हद तक सही है। सबसे बड़ी समस्या जड़ी-बूटियों की उपलब्धता की है। उपलब्धता कम होने के कारण वे मंहगी भी हैं। आयुर्वेद का प्रसार, जड़ी-बूटियों का उत्पादन, उनकी प्राकृतिक खेती आदि के बारे में सही सरकारी नीति नहीं होने के कारण से बड़ी-बड़ी कंपनियां जिस प्रकार से जड़ी-बूटियों को संग्रह कर रही हैं, अनेक औषधीय पौधों पर तो लुप्त होने का खतरा मंडराने लगा है। आज एक तरफ किसानों को फसल बेचने में समस्या आ रही है और दूसरी ओर औषधीय पौधे उपलब्ध नहीं हैं। यदि इनकी खेती की जाए तो दोनों की ही समस्याओं का समाधान हो सकता है। इसके लिए उन स्थानों की पहचान की जानी चाहिए जहां इनकी खेती की जा सकती है या फिर हरेक स्थान के अनुसार यह तय किया जाना चाहिए कि वहां की मिट्टी और पर्यावरण के अनुसार वहां कौन से औषधीय पौधों की खेती करना उपयुक्त होगा। इससे उन औषधियों की गुणवत्ता भी बनी रहेगी। तभी आयुर्वेदिक औषधियों के मूल्य कम हो सकते हैं। इससे उनकी शुद्धता भी सुनिश्चित की जा सकेगी जिससे उनका प्रभाव भी तत्काल होगा।