लाभकारी है चिरायता

धरोहर ब्यूरो

चिरायते का नाम अधिकांश लोगों ने सुन रखा होगा। बरसों से हमारी दादी-नानी चिरायते से बीमारियों को दूर भगाती रही है। असल में चिरायता एक जड़ी-बूटी है जो कुनैन की गोली से अधिक प्रभावी होती है। एक प्रकार से यह एक देहाती घरेलू नुस्खा है। पहले इस चिरायते को घर में सुखा कर बनाया जाता था। आजकल यह बाजार में भी मिलता है लेकिन अधिक कारगर तो घर पर बना हुआ ताजा और विशुद्ध चिरायता ही अधिक कारगर होता है।

आयुर्वेद के मतानुसार चिरायता का रस तीखा, गुण में लघु, प्रकृति में गर्म तथा कड़वा होता है। यह बुखार, जलन और कृमिनाशक होता है। चिरायता त्रिदोष (वात, पित्त, कफ) को नष्ट करने वाला, प्लीहा व यकृत (तिल्ली और जिगर) की वृद्धि को रोकने वाला, आमपाचक, उत्तेजक, अजीर्ण, अम्लपित्त, कब्ज, अतिसार, प्यास, पीलिया, अग्निमान्द्य, संग्रहणी, दिल की कमजोरी, रक्तपित्त, रक्तविकार, त्वचा के रोग, मधुमेह, गठिया का नाशक, जीवनीशक्तिवर्द्धक गुणों से युक्त है।

चिरायता मन को प्रसन्न करता है। इसके सेवन से पेशाब खुलकर आता है। यह सूजनों को नष्ट करता है। दिल को मजबूत व शक्तिशाली बनाता है। चिरायता जलोदर (पेट में पानी भरना), सीने का दर्द और गर्भाशय के विभिन्न रोगों को नष्ट करता है। यह खून को साफ करता है तथा कितना भी पुराना बुखार क्यों न हो चिरायता उसे नष्ट कर देता है। इसका कड़वापन ही इस औषधि का विशेष गुण होता है।

वैज्ञानिक मतानुसार चिरायता का रासायनिक विश्लेषण करने पर ज्ञात होता है कि इसमें पीले रंग का एक ओफेलिक एसिड, दो प्रकार के तिक्त चिरायनिन और एमेरोजेण्टिन नामक ग्लाइकोसाइड्स, दो क्रिस्टलीय फिनॉल जेन्टीयोपीक्रीन, पीले रंग के क्रिस्टल यौगिक, सुअर्चिरिन, नामक जैन्थोन होते हैं। उल्लेखनीय है कि एमेरोजेण्टिन नामक ग्लाइकोसाइड संसार के सबसे अधिक कड़वे पदार्थों में से एक होता है।

होम्योपैथी में चिरायते की उपयोगिता ज्वर निवारण हेतु सर्वप्रथम डॉ. कालीकुमार भट्टाचार्य जी ने प्रतिपादित की। श्री घोष अपनी पुस्तक ड्रग्स ऑफ हिन्दुस्तान में लिखते हैं कि चिरायता नए (एक्यूट) और पुराने (क्रानिक) दोनों ही प्रकार के ज्वरों को मिटाता है। नए वे जो विषाणु या मलेरिया पेरासाइटजन्य होते हैं। पुराने जीर्ण ज्वर बहुधा कमजोर लोगों में जड़ जमाए बैठे घातक जीवाणुओं के कारण होते हैं। आँखों में जलन के साथ दोपहर के बाद चढ़ने वाले तेज बुखार के लिए होम्योपैथी वैद्य चिरायता ही प्रयुक्त करते हैं।

कालाजार नामक जीर्ण ज्वर रोग में जिसमें लीवर तथा स्प्लीन दोनों बढ़ जाते हैं, चिरायता चमत्कारी प्रभाव दिखाता है। इसका मदर टिंक्चर एक और तीन एक्स की शक्ति में होम्योपैथी में प्रयुक्त होता है।

प्रातः काल खाली पेट लिया गया चिरायते का काढ़ा या चूर्ण (चिरायता भिगाया जल मिश्री के साथ) लेने से उदरस्थ कृमि तुरंत समाप्त हो जाते हैं। एक माह तक ऐसा करने पर कुछ अन्य रोग भी समूल रूप से नष्ट हो जाते हैं।

उपयोग विधि

ज्वर निवारण हेतु 3 ग्राम चिरायता 20 ग्राम जल में भिगोकर, रात भर रखकर प्रातः छान लेते हैं तथा 5 ग्राम दिन में दो बार मधु के साथ लेना चाहिए। चिरायते का काढ़ा मलेरिया ज्वर में तुरंत लाभ पहुँचाता है। लीवर प्लीहा पर इसका प्रभाव सीधा पड़ता है व ज्वर मिटाकर यह दौर्बल्य को भी दूर करता है। कृमि रोग, कुष्ठ, वैसीलिमिया, वायरीमिया सभी में इसका परिणाम तुरंत होता है। यह त्रिदोष निवारक है अतः बिना किसी आपत्ति के सभी प्रकृति वाले लोगों के लिए लाभकारी हो सकता है। बाह्य उपयोग के रूप में यह घावों को धोने, अग्निमंदता, अजीर्ण, यकृत विकारों में आंतरिक प्रयोगों के रूप में, रक्त विकार उदर तथा रक्त कृमियों के निवारणार्थ, शोथ एवं ज्वर के बाद की दुर्बलता हेतु भी प्रयुक्त होता है। इसे एक उत्तम सात्मीकरण स्थापित करने वाला टानिक भी माना गया है। 100 ग्राम तुलसी के सूखे पत्ते का चूर्ण, 100 ग्राम नीम की सूखी पत्तियों का चूर्ण, 100 ग्राम सूखे चिरायते का चूर्ण लीजिए। इन तीनों को समान मात्रा में मिलाकर एक बड़े डिब्बे में भर कर रख लीजिए। यह तैयार चूर्ण मलेरिया या अन्य बुखार होने की स्थिति में दिन में तीन बार दूध से सेवन करें। मात्रा दो दिन में आश्चर्यजनक लाभ होगा। यह एक कारगर एंटीबायोटिक है। बुखार ना होने की स्थिति में भी यदि इसका एक चम्मच सेवन प्रतिदिन करें तो यह चूर्ण किसी भी प्रकार की बीमारी चाहे वह स्वाइन फ्लू ही क्यों ना हो, उसे शरीर से दूर रखता है।