राष्ट्रीय एकता और आस्था का संगम महाकुम्भ

भारत आदिकाल से पर्वो और उत्सवों का देश रहा है जो भारत की श्रेष्ठता और समृद्धि को प्रकट करता है। भारतीय समाज की जीवन पद्धति में वैदिक काल से ही कुम्भ जैसे महापर्वो के आयोजन की विशेष परम्परा रही है। भारत को सांस्कृतिक एकता के सूत्र में बॉधने के लिए जिस प्रकार वैदिक जीवन पद्धति के महान प्रचारक आदि गुरु शंकाराचार्य ने भारत के चारों कोनों में चार धामों की स्थापना की, उसी प्रकार राष्ट्रीय एकता के प्रतीक के रूप में देश के चार प्रमुख कुम्भ महापर्व के आयोजन के स्थल है। वैदिक संस्कृति में जहां व्यक्तिगत साधना से जीवन पद्वति को परिष्कृत करने पर जोर दिया जाता था वहीं दूसरी ओर तीर्थ स्थलों और महापर्वो को राष्ट्रीय एकता और राष्ट्रीय चरित्र को परिष्कृत करने का माध्यम माना गया है

महाकुम्भ केवल धार्मिक आयोजन मात्र नहीं है अपितु आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्त्व को फलीभूत करने वाला आस्था पर्व है। यहाँ आकर मनुष्य एक ओर आत्मशुद्धि व आत्मकल्याण का भाव रखता है वही दूसरी ओर सम्पूर्ण राष्ट्र मेरा परिवार है, यह भाव रखकर राष्ट्रीय एकता को मजबूत करता है। हजारों वर्षो से चली आ रही कुम्भ परम्परा भारत की प्राचीन राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक धारा का परिचय कराती है। कुम्भ मेले में सभी पन्थ सम्प्रदायों के देश-विदेश के साधु सन्त आकर सामाजिक समस्याओं पर विचार विमर्श करते है। यहाँ शैव, वैष्णव, शाक्त, सिख, जैन, बौद्ध सभी पंथ सम्प्रदाय के भारतीय सम्मिलित होते है। सभी मिलकर पूरी परम्परा में क्या-क्या परिवर्तन करना चाहिए, कौन सी परम्परा राष्ट्र और समाज के लिए हानिकारक है, भारतीय समाज को क्या संदेश देना है इन सभी विषयों पर गहन विचार विमर्श कुम्भ में किया जाता है। कुम्भ में स्नान करने वाला कौन जाति का, कहां का निवासी है इसका विचार किये बिना सम्पूर्ण समाज के लोग यहाँ आते हंै।

यह राष्ट्रीय एकता का अनुपम संगम है। यही वास्तव में भारत की सनातनी शक्ति है। जिसमें ऊँच-नीच, पथं-सम्प्रदाय उत्तर-दक्षिण आदि के भेद को कोई स्थान नहीं है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का साक्षात् दर्शन का अद्भुत आयोजन है कुम्भ महापर्व। भारत के चार कुम्भ स्थल धर्म व्यवस्था द्वारा स्थापित चार सार्वजनिक मंच है जो सम्पूर्ण समाज को एक सूत्र में बाँधते है। व्यक्तिगत नियन्त्रण के बिना लाखों लोगों का आस्था के इस पर्व में एकत्रित होना निश्चित ही अद्भुत परम्परा है। वास्तव में भारत राष्ट्र को इस प्रकार के महापर्वो ने ही एक सूत्र में बांधा हुआ है। संसार सागर में विचारों और भावनाओं के सहयोग से मन्थन करते हुए अमृत निकालने की व्यवस्था का नाम महाकुम्भ है। राष्ट्रीय एकता और आस्था की अद्भुत रचना है कुम्भ।