भारत की धरोहर है राष्ट्र की सांस्कृतिक चेतना

वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिता: यनि हम राष्ट्र को जगाने वाले पुरोहित है। इस वाक्य के द्वारा राष्ट्र की सर्वप्रथम संकल्पना वेदों ने की थी। उत्तर से दक्षिण तथा पूर्व से पश्चिम तक की भारत की सीमाओं का उल्लेख मनुस्मृति और पुराणों सरीखे हमारे अनेकानेक ग्रन्थों में मिलता है। पांच हजार वर्ष पूर्व जो महायुद्ध हुआ था उसे यद्यपि महाभारत के नाम से जानते हैं किन्तु युद्ध मे सम्मिलित होने वाले देशों पर ध्यान दे तो हमारे सामने एक बृहत्तर भारत का चित्र उभर कर सामने आता है। शायद भारत का यही चित्र आचार्य चाणक्य के सामने भी रहा होगा, तभी उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन राष्ट्र की अखण्डता को सुनिश्चित करने में लगा दिया और वे इसमें सफल भी हुए। मौर्य साम्राज्य महाभारत के बाद के इतिहास में आज तक का सबसे बड़ा भारतीय संघराज्य रहा है। आज के भारत का क्षेत्रफल भी उससे छोटा ही है।

भारतीय चिंतन में यद्यपि राष्ट्रनिर्माण का कार्य राजनीति के अन्तर्गत नहीं समझा जाता परन्तु राष्ट्र और देश में गहन सम्बन्ध है और इस अर्थ में देश की राजनीति से राष्ट्र भी प्रभावित होता ही है। घर के प्रबन्ध की तुलना देश की राजनीति के साथ कर सकते है। घर के प्रबन्ध की व्यवस्था नहीं हो सकती यदि घर में रहने वाले घर को व्यवस्थित न रखना चाहें या घर की संकल्पना पर ही सवाल खड़ा कर दें। आज कुछ ऐसी ही स्थिति देश में निर्माण होती प्रतीत हो रही है। इसका ताजा उदाहरण जवाहरलाल विश्वविद्यालय, नई दिल्ली में चल रहा विवाद है। जनेवि के कुछेक छात्र और शिक्षक भारतविरोधी नारे लगाने को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मानते हैं। इतना ही नहीं, बीबीसी नामक एक विदेशी मीडिया संस्थान से बातचीत में वे यह भी कहते हैं कि राष्ट्र और राष्ट्रीयता जैसी अवधारणा में उनका विश्वास नहीं है, क्योंकि वे माक्र्सवादी हैं। राष्ट्र और राष्ट्रवाद को लेकर यह को संभ्रम बना है, इसका बड़ा कारण भारत की चिंतन परंपरा से उनका कटा होना है। राष्ट्र की भारतीय संकल्पना यूरोप के उस नेशन-स्टेट की संकल्पना से सर्वथा भिन्न है जिसके बारे में पश्चिमी विद्वानों ने कहा है कि नेशनलिज्म गुंडों की अंतिम शरणस्थली होती है।

इसलिए अंग्रेजी के शब्दों का भारतीय रूपांतर करते समय प्राचीन संस्कृत शब्दों के प्रयोग में बड़ी सावधानी रखी जाने की आवश्यकता है। नेशन राष्ट्र नहीं है। नेशन एक राजनीतिक ईकाई है, जबकि भारत का राष्ट्र एक सांस्कृतिक ईकाई है। राष्ट्र की संकल्पना विश्व को भारत की एक अनुपम देन है। यदि भारत की राष्ट्र की अवधारणा को विश्व ठीक से समझ लेगा और उसे अपने आचरण में उतार पाएगा, तो वह अशांति, युद्ध और सभ्यताओं के परस्पर संघर्ष की समस्याओं से मुक्ति पा सकेगा।

भारत की इस राष्ट्र की संकल्पना को छत्रपति शिवाजी, महर्षि दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानंद और महात्मा गाँधी जैसे महापुरूष भलीभांति समझते थे। उन्होंने इसे मजबूत करने के लिए काफी प्रयास किया। दुर्भाग्यवश अंग्रेजों के बाद भारत का शासन जिनके हाथ में रहा, वे स्वयं राष्ट्र की इस सांस्कृतिक संकल्पना से अनभिज्ञ थे। उन्हें भी केवल नेशन-स्टेट की संकल्पना ही समझ आती थी। इस कारण उन्होंने जनेवि जैसा संस्थान खड़ा किया जो न केवल भारत की मिट्टी से पूरी तरह कटा हुआ है, बल्कि जो भारत की अनुपम थाती से अनभिज्ञ भी है। वहां के शिक्षकों तक को भारत की सांस्कृतिक समझ नहीं है, छात्रों की तो बात ही दूर है। सवाल है कि क्या हम कुछेक खंडहरों और स्थापत्य-निर्माणों को ही भारत की धरोहर मानते हैं? क्या भारत की ज्ञान परंपरा यहां की धरोहर नहीं है?

यदि ज्ञान परंपरा को इस देश की धरोहर मानें तो उसके संरक्षण करने की भी उतनी ही आवश्यकता है जितनी कि हम उन खंडहरों की करते हैं। जैसे खंडहरों व अवशेषों का संरक्षण पुरातत्व विभाग करता है, वैसे ही ज्ञान परंपरा का संरक्षण केवल विश्वविद्यालयों में ही किया जा सकता है। क्या हम अपने विश्वविद्यालयों को भारत के इस अमूल्य धरोहर के संरक्षण का केंद्र बना सकते हैं? जनेवि के विवाद से उपजा मूल प्रश्न यही है।