सही समझ के मंत्रदाता : रवींद्र शर्मा गुरुजी

रामबहादुर राय
लेखक इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय कलाकेंद्र के अध्यक्ष हैं।


रवींद्र शर्मा ‘गुरुजी’ में कलात्मक आकर्षण अपार था। जो भी उनके संपर्क में आया उसने अनुभव किया कि उसकी समझ सुधरी। इसे दो अवसरों पर देखा और जाना। उन्हें देखने, सुनने और समझने के बहुत अवसर आए। लेकिन जिन दो बातों का उल्लेख यहां कर रहा हूं उनमें गुरुजी की छाप अमिट है। पहली घटना को कई साल हो गए। श्री गुरु गोविंद सिंह ट्राई सेनटेनरी यूनिवर्सिटी ने दूसरे स्ववित्तपोषित विश्वविद्यालयों से भिन्न और एक बेहतर रिवाज बनाया है। दूसरे विश्वविद्यालय किसी औद्योगिक घराने के व्यक्ति को डि.लिट्. की उपाधि अपने दीक्षांत समारोह में देते हैं। हमारा विश्वविद्यालय शिक्षा, सस्कृति, कला, समाज सेवा आदि-क्षेत्रों के किसी दो व्यक्ति को हर साल डि.लिट्. की उपाधि देता है। एक साल हमने के.एन. गोविंदाचार्य और रवींद्र शर्मा ‘गुरुजीÓ को चुना। दोनों अपने क्षेत्र के महारथी! समस्या थी कि गुरुजी क्या हां करेंगे? यह समस्या इसलिए थी कि ऐसे आयोजनों से दूर रहने का उनका स्वभाव था। हमारे आग्रह को उन्होंने जिस सहजता से स्वीकार किया उससे ही उनकी कलाधर्मिता को हम अनुभव कर सके। पूरी गरिमा से सम्मान ग्रहण किया। कोई दिखावा नहीं। हर तरह से सहज बने रहे। लेकिन उन्हें जानने और मानने वालों ने उसे एक राष्ट्रीय उत्सव बना दिया। गुरुजी उसके कर्ता नहीं, साक्षी बने रहे। यह भाव बोध उन्हें असाधारण बनाता था।
दूसरी घटना का संबंध इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र से है। हमारे निमंत्रण पर वे ‘भारत विद्या प्रयोजना’ में आए। आ तो गए, पर आश्वस्त नहीं थे। यह हम बाद में जान सके। हजारों साल जो दिल्ली नाम बदल-बदलकर इतिहास के करवटों में राजधानी बनी रही, उसके आज के निवासी क्या भारत विद्या के प्रवाह से कहीं दूर तो नहीं चले गए होंगे। यह आशंका उनके मन में थी, जिसे उन्होंने व्यक्त नहीं किया। व्यक्त कर देते तो कला निर्गुण कविता हो जाती। वे भांपने और आजमाने के लिए सन्नद्ध होकर मंच पर पहुंचे। अद्भुत दृश्य था। एक साधारण सा दिखने वाला व्यक्ति क्या बोलेगा? इस जिज्ञासा और ऐसे अनेक प्रश्नों में सभा का हर व्यक्ति उबचूब हो रहा था। वहां जो दिख रहा था वह स्थूल ज्यादा था। सक्ष्म अदृश्य था। विचार और भाव सूक्ष्म ही होता है। वह वहां हवा में तैर रहा था। किसी संत की उपस्थिति मात्र से वातावरण, परिवेश और पर्यावरण कैसे बदल जाता है, यह उस दिन हर किसी ने अनुभव किया होगा। सुनते रहे हैं कि हवा का रुख भी किसी सज्जन की उपस्थिति से अनुकूल हो जाता है। उस अनुकूलता से विद्या की मंदाकिनी बहने लगती है। उससे समीर की सुंगध फैलती है। वह रम्य होती है। स्वास्थ्यकर होती है। आनंद की अनुभूति देती है। ऐसी ही मन की तरंग में काफी देर तक उपस्थित लोगों ने गुरुजी को उस दिन सुना। लोग सचमुच मंत्र मुग्ध थे। कितना समय गुजर गया है इसका किसी को अंदाज नहीं था। और सुनने को आतुर थे श्रोता। मंच पर बैठा वक्ता और सभा में उपस्थित श्रोता के तार-तरंग-भाव-समझ जब एक ही धरातल पर आ मिलते हैं तो वह सभा सामूहिक साधना का रुप ले लेती है। उस दिन यही हुआ। वह समयातीत सभा थी। अचानक गुरुजी ने बोलना बंद कर दिया। उससे कोई मर्माहत नहीं हुआ। उल्टे उनकी हर बात हर व्यक्ति के मन में हमेशा के लिए अंकित और टंकित हो गई। क्या आपने ऐसी सभा का कभी आनंद उठाया है? ऐसा अनुभव होता बहुत विरल है, जो उस दिन हर किसी को हुआ।
बडी बात जो है वह यह है कि उन्होंने देश की राजधानी के मर्मस्थ्ल पर अपना वरद हाथ रखा। ऐसा जब होता है तो सदियों पुरानी मूूच्र्छा गुरु से टूटती है। समाज की मूच्र्छा टूटती है सुधारक से। जब-जब ऐसा होता है तो व्यक्ति जहां अपने में लौटता है और स्वयं को पहचान पाता है वहीं समाज अपनी मूल परंपरा से जुड जाता है। भले ही इतिहास के पहाड़, उसके झारने, मैदान के भू-भाग उस परंपरा को प्रभावित करते हैं। फिर भी वह प्रवाह बना रहता है जो उद्गम से निकलता है। और महासागर तक पहुंचता है। इस अनुभूति से अज्ञान का गहन अंधकार भी छंट जाता है। उगता है नवोन्मेष का सूरज। उससे दिखता है वह मार्ग जो मुक्ति देता है। उस दिन वही मार्ग गुरुजी ने दिखाया। उन्होंने यह दावा नहीं किया कि वे जो बता रहे हैं वह एकमेव मार्ग है। यही तो भारत विद्या है। जिसमें मार्ग अनेक और अनंत हैं। भारत विद्या का संदेश सीधा है-अपना मार्ग पहचानो। उसे खोजो और उस पर चलो। समाज के बनने की स्वभावगत, परंपरागत और परिवेशगत विधि ही सूत्र में भारत विद्या है। गीता में यही ज्ञान है। जो किसी और जैसा होने से व्यक्ति और समाज को विरत करता है। प्रेरित करता है कि स्वयं को अभिव्यक्त करना ही स्वधर्म है। यही जब व्यक्ति, समाज, संस्कृति और राज-काज में होने लगे तो किसी देश की सीमा में वह राष्ट्रवाद है और दुनिया के तल पर मानवता। यह ऐसा विचार है जो लौकिक होते हुए अलौकिक है। इसीलिए अमर है। उस दिन गुरुजी ने हमें शाश्वत विचार के अमरत्व से जोड़ा। शाश्वत विचार से जानना और समझना संभव हो जाता है। उससे ही व्यक्ति सुखी जीवन जी पाता है। ऐसे गुरुजी शरीर में रहें या न रहें, क्या फर्क पड़ता है।