संस्कृत से मिलेगी पत्रकारिता को नयी दिशा

वर्ष 1835 में एक अंग्रेज मैकाले ने संस्कृत को कालबाह्य और अनुपयोगी भाषा बताते हुए, उसकी शिक्षा को समाप्त कर दिए जाने का फतवा सुनाया था और उसकी नीतियों पर चलते हुए स्वाधीनता के बाद भी संस्कृत की भारतीय सरकारों द्वारा भी उपेक्षा ही की गई। परंतु पिछले डेढ़ सौ वर्षों की लगातार उपेक्षा और समाप्त किए जाने के तमाम प्रयासों के बावजूद संस्कृत ऐसी जीवन्त भाषा बनी हुई है कि इसमें आज भी 123 दैनिक, साप्ताहिक, मासिक पत्रा-पत्रिकाएं छपती हैं, बिकती हैं और पढ़ी जाती हैं। आज जबकि संस्कृत को एक मृतभाषा कह दिया जाता है और इसे बोलने-पढ़ने-लिखने वाले कहीं नजर नहीं आते हों, फिर भी संस्कृत में इतनी बड़ी संख्या में पत्रा-पत्रिकाओं का प्रकाशित होना एक आश्चर्यजनक बात ही है। ऐसे में यह आवश्यक है कि संस्कृत भाषा में पत्राकारिता की अलग से चिंता की जाए, इस बात को ध्यान में रख कर पिछले दिनों भारतीय धरोहर ने देश के एकमात्रा पत्राकारिता विश्वविद्यालय माखनलाल चतुर्वेदी पत्राकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय के सहयोग से संस्कृत पत्राकारिता पर एकदिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया।
देश की राजधानी नयी दिल्ली में आयोजित इस कार्यशाला में संस्कृत संस्थाओं के प्रमुख, संस्कृत पत्राकार सहित आकाशवाणी, दूरदर्शन सहित अनेक संस्थाओं और विश्वविद्यालयों के संस्कृत विभाग के प्रमुख सहभागी हुए। इस संगोष्ठी की विशेषता यह रही कि कई वक्ताओं ने संस्कृत में ही संबोधन किया और वह संस्कृत न जानने वाले भी सरलता से समझ पा रहे थे। इस प्रकार इतना तो साफ था कि संस्कृत उतनी कठिन है नहीं जितनी कि बताई जाती है।
बहरहाल, संस्कृत पत्राकारिता के समक्ष कठिनाइयों की चर्चा में यह बात समझ आई कि इसकी चुनौतियां भी वही हैं, जो आज हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं की पत्राकारिता या गैरव्यावसायिक पत्राकारिता के सामने है। पाठक वर्ग तलाशना और आर्थिक संतुलन साधना दोनों ही पक्षों पर संस्कृत पत्राकारिता को गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। इस पर प्रकाश डालते हुए दिल्ली संस्कृत अकादमी के सचिव डॉ. जीतराम भट्ट ने कहा कि जो स्थिति संस्कृत भाषा की है, वही इसकी पत्राकारिता की भी है। जिस प्रकार आज भाषा नौकरी से जुड़ गई है, उसी प्रकार प्रकाशन व्यवसाय हो गया है। संस्कृत पत्राकारिता के समक्ष बड़ी चुनौती धन की है। धन के अभाव में ही अधिकांश पत्रिकाएं बंद हो रही हैं और धन के अभाव में ही संस्कृत पत्राकार लोभ में फंस जाता है। उन्होंने अपना अनुभव बताते हुए कहा कि संस्थागत पत्रिकाएं ठीक चल रही हैं। परंतु व्यक्तिगत प्रयासों से निकलने वाली पत्रिकाओं की स्थिति अच्छी नहीं है।

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बहरहाल, संस्कृत पत्राकारिता का इतिहास भी देश में पत्राकारिता के इतिहास जितना ही पुराना है। पहली संस्कृत पत्रिका वर्ष 1866 में बनारस से प्रकाशित हुई थी। आज 123 पत्रा-पत्रिकाएं संस्कृत में प्रकाशित हो रही हैं जिनमें कुछ की ही स्थिति अच्छी कही जा सकती है। दो ई-पत्रिकाएं भी निकलती हैं। पत्राकारिता की बात होते ही संचार व्यवस्था और संचारकों की चर्चा होनी स्वाभाविक है। आज माना जाता है कि जनसंचार की अवधारणा पश्चिम से ही आई है। इसलिए जनसंचार जहां भी पढ़ाया जाता है, वहां इसके पश्चिमी सिद्धांत ही पढ़ाए जाते हैं। अपने देश में भी संस्कृत साहित्य में उपलब्ध जनसंचार के उदाहरणों और सिद्धांतों पर कोई शोध नहीं किया गया है। परंतु माखनलाल पत्राकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय ने अनेक शोध परियोजनाएं शुरू की हैं, जिनमें संस्कृत साहित्य में जनसंचार की अवधारणा का विषय भी शामिल है।
इस विषय की जानकारी देते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर बृजकिशोर कुठियाला ने कहा कि वे संस्कृत के जानकार नहीं हैं, परंतु संस्कृत के विद्वानों से यह जानकारी मिली की संस्कृत साहित्य में जनसंचार के काफी उदाहरण हैं। फिर भरत मुनि के नाट्यशास्त्रा और जनसंचार के विषय पर काम कर रहे नेपाल से पधारे विद्वान डॉ. निर्मलमणि अधिकारी के बारे में पता चला। निर्मलमणि को विश्वविद्यालय की ओर से यह कार्य सौंपा गया। काफी अथक परिश्रम करके निर्मल अधिकारी ने इस पर पुस्तक तैयार की ‘थ्योरी एंड प्रैक्टिस ऑफ कम्यूनिकेशन इन भरत मुनि नाट्यशास्त्रा’। इस पुस्तक का लोकार्पण भी इस संगोष्ठी में किया गया। इसके अलावा विश्वविद्यालय द्वारा मीमांसा दर्शन और संचार सिद्धांत पर भी शोध कार्य करवाया जा रहा है। इस पर प्रकाश डालते हुए, डॉ. निर्मल अधिकारी ने कहा कि वैश्वीकरण के मौजूदा दौर की संचार प्रक्रिया केवल हम ही दे सकते हैं। केवल संस्कृत साहित्य में ही उन सभी रसों और भावों की चर्चा है जो एक वैश्विक संचार प्रक्रिया के लिए आवश्यक हैं। पश्चिम की संचार प्रक्रियाएं एकांतिक हैं और वे मनुष्य के सभी पहलुओं का समावेश नहीं करती। जबकि भारत में विविधताओं के कारण संचार की बहुमुखी प्रक्रिया का विकास हुआ था।DSC_0006
कार्यशाला में उपस्थित अन्य विद्वान वक्ताओं ने भी इसका समर्थन किया। लाल बहादुर शास्त्राी राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ (मानित वि.वि.) के कुलपति प्रोफेसर रमेश कुमार पांडे ने कहा कि नाट्यवेद में संचार के तीनों रूपों, दृश्य, श्रव्य और क्रीडनीय की चर्चा है। उन्होंने बताया कि उनके विश्वविद्यालय में संस्कृत पत्राकारिता का पाठ्यक्रम शुरू किया जा चुका है। कविकुलगुरू कालिदास विश्वविद्यालय की कुलपति डा. उमा वैद्य ने कहा कि वैदिक साहित्य में सरमा पणि संवाद संचार प्रक्रिया का अच्छा उदाहरण हैं। इसी प्रकार रामायण काल में हनुमान और महाभारत काल में संजय भी संचारक यानी आज की भाषा में रिपोर्टर ही थे। अन्य वक्ताओं ने संचारकों की भूमिका निभाने वाले सूत जी और काकभुशुण्डि को भी याद किया।
भाषा के रूप में संचार माध्यम बनने की संभावना पर चर्चा करते हुए कार्यशाला में यह बात उभर कर आई कि संस्कृत एकमात्रा भाषा है जिसमें शब्द बनाने की अनंत संभावनाएं हैं। दिल्ली दूरदर्शन के वरिष्ठ समाचार सलाहकार ने दूरदर्शन पर संस्कृत में प्रारम्भ संस्कृत में प्रारम्भ विशेष कार्यक्रम वार्तावली का उल्लेख किया। साथ ही उन्होंने थाईलैण्ड (बैकांक) में हुये विश्व संस्कृत सम्मेलन की विशेषता को बताया उन्होंने कहा कि कम्प्यूटर मे संस्कृत भाषा की अनन्त संभावनायें है। अभी चौथी और पांचवीं पीढ़ी के कम्प्यूटर चल रहे हैं और यह नासा के वैज्ञानिकों के लम्बे समय तक अनुसंधान से यह सिद्ध किया है कि छटी और सातवीं पीढी के कम्प्यूटरों की भाषा संस्कृत होगी क्योंकि उनकी प्रोग्रामिंग केवल संस्कृत में ही संभव हो पाएगी। दूसरी कोई भी भाषा इतनी वैज्ञानिक नहीं है।
माखनलाल पत्राकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर बृजकिशोर कुठियाला ने संस्कृत पत्राकारिता को विकसित किए जाने पर जोर देते हुए कहा कि संस्कृत पत्राकारिता के प्रचार के साथ-साथ एक भिन्न प्रकार की संस्कृति का भी प्रचार किया जाना चाहिए। आज देश की पत्राकारिता मिशन को भूल कर केवल व्यावसायिक हो गई है। संस्कृत पत्राकारिता से हम इसे एक दिशा दे सकते हैं। व्यवसाय हो, परंतु उसमें नियम हों। उन्होंने संस्कृत को तकनीक की भावी भाषा बताते हुए कहा कि आने वाले समय में संस्कृत कम्प्यूटर की भाषा बन जाएगी, परंतु क्या हमारा देश और हमारे लोग इसके लिए तैयार हैं? उन्होंने विश्वविद्यालय की ओर मासिक संस्कृत समाचार पत्रिका प्रकाशित करने का अश्वासन लिया।
इस संगोष्ठी में संस्कृत पत्राकारिता के साथ-साथ संस्कृत के भविष्य पर भी चिंतन किया गया। संस्कृत भाषा और पत्राकारिता दोनों के संवर्धन पर विचार किया गया। अलीगढ़ से आये प्रो. महेन्द्र मिश्र ने संस्कृत की वैज्ञानिकता पर अपने विचार रखे उन्होंने कहा कि संस्कृत की वैज्ञानिक स्वरूप के कारण सम्पूर्ण विश्व उसके प्रति आकर्षित है। हमारा यह दृर्भाग्य है कि भारत में ही संस्कृत उपेक्षा हो रही है।
संगोष्ठी इस अर्थ में सफल कही और मानी जा सकती है कि इसमें न केवल संस्कृत भाषा पर चिंतन हुआ, बल्कि संस्कृत भाषा में भी चिंतन हुआ। कार्यशाला का संयोजन भारतीय धरोहर के संयुक्त-महामन्त्राी डॉ. कृष्णचन्द्र पाण्डे एवं माखन लाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्राकारिता विश्व विद्यालय की प्रवक्ता श्रीमती रजनी नागपाल ने किया।