सिलिकॉन वैली पर चढ़ा उपवास का जादू

अधिक दिन नहीं हुए हैं, जब उपवासों के स्वास्थ्य लाभ पर शोध के लिए नोबल पुरस्कार मिला है, तो दूसरी ओर दुनिया की प्रमुख हस्तियां इसे अपनाने लगी हैं। इस सूची में एक नाम युवाओं में अत्यधिक लोकप्रिय फेसबुक के एक निदेशक डोन जिगमोंड का है। जिगमोंड फेसबुक में एनालिटिक्स निदेशक हैं और वे नियमित रूप से 14 या उससे अधिक घंटों का उपवास रखते हैं। ऐसा वे अधिक स्वस्थ और चुस्त-दुरुस्त रहने के लिए करते हैं।
माइक्रोसॉफ्ट, गूगल और यूट्यूब में काम कर चुके जिगमोंड कहते हैं, “हम सभी को अक्सर कार्यालय में और भागदौड़ करते हुए ही खाना खाना पड़ता है। ऐसे में हम अपने खाने पर नियंत्राण नहीं रख सकते कि क्या खाएं और कब खाएं। परंतु हम यह तो निश्चित कर ही सकते हैं कि इसका अंतराल कितना हो? वर्ष 2014 में जिंगमोंड ने एक खाद्य स्टार्टअप कंपनी हाम्पटन क्रीक में कुछ दिन काम किया था। इस दौरान उनका भोजन-विज्ञानियों, पौध-जीवविज्ञानियों और शेफ यानी कि रसोइयों के साथ मिलना हुआ। वहां उन्होंने भोजन से संबंधित रूचियों और शोधों पर विचार किया। इसके बाद उन्होंने एक शोध-प्रबंध पढ़ा जिसमें बताया गया था कि नियमित अंतराल पर भोजन करने से चुस्त रहा जा सकता है।
इस शोध प्रबंध ने जिंगमोंड को थाइलैंड में एक बौद्ध मंदिर में बिताए गए दिनों की उन्हें याद दिला दी। उन्हें याद आया कि बौद्ध भिक्षु भी कुछ ऐसी ही दिनचर्या का पालन करते थे। वे भी अपने भोजन में नियमित अंतर रखते थे। इसके बाद उन्होंने भी इसका अभ्यास करना प्रारंभ किया। उन्होंने दो बार के भोजन में नौ घंटों का अंतर रखना प्रारंभ किया। एक वर्ष से कम समय में ही उनका वजन लगभग नौ किलोग्राम कम हो गया। बौद्ध मत के अभ्यासी जिगमोंड कहते हैं कि वे हमेशा सुबह एकदम तरोताजा होते हैं और रात को कभी भूखा अनुभव नहीं करते। सुबह नौ से शाम के छह के बीच वे शायद ही कभी कुछ खाते हैं। वे कहते हैं कि सबसे बुरा काम हम यही करते हैं कि हर समय कुछ न कुछ खाते रहते हैं। उन्होंने एक पुस्तक भी लिखी है, बुद्धाज डाइट, द एनशिएंट आर्ट ऑफ लूजिंग वेट विदाउट लूजिंग योर माइंड।
नियमित अंतराल पर उपवास करने का यह तरीका अपनाने वाले जिगमोंड अकेले नहीं हैं। सूचना-तकनीक के नवीनतम गैजेटों का उपयोग करने वाली युवा पीढ़ी को यह जान कर आश्चर्य हो सकता है कि सूचना-तकनीक पर काम करने वाले अधिकांश युवा इसे अपना रहे हैं। अमेरिका की सिलिकॉन वैली के अधिकांश युवा तकनीकी विशेषज्ञ नियमित रूप से 14 से 60 घंटों का उपवास रख रहे हैं।
सैन फ्रांसिस्को में इन युवा तकनीकी-विशेषज्ञों ने एक समूह बना रखा है वीफास्ट अर्थात् हम उपवास करते हैं। इस समूह का निर्माण वर्ष 2015 में हुआ था और तब से यह निरंतर सक्रिय है। इस समूह के सभी सदस्य प्रातः अल्पाहार को तो विशेष महत्व देते हैं परंतु इसके बाद वे कम से कम 14 घंटे का उपवास रखते हैं। कुछ युवा 24 घंटे से लेकर 36 और 60 घंटों तक का उपवास रखते हैं। यह समूह हरेक बुधवार को अल्पाहार पर एक इटैलियन कैफे में मिलता है।
नूट्रोबाक्स कंपनी के संस्थापक और सीओओ माइकल ब्रैंट के अनुसार यह उपवास वे लोग केवल लंबे जीवन के लिए ही नहीं, वरन् बेहतर जीवन जीने के लिए रखते हैं। उनका मानना है कि जिसप्रकार हम अपने कम्प्यूटर या मोबाइल को तरोताजा करने के लिए रिस्टार्ट करते हैं, उसी प्रकार यह उपवास उनके शरीर के लिए रिस्टार्ट का ही काम करता है। जब वे उपवास करते हैं, तो फिर उन्हें अपच और अत्यधिक भोजन से होने वाले आलस की चिंता नहीं करनी पड़ती।
मंगलवार को उनकी कंपनी के सभी कर्मचारी उपवास रखते हैं। कंपनी के सहसंस्थापक ज्योफ्री वू का कहना है कि मंगलवार कंपनी के लिए सबसे अधिक उपयोगी दिन होता है। वीफास्ट समूह के सदस्य सोशल मीडिया का उपयोग कर उपवास पर होने वाले नए शोधों पर चर्चा करते हैं, इसके प्रोत्साहन के लिए कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं।
भोजन में एक नियमित विराम देना, आयुर्वेद का काफी पुराना और अनुभूत ज्ञान है। आयुर्वेद भी प्रातः भोजन को अधिक महत्व देता है और उसके बाद शाम के भोजन को आवश्यक बताता है। भारतीय परिस्थितियों के अनुसार आयुर्वेद सूर्यास्त से पहले भोजन लेने की राय देता है। यदि हम इसकी गणना करें तो सायं छह बजे से प्रातः के नौ बजे तक पंद्रह घंटों का उपवास स्वाभाविक रूप से हो जाता है। यह जानना हमारे लिए रूचिकर हो सकता है कि आयुर्वेद के इस ज्ञान को पश्चिमी जगत के युवा किसी और रूप में अपना रहे हैं। परंतु यह जानना हमारे लिए और भी आनंददायी और लाभकारी हो सकता है कि उपवास की हमारी प्रथाएं न केवल शरीर के लिए हितकारी हैं, बल्कि नितांत वैज्ञानिक भी हैं।
आयुर्वेद के ग्रंथों में एक कथा आती है कि एक बार आचार्य चरक ने अपने शिष्यों से पूछा कि कोरुक, कोरुक, कोरुक यानी स्वस्थ कौन है, स्वस्थ कौन है, स्वस्थ कौन है। उन्होंने प्रश्न को तीन बार दुहराया था। अनेक शिष्यों ने कई उत्तर दिए, परंतु चरक ने एक उत्तर को सही माना। यह उत्तर था हितभुक्, मितभुक् और हितभुक् यानी जो शरीर के लिए लाभकारी पदार्थों का सेवन करता है, मितभुक् यानी जो अल्प मात्रा में भोजन करता है और ऋतभुक् यानी जो अच्छी कमाई से प्राप्त भोजन करता है। इस प्रकार आयुर्वेद पश्चिम के उपरोक्त अनुभव को न केवल और पुष्ट करता है, बल्कि उसे आगे भी बढ़ाता है। पर्वों से जुड़े उपवास यदि आयुर्वेद के अनुसार किए जाएं तो अधिक लाभकारी हो सकते हैं।