भारतीय समृद्ध ज्ञान परम्परा की वाहक पुस्तकें

रवि शंकर
कार्यकारी संपादक

इदं शस्त्राम्, इदं शास्त्राम्, शापादपि, शरादपि, भगवान परशुराम ने सहस्रार्जुन को कहा था। अर्थात्, मेरे एक हाथ में शास्त्रा हैं और दूसरे हाथ में शस्त्रा, जिससे चाहो लड़ लो। लड़ाई शास्त्रों से भी होती है। भारत के संदर्भ में इसे हम देखें तो पाएंगे कि जितना अंग्रेजों ने हमें शस्त्रों से नहीं जीता, उससे अधिक शास्त्रों से जीत लिया। हम उनकी भाषा बोलने में गर्व अनुभव करते हैं, उनके शास्त्रों को प्रामाणिक मानकर पढ़ते-पढ़ाते हैं, उनके ज्ञान, पूर्वजों और अनुभवों के आगे अपने ज्ञान, पूर्वजों और अनुभवों को हेय मानते हैं। इसलिए भले ही हंट्टिगटन ने सभ्यताओं के संघर्ष का सिद्धांत नब्बे के दशक में दिया और भले ही वह इसे इस्लाम के साथ संघर्ष तक सीमित मानता रहा हो, वास्तव में भारत इस सभ्यताओं के संघर्ष का सबसे बडा पीड़ित है।
सभ्यताओं के संघर्ष की वर्तमान लड़ाई के हथियार शास्त्रा और पुस्तकें हैं। इनसे ही हमें लड़ना होता है। इसलिए हमारे आक्रांताओं ने हमारे मौलिक शास्त्रों और ज्ञान को निम्न कोटिBook_cut_out copy का साबित करने की भरपूर कोशिश की। उन्होंने भारतीय मौलिक चिंतन और सृजन को न तो उभरने दिया और न ही वैसा वातावरण बनने दिया जिसमें मौलिक चिंतन और शोध होता। फिर भी उनके इस आक्रमण का तीव्रतम विरोध हुआ।
दुनिया का इतिहास देखें तो ऐसे आक्रमणों में अनेक सभ्याताएं नष्ट हो गईं, मिट गईं। परंतु हमने संघर्ष किया, आज भी कर रहे हैं। इस संघर्ष का परिणाम थीं वैसी पुस्तकें जो इस संघर्ष में हमारा हथियार बनीं और आज भी बन सकती हैं। परंतु स्वाधीनता के बाद हम इस क्रम को धीरे-धीरे खोते गए, बल्कि अंग्रेजों के काल की तुलना में स्वाधीन भारत में भारतीय मनीषा और ज्ञान को सामने लाने के सभी प्रयासों को समझबूझ कर दबाया गया।
इसलिए एक ओर हम पाते हैं कि वर्ष 1920 के आसपास अनेक पुस्तकें रची जा रही होती हैं जो भारतीय ज्ञान परंपरा को बौद्धिक और अकादमिक रूप से स्थापित करती हैं और वे तत्कालीन विश्वविद्यालयों में स्थान भी पा रही होती हैं परंतु स्वाधीनता के बाद ऐसी पुस्तकों को पूरी तरह उपेक्षित कर दिया जाता है। उदाहरण के लिए भारतीय राजनीति विज्ञान के विद्यार्थियों के लिए काशी प्रसाद जायसवाल की पुस्तक हिंदू पॉलिटी अत्यंत उपयोगी पुस्तक है। रसायनशास्त्रा के विद्यार्थियों के लिए प्रफुल्लचंद्र राय की हिंदू केमिस्ट्री अवश्य पठनीय पुस्तक है। ये दोनों पुस्तकें कला और विज्ञान दोनों ही क्षेत्रों में भारत की मनीषा का लोहा मनवाती हैं। परंतु ऐसी समस्त पुस्तकें उपेक्षा की शिकार हुईं।
स्वाधीनता के बाद भी ऐसे विद्वानों की कमी नहीं रही जिन्होंने निरंतर इस परंपरा को आगे बढ़ाया। वैद्य गुरुदत्त, पंडित भगवद्दत्त, कोटा वेंकटचलम्, प्रो. सत्य प्रकाश, पंडित उदयवीर शास्त्राी आदि ऐसे नाम हैं, जिन्होंने भारतीय मनीषा को सामने लाने का प्रयास किया। साथ ही इन्होंने भारतीय ज्ञान पंरपरा को उपेक्षित करने के देशी-विदेशी प्रयासों को भी उजागर किया। भारत का इतिहास हो या फिर राजनीतिशास्त्रा, रसायनशास्त्रा हो या फिर भारतीय दर्शन, प्रत्येक क्षेत्रा में बड़ी ही उत्कृष्ट पुस्तकें लिखी गईं। इनमें से बहुत सी पुस्तकें अब अप्राप्य हैं या फिर केवल पुस्तकालयों में ही उपलब्ध हैं। कुछ पुस्तकें ऑनलाइन उपलब्ध हैं।
भारतीय ज्ञान परंपरा को सामने लाने का यह महायज्ञ अभी थमा नहीं है। यह जारी है। अनेक विद्वान समस्त प्रचार-प्रसिद्धि तथा धन-वैभव आदि से दूर रहते हुए माँ सरस्वती की साधना में रत हैं। उदाहरण के लिए कर्नाटक के गुलबर्गा के रहने वाले इंजिनीयर वेणुगोपाल ने भारतीय गणित पर अपरिमित काम किया है। उन्होंने गणित के लगभग सभी संस्कृत ग्रंथों का अनुवाद किया है। इनके आधार पर भारतीय गणित का इतिहास भी लिखा है। प्रोफेसर चंद्रकांत राजू भी भारतीय गणित पर काफी काम कर रहे हैं। उन्होंने आर्यभट्ट के कैल्कुलस और शुल्ब सूत्रों पर आधारित ज्यामिति पर काफी काम किया है। उन्होंने भी गणित का सांस्कृतिक इतिहास लिखा है।
समस्या यह है कि देश के वर्तमान शिक्षा तंत्रा में ऐसे प्रयासों को समुचित स्थान नहीं मिल पा रहा है। न तो इस प्रकार के शोध को कोई मान्यता मिलती है और न हीं इन प्रयासों के परिणामस्वरूप निकली पुस्तकों का शैक्षणिक जगत में कोई उपयोग किया जाता है। ऐसे में इन पुस्तकों और इस विशद ज्ञान का देश उतना लाभ नहीं मिल पा रहा है जितना कि मिलना चाहिए या फिर मिल सकता था।
वास्तव में शिक्षा में जितने भी राष्ट्रवादी प्रयास हुए हैं, उन प्रयासों में केवल व्यक्तियों का अंतर आया है। पाठ्यक्रम और शिक्षण में भारतीयता का समावेश करने में ऐसे सभी प्रयास लगभग असफल ही रहे हैं। उदाहरण के लिए शुद्ध रूप से भारतीय शास्त्रों को पढ़ाने वाले गुरूकुलों में भी कहीं भी भारतीय संस्कृत वांङ्मय में उपलब्ध गणित तथा विज्ञान नहीं पढ़ाया जाता। न ही कहीं भी वेद, मनु, महाभारत, कौटिलीय अर्थशास्त्र आदि पर आधारित राजनीतिशास्त्र या प्रबंधन की शिक्षा दी जाती है। विभिन्न आध्यात्मिक, सांस्कृतिक संगठनों द्वारा संचालित विद्यालय तथा विश्वविद्यालय भी इस कार्य करने में असफल रहे हैं। इसलिए देश की शिक्षा में एक आमूलचूल परिवर्तन लाने की आवश्यकता है। ये पुस्तकें ही इस परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त कर सकती हैं। ये भारतीय ज्ञान परंपरा की नींव के वे पत्थर हैं, जिन पर भारतीय शिक्षा का पूरा भवन खड़ा किया जा सकता है। आवश्यकता केवल इतनी है कि इनका पठन-पाठन को प्रोत्साहन दिया जाए। इनके आधार पर नए शोध कार्य खड़े किए जाएं।
आज यह आवश्यकता है कि ऐसे कार्यों, पुस्तकों और विद्वानों का प्रचार-प्रसार हो, इन पुस्तकों को शैक्षणिक जगत में लाया जाए, इनके आधार पर पाठ्यक्रम तैयार किए जाएं। इससे न केवल भारत का बल्कि संपूर्ण मानवता का उपकार होगा। हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि भारतीय ज्ञान परंपरा मनुष्य के विकास के साथ-साथ प्रकृति के संरक्षण का भी पूरा ध्यान रखती है। विज्ञानविषयक भारतीय ज्ञान पंरपरा पर लिखी गई पुस्तकों के परिचय में हम इसे विस्तार से देख सकते हैं।
भारतीय धरोहर के इस अंक में कुछ ऐसी ही नई पुरानी पुस्तकों से आपका परिचय करवाएंगे जो भारतीय ज्ञान पंरपरा को स्थापित करती हैं और जो भारतीय अकादमिक वर्ग द्वारा राजनीतिक प्रेरणा एवं सभ्यतागत संघर्ष में विपक्ष में खडे होने के कारण पूर्णतः उपेक्षित कर दी गईं। ये पुस्तकें इस सभ्यता संघर्ष में हमारा हथियार हैं। ये इस संघर्ष में हमारी सभ्यता को विश्व के उच्च शिखर पर स्थापित करने में हमारी सहयोगी साबित होने वाली हैं। इन्हें हम पढ़ें और सभी जिज्ञासु जनों को पढ़ाएं।