शताब्दी पर दीनदयाल जी की याद

pandit_deendayal_upadhyayaसईद अंसारी
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।
पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी का शताब्दी वर्ष 25 सितंबर 2015 से शुरू हुआ है। इस मौके पर लेखक संजय द्विवेदी ने पंडित दीनदयाल उपाध्याय पर बेहद प्रामाणिक, वैचारिक सामग्री इस किताब के रूप में पेश की है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय के पूरे व्यक्तित्व का आकलन पुस्तक को पांच भागों में बाटंकर किया गया है। संपादक संजय द्विवेदी की लेखनी ने पंडित दीनदयाल उपाध्याय के जीवन के हर पहलू को ब़ड़ी सहजता और सरलता से पाठकों के मानसपटल पर अंकित किया है। पुस्तक के पहले भाग में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के संदर्भ में पंडित दीनदयाल के विचारों को बहुत ही खूबी से स्पष्ट किया गया है। दीनदयाल जी के अनुसार ‘परस्पर जोड़ने वाला विचार हमारी संस्कृति है और यही संास्कृतिक राष्ट्रवाद का मर्म है‘। किस तरह से दीनदयाल अखंड भारत के समर्थक रहे, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को उन्होंने कैसे परिभाषित किया, ‘वसुधैव कुटुम्बकम‘ की पंडित जी ने क्या अवधारणा दी, यह इस पुस्तक में बताया गया है। समाज के सर्वांगीण विकास और उत्थान के लिए उनके कार्याें और प्रयासों से पाठकों को अवगत कराने की सराहनीय कोशिश की गई है।
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के संबंध में डॉ, महेशचंद शर्मा का कहना है कि ‘गुरुजी‘ श्री गोलवलकर के अनुसार दो प्रकार के राष्ट्रवाद है। पहला भू-सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और दूसरा राजनीतिक क्षेत्राीय राष्ट्रवाद। भू-सांस्कृतिक राष्ट्रवाद मानवीय है जबकि राजनीतिक क्षेत्राीय राष्ट्रवाद युद्धकामी और साम्राज्यवाद का सर्जक है। संस्कृति तत्व ही राष्ट्रीयत्व का नियामक होता है। दीनदयाल जी के अनुसार ‘अखंडता की भगीरथी की पुण्यधारा में सभी प्रवाहों का संगम आवश्यक है। यमुना भी मिलेगी और अपनी सारी कालिमा खोकर गंगा की धवल धारा में एकरूप हो जाएगी। दीनदयाल जी के एकात्म अर्थ चिंतन पर डॉ. बजरंगलाल गुप्त ने विचार रखे हैं। दीनदयालजी ने समाज के विकास और प्रगति की आकांक्षा की थी इसीलिए न केवल आर्थिक परिदृश्य बल्कि सामाजिक, आर्थिक समस्याएँ और उनके समाधान के लिए भी हमेशा अपने विचार व्यक्त किए। वे एक ऐसी व्यवस्था के पक्षधर थे, जिसमें धर्म, अर्थ, सदाचार और समृद्धि साथ-साथ चल सकें। ऐसी व्यवस्था से अर्थ के अभाव और अर्थ के प्रभाव दोनों से बचाव संभव है।
पंडित दीनदयाल उपाध्यायजी के विराट व्यक्तित्व के पीछे उनकी तपस्या, त्याग और संघर्ष का विशेष आधार था। पंडितजी को जनसंघ का अध्यक्ष बनाए जाने पर उन्होंने कहा, ‘आपने मुझे किस झमेले में डाल दिया‘। इस पर गुरु गोलवलकर का यही जवाब था कि जो संगठन के काम में अविचल निष्ठा और श्रद्धा रखे वही कीचड़ में रहकर भी, कीचड़ से अछूता रहते हुए भी सुचारू रूप से वहाँ की सफाई कर सकेगा।
पंडित दीनदयाल उपाध्याय का अनुकरण करना सबके लिए आसान नहीं है। उपाध्याय जी की भतीजी मधु शर्मा पंडित जी की लगन का एक उदाहरण देते हुए बताती है कि जनसंघ का संविधान लिखने के लिए पंडित जी लगातार दो दिन तक जागते रहे थे और इसी अवधि में उन्होंने बिना खाए पीये सिर्फ काम किया था। दीनदयाल ने हर व्यक्ति के सामाजिक और सांस्कृतिक व्यवहार पर महŸव दिया है। भाजपा ने पंडित दीनदयाल को एकात्म मानवतावाद के साथ पूर्ण रूप में अपनाया है।
पंडितजी का चिंतन मौलिक था और पूरी मानवता के लिए था। पंडित हरिदत्त शर्मा के अनुसार ‘दीनदयाल जी के व्यक्तित्व को शब्दों में पिरो पाना बड़ा कठिन है। संजय द्विवेदी ने दीनदयाल जी के व्यक्तित्व के पहलू को उजागर करते हुए इस पुस्तक का संपादन किया है। दीनदयाल के बारे में जानने-समझने और उनके आदर्शो की जानकारी हासिल करने की इच्छा रखने वाले पाठकों और मीडिया से जुडे़ व्यक्तित्वों के लिए निश्चित रूप से यह पुस्तक उनके अध्ययन, विश्लेषण और शोध में विशेष सहायता करेगी। विभिन्न विद्वानों के दीनदयाल जी के बारे में जाहिर किए गए विचार, उनके लेखों और भाषणों को किताब में शामिल कर संजय द्विवेदी ने पंडित जी के बारे में सब कुछ समेट दिया है। इस पुस्तक के जरिए पंडित जी का संचारक व्यक्तित्व तो पाठकों के सामने आएगा ही, साथ ही लेखकीय और पत्राकारिता के रूप में उनके व्याख्यान दिशा-निर्देश का काम करेंगे।