महर्षि दयानंद की सभ्यतामूलक दृष्टि

रवि शंकर
कार्यकारी संपादक
यह देखना वास्तव में आश्चर्यजनक लग सकता है कि जिस समय यूरोप और अमेरिका में सभ्यताओं के संघर्ष की बात कही और उठाई जा रही थी, ठीक उसी समय भारत उदारीकरण को बढ़ाने की प्रक्रिया में था। यह थोड़ा दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जा सकता है कि हजारों वर्षों से पूरी दुनिया को शांति का संदेश देने वाला देश इतना दिग्भ्रमित हो। यह और भी बड़ा दुर्भाग्य प्रतीत होता है जब हम यह देखते हैं कि पिछले लगभग डेढ़ हजार वर्षों से निरंतर असभ्य और बर्बरों के आक्रमणों से दो-चार होने के बाद भी हमारे देश में इस समस्या को समझने का कोई ठोस प्रयास नहीं हुआ। भक्तिकाल को अवश्य प्रतिरोध के रूप में देखा जाता है, परंतु भक्तिकाल के संतों और महात्माओं ने इन बर्बरों और असभ्यों के सभ्यतागत आक्रमणों को समझने, उसे व्याख्यायित करने और उसका सामना करने का प्रयास नहीं किया। पहली बार यह प्रयास करते हैं महर्षि स्वामी दयानंद सरस्वती 1870 के दशक में।

यह देखना और भी दुर्भाग्यजनक लगता है कि महर्षि दयानंद को भारतीय इतिहास में केवल एक समाजसुधारक के रूप में देखा और समझा जाता है, जिन्होंने कथित हिंदू धर्म की बुराइयों को दूर करने के लिए आर्य समाज की स्थापना की। हालांकि इसकी विस्तृत चर्चा हम आगे करेंगे, परंतु यहां यह स्पष्ट कर देना समीचीन होगा कि महर्षि दयानंद ने आर्य समाज की स्थापना नहीं की थी। महर्षि दयानंद जिस काल में हुए थे, देश में उस समय मुगलों की सत्ता समाप्त हो चुकी थी, मराठे पराजित हो चुके थे, अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन लगभग पूरे भारतवर्ष में फैल चुका था। महर्षि ने 1857 के पहले स्वाधीनता संग्राम में पूरी शक्ति से भाग लिया था। उस क्रांति में सन्यासियों का संजाल खड़ा करने और जनता में क्रांति का ज्वाला भड़काने में उनका सक्रिय सहभाग रहा था। परंतु 1857 की क्रांति के असफल होने के बाद महर्षि ने अपने प्रयासों की दिशा बदल दी।

दयानंद इसके बाद देश भर में शास्त्रार्थ करते नजर आते हैं। शास्त्रार्थ करते, गुरूकुल और गौशालाएं स्थापित करते, राजाओं को संगठित करने के प्रयास करते और अन्य सामाजिक विभूतियों को एकजुट करने का प्रयास करते हुए दयानंद ने देश में पहली बार उस सभ्यातामूलक विमर्श को जन्म दिया जिसकी आवश्यकता पिछले हजार वर्षों से अनुभव की जा रही थी। क्या हम इसकी तुलना आदि गुरू शंकराचार्य की परिस्थितियों से कर सकते हैं? आदि गुरू शंकराचार्य के समय में देश में नास्तिक बौद्ध मत प्रचलित हो रहा था जो अपने मत के प्रचार के लिए देशद्रोह की सीमा तक जाने के लिए तैयार बैठा था। देश के स्थापित धर्मगुरू अपने मठों व आश्रमों में मगन थे। वे बौद्धों द्वारा खड़े किए जाने वाले सभ्यतागत मुद्दों पर उत्तर देने के लिए न तो तैयार थे और न ही उसकी तैयारी कर रहे थे। ऐसे में कुमारिल भट्ट ने यह बीड़ा उठाया और उन्होंने बौद्धों के सभ्यतामूलक आक्रमण का सफलतापूर्वक प्रतिरोध किया। परंतु बौद्धों ने छल से कुमारिल भट्ट को उनके ही नियमों का हवाला देकर आत्महत्या करने पर विवश कर दिया। मंडन मिश्र जैसे वैदिक विद्वान इस अन्याय पर खामोश रहे। तब आचार्य शंकर ने इस सभ्यतागत संघर्ष में वैदिक धर्म की ध्वजा उठाई।

कुछ ऐसा ही वातावरण हम उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में भी देखते हैं। हालांकि आठवीं शताब्दी से ही मुसलमानों का और पंद्रहवीं शताब्दी से ही ईसाइयों का सभ्यतागत आक्रमण देश पर प्रारंभ हो चुका था, परंतु उदार परंपरा वाले भारतवर्ष के शासन उनसे व्यापार कर रहे थे, उनके लिए देश में मस्जिदें और चर्च बनवा रहे थे। आदिगुरू शंकराचार्य की परंपरा के पाँचों पीठों के शंकराचार्यों के अलावा देश में दर्जनों और शंकराचार्यों ने जन्म ले लिया था, परंतु वे इस्लाम के सूफी और ईसाइयत के सेवा के रूप में होने वाले आक्रमणों को समझ ही नहीं पा रहे थे उसका उत्तर देने के लिए सन्नध होना तो काफी दूर की बात है। मुसलमानों के शासन के समाप्त होने के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी का शासन जब आया तो चर्च पूरी ताकत से सक्रिय हो गया। इससे पहले वह केवल गोआ और दक्षिण भारत में तमिलनाडू वगैरह में ही थोड़ा बहुत काम कर पा रहा था। गोआ में चर्च के इन्क्वीजीशन की क्रूरता का इतिहास अब उपलब्ध है। वर्ष 1835 के बाद लार्ड मैकॉले के प्रयासों से देश में अंग्रेजी शिक्षा का भी सूत्रापात हो गया था जिसमें बाइबिल का अध्ययन सहजता से करवा दिया जाता था और जो ईसाई बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित होता था।

इस विकट परिस्थिति में देव दयानंद ने हरिद्वार के कुंभ के मेले में पाखंडखंडिनी पताका लहराई और पहली बार देश में सभ्यतामूलक विमर्श प्रारंभ किया। दयानंद ने केवल पंडितों से शास्त्रार्थ नहीं किया, उन्होंने बड़ी संख्या में पादरियों और मौलानाओं से भी शास्त्रार्थ किये। सत्यार्थ प्रकाश में उन्होंने भारतीय मतों की समीक्षा करने के साथ-साथ कुरआन और बाइबिल की भी समीक्षा की। किसी भारतीय द्वारा कुरआन और बाइबिल की समीक्षा का यह पहला प्रयास था, परंतु यह इतना जबरदस्त प्रयास था कि इस समीक्षा के बल पर आज भी किसी भी मौलाना या पादरी को निरूत्तर किया जा सकता है। महर्षि दयानंद ने आध्यात्मिक और धार्मिक आधारों पर इस्लाम और ईसाइयत दोनों को ही खारिज किया और उनके पाखंड को उजागर किया।

उनके इस प्रयास का ही परिणाम था कि देश में उनके पीछे ऐसे विमर्श को खड़ा करने वाले लोगों की एक पूरी श्रृंखला खड़ी हो गई। पंडित गुरूदत्त, श्यामजी कृष्ण वर्मा, महात्मा लेखराम, चमुपति शास्त्राी, स्वामी श्रद्धानंद, लाला लाजपतराय आदि ने इस बौद्धिक बहस को न केवल आगे बढ़ाया, बल्कि उन्होंने इस यज्ञ में अपने प्राणों की प्रत्यक्ष आहूतियां भी दीं। हिंदू से मुसलमान और ईसाई बने मतांतरितों को पुनः वैदिक धर्म में शामिल करना प्रारंभ करने के कारण महात्मा लेखराम, स्वामी श्रद्धानंद जैसे महान लोगों की हत्या कर दी गई। इस्लाम की समीक्षा करने वाले ग्रंथों का प्रकाशन करने के कारण महाशय राजपाल जी की हत्या कर दी गई। यहां यह जानना आवश्यक है कि सबसे पहले महर्षि दयानंद की भी हत्या ही की गई थी।

इतनी हत्याओं के बाद भी यह विमर्श स्थगित नहीं हुआ। परंतु इस विमर्श को विराम देने के दूसरे कई प्रयास प्रारंभ हो गए थे। महर्षि दयानंद के ही काल में प. बंगाल में राजा राममोहन राय द्वारा स्थापित ब्रह्मसमाज ईसाइयत से भरी अंग्रेजी शिक्षा को देश के लिए वरदान मान रहा था तो रामकृष्ण परमहंस इस्लाम को आध्यात्मिक रूप से स्थापित कर रहे थे। इसलिए जब स्वामी विवेकानंद ने वर्ष 1894 में शिकागो में भाषण दिया और सभी मतों को समान बताया तो उन्हें यूरोप और अमेरिका के समाज ने हाथों-हाथ लिया। इसके बाद प्रयासपूर्वक महर्षि दयानंद द्वारा खड़े किए गए सभ्यतामूलक विमर्श को दबाने के प्रयास किए जाने लगे। सबसे पहले तो उन्हें एक समाजसुधारक मात्रा मान कर उनके योगदान को नकार दिया गया। फिर उन्हें आक्रामक हिंदुत्व का प्रतिनिधि बनाकर खारिज करने की चेष्टा की गई। इसमें महात्मा गांधी जैसे नेताओं ने भी जाने-अनजाने अपना योगदान दिया।

वास्तविकता यह है कि महर्षि दयानंद केवल समाजसुधारक नहीं थे। वे समाजसुधारक भी थे। इस प्रकार तो वे संस्कृत के शिक्षक भी थे। संस्कृत व्याकरण के मूल ग्रंथ अष्टाध्यायी और वेदों के अर्थपूर्वक पठन-पाठन को दोबारा से उन्होंने ही स्थापित किया। परंतु इसके कारण वे केवल वैयाकरण या वेदों के शिक्षक तो नहीं कहे जा सकते। इसी प्रकार भले ही उन्होंने समाज में सुधार के भी कई सारे प्रयास किए, परंतु उन्हें केवल एक सामाजिक सुधारक भर नहीं कहा जा सकता। वे समाज सुधारक से कहीं बढ़ कर थे। वे सभ्यतामूलक विमर्श के पहले उद्गाता थे।

महर्षि दयानंद ने बड़े ही आग्रह और निर्भीकतापूर्वक इस विमर्श को आगे बढ़ाया था। इसलिए कई बार उन पर जानलेवा हमले किए गए थे। परंतु वे कहा करते थे कि पाखंड के वटवृक्ष को नहरने (नाखून काटने वाले) से नहीं, बल्कि कुल्हाड़ी से प्रहार करूँगा। वैचारिक रूप से जितने साफ और स्पष्ट महर्षि दयानंद दिखाई देते हैं, उतना दूसरा कोई भी समकालीन या उनके बाद के महापुरूष नहीं दिखते। चाहे लोकमान्य तिलक हों या स्वामी विवेकानंद या फिर महात्मा गाँधी, सभी अपने ही विचारों में उलझते नजर आते हैं। तिलक ने आर्यों का आदि देश ही भारत से बाहर कर दिया था और इस प्रकार आर्यों का बाहर से आना स्वीकार कर लिया था।

स्वामी विवेकानंद के विचार भी काफी विरोधाभासी रहे हैं। मांसाहार हो या इस्लाम व ईसाइयत, वे कभी उसकी प्रशंसा करते हैं तो कभी आलोचना। अमेरिका और उसकी संस्कृति की भी स्वामी विवेकानंद ने काफी प्रशंसा की है। गर्व से कहो हम हिंदू हैं का उद्घोष करने के बाद स्वामी विवेकानंद हिंदू शब्द को ही निरर्थक बता देते हैं। महात्मा गाँधी भी हिंदू-मुस्लिम एकता के चक्कर में मूल स्थापनाओं से समझौता करते नजर आते हैं। गौरक्षा के प्रबल आग्रही होने के बावजूद उन्हें मुसलमानों के गौमांसभक्षण से कोई आपत्ति नहीं है। यहां तक कि उन्होंने प्रसिद्ध भजन ‘वैष्णव जन तो तेने रे कहिए जी’ में भी बदलाव करवा दिया था।

महर्षि दयानंद इन उहापोहों से मुक्त होकर अपनी बात रखते हैं। गौमांसभक्षण तो दूर की बात है, वे मांसाहार को ही गलत ठहराते हैं। ईश्वर और अल्लाह उनके लिए एक नहीं हैं, बल्कि उनकी अवधारणात्मक विसंगतियों को दर्शाते हुए वे वेदसमर्थित ईश्वर के सृष्टिनियामक स्वरूप को ही मान्यता देते हैं। महर्षि दयानंद कभी भी यह नहीं कहते कि सभी मत एक समान हैं, वे कहते हैं कि धर्म एक ही है और सभी मतवाले भी उसे मानते हैं। यदि वे अपने मतों के आग्रह को थोपना छोड़ दें और केवल उस विशुद्ध धर्म जिस पर सभी एकमत हैं, को स्वीकार करें तो मतों का झगड़ा ही समाप्त हो जाए। उन्होंने इसका उदाहरण देते हुए कहा कि वैष्णव हरिनाम से मुक्ति मानते हैं, परंतु शैव शिव के मंत्रा से। मुसलमान मोहम्मद को उद्धारक मानते हैं तो ईसाई ईसा को। इसमें कोई एकमत नहीं हो सकते, बल्कि सभी एक-दूसरे का खंडन ही करते हैं। परंतु सभी यह मानते हैं कि सच बोलना चाहिए, आचरण शुद्ध रखना चाहिए, असहायों की सहायता करनी चाहिए, बुद्धि और ज्ञान का उपयोग करना चाहिए। महर्षि दयानंद ने इसलिए सभी मतों के प्रमुखों से आग्रह किया कि वे अपने मतों के प्रचार की बजाय इन शाश्वत और सर्वमान्य धर्म के लक्षणों का प्रचार करें। सबको अपने मत में दीक्षित करने का प्रयास करने की बजाय इस पर वे अपनी एकता स्थापित करें।

देखा जाए तो बीसवीं शताब्दी में हट्टिंगटन सभ्यताओं के जिस अवश्यंभावी संघर्ष की बात कर रहा है, महर्षि दयानंद उन्नीसवीं शताब्दी में ही उसका समाधान बता रहे थे। इसी प्रकार महात्मा गाँधी धर्म को शिक्षा का अनिवार्य अंग मानते थे, वे राजनीति को भी धर्माधारित ही रखना चाहते थे, परंतु वे विभिन्न मतों के पारस्परिक विरोधों को समायोजित करने का रास्ता नहीं खोज पा रहे थे। इसलिए नई तालीम का सुझाव देते हुए वे यह तो कहते हैं कि सभी धर्मों की शिक्षा दी जानी चाहिए, परंतु वे यह नहीं बता पाते हैं कि धर्मों की शिक्षा में क्या पढ़ाया जाए, जिससे परस्पर सद्भाव बढ़े। इसका समाधान महर्षि दयानंद ही देते हैं। उन्होंने साफ-साफ कहा कि उपासना के तरीकों और उद्धारक व्यक्तित्व पर विवाद को परे छोड़ते हुए मानवीय मूल्यों जिन पर सभी की सहमति हो, की पढ़ाई ही धार्मिक शिक्षा है।

आज आवश्यकता है कि महर्षि दयानंद के विचारों की स्पष्टता और तेजस्विता को फिर से धारण किया जाए। सर्वपंथ समभाव का वास्तविक दर्शन और स्थापना इससे ही संभव है। जब तक हम सभी महर्षि दयानंद के प्रारंभ किए इस सभ्यतामूलक विमर्श को आगे नहीं बढ़ाएंगे, देश की समस्याएं भी सुलझने वाली नहीं हैं। चाहे वह सामाजिक समस्या हो या फिर राजनीतिक, इनका समाधान महर्षि दयानंद की उस शाश्वत दृष्टि में ही है।