श्रीरामचरितमानस के अद्भुत टीकाकार महाराजकुमार बाबू रणबहादुर सिंह

डॉ. जितेन्द्रकुमार सिंह संजय
लेखक साहित्य कला संस्कृति एवं इतिहास के अध्येता हैं।


भारतीय राजवंश का विद्यानुराग जगत्प्रसिद्ध है। भारत के विद्या-व्यसनी नरेशों ने साहित्य-संगीत और कला को केवल संरक्षित ही नहीं किया, अपितु पूरी निष्ठा के साथ स्वयं भी सृजनधर्म का पालन किया। रायबरेली जलिे के शाहमऊ-टेकारी के प्रतिष्ठित ताल्लुकेदार बाबू गंगाबख्श सिंह के अनुज महाराजकुमार बाबू रणबहादुर सिंह ऐसे ही सृजनधर्मी चेतना के आलोकपुंज थे। महाराजकुमार बाबू रणबहादुर सिंह शाहमऊ-टेकारी के गौरव थे। शाहमऊ-टेकारी का इतिहास तिलोई रियासत से सम्पृक्त है। तिलोई-नरेश वीरशिरोमणि राजा बलभद्र सिंह के नि:सन्तान शहीद हो जाने के पश्चात् उनकी प्रथम रानी केश कुँवरि ने शाहमऊ के छत्रधारी सिंह को मुकुट पहनाकर अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। राजा छत्रधारी सिंह के तृतीय पुत्र बाबू जंगबहादुर सिंह को भगीरथपुर का ताल्लुका मिला।
सन् 1762 ई. में जन्में बाबू जंगबहादुर सिंह कट्टर हिन्दू ही नहीं, हिन्दी-संस्कृत के पक्षधर भी थे। अपने राज्यकार्य में अरबी और फारसी भाषा का बिलकुल प्रयोग नहीं करते थे। अरबी-फारसी के शब्दों का अपने मुख से उच्चारण भी नहीं करते थे। कालान्तर में हिन्दुत्व का ध्वज फहरानेवाले बाबू जंगबहादुर सिंह को सरकारी मालगुजारी जमा न करने का आरोप लगाकर फैजाबाद की तत्कालीन बेगम के द्वारा कैद करा लिया गया। बेगम ने बाबू जंगबहादुर सिंह को केवल कैद ही नहीं करवाया, अपितु उनके ज्येष्ठ पुत्र बाबू विन्ध्यासेवक सिंह का सिर कटवा लिया। इतिहासकार श्री पवन बख्शी लिखते हैं- जब वह सिर बेगम के सामने पेश किया गया तो बेगम ने आज्ञा देते हुए कहा कि इस सिर को ले जाओ और जंगबहादुर सिंह से पूछो कि यह किसका सिर है। हार्दिक दु:ख पहुँचाने की पराकाष्ठा थी। जंगबहादुर सिंह को उनके पुत्र का कटा हुआ सिर दिखाकर उनसे पूछा गया कि यह किसका सिर है? जंगबहादुर सिंह ने सिर को पहचान कर स्वाभिमान के साथ कहा- किसी वीर पुरुष का सिर होगा। उन्होंने यह भी कहा कि हमारे वंश के एक वीर पुरुष राजा बलभद्र सिंह थे, जिन्होंने अपना सिर दे दिया था और यह दूसरा वीर पुरुष है, जिसने अपना सिर दे दिया। इसकी वीरता के लक्षण मुझे अब भी इसके मुस्कराते चेहरे पर दिख रहे हैं। धन्य है क्षत्रिय की वीरता! धन्य है उसकी सहनशक्ति! धन्य है उसका उत्साह! यह उत्तर सुनते ही सब लोग दंग रह गये। जंगबहादुर सिंह की निर्भीकता देखकर बेगम ने यही निश्चय किया कि इन्हें कारागार में ही डाल देना चाहिए।
बाबू जंगबहादुर सिंह दस वर्ष तक कारागार में रहे। कालान्तर में उनके द्वितीय पुत्र बाबू रघुनाथ सिंह के चौदह वर्षीय पुत्र बाबू सर्वजीत सिंह ने अपने पितामह को कैद से मुक्त कराने की पहल की। बेगम ने बाबू सर्वजीत सिंह को कैद कर लिया और बाबू जंगबहादुर सिंह को मुक्त कर दिया। बाबू जंगबहादुर सिंह ने शीघ्र ही रुपयों का प्रबन्ध करके मालगुजारी अदा की और अपने पौत्र बाबू सर्वजीत सिंह को छुडाया। मालगुजारी न जमा करने के कारण जो रियासत छिन गयी थी, वह भी वापस हो गई। ताल्लुके की सनद बाबू सर्वजीत सिंह को मिली और ये अवैतनिक मजिस्ट्रेट भी बनाये गये। बाबू सर्वजीत सिंह ने सन् 1857 ई. में आंग्ल-शासकों की बडी मदद की थी। इसलिए भगीरथपुर ताल्लुके की खूब वृद्धि हुई। अनेक जब्त हुए ताल्लुके इसमें मिला दिये गये। शीघ्र ही यह ताल्लुका शाहमऊ-टेकारी के नाम से प्रसिद्ध हो गया।
बाबू सर्वजीत सिंह के ज्येष्ठ पुत्र बाबू गंगाबख्श सिंह का जन्म सन् 1853 ई. में एवं कनिष्ठ पुत्र बाबू रणबहादुर सिंह का जन्म सन् 1858 ई. में हुआ। बाबू गंगाबख्श सिंह सन् 1888 ई. में शाहमऊ-टेकारी की गद्दी पर आरूढ हुए। बाबू रणबहादुर सिंह को बेरारा नामक गाँव गुजारे में दिया गया। बाबू रणबहादुर सिंह को कोई सन्तान न थी। साहित्य-सृजन ही उनका मुख्य ध्येय था। कनपुरिया क्षत्रिय वंश (इतिहास) और श्रीमद्गोस्वामी तुलसीदासकृत रामायण की टीका बाबू रणबहादुर सिंह की सारस्वत-साधना के स्थायी स्मारक हैं।
महाराजकुमार बाबू रणबहादुर सिंह ने गोस्वामी तुलसीदास जी की नानापुराणनिगमागमसम्मत उक्ति का परीक्षण करने के लिए बडे कठिन परिश्रम से इस टीका का प्रणयन किया है। महाराजकुमार बाबू रणबहादुर सिंह कृत श्रीमद्गोस्वामी तुलसीदासकृत रामायण की नानापुराणनिगमागमसम्मता टीका के प्रत्येक काण्ड पृथक् पृथक् प्रकाशित हुए हैं। सर्वप्रथम सुन्दरकाण्ड का प्रकाशन विजय दशमी 1922 ई. को हुआ। इसी क्रम में 1922 ई. में ही अरण्यकाण्ड और किष्किन्धाकाण्ड का प्रकाशन हुआ। तीन वर्ष के बाद चैत्र शुक्ल दुर्गाष्टमी 1925 ई. को अवधकाण्ड प्रकाशित हुआ। अवधकाण्ड प्रकाशित होने के पाँच वर्ष बाद मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी 1930 ई. को बालकाण्ड और लंकाकाण्ड प्रकाशित हुए। अन्त में चैत्र शुक्ल रामनवमी 1931 ई. को उत्तरकाण्ड का प्रकाशन हुआ। महाराजकुमार बाबू रणबहादुर सिंह ने शाहमऊ-टेकारी रियासत से गुजारे में प्राप्त सीमित संसाधन से इस कार्य को अत्यन्त निष्ठापूर्वक पूर्ण किया है। डबल डिमाई साइज में बालकाण्ड 432 पृष्ठ में, अवधकाण्ड 348 पृष्ठ में, अरण्यकाण्ड 96 पृष्ठ में, किष्किन्धाकाण्ड 62 पृष्ठ में, लंकाकाण्ड 192 पृष्ठ में और उत्तरकाण्ड 182 पृष्ठ में मुद्रित है। इस टीका की रचना के उद्देश्य का उद्घाटन करते हुए महाराजकुमार बाबू रणबहादुर सिंह लिखते हैं, ‘मैंने अनेक पुराणादि धर्मग्रन्थों में यही शिक्षा-रत्न पाया कि मनुष्य को सच्चरित्र होना चाहिए इस अपने कथन में प्रमाण देना मानों पाठकों को अनभिज्ञ समझना है। क्योंकि आबालबृद्ध सभी सुचरित्र की सराहना करते हैं। जब यह निश्चित हुआ कि मनुष्य को सुचरित्र होना चाहिए तो यह प्रश्न उठा कि सुचरित्र पुरुष संसार में कौन हुआ है जिसका अनुगमन अथवा अनुकरण करके हम सच्चरित्र बनें? प्रश्न के उठते ही उत्तर मिला कि रामचरित्र ही आदर्श रूप है अतएव रामचरित्र देखने और समझने की इच्छा हुई। संस्कृत में अधिक अभ्यास न होने के कारण लोक में अधिक प्रचार को प्राप्त पूज्यपाद श्रीगोस्वामी तुलसीदासजी की रामायण देखने लगा। कहने में कुछ खेद होता है कि उस अवस्था में मुझे अनेक पण्डित मिले, जिन्होंने तुलसीदास की रामायण में यह कहकर कि भाषा है, इसका क्या प्रमाण है अपनी अश्रद्धा प्रकट की। कुछ मेरा चित्त भी दोलायमान हुआ, परन्तु भगवत्कृपा से मेरे मन में यह बात उदय हुई कि तुलसीदासजी ने स्वयं कहा है कि नानापुराणनिगमागमसम्मतं यदित्यादि अर्थात् यह तो अनेक पुराण और निगमागमसम्मत रामचरित्र है, इसके उदय होते ही अनेक प्रकार के परिश्रम और धनव्यय से मैंने तुलसीदासजी की उक्ति को नानापुराणनिगमागमसम्मत ही पाया।Ó
महाराजकुमार बाबू रणबहादुर सिंह ने कठोर परिश्रम करके श्रीरामचरितमानस के मूल स्रोतों का उद्घाटन किया है। महाराजकुमार बाबू रणबहादुर सिंह की वैदुष्यपूर्ण टीका से सिद्ध होता है कि गोस्वामी तुलसीदासजी ने निगमागमसम्मत और क्वचिदन्यतोऽपि रामचरितमानस की रचना करने के लिए बालकाण्ड में 97, अवधकाण्ड में 161, अरण्यकाण्ड 44, किष्किन्धाकाण्ड 71, सुन्दरकाण्ड 53, लंकाकाण्ड 32 एवं उत्तरकाण्ड में 49 ग्रन्थों का मन्थन किया है। आजादी के पूर्व शारदा-सदन रायबरेली से प्राप्त होनेवाली महाराजकुमार बाबू रणबहादुर सिंह कृत श्रीमद्गोस्वामी तुलसीदासकृत रामायण की इस टीका का साहित्य-जगत् में उतना प्रचार-प्रसार नहीं हो पाया, जितना होना चाहिए था। महात्मा अंजनीनन्दनशरण के मानसपीयूष और स्वामी प्रज्ञानानन्द सरस्वती के मानस गूढार्थ चन्द्रिका की तरह ही उत्कृष्ट टीका होने के बाद भी बाबू रणबहादुर सिंह की इस टीका को न जाने क्यों हिन्दी-साहित्य के आलोचकों की उपेक्षा का दंश झेलना पडा। इतना ही नहीं इसके प्रकाशन के चालीस वर्ष बाद सन् 1971 ई. में अखिल भारतीय विक्रम परिषद्, काशी से आचार्य पण्डित सीताराम चतुर्वेदी द्वारा सम्पादित श्रीरामचरितमानस की मारुति टीका का प्रकाशन हुआ, जिसके मूल में यही टीका है। आज साहित्य-जगत् में आचार्य पण्डित सीताराम चतुर्वेदी कृत श्रीरामचरितमानस की मारुति टीका तो प्रसिद्ध है, किन्तु बाबू रणबहादुर सिंह की टीका से बहुत कम लोगों का परिचय है।
आचार्य पण्डित सीताराम चतुर्वेदी ने मारुति टीका की भूमिका में लिखा है, ‘सम्पादकों, विद्वानों तथा मानस-मर्मज्ञों की इस सभा ने यह भी निश्चय किया कि गोस्वामीजी ने जिन जिन ग्रन्थों से सामग्री सँजोई है, उन ग्रन्थों के मूल स्रोत भी पाद-टिप्पणी में दिये जायँ जिससे रामायण के अध्येताओं को भी सुविधा हो और पाठ का शुद्ध अर्थ लगाने में भी सहायता मिले।Ó यद्यपि सम्पादक-मण्डल ने यह भार स्वीकार तो कर लिया, तथापि पीछे चलकर यह ज्ञात होने लगा कि यह कार्य असम्भव नहीं तो दुरूह अवश्य है। इसी बीच काशी के सार्वभौम संस्कृत-प्रचार कार्यालय के मन्त्री पण्डित वासुदेव द्विवेदी ने व्याकरणाचार्य श्री बाबूलाल त्रिपाठी के पास से बाबू रणबहादुर सिंह द्वारा अनेक कवि-कोविद महात्माओं की सम्मति से तथा पण्डित मातृदत्तजी सोहगौर त्रिपाठी, पण्डित ललिताप्रसादजी ओझा, पण्डित दामोदरजी शर्मा, पण्डित रामपदार्थ सुकुलजी की सहायता से 27 वर्षों के सतत प्रयत्नों के उपरान्त वेदादि शास्त्रों के श्लोकों, प्रमाणों से प्रमाणीभूत श्लोकों के अर्थों और टिप्पणियों से अलंकृत प्रकाशित संस्करण लाकर प्रस्तुत कर दिया जिससे यह कार्य सरल हो गया। उपर्युक्त ग्रन्थ में दिये हुए प्रमाणों के अतिरिक्त अन्य बहुत-से स्रोतों से भी इस संस्करण में सम-भाव-बोधक श्लोक प्रस्तुत कर दिये गये हैं।Ó
आचार्य पण्डित सीताराम चतुर्वेदी ने बाबू रणबहादुर सिंह कृत इस टीका का उल्लेख करते हुए बाबू रणबहादुर सिंह की सारस्वत-साधना की अपेक्षा उनके सहयोगियों का उल्लेख करना ज़्यादा आवश्यक समझा। सहयोगियों की चर्चा में ज़्यादा रुचि होने के कारण आचार्य पण्डित सीताराम चतुर्वेदी ने हड़बड़ी में बाबू रणबहादुर सिंह के ज्येष्ठ भ्राता का नाम बाबू गंगाबख्श सिंह न लिखकर बाबू गंगावक्ष सिंह लिख दिया है। इतना ही नहीं उनके सहयोगियों में पण्डित मातृदत्तजी सोहगौर त्रिपाठी एवं पण्डित ललिताप्रसादजी ओझा के अतिरिक्त अपनी तरफ से पण्डित दामोदरजी शर्मा और पण्डित रामपदार्थ सुकुलजी का नाम भी जोड दिया है, जबकि महाराजकुमार बाबू रणबहादुर सिंह कृत टीका में पण्डित मातृदत्तजी और पण्डित ललिताप्रसादजी के अतिरिक्त अन्य किसी का नामोल्लेख नहीं है। यद्यपि आचार्य पण्डित सीताराम चतुर्वेदी ने उपर्युक्त ग्रन्थ में दिये हुए प्रमाणों के अतिरिक्त अन्य बहुत-से स्रोतों से भी इस संस्करण में सम-भाव-बोधक श्लोक प्रस्तुत कर दिये गये हैं लिखकर अपनी टीका की श्रेष्ठता सिद्ध करने का प्रयत्न किया है, तथापि बाबू रणबहादुर सिंह के द्वारा दिये गये स्रोतों के अतिरिक्त अन्य स्रोत यहाँ दिखते नहीं हैं।
महाराजकुमार बाबू रणबहादुर सिंह कृत टीका के उद्धरणों के विषय में आचार्य पण्डित सीताराम चतुर्वेदी लिखते हैं, ‘यह स्पष्ट कर देना नितान्त आवश्यक है कि उपर्युक्त शाहमऊ-टिकारीवाले संस्करण में जिन अनेक ग्रन्थों का उल्लेख किया गया है और जिनके प्रमाण दिये गये हैं, उनमें से बहुत-से ग्रन्थ ऐसे हैं, जिनका हमें दर्शन नहीं हो पाया और जो खोजने पर भी कहीं नहीं मिल पाये। इसलिए उनकी प्रामाणिकता का दायित्व पूर्णत: उपर्युक्त संस्करण पर ही है, किन्तु जहाँ तक प्रसिद्ध और सुलभ ग्रन्थों से प्राप्य उद्धरणों की बात है, वे पूर्णत: असन्दिग्ध हैं और उन्हें देखकर यह समझने में तनिक भी सन्देह नहीं रह जाता कि गोस्वामी तुलसीदासजी कितने असाधारण दिग्गज विद्वान् थे, जिन्होंने सम्पूर्ण भारतीय वाङ्मय (साहित्य और दर्शन) को हृदयंगम कर डाला था और अत्यन्त कौशल के साथ उस सम्पूर्ण ज्ञान-राशि को रामचरितमानस में इस प्रकार लाकर जड दिया जैसे कोई कुशल जौहरी आभूषणों में अनेक नगीने जडकर दोनों को एक-दूसरे का कीर्तिमान् पूरक बना देता है। कहीं भी यह आभास तक नहीं मिलता कि गोस्वामीजी ने इसमें अनेक स्थानों से सामग्री ला जुटाई है। यही उनकी वास्तविक कुशलता एवं महत्ता है और यह सम्पादन ही उनकी मौलिकता है।Ó
वस्तुत: आचार्य पण्डित सीताराम चतुर्वेदी के उपर्युक्त दोनों उद्धरण एक-दूसरे के विरोधी हैं। उन्होंने जहाँ पहले उद्धरण इसमें उपर्युक्त ग्रन्थ में दिये हुए प्रमाणों के अतिरिक्त अन्य बहुत-से स्रोतों से भी इस संस्करण में सम-भाव-बोधक श्लोक प्रस्तुत कर दिये गये हैं, लिखकर अपने श्रम और स्वाध्याय का प्रतिपादन किया है, वहीं दूसरे उद्धरण में शाहमऊ-टिकारीवाले संस्करण में जिन अनेक ग्रन्थों का उल्लेख किया गया है और जिनके प्रमाण दिये गये हैं, उनमें से बहुत-से ग्रन्थ ऐसे हैं, जिनका हमें दर्शन नहीं हो पाया और जो खोजने पर भी कहीं नहीं मिल पाये, इसलिए उनकी प्रामाणिकता का दायित्व पूर्णत: उपर्युक्त संस्करण पर ही है, लिखकर अपने आपको उत्तरापेक्षी होने से मुक्त भी कर लिया है। महाराजकुमार बाबू रणबहादुर सिंह कृत श्रमसाध्य एवं व्ययसाध्य टीका का उचित मूल्यांकन न करना, उनकी सारस्वत-साधना को अपना बनाकर प्रस्तुत कर देना आचार्य पण्डित सीताराम चतुर्वेदी जैसे मूर्धन्य मनीषी की कीर्ति-कौमुदी को कलंकित करता है। मारुति टीका की व्याख्या और वैदुष्यपूर्ण टिप्पणियाँ जहाँ आचार्य चतुर्वेदी के पाण्डित्य को प्रदर्शित करती हैं, वहीं बाबू रणबहादुर सिंह की सारस्वत-साधना को नींव में रखकर दिये सम-भाव-बोधक श्लोकों की अविच्छिन्न श्रृंखलाएँ पण्डित सीताराम जी की साहित्यिक शुचिता पर प्रश्नचिह्न भी लगाती हैं।
विश्व-वन्द्य गोस्वामीजी की वाग्विभूति और महाराजकुमार बाबू रणबहादुर सिंह की नानापुराणनिगमागमसम्मत टीका एक-दूसरे की पूरक हैं। यहाँ गोस्वामीजी की कल्याणी वाणी और बाबू रणबहादुर सिंह की तत्त्वान्वेषिणी दृष्टि को कतिपय उद्धरणों से देखा जा सकता है-
(1) जेहि सुमिरत सिधि होइ, गननायक करिवर वदन।
करौ अनुग्रह सोइ, बुद्धिरासि सुभ गुन सदन।।
मुहूर्तवृन्दावने
जायन्ते सिद्ध्यो यस्य स्मरणात्स गजानन:।
कुर्यादनुग्रहं बुद्धिनाथ: शुभगुणाकर:।। [5]
(2) मूक होइ वाचाल, पंगु चढै गिरिवर गहन।
जासु कृपा सो दयालु, द्रवउ सकल कलिमल दहन।।
महाभारते
मूकं करोति वाचालं पङ्गुं लङ्घयते गिरिम्।
यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्दमाधवम्।। [6]
(3) नील सरोरुह श्याम, तरुन अरुन वारिज नयन।
करो सो मम उर धाम, सदा छीरसागर सयन।।
नारदपञ्चरात्रे
नीलाम्बुतनुं दिव्यमरुणाम्बुजलोचनम्।
स्मरामि हृदि तं देवं क्षीरसागरशायिनम्।। [7]
इसी तरह सम्पूर्ण मानस के सम-भाव-बोधक श्लोकों को ढूँढकर बाबू रणबहादुर सिंह ने अपनी नानापुराणनिगमागमसम्मता टीका को अलंकृत किया है। इन्हीं श्लोकों को आचार्य पण्डित सीताराम चतुर्वेदी ने अपनी मारुति टीका में यथावत उद्धृत कर दिया है।
वस्तुत: महाराजकुमार बाबू रणबहादुर सिंह ने श्रीरामचरितमानस की नानापुराणनिगमागमसम्मत टीका तैयार करने के लिए कवि-कोविदों की एक परिषद् बनाया था और उस परिषद् के सदस्यों के सम्पूर्ण पारिवारिक दायित्व का निर्वहन स्वयं किया था। इस दायित्व-निर्वहन में शाहमऊ-टिकारी से गुजारे में प्राप्त बेरारा गाँव भी बिक गया था। जिस कार्य को बाबू रणबहादुर सिंह ने अपने सीमित संसाधन के बल पर पूर्ण किया था, उसे आज की साहित्य अकादमियाँ वृहद् परियोजनाएँ बनाकर भी पूर्ण नहीं कर सकती हैं। भले ही आज महाराजकुमार बाबू रणबहादुर सिंह की सारस्वत-साधना उचित मूल्यांकन के अभाव में अन्धकाराच्छन्न हो गयी है, किन्तु विद्या कभी वन्ध्या नहीं होती। कभी-न-कभी किसी मल्लिनाथ की सहृदय दृष्टि उस पर अवश्य पड़ेगी और पुन: बाबू रणबहादुर सिंह की सारस्वत-साधना साहित्याम्बर के क्षितिज पर उदित होगी। निश्चय ही आज ऐसे आलोचकों की महती आवश्यकता है, जो नेपथ्य में पड़े साहित्य-देवताओं को प्रकाशित कर सके।