स्वतन्त्रता संग्राम में संस्कृतनिष्ठ पत्रकारों की भूमिका

स्वतन्त्रता संग्राम में संस्कृतनिष्ठ पत्रकारों की भूमिका

डॉ. बलदेवानन्द सागर
लेखक आकाशवाणी से संबंद्ध हैं।


संस्कृत भारत की सांस्कृतिक धरोहर है। इस राष्ट्र की पहचान और अस्मिता है। स्वतन्त्र-भारत की भाषाई नीति के चक्रव्यूह में न पड़कर आज संस्कृत पत्रकारिता के क्षेत्र में नित-नूतन हो रहे प्रयोगों की पड़ताल करें तो लगता है कि विश्व की अधिकाधिक भाषाएँ, इस वैज्ञानिक और गणितात्मक वाणी विज्ञान से लाभान्वित हो रही हैं। कम्यूटर भाषा विज्ञान को परिपोषित और सम्वर्धित करने में संस्कृत के शब्दानुशासन से अधिकाधिक मदद ली जा रही है। ऐसे परिदृश्य में किन्हीं कारणों से धीमी गति से चलने वाली संस्कृत पत्रकारिता अब आधुनिक संचार माध्यमों के सर्वविध क्षेत्रों में और सामाजिक संचार माध्यमों में अपनी उपयोगिता और प्रभाव को स्थापित कर रही है।
जब भी हिन्दी पत्रकारिता की बात होती है तो हिन्दी के प्रथम पत्र उदन्त-मार्तण्ड (1826 ई., सम्पादक पं. जुगल किशोर शुकुल) का सन्दर्भ अवश्य दिया जाता है। ठीक उसी तरह से, संस्कृत पत्रकारिता के इतिहास में ईस्वी सन् 1866 में पहली जून को काशी से प्रकाशित काशी विद्या सुधानिधि: का उल्लेख अवश्य होता है। संस्कृत पत्रकारिता की इस प्रथम पत्रिका का दूसरा नाम था पण्डित पत्रिका। काशी से ही 1967 ई. में क्रमनन्दिनी का प्रकाशन आरम्भ हुआ। विशुद्ध संस्कृत की ये दोनों पत्रिकाएँ प्राचीन संस्कृत ग्रन्थों का भी प्रकाशन करती थीं। इनमें विशुद्ध समाचार पत्रों के लक्षण नहीं थे। अप्रैल, 1872 ई. में लाहौर से विद्योदय: नए साज-सज्जा के साथ शुद्ध समाचार पत्र के रूप में अवतरित हुआ। हृषीकेश भट्टाचार्य के सम्पादकत्व में इस पत्रिका ने संस्कृत पत्रकारिता को अपूर्व सम्बल प्रदान किया। विद्योदय: से प्रेरणा पाकर संस्कृत में अनेक नयी पत्र-पत्रिकाएँ प्रकाशित होने लगीं।
इतिहास की इस बात को दोहराते हुए कहना चाहूँगा कि काशीविद्यासुधानिधि: (एक जून, 1866) से शुरू हुयी इस संस्कृत पत्रकारिता की यात्रा में अनेक छोटे-बड़े पड़ाव आये और इस बिन्दु को और अधिक व्यापक रूप में समझने के लिए मैं लोकमान्य तिलकजी के मराठी भाषिक केसरी का उल्लेख करना चाहूँगा।
भारत की भाषा ई-पत्रकारिता के इतिहास में, वैसे तो अनेक दैनिक-मासिक पत्र-पत्रिकाओं का महत्वपूर्ण योगदान रहा है किन्तु केसरी की बात कुछ ख़ास है। विष्णु शास्त्री चिपलूण कर, बाल गंगा धर तिलक, वामन शिव राम आप्टे, गणेश कृष्ण गर्दे, गोपाल गणेश आगरकर और महादेव वल्लभ नाम जोशी के हस्ताक्षरों के साथ केसरी का उद्देश्य-पत्र 1880 ईस्वी. की विजयादशमी को मुम्बई के नेटिव-ओपिनियन में प्रकाशित कराया गया। केसरी के प्रकाशन का निर्णय तो हो गया लेकिन मुद्रण के लिए पूँजी की समस्या थी। अन्तत:नाम जोशी की व्यावहारिक-कुशलता के साथ 4-जनवरी 1881 को पुणे से साप्ताहिक केसरी (मराठी) का प्रति मंगलवार को प्रकाशन होने लगा।
जिस बात की ओर मैं संकेत करना कहता हूँ, वह है संस्कृत के दिग्गज रचनाकार पण्डित राज जगन्नाथ के भामिनी विलास का वह प्रसिद्ध संस्कृत-श्लोक, जो केसरी के उद्देश्य और कार्य को द्योतित करता है। विष्णु शास्त्री चिपलूण कर द्वारा चुना गया और केसरी के मुख पृष्ठ पर निरन्तर छपा यह श्लोक इस प्रकार है-
स्थितिंनोरेदध्या:क्षणमपिमदान्धेक्षण-सखे!
गज-श्रेणीनाथ! त्वमिहजटिलायांवनभुवि।
असौकुम्भि-भ्रान्त्याखरनखरविद्रावित-महा-
गुरु-ग्राव-ग्राम:स्वपितिगिरिगर्भेहरिपति:।।
अर्थात् हे गजेन्द्र ! इस जटिल वन-भूमि में तुम पलभर के लिए भीम तरू को, क्योंकि यहाँ पर पर्वत-गुफा में वह केसरी (हरिपति) सो रहा है जिसने हाथी के माथे जैसी दिखने की भ्रान्ति में बड़ी-बड़ी शिलाओं को भी अपने कठोर नाखूनों से चूर-चूर (विद्रावित) कर दिया है।
इस लघु आलेख में संस्कृत-पत्रकारिता के 152 वर्षों के इतिहास को संकेत रूप में कहना चाहूँ तो मुझे बंकिमचन्द्र चटर्जी के सुख्यात बंगला उपन्यास आनंद मठ का वन्दे मातरम् – यह उद्घोष-गीत याद आ रहा है। मेरा विनम्र मन्तव्य यही है कि तत्कालीन भाषा ई-पत्रकारिता के लेखक-सम्पादक-प्रकाश कब हुतायत संख्या में या तो संस्कृत के जानकार या विशेषज्ञ थे या संस्कृत के प्रतिनिष्ठा वान्थे और पत्रकारिता के समर्पित कार्य के लिए संस्कृत के समृद्ध साहित्य का आश्रय लेते थे। चूँकि स्वाधीनता-प्राप्ति के लिए जन-सामान्य की भाषा में संचार और सम्वाद करना ज़रूरी था, इसलिए विभिन्न भारतीय भाषाओं में तुलनात्मक-रूप से अधिक और संस्कृत में कम, पत्र-पत्रिकाएँ छपती रहीं। किन्तु भारत के सभी राज्यों से प्रकाशित होने वाली संस्कृत-पत्र-पत्रिकाओं की बात करें तो किसी एक प्रान्तीय-भाषा या हिन्दी या अंग्रेजी-उर्दू की तुलना में समग्र रूप से संस्कृत-पत्र-पत्रिकाओं की संख्या अधिक मानी जा सकती है।शोध के आधार पर यह संख्या 120 से 130 के बीच की कही जा सकती है।
बिहार का पहला संस्कृत-पत्र 1878 ई. में विद्यार्थी के नाम से पटना से निकला। यह मासिक पत्र 1880 ई. तक पटना से नियमित निकलता रहा और बाद में उदयपुर चला गया, जहाँ से पाक्षिक रूप में प्रकाशित होने लगा। कुछ समय बाद यह पत्रिका श्रीनाथद्वारा से प्रकाशित होने लगी। आगे चल कर यह हिन्दी की हरिश्चन्द्र-चन्द्रिका और मोहनचन्द्रिका पत्रिकाओं में मिलकर प्रकाशित होने लगी। यह संस्कृत-भाषा का पहला पाक्षिक-पत्र था जिसके सम्पादक पं. दामोदर शास्त्री थे एवं इसमें यथानाम प्राय: विद्यार्थिओं की आवश्यकता और हित को ध्यान में रखते हुए सामग्री प्रकाशित की जाती थी। 1880 ई. में पटना से मासिक धर्मनीति-तत्त्वम् का प्रकाशन हुआ, किन्तु इसके विषय में कोई ख़ास जानकारी नहीं मिल पाती है और नहीं इसका कोई अंक उपलब्ध है।
17 अक्टूबर, 1884 ई. को कुट्टूर (केरल) से विज्ञान-चिन्तामणि: नामक मासिक पत्रिका का प्रकाशन आरम्भ हुआ। कुछ समय बाद, प्रचारातिरेक के कारण यह पत्रिका पाक्षिक, दशाह्निक और अन्तत: साप्ताहिक हो गयी। नीलकान्त शास्त्री के सम्पादकत्व में यह पत्रिका संस्कृत पत्रकारिता के विकास में मील का पत्थर सिद्ध हुयी।
संस्कृत की समृद्धि, प्रतिष्ठा और शिक्षाप्रणाली के परिष्कार के लिए पं. अम्बिकादत्त व्यास द्वारा 1887 ई. में स्थापित संस्था बिहार-संस्कृत-संजीवन-समाज: , संस्कृत के प्रचार-प्रसार के लिए प्रयासरत रहा। इसकी पहली बैठक पाँच अप्रैल, 1887 ई. में हुयी, जिसकी अध्यक्षता पॉप जॉन बेन्जिन ने की थी। इसमें अनेक राज्यों से बहुत-सारे लोग आये थे। सचिव स्वयं पं. अम्बिकादत्त व्यास जी थे। इस समाज द्वारा 1940 ई. में त्रैमासिक के रूप में संस्कृत सञ्जीवनम् का प्रकाशन आरम्भ किया गया था।
19वीँ शताब्दी के अन्तिम दो दशकों में बहुत सारी संस्कृत-पत्रिकाओं का प्रकाशन हुआ। राष्ट्रीय आन्दोलन की दृष्टि से इन सभी में संस्कृत-चन्द्रिका और सहृदया का विशेष स्थान है। पहले कोलकाता और बाद में कोल्हापुर से प्रकाशित होने वाली संस्कृत-चन्द्रिका ने अप्पाशास्त्री राशिवडेकर के सम्पादकत्व में अपार ख्याति अर्जित की। अपने राजनीतिक लेखों के कारण अप्पाशास्त्री को कई बार जेल जाना पड़ा। संस्कृत-भाषा का पोषण और सम्वर्धन, संस्कृत-भाषाविदों में उदार दृष्टिकोण का प्रचार तथा सुषुप्त संस्कृतज्ञों को राष्ट्र-हित के लिए जगाना आदि उद्देश्यों को ध्यान में रखकर सहृदया ने राष्ट्रिय-आन्दोलन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी।
20वीं शताब्दी के आरम्भ में लोकमान्य तिलक के नेतृत्व में सारे देश ने स्वदेशी आन्दोलन में भाग लिया था। संस्कृत-पत्रकारिता के लिए ये सम्वर्धन का युग था। उस अवधि में देश के विभिन्न भागों से अनेक संस्कृत-पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन हुआ, जिनमें भारतधर्म (1901 ई.), श्रीकाशीपत्रिका (1907 ई.), विद्या (1913 ई.), शारदा (1915 ई.), संस्कृत-साकेतम् (1920 ई.) वगैरह प्रमुख थीं। अर्वाचीन संस्कृत साहित्य के अनुसार 1918 ई. में पटना से पाक्षिक मित्रम् का प्रकाशन शुरू हुआ था। इसका प्रकाशन संस्कृत संजीवन समाज करता था।
स्वतन्त्रता संग्राम के दिनों में अन्य प्रमुख संस्कृत पत्रिकाएँ थीं – आनन्दपत्रिका (1923 ई.), गीर्वाण (1924 ई.), शारदा (1924 ई.), श्री: (1931 ई.), उषा (1934 ई.), संस्कृत ग्रन्थमाला (1936 ई.), भारतश्री: (1940 ई.) आदि। 1938 ई. में कानपुर से अखिल भारतीय संस्कृत साहित्य सम्मलेन का मासिक मुखपत्र संस्कृत रत्नाकर: आरम्भ हुआ। श्री केदारनाथ शर्मा इसके सारस्वत सम्पादक एवं प्रकाशक थे। 1943 ई. में राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ की त्रैमासिक पत्रिका गंगानाथ झा रिसर्च जर्नल आरम्भ की गई।
इन सब तथ्यों के मद्देनजऱ पूर्ण विश्वास के साथ कहा जा सकता है कि स्वतन्त्रता संग्राम में संस्कृतनिष्ठ पत्रकारों की भूमिका अत्यन्त महत्त्वपूर्ण, निरन्तर प्रेरणादायी और राष्ट्र-चेतना के प्रति समर्पित रही। इसी आधारभूमि के कारण विश्वास के साथ कह सकते हैं की आधुनिक संस्कृत पत्रकारिता का भविष्य सकारात्मक और उज्जवल है।