राष्ट्र की बेमिसाल मातृशक्ति

पूनम नेगी
लेखिका स्वतंत्र पत्रकार हैं।


भारतीय वांग्मय में भगवती दुर्गा की अभ्यर्थना पुरुषार्थ साधिका देवी के रूप में मिलती है। वे नारी शक्ति की प्रबल जिजीविषा की अन्यतम प्रतीक हैं। शक्ति के बिना शिव शव हैं। इस सूत्र में विश्व मंगल का गहन तत्वदर्शन निहित है। यही वजह है कि हमारी आर्य संस्कृति को मातृसत्तात्मक होने का गौरव हासिल है। वर्तमान की अत्याधुनिक इक्कीसवीं सदी को महिला सदी कहा जा रहा है। शिक्षा, चिकित्सा, बैंकिंग, इंजीनियरिंग, प्रबंधन, विज्ञान, खेलकूद, कला व सैन्य से लेकर समाजसेवा तथा राजनीति सभी क्षेत्रों में बीते कुछ सालों में अर्जित मातृ शक्ति की उपलब्धियां निश्चित रूप से गौरवान्वित करती हैं। आइए रूबरू होते हैं अपने महान राष्ट्र की ऐसी ही कुछ बेमिसाल मातृशक्तियों से –

भारत की अग्निपुत्री डॉ. टेस्सी थॉमस
भले ही शक्ति पूजा का महापर्व नवरात्र गत माह बीत चुका हो लेकिन भारत की अग्निपुत्री डॉ. टेस्सी थॉमस सही मायने में अपने जीवन में मां दुर्गा के दर्शन को आत्मसात कर राष्ट्र की सुरक्षा में अपना अमूल्य योगदान दे रही हैं। मिसाइल-वुमन ऑफ़ इंडिया कहलाने वाली डॉ. टेस्सी थॉमस को कम लोग ही जानते हैं। डॉ. टेस्सी थॉमस का अब तक का सारा जीवन भारत की अग्नि मिसाइल के अनेक उन्नत एवं परिष्कृत संस्करणों के लिए अनुसन्धान कर उन्हें विकसित करने में ही बीता है। बताते चलें कि भारत की 3500 कि.मी. तक मार करने वाली अग्नि-4 मिसाइल के सफल परीक्षण के बाद से ही रक्षा अनुसन्धान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) की इस महिला वैज्ञानिक डॉ. टेस्सी थॉमस को अग्नि पुत्री के नाम सम्बोधित किया जाने लगा था। भारत के मिसाइल कार्यक्रम और परियोजना के जनक डॉ अब्दुल कलाम को अपना गुरु मानने वाली डॉ. टेस्सी थॉमस को 2016 में लाल बहादुर शास्त्री नेशनल अवॉर्ड से भी पुरस्कृत किया जा चुका है। यह पुरस्कार मिसाइल टेक्नॉलजी के मैदान में भारत को आत्मनिर्भर बनाने के उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए दिया गया है। उनको आईटीएम यूनिवर्सिटी, ग्वालियर समेत पांच विभिन्न यूनिवर्सिटियों ने डीएससी की मानद डिग्री भी भेंट की है। मौजूदा समय में वह रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) में एडवांस्ड सिस्टम्स लैबरेटरी, हैदराबाद की डायरेक्टर हैं। जानना दिलचस्प होगा कि अप्रैल, 1964 में केरल में जन्मीं टेसी थॉमस का जन्म भी मिसाइल लॉन्च स्टेशन के पास केरल के अलाप्पुझा में हुआ था। हुआ। उनके पिता एक छोटे बिजनसमैन और मां गृहिणी थीं। उनकी शादी सरोज कुमार से हुई है जो भारतीय नौसेना में अधिकारी हैं और उनका एक बेटा है जिनका नाम तेजस है। वे दुनिया में रणनीतिक परमाणु बैलिस्टिक मिसाइलों पर काम कर रही महिलाओं में से एक हैं। भारत में मिसाइल टीम का नेतृत्व करने वाली इस पहली महिला की उपलब्धियों पर देश के जाने-माने उद्योगपति आनंद महिंद्रा का यह कहना वाकई मायने रखता है कि भारतीय मिसाइल प्रोजेक्ट का नेतृत्व करने वाली पहली महिला किसी बॉलीवुड स्टार से ज्यादा प्रसिद्ध होने की योग्यता रखती हैं।

मार्शल आर्ट गुरु मीनाक्षी राघवन
मीनाक्षी राघवन राष्ट्र की अनूठी मातृशक्ति का एक बेमिसाल उदाहरण हैं। उनके शिष्य उन्हें प्यार से समुराई अम्मा पुकारते हैं। काबिलेगौर हो कि 75 साल की उम्र में वे सैकड़ों बच्चों को कलारीपयट्टू (तलवार आधारित दक्षिण भारतीय मार्शल आट्र्स) का प्रशिक्षण दे रही हैं। उम्र के इस पड़ाव पर भी उनकी युद्धकला व स्फूर्ति अच्छे अच्छों को हैरानी में डाल देती है। यही वजह है कि उनकी प्रशिक्षणशाला में प्रशिक्षुओं की भारी भीड़ जुटती है। मीनाक्षी का मूल मकसद अपने इस युद्ध कौशल को देश की भावी पीढ़ी खासतौर पर बालिकाओं को सिखाना है क्योंकि वे मानती हैं कि कलारी केवल खेल नहीं बल्कि आत्मरक्षा का बेहतरीन हथियार है। बताते चलें कि कलारीपयट्टू देश की वह प्राचीन युद्धकला है जो बारूद और अन्य परिष्कृत हथियारों के आविष्कार से पहले प्राचीन युद्धों में इस्तेमाल की जाती थी तथा 17वीं सदी में तत्कालीन शिक्षा व्यवस्था में यह सैन्य शिक्षा में शामिल थी। मीनाक्षी कहती हैं – कलारी के सतत अभ्यास की बदौलत की कृपा से अब तक पूरी स्वस्थ हैं और ऐसे ही चुस्त दुरुस्त बने रहने की प्रार्थना ईश्वर से करती हैं ताकि अधिक से अधिक छात्रों को इस युद्धकला में पारंगत कर सकें।
केरल के वटकरा की रहने वाली मीनाक्षी राघवन बताती हैं, बचपन में मैं तलवारवाजी के बजाय नृत्य सीखा करती थी। एक दिन नृत्य अभ्यास करते हुए मेरे शिक्षक ने मेरे अभिभावकों को सलाह दी कि शरीर में और लचीलापन लाने के लिए वे मुझे कलारीपयट्टू (तलवार आधारित प्राचीन दक्षिण भारतीय मार्शल आट्र्स विधा) भी सिखाएं। मुझे यह अभ्यास पसंद आने लगा, इसलिए मैंने इसे जारी रखा। हालांकि नृत्य के मुकाबले यह एक मुश्किल काम था लेकिन परिवार के सहयोग से धीरे-धीरे ही सही, मैं कलारी में निपुण होने लगी। 17 साल की उम्र में राघवन से मेरी शादी हुई जो कलारी सिखाने के एक गुरुकुल के प्रमुख थे। मै भी उनकी सहयोगी के तौर पर उस गुरुकुल से जुड़ गयी। आठ साल पहले पति की मौत के बाद मैं उनके स्थान पर गुरुकुल की प्रमुख बन गयी। उस वक्त मेरी उम्र 66 साल थी। पर अपने पति के काम को आगे बढ़ाने की इच्छा से मैंने बच्चों को कलारी सिखाना शुरु किया। आज मेरी चारो संतानें और नाती-पोते सभी कलारी का अभ्यास करते हैं।

जंगल की वयोवृद्ध वैद्य लक्ष्मीकुट्टू
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने पहले रेडिया कार्यक्रम मन की बात में केरल के कल्लार जिले की रहने वाली एक आदिवासी महिला लक्ष्मीकुट्टी की खुलेमन से प्रशंसा की थी जिन्होंने अनेक जीवनरक्षक आयुर्वेदिक औषधियां बना कर एक पारम्परिक चिकित्सा के क्षेत्र में एक मिसाल कायम की है। आदिवासी इलाके में जंगल के बीच ताड़ के पत्तों से बनी झोपड़ी में रहने वाली 76 साल की लक्ष्मीकुट्टी यूं पेशे से तो शिक्षिका हैं मगर उन्हें पारम्परिक जड़ी-बूटियों की अद्भुत जानकारी है। सर्पदंश से शरीर में जहर के असर को रोकने वाली दवा बनाने में उन्हें महारत हासिल है। यही वजह है कि जड़ी-बूटियों से इलाज करने के लिए खासकर सर्पदंश से पीडि़त लोग दूर दूर से लक्ष्मीकुट्टी के पास बड़ी संख्या में पहुंचते हैं।
जंगल की बड़ी अम्मा के नाम से मशहूर लक्ष्मीकुट्टू का दावा है कि अपनी स्मरण शक्ति आधार पर वे 500 औषधियां तैयार कर सकती हैं। ये सारा ज्ञान उनको अपनी मां से परंपरागत रूप में मिला था जो कि गांव में दाई का काम करती थी। जानना दिलचस्प होगा कि केरल के वन विभाग ने लक्ष्मीकुट्टी के पारम्परिक औषधीय ज्ञान पर आधारित एक किताब का संकलन किया है। यही नहीं अब तक उन्हें कई पुरस्कारों से सम्मानित हो चुकीं लक्ष्मीकुट्टी को भारतीय जैव विविधता कांग्रेस द्वारा 2016 में सम्मानित किया जा चुका है। इस उम्र में भी लक्ष्मी हर्बल दवाओं की अपनी जानकारी से लगातार समाज सेवा में जुटी हुई हैं। लोग प्यार से लक्ष्मीकुट्टी को वनामुथस्सी नाम से भी पुकारते हैं। वे अब तक सैकड़ों लोगों का इलाज कर चुकी हैं। 1995 में लक्ष्मीकुट्टी को उस समय पहचान मिली जब केरल सरकार ने उन्हें नट्टू वैद्य रत्न पुरस्कार से नवाजा था। कहा जाता है कि 1950 में वह जनजातीय समुदाय से पहली लड़की थीं, जिसे स्कूल जाने का मौका मिला था। उस वक्त उन्हें स्कूल जाने के लिए 10 किलोमीटर रोजाना पैदल चलना पड़ता था। उन्होंने अपनी मां से ये चिकित्सा पद्धति सीखी थी।

खनकती आवाज जो निभा रही हैं जागर की परंपरा बसंती बिष्ट
उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्र में देवी-देवताओं का स्तुतियां जागर (जागरण का एक रूप) के जरिए की जाती हैं। इस परंपरा को जागर गायिका बसंती बिष्ट ने न सिर्फ आगे बढ़ाया है बल्कि जागर पर शोध कर उन्होंने इस गायन विधा को फलक तक भी पहुंचाया है। बताते चलें कि जिस उम्र में तमाम महिलाएं खुद को घर की दहलीज तक समेट लेती हैं, उस उम्र में पर्वतीय क्षेत्र की एक उम्रदराज ग्रामीण महिला ने तमाम वर्जनाएं तोड़ पुस्र्षों के एकाधिकार को चुनौती देते हुए उत्तराखंड की पहली महिला जागर गायिका होने का गौरव हासिल किया। 64 साल की बसंती बिष्ट बीते साल साल पद्म सम्मान से सम्मानित होने वाली उत्तराखंड इकलौती ऐसी शख्सियत हैं जिन्होंने न सिर्फ नंदादेवी के जागर को विश्व पटल पर पहचान दिलायी बल्कि उत्तराखंड की पुरातन जागर परम्परा को पहली बार एक किताब का रूप भी दिया ताकि आने वाली पीढिय़ों के लिये इस पारम्परिक धरोहर को संभाल कर रखा जा सके।
गौरतलब हो कि बंसती बिष्ट की पहचान सिर्फ पारंपरिक वाद्य यंत्र डौंर (डमरू) बजाने और भगवती के जागर की असाधारण आवाज के तौर पर ही नहीं है वरन उत्तराखंड आंदोलन के दौरान उनके लिखे गीत आज भी खूब पसंद किये जाते हैं। बताते चलें कि बसंती बिष्ट उत्तराखंड के चमोली जिले के उस ल्वॉणी गांव की रहने वाली हैं जहां बारह साल में निकलने वाली नंदा देवी की धार्मिक यात्रा का अंतिम पड़ाव होता है। इसे एशिया की सबसे लंबी पैदल यात्रा माना जाता है। चमोली जिले के बधाण इलाके को नंदा देवी का ससुराल माना जाता है। इसलिये यहां के लोग नंदा देवी के स्तुति गीत, पांडवाणी और जागर खूब गाते हैं। यहां के लोगों का मानना है कि नंदा देवी उत्तराखंड की देवी ही नहीं बल्कि बेटी भी हैं। इस कारण जब वो हर 12 साल बाद अपने मायके आती हैं तो उनका पूरे सम्मान के साथ आदर किया जाता है और उनके आगमन और विदाई पर अनेक गीत और जागर गाये जाते हैं। ये चलन पीढिय़ों से चल रहा है। बसंती बिष्ट कहती हैं कि उन्हें जागर गाने की शुरुआती शिक्षा अपनी मां बिरमा देवी से मिली जो खुद बहुत अच्छा जागर गाती थीं।

मुसहरों की अंधेरी जिंदगी में रोशन करने वाली सुधा वर्गीस
समाजसेवी सुधा वर्गीस की शख्सियत आज किसी परिचय की मोहताज नहीं है। महादलितों की श्रेणी में शुमार बिहार की मुहसर जाति के जीवन को समाज की मुख्यधारा से जोडऩे के लिए कठिन संघर्ष करने वाली सुधा जी की उनके अधिकारों के लिए संघर्ष की कहानी किसी फिल्मी कथानक से कम नहीं है। बकौल सुधा वर्गीस 1965 में वे पहली बार एक कॉन्वेंट स्कूल में शिक्षक बनकर बिहार गयी थीं। जहां उन्होंने गरीबी और भेदभाव को देखा बेहद करीब से देखा। वहां उनको मुसहर जाति के बारे में पता चला। उनकी गरीबी व अशिक्षा देख वे हैरान हो गयीं। उन्होंने उनकी इस गरीबी और लाचारी को खत्म करने का एक तरीका निकाला। उन्होंने अपना सामान बांधा और मुसहरों के गांव जमसौत जा पहुंचीं। उस गांव में जीवन जीना किसी जंग लडऩे के बराबर था। बिजली-पानी तो दूर की बात है, वहां शौचालय तक का प्रबंध नहीं था। जैसे-तैसे उन्होंने एक बेहद गंदी गली में एक घर ढूंढा। उन्हें रोजाना सुबह चार बजे उठना पड़ता था ताकि गांव की महिलाओं के साथ शौच करने जा सकें। उस गांव में न साफ पानी था और न ही पेटभर भोजन। मुसहर जाति की असली परेशानी यह थी उन्हें अपने हक ही नहीं मालूम थे। उनके बच्चे स्कूल नहीं जाते थे, क्योंकि वहां उन्हें अछूत कहकर कक्षाओं से दूर रखा जाता था। बड़े लोगों के पास मजदूरी के सिवा और कोई काम नहीं था। यहां भी उनके साथ भेदभाव होता था उन्हें कम वेतन मिलता था।
महिलाओं को नहीं पता था कि बलात्कार अपराध है। अशिक्षा व जागरूकता के अभाव में लोग इस अत्याचार व भेदभाव के खिलाफ कुछ नहीं कह पाते थे। यह सब जानने के बाद सुधा जी ने साइकिल दीदी बनकर मुसहरों के उद्धार का नया सफर शुरू किया। उन्होंने लड़कियों की पढ़ाई से शुरुआत की। उनके अधिकारों की लड़ाई लडऩे के लिए फिर खुद वकालत की पढ़ाई भी की ताकि वह कानूनी अड़चनों को भी संभाल सकें। उन महादलितों की लड़ाई लड़ते हुए 1987 में उन्होंने नारी गुंजन नाम का एक स्वयंसेवी संगठन बनाया। उनके इस संगठन के जरिए आज बहुत सी महिलाएं घर चलाने के लिए कुछ पैसा कमा पा रही हैं। सैकड़ों महिलाएं बागवानी कर आत्मनिर्भर बनी हैं। इतना ही नहीं आज मुसहर महिलाओं का अपना खुद का एक महिला बैंड भी है। सुधा वर्गीस के प्रयासों की बदौलत यह पिछड़ा समुदाय आज एक बेहतर कल की ओर बढ़ रहा है।