भारत ही नहीं समूची मानवता के हित में आयुर्वेद का संरक्षण

भारत ही नहीं समूची मानवता के हित में आयुर्वेद का संरक्षण

भारत की अमूल्य धरोहर यहां की ज्ञान परंपरा है और आयुर्वेद उसका एक बड़ा हिस्सा है। आरोग्य शिविर, ऋतुचर्या, सौ वर्ष तक स्वस्थ रहने के नियम, रोगचर्या तथा उत्तम संतान का भारतीय विज्ञान जैसे विषयों पर संगोष्ठियों के आयोजन से लेकर प्रत्येक व्यक्ति को उसकी प्रकृ ति का ज्ञान करवाने का अभियान चलाने तक भारतीय धरोहर ने संस्थागत रूप से भरपूर परिश्रम किया है। यदि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी प्रकृति की जानकारी हो तो वह न केवल अपना स्वास्थ्य ठीक रख सकता है, बल्कि अपनी कार्यक्षमता भी बढ़ा सकता है और सामाजिक-पारिवारिक जीवन को भी ठीक रख सकता है। हम विगत आठ वर्ष से लगातार मानव शरीर की प्रकृति को लेकर देश में जागरूकता फैलाने का अभियान चला रहे हंै। इसे विडंबना ही माना जाना चाहिए कि स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा में प्रकृतिचर्या को लेकर स्वयं आयुर्वेद जगत में भी अभी तक कोई विशेष जागरुकता नहीं हैं। देश में ऐसे वैद्यों की संख्या उंगलियों पर ही गिनी जा सकती होगी जो प्रकृति परीक्षण का और प्रकृतिचर्या बताने का अभ्यास करते हों। यही कारण है कि पिछले दिनों आयोजित वार्षिक राष्ट्रीय बैठक में लोगों को आयुर्वेद के साथ साथ मानव शरीर की प्रकृति के प्रति जागरुक करने के लिए किए गए अब तक के कार्य और आगामी योजनाओं की समीक्षा अत्यधिक गंभीरता से की गई। प्रसंन्नता की बात है कि हाल में ही स्वयं प्रधानमंत्री श्री मोदी जी ने अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान के उद्घाटन के अवसर पर प्रकृति परामर्शदाताओं की अवधारणा को स्वीकार किया है। यदि यह अवधारणा जमीन पर आ गई तो न केवल जनसामान्य के स्वास्थ्य की रक्षा होगी। बल्कि सम्पूर्ण विश्व में शाश्वत जीवन मूल्यों की स्थापना का मार्ग भी प्रशस्त होगा।
आयुर्वेद भारतीय ज्ञान परंपरा की एक ऐसी धरोहर है, जिसमें कई ज्ञान-धाराएं आती हैं। यह चिकित्सा का विज्ञान तो है ही, इसमें जड़ी-बूटियों के गुणों पर इतनी चर्चा है कि यह पादपविज्ञान का भी श्रेष्ठ स्रोत है और रसायनशास्त्र का विषय भी आयुर्वेद में भरपूर आता है। इस प्रकार एक अकेला आयुर्वेद ज्ञान की आज की कई धाराओं का मुख्य स्रोत है। इसलिए यदि आयुर्वेद को हम आगे बढ़ाते हैं, तो इससे केवल देशवासियों के स्वास्थ्य की ही चिंता नहीं कर रहे होते हैं, बल्कि विज्ञान की अनेक धाराओं को भी पुष्ट कर रहे होते हैं।
यदि हम भारत को समृद्ध और स्वस्थ देखना चाहते हैं तो इसके लिए हमें आयुर्वेद की शरण में जाना ही होगा। क्योंकि केवल आयुर्वेद ही है जो सवा सौ करोड़ से अधिक लोगों के इस देश को स्वस्थ रख सके। बहुत महंगा न होने की वजह से गरीब हो या अमीर सब के लिए आयुर्वेद जीवनदायी सिद्ध हो सकता है। जैसे आयुर्वेद में नाड़ी देख कर ही रोग की पहचान कर ली जाती है तो एक प्रकार से जांच पूरी तरह नि:शुल्क ही है। समझा जाता है कि भारत में लगभग छह करोड़ लोग प्रतिवर्ष केवल इसलिए निर्धनता की सूची में आ जाते हैं, क्योंकि उनकी आय का बड़ा हिस्सा रोग की जाँच और इलाज में ही व्यय हो जाता है। संतोष इस बात का है कि भारत सरकार ने आयुष विभाग को अलग मंत्रालय का दर्जा दिया। परंतु यह काम सफल तब होगा जब सरकार ऐसा वातावरण बनाने में सहायता प्रदान करे कि देश की सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाएं आयुर्वेद के अध्ययन की ओर प्रेरित हों और उन्हें श्रेष्ठतम वरिष्ठ वैद्यों के संरक्षण में अभ्यास करने का अवसर मिले। ऐसा तब होगा जब सरकार स्वास्थ्य बजट में आयुष विशेषकर आयुर्वेद को समुचित हिस्सा प्रदान करे। वर्तमान में लगभग 50 हजार करोड़ रुपयों के स्वास्थ्य बजट में से आयुष को मिलते हैं केवल 18 सौ करोड़ रुपए यानी कि लगभग तीन प्रतिशत और इतनी राशि भी आयुर्वेद के साथ होमियोपैथ, यूनानी, योग और सिद्ध में बट जाती है। ऐसे में आयुर्वेद का प्रचार कैसे होगा?
यदि प्रारंभ से ही आयुर्वेद सम्मत जीवन शैली का पालन किया जाए तो इससे 70-80 प्रतिशत बीमारियाँ तो होंगी ही नहीं, जो होंगी भी, वे इस गंभीर अवस्था तक नहीं बिगड़ेंगी कि मंहगे अस्पतालों की आवश्यकता पड़े। यदि एकाध प्रतिशत रोगियों को इसकी आवश्यकता पड़ती भी है, तो उसके लिए राज्य स्तर पर व्यवस्था की जा सकती है। इससे न केवल देश की जनता, बल्कि सरकार का भी काफी पैसा बच सकता है। इस प्रकार आयुर्वेद न केवल देश का स्वास्थ्य सुधार सकता है, बल्कि यह सरकार का भी आर्थिक स्वास्थ्य सुधार सकता है। आयुर्वेद पर ध्यान देने से सरकार का स्वास्थ्य बजट काफी घट सकता है।