भारत से ही मिलेगा पर्यावरण संरक्षण का रास्ता

आज विश्व में जिस प्रकार का पर्यावरण का संकट दिखाई दे रहा है उसके कारण सम्पूर्ण विश्व चिन्तित है। पिछले दिनों पेरिस में पर्यावरण को बचाने के लिए लगभग 200 देशों ने लम्बी चर्चा की। पर्यावरण की रक्षा के लिए आज दुनिया के विकसित देश इतने व्याकुल हैं। वे शायद यह भूल रहे हैं उनके द्वारा ही विकास की अन्धी दौड़ में पर्यावरण को सर्वाधिक हानि पहुँची है। पर्यावरण की रक्षा के लिए दुनिया भर से पैसा इकट्ठा करना लम्बी-लम्बी योजनाएं बनाने से उसकी रक्षा सम्भव नहीं है। यदि दुनिया के देश वास्तव में पर्यावरण की रक्षा के विषय में गम्भीर है तो उन्हें पर्यावरण संरक्षण की भारतीय पद्वति का अध्ययन करना चाहिए और उसी के आधार पर विश्व को पर्यावरण को बचाने के उपाये खोजने चाहिए। जो देश आज विकास की होड़ में प्रकृति का शोषण कर रहे हैं, उन्हें यह बात भली-भांति स्मरण रखनी चाहिए कि प्रकृति का अनियंत्रित शोषण स्वयं के विनाश का कारण बनता है। भारतीय ऋषियों ने प्रकृति के सामंजस्य बना कर चलने का मार्ग हमें दिया। प्रकृति के साथ मैत्राीपूर्ण सम्बन्ध ही प्राणी मात्रा की रक्षा की गारन्टी देता है।

भारतीय ऋषियों के अनुसार पृथ्वी, जल, वायु, आकाश और अग्नि तत्व से इस सृष्टि की रचना हुयी। मानव भी इस सृष्टि का अंग है। ये सभी तत्व एक दुसरे पर अश्रित हैं और परस्पर एक दूसरे के पूरक हैं। जब किसी भी एक तत्व में गड़बड़ होती है तो पांचों तत्व प्रभावित होते है। हमारे ऋषियों ने पर्यावरण के प्रत्येक तत्व को आध्यात्मिकता से जोड़कर जन-जन के मन के उनके प्रति श्रद्धा का भाव निर्माण किया था। प्रकृति ही माता है। इसलिए प्रत्येक तत्व की पूजा करना, उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का माध्यम बना। प्रकृति के साथ हम परिवार की भांति रहें, यह विचार उन्होंने हमें दिया।

किसी भी देश की वास्तविक समृद्धि का आधार वहां का सन्तुलित पर्यावरण ही होता है। मानवीय गतिविधियों और प्रकृतिक परिस्थितियों के बीच समन्वय होना चाहिए। यही कारण है कि वेदों में प्रकृति के प्रत्येक तत्व के प्रति पूज्य भाव रखने की कामना की गयी है। यजुर्वेद में स्पष्ट निर्देश दिया गया है कि जल को दूषित न करें, वृक्ष-वनस्पतियों को न काटें, जल को शुद्ध रखें, अधिक से अधिक वृक्ष लगाये आदि आदि।

कहा गया है – धर्माे रक्षति रक्षित। हमारे द्वारा रक्षित धर्म ही हमारी रक्षा करता है। इसी प्रकार से प्रकृतिः रक्षति रक्षितः अथात् हम प्रकृति की रक्षा करेंगे तो प्रकृति हमारी रक्षा करेेगी, का मंत्रा अपनाना होगा। अपने स्वार्थ के लिए प्रकृति के साथ जिस प्रकार का खिलवाड़ विकसित देशों के द्वारा किया गया है, उसी का दुष्परिणाम है कि आज जलवायु परिवर्तन खतरनाक स्तर पहुँच गया है।

अभी भी समय है, सम्पूर्ण विश्व यदि गम्भीरता से इस पर विचार कर प्रयास करे तो इस संकट से उबरा जा सकता है। इसके लिए भारतीय जीवन पद्धति की अमूल्य धरोहर को दुनिया द्वारा अपनाने की आवश्यकता है। आज इस पर सहमति बनती भी दिख रही है। विश्व के देश यह स्वीकारने लगे हैं कि भारत को इसका नेतृत्व करना चाहिए। भारत यदि इसकी कमान अपने हाथ में लेता है तो सम्भव है इस समस्या का समाधान निकाला जा सकें।