व्रत करें, स्वस्थ रहें

व्रत की वैज्ञानिकता साबित करने के लिए जापानी वैज्ञानिक योशीनोरी ओहसुमी को मिला नोबेल पुरस्कार

ब्यूरो रिपोर्ट

जिस समय जापान के जीवविज्ञानी योशीनोरी ओहसुमी को चिकित्सा या फीजियोलॉजी के क्षेत्रा में नोबेल पुरस्कार देने की घोषणा की जा रही थी, भारत में लाखों लोग नवरात्रि का व्रत कर रहे थे। यह जानकर भारत के लोगों को खुश होना चाहिए कि इस नोबेल के मिलने और उनके व्रत करने के बीच सीधा-सीधा संबंध है। योशीनोरी ओहसुमी को यह पुरस्कार व्रत पर शोध करने के लिए ही दिया गया है। योशीनोरी ने यह साबित किया है कि व्रत रखने से लोगों का स्वास्थ्य अच्छा रहता है। इसके लिए उन्होंने एक वैज्ञानिक प्रक्रिया ऑटोफैगी को आधार बनाया है।
ऑटोफैगी का शाब्दिक अर्थ होता है स्वयं को खाना। यह एक प्रक्रिया है, जिसमें शरीर की कोशिकाएं मृत या बेकार कोशिकाओं को खाती हैं। इससे शरीर को उस समय ऊर्जा प्राप्त होती है, जब भोजन से मिलने वाले पोषक तत्व नहीं मिलते और इससे आयु बढ़ने की प्रक्रिया धीमी हो जाती है। दूसरे शब्दों में कहें तो यदि आप थोड़े समय के लिए खाना बंद कर देते हैं, तो आपका शरीर काम करना नहीं बंद करता, बल्कि जीवित कोशिकाएं शरीर की दूसरी मृत कोशिकाओं से ऊर्जा प्राप्त करती रहती हैं और आप इस ऊर्जा के बल पर अपनी दिनचर्या जारी रख सकते हैं।
टोकियो प्रौद्योगिकी संस्थान के योशीनोरी ओहसुमी ने इसके लिए कई प्रयोग किए, जिससे इस बारे में ज़्यादा जानकारी मिल पाई। व्रत करने से कोशिकाओं को प्राकृतिक तरीके से शरीर को साफ़ करने में मदद मिलती है। यानी कम समय के लिए व्रत करना या भूखे रहना शरीर की अंदरुनी सफाई करने में भी सहायता करता है।
जॉन हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी में न्यूरोसाइंस के प्रोफ़ेसर मार्क मैटसन बताते हैं कि व्रत करके हम मस्तिष्क की क्षमता में सुधार करते हैं। व्रत करना दिमाग के लिए एक चुनौती की तरह होता है कि वो शरीर को सक्रिय रखे। इसलिए जब शरीर के भीतर की कोशिकाएं मृत कोशिकाओं को खाना शुरू करती हैं, मस्तिष्क और भी ज्यादा सतर्क हो जाता है। ये ऐसी प्रतिक्रिया करता है, जो शरीर की भोजन की अनुपस्थिति में बीमारियों से बचाती है।
मैटसन बताते हैं कि जब जीव भूखा होता है, तो उसके दिमाग की नर्व सेल्स ज्यादा सक्रिय हो जाती हैं। आधुनिक विज्ञान के अनुसार शरीर भोजन से मिली ऊर्जा को ग्लाइकोजन के रूप में लीवर में जमा करता है और व्रत न रखने पर इसे खर्च करने का मौका शरीर को नहीं मिलता। बहुत से लोग इस जमा ऊर्जा को खर्च करने के लिए व्यायाम करते हैं, लेकिन व्यायाम से अच्छा है कि नियमित अवधि में व्रत रखा जाए।
इस प्रकार आधुनिक विज्ञान ने एक बार फिर भारत के ऋषियों की व्यवस्था को सही ठहराया है। भारतीय ऋषियों ने साप्ताहिक, पाक्षिक या मासिक व्रत रखने की प्रक्रिया विकसित की थी जिससे लोग स्वाभाविक रूप से स्वस्थ रहते थे। वर्ष में एक या दो बार नवरात्रों के रूप में लंबे व्रत रखने की भी व्यवस्था बनाई गई थी। इस प्रकार स्वाभाविक रूप से ही लोग अपने शरीर को डिटाक्स यानी कि दूषणमुक्त कर लिया करते थे और स्वस्थ रहते थे।