राष्ट्रीय एकता और आस्था का संगम महाकुम्भ

राजीव मल्होत्रा
लेखक इनफिनिटी फाउंडेशन से जुड़े हैं।
भारत आदिकाल से पर्वो और उत्सवों का देश रहा है जो भारत की श्रेष्ठता और समृद्धि को प्रकट करता है। भारतीय समाज की जीवन पद्धति में वैदिक काल से ही कुम्भ जैसे महापर्वो के आयोजन की विशेष परम्परा रही है। भारत को सांस्कृतिक एकता के सूत्र में बॉधने के लिए जिस प्रकार वैदिक जीवन पद्धति के महान प्रचारक आदि गुरु शंकाराचार्य ने भारत के चारों कोनों में चार धामों की स्थापना की, उसी प्रकार राष्ट्रीय एकता के प्रतीक के रूप में देश के चार प्रमुख कुम्भ महापर्व के आयोजन के स्थल है। वैदिक संस्कृति में जहां व्यक्तिगत साधना से जीवन पद्वति को परिष्कृत करने पर जोर दिया जाता था वहीं दूसरी ओर तीर्थ स्थलों और महापर्वो को राष्ट्रीय एकता और राष्ट्रीय चरित्र को परिष्कृत करने का माध्यम माना गया है

महाकुम्भ केवल धार्मिक आयोजन मात्र नहीं है अपितु आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्त्व को फलीभूत करने वाला आस्था पर्व है। यहाँ आकर मनुष्य एक ओर आत्मशुद्धि व आत्मकल्याण का भाव रखता है वही दूसरी ओर सम्पूर्ण राष्ट्र मेरा परिवार है, यह भाव रखकर राष्ट्रीय एकता को मजबूत करता है। हजारों वर्षो से चली आ रही कुम्भ परम्परा भारत की प्राचीन राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक धारा का परिचय कराती है। कुम्भ मेले में सभी पन्थ सम्प्रदायों के देश-विदेश के साधु सन्त आकर सामाजिक समस्याओं पर विचार विमर्श करते है। यहाँ शैव, वैष्णव, शाक्त, सिख, जैन, बौद्ध सभी पंथ सम्प्रदाय के भारतीय सम्मिलित होते है। सभी मिलकर पूरी परम्परा में क्या-क्या परिवर्तन करना चाहिए, कौन सी परम्परा राष्ट्र और समाज के लिए हानिकारक है, भारतीय समाज को क्या संदेश देना है इन सभी विषयों पर गहन विचार विमर्श कुम्भ में किया जाता है। कुम्भ में स्नान करने वाला कौन जाति का, कहां का निवासी है इसका विचार किये बिना सम्पूर्ण समाज के लोग यहाँ आते हंै।

यह राष्ट्रीय एकता का अनुपम संगम है। यही वास्तव में भारत की सनातनी शक्ति है। जिसमें ऊँच-नीच, पथं-सम्प्रदाय उत्तर-दक्षिण आदि के भेद को कोई स्थान नहीं है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का साक्षात् दर्शन का अद्भुत आयोजन है कुम्भ महापर्व। भारत के चार कुम्भ स्थल धर्म व्यवस्था द्वारा स्थापित चार सार्वजनिक मंच है जो सम्पूर्ण समाज को एक सूत्र में बाँधते है। व्यक्तिगत नियन्त्रण के बिना लाखों लोगों का आस्था के इस पर्व में एकत्रित होना निश्चित ही अद्भुत परम्परा है। वास्तव में भारत राष्ट्र को इस प्रकार के महापर्वो ने ही एक सूत्र में बांधा हुआ है। संसार सागर में विचारों और भावनाओं के सहयोग से मन्थन करते हुए अमृत निकालने की व्यवस्था का नाम महाकुम्भ है। राष्ट्रीय एकता और आस्था की अद्भुत रचना है कुम्भ।

 

 

वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिता: यनि हम राष्ट्र को जगाने वाले पुरोहित है। इस वाक्य के द्वारा राष्ट्र की सर्वप्रथम संकल्पना वेदों ने की थी। उत्तर से दक्षिण तथा पूर्व से पश्चिम तक की भारत की सीमाओं का उल्लेख मनुस्मृति और पुराणों सरीखे हमारे अनेकानेक ग्रन्थों में मिलता है। पांच हजार वर्ष पूर्व जो महायुद्ध हुआ था उसे यद्यपि महाभारत के नाम से जानते हैं किन्तु युद्ध मे सम्मिलित होने वाले देशों पर ध्यान दे तो हमारे सामने एक बृहत्तर भारत का चित्र उभर कर सामने आता है। शायद भारत का यही चित्र आचार्य चाणक्य के सामने भी रहा होगा, तभी उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन राष्ट्र की अखण्डता को सुनिश्चित करने में लगा दिया और वे इसमें सफल भी हुए। मौर्य साम्राज्य महाभारत के बाद के इतिहास में आज तक का सबसे बड़ा भारतीय संघराज्य रहा है। आज के भारत का क्षेत्रफल भी उससे छोटा ही है।

भारतीय चिंतन में यद्यपि राष्ट्रनिर्माण का कार्य राजनीति के अन्तर्गत नहीं समझा जाता परन्तु राष्ट्र और देश में गहन सम्बन्ध है और इस अर्थ में देश की राजनीति से राष्ट्र भी प्रभावित होता ही है। घर के प्रबन्ध की तुलना देश की राजनीति के साथ कर सकते है। घर के प्रबन्ध की व्यवस्था नहीं हो सकती यदि घर में रहने वाले घर को व्यवस्थित न रखना चाहें या घर की संकल्पना पर ही सवाल खड़ा कर दें। आज कुछ ऐसी ही स्थिति देश में निर्माण होती प्रतीत हो रही है। इसका ताजा उदाहरण जवाहरलाल विश्वविद्यालय, नई दिल्ली में चल रहा विवाद है। जनेवि के कुछेक छात्र और शिक्षक भारतविरोधी नारे लगाने को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मानते हैं। इतना ही नहीं, बीबीसी नामक एक विदेशी मीडिया संस्थान से बातचीत में वे यह भी कहते हैं कि राष्ट्र और राष्ट्रीयता जैसी अवधारणा में उनका विश्वास नहीं है, क्योंकि वे माक्र्सवादी हैं। राष्ट्र और राष्ट्रवाद को लेकर यह को संभ्रम बना है, इसका बड़ा कारण भारत की चिंतन परंपरा से उनका कटा होना है। राष्ट्र की भारतीय संकल्पना यूरोप के उस नेशन-स्टेट की संकल्पना से सर्वथा भिन्न है जिसके बारे में पश्चिमी विद्वानों ने कहा है कि नेशनलिज्म गुंडों की अंतिम शरणस्थली होती है।

इसलिए अंग्रेजी के शब्दों का भारतीय रूपांतर करते समय प्राचीन संस्कृत शब्दों के प्रयोग में बड़ी सावधानी रखी जाने की आवश्यकता है। नेशन राष्ट्र नहीं है। नेशन एक राजनीतिक ईकाई है, जबकि भारत का राष्ट्र एक सांस्कृतिक ईकाई है। राष्ट्र की संकल्पना विश्व को भारत की एक अनुपम देन है। यदि भारत की राष्ट्र की अवधारणा को विश्व ठीक से समझ लेगा और उसे अपने आचरण में उतार पाएगा, तो वह अशांति, युद्ध और सभ्यताओं के परस्पर संघर्ष की समस्याओं से मुक्ति पा सकेगा।

भारत की इस राष्ट्र की संकल्पना को छत्रपति शिवाजी, महर्षि दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानंद और महात्मा गाँधी जैसे महापुरूष भलीभांति समझते थे। उन्होंने इसे मजबूत करने के लिए काफी प्रयास किया। दुर्भाग्यवश अंग्रेजों के बाद भारत का शासन जिनके हाथ में रहा, वे स्वयं राष्ट्र की इस सांस्कृतिक संकल्पना से अनभिज्ञ थे। उन्हें भी केवल नेशन-स्टेट की संकल्पना ही समझ आती थी। इस कारण उन्होंने जनेवि जैसा संस्थान खड़ा किया जो न केवल भारत की मिट्टी से पूरी तरह कटा हुआ है, बल्कि जो भारत की अनुपम थाती से अनभिज्ञ भी है। वहां के शिक्षकों तक को भारत की सांस्कृतिक समझ नहीं है, छात्रों की तो बात ही दूर है। सवाल है कि क्या हम कुछेक खंडहरों और स्थापत्य-निर्माणों को ही भारत की धरोहर मानते हैं? क्या भारत की ज्ञान परंपरा यहां की धरोहर नहीं है?

यदि ज्ञान परंपरा को इस देश की धरोहर मानें तो उसके संरक्षण करने की भी उतनी ही आवश्यकता है जितनी कि हम उन खंडहरों की करते हैं। जैसे खंडहरों व अवशेषों का संरक्षण पुरातत्व विभाग करता है, वैसे ही ज्ञान परंपरा का संरक्षण केवल विश्वविद्यालयों में ही किया जा सकता है। क्या हम अपने विश्वविद्यालयों को भारत के इस अमूल्य धरोहर के संरक्षण का केंद्र बना सकते हैं? जनेवि के विवाद से उपजा मूल प्रश्न यही है।