भारतीय विज्ञान परंपरा से ही होगा देश का विकास

डॉ. रवि प्रकाश आर्य
लेखक राजकीय महाविद्यालय, खरखौदा में प्राचार्य हैं।
ज्ञान और विज्ञान कभी भी अप्रासंगिक नहीं हो सकते। ज्ञान और विज्ञान कहीं भी हो, वह हमेशा प्रासंगिक ही होता है। दोनों चिरंतन हैं। तकनीकी प्रासंगिक और अप्रासंगिक हो सकती है, तकनीकी में विकास हो सकता है, कोई तकनीकी किसी एक राष्ट्र के लिए उपयोगी हो तो किसी दूसरे राष्ट्र के लिए अनुपयोगी हो सकती है, परंतु ज्ञान और विज्ञान कभी अप्रासंगिक नहीं हो सकता।
अंग्रेजों के सौ वर्ष के शासनकाल में बड़े ही षड्यंत्रपूर्वक हमारे मन-मस्तिष्क में एक बात डाल दी गई है कि जो भी हमारे पास था, वह सब गलत था और जो पश्चिम से आने वाला है, वह सब सत्य होगा। इस विचारधारा का पल्लवन, पोषण एक लंबी परंपरा में हुआ। परंतु यह कहना कि ज्ञान और विज्ञान पश्चिम की धरोहर है और वहाँ से ही इसका फैलाव हुआ, बिल्कुल अमान्य है। पश्चिम का ज्ञान और विज्ञान से संबंध बहुत नया यानी केवल दो सौ वर्षों का है। ज्ञान और विज्ञान की जितनी प्राचीनता इस देश में रही, वह पश्चिम में नहीं रहा है।
ज्ञान और विज्ञान शब्दों का सबसे पहला प्रयोग भारत में ही हुआ। वैदिक काल से लेकर उपनिषदों में, गीता में इसका उपयोग मिलता है। वहाँ कहा है कि जो ज्ञान और विज्ञान दोनों को साथ-साथ जानता है, वही वास्तव में विकसित होता है, उसका ही कल्याण होता है। यदि आप केवल ज्ञान से परिचित हैं, तो आप आगे नहीं बढ़ सकते हैं और यदि केवल विज्ञान को लेकर चलते हैं, तो भी आप आगे नहीं बढ़ सकते हैं। भविष्य का दर्शन ज्ञान और विज्ञान के समन्वय से ही होने वाला है। हमारे यहाँ ऐसी बात कही गई है।
ज्ञान और विज्ञान को सबसे पहले परिभाषित करने वाले भी हम हैं। आचार्य शंकर ने ज्ञान और विज्ञान दोनों की परिभाषा दी है। उपनिषदों का भाष्य करते हुए वे लिखते हैं कि ज्ञान केवल एक सूचना है, परंतु जब वह सूचना अनुभूति का विषय बन जाए तो वह विज्ञान बन जाता है। उदाहरण के लिए ईश्वर है, यह ज्ञान है। परंतु जब योगी जब उस ईश्वर की अनुभूति करता है, तो वह विज्ञान बन जाता है। इसका अर्थ है कि अनुभूतिजन्य ज्ञान ही विज्ञान है।
पश्चिम में भी विज्ञान का उद्भव हुआ और उन्होंने भी इसको परिभाषित किया। उनके अनुसार जो इंद्रियों के प्रेक्षण पर आधारित है, वही विज्ञान है। दो दिखता है, प्रयोगशाला में प्रयोग किए जाते हैं और उसमें जो भी दिखता और साबित होता है, उसे ही विज्ञान कहा जाता है। जो प्रयोगशाला में साबित नहीं होता, उसे वे विज्ञान नहीं मानते। इस ब्रह्मांड में बहुत सी वस्तुएं ऐसी हैं, जिनका प्रेक्षण संभव नहीं है। प्रेक्षण योग्य यानी इंद्रियों द्वारा जानने योग्य। आँख, नाक आदि से हमें जो दिखता या अनुभव होता है, उसे ही प्रत्यक्ष कहते हैं। बहुत सी ऐसी चीजें हैं जो प्रत्यक्ष नहीं हैं। जैसे संवेदनाएं हैं, मन के विचार हैं। इनका कोई प्रत्यक्षीकरण नहीं होता। ये आधुनिक विज्ञान की सीमा में नहीं आती।
इस प्रकार हमारे यहाँ विज्ञान अधिक गहनतम था। पश्चिम का विज्ञान काफी छिछला है। यदि हम ब्रह्मांड की उत्पत्ति का रहस्य जानना चाहते हैं, तो हम उसके लिए भी प्रयोग करके देखना चाहते हैं। जब पश्चिम में विज्ञान का उदय हो रहा था, तब उनके समक्ष यह प्रकृति थी। इस प्रकृति के भौतिक गुण-धर्मों के अध्ययन के लिए भौतिकी और रासायनिक गुणों के अध्ययन के लिए रसायन विज्ञान प्रारंभ हुआ। फिर जीव विज्ञान प्रारंभ हुआ। आज चेतनता की भी बात प्रारंभ हो गई है। इस प्रकार बिखरे हुई तरीके से अध्ययन किया जा रहा है।
उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में वर्ष 1835 के आस-पास भारत में ज्ञान-विज्ञान की समृद्ध परंपरा थी। यह अंग्रेजों के सर्वेक्षणों का ही परिणाम है। इस काल में विश्व व्यापार में भारत का योगदान 43 प्रतिशत है। विश्व निर्यात में भी भारत का योगदान लगभग 38 प्रतिशत है। आज विश्व व्यापार में भारत की हिस्सेदारी 0.01 प्रतिशत के लगभग है। वर्तमान में विश्व व्यापार में अमेरिका और चीन का मिलाकर हिस्सा लगभग 49 प्रतिशत ही है। यानी उन्नीसवीं सदी के मध्य तक भारत दुनिया के व्यापार के शीर्ष पर था। उस समय स्टील आदि धातु उद्योग, चमड़ा उद्योग, वस्त्र उद्योग सभी पर भारत का एकाधिकार है। ब्रिटिश संसद में उस समय एक बहस चली थी कि डेनमार्क से स्टील खरीद कर जो समुद्री जहाज बनाते हैं, यह तो काफी मंहगा पड़ता है। क्यों नहीं, हम भारत द्वारा 40-50 वर्ष प्रयोग करने के बाद छोड़े गए जहाजों का उपयोग कर लें। वह उसके बाद भी काफी दिनों तक चलेगा और वह काफी सस्ता पड़ेगा। वर्ष 1840 के आस-पास की यह घटना है। यह भारत के विज्ञान और तकनीक का एक अच्छा उदाहरण है।
उस कालखंड में उद्योग भारत में अपने चरम पर था। लगभग 50 प्रकार के उद्योग धंधे भारत में चल रहे थे। भारत में उस समय स्टील का उत्पादन लगभग 90 लाख टन प्रतिवर्ष होता था। मध्य प्रदेश के सरगुजा आदि क्षेत्रों के लोग जिन्हें हम आज आदिवासी कहते हैं, वे सभी स्टील बनाते थे। अंग्रेजों ने उन पर प्रतिबंध लगाए और बड़ी कंपनियों को स्टील बनाने का ठेका दे दिया। इससे भारत के उद्योग नष्ट हो गए। इसी प्रकार भारत का वस्त्र उद्योग विश्वप्रसिद्ध था। मधुबनी और सूरत इसके दो बड़े केंद्र थे। रोम के शासक तक के कपड़े भारत से ही जाता था। उन्हें वस्त्र पहनना हमने ही सिखाया।
यूरोप की स्थिति यह है कि वहाँ बहुत कम वनस्पतियां होती हैं। मैं यूरोप के कई देशों में घूमता रहा हूँ। वहाँ आलू, पत्ता गोभी आदि के अलावा अधिक सब्जियां नहीं होतीं। हमारे यहाँ ढेर सारी वनस्पतियां और औषधियां होती हैं। इसलिए यहाँ आयुर्वेद का विकास हुआ। इसलिए हमारे पूर्वजों, ऋषियों ने हर पेड़-पौधे पर शोध करके उसके गुण-धर्मों की विवेचना की और उसके लाभ और प्रभाव बताए। परंतु यह यूरोप में तो संभव ही नहीं था। इसलिए वहाँ जब एलोपैथिक का जन्म हुआ तो वह रासायनिक पदार्थों पर आधारित था। रसायनों से ही वे वस्त्र भी बनाने लगे। पोलिएस्टर, टेरीलीन आदि तो केमिकल से बने हुए हैं। हमारे यहाँ सूती, ऊनी और रेशमी वस्त्र बनते थे और वह बहुत सस्ता होता था। आज यही सूती और रेशमी वस्त्र इतने मंहगे बिक रहे हैं, जबकि यूरोपीय विज्ञान के बनाए केमिकल वाले वस्त्रों को कोई पूछता भी नहीं। सभी को पता है कि वे शरीर के लिए हानिकारक हैं।
इसी प्रकार यूरोप ने रासायनिक खाद बनाए। उन्होंने कहा कि हमारे गोबर खाद से तो फसल बढ़ती नहीं, इसलिए रासायनिक खाद डालो। परंतु यह रासायनिक खाद मिट्टी के सभी सूक्ष्म कीटों को नष्ट कर देता है। पेड़-पौधे तेजी से बढ़ तो जाते हैं, परंतु उनमें पोषण नहीं होता और धीरे-धीरे मिट्टी भी बंजर होती जाती है। बार-बार रासायनिक खादों का प्रयोग करेंगे तो वह काम नहीं करेगा। यह कैसा विज्ञान हुआ?
हमारे यहाँ इस प्रकार का विज्ञान और तकनीकी थी कि हम प्रकृति का पूरा संतुलन बना कर रखते थे। हम प्रकृति के विरुद्ध कार्य ही नहीं करते थे। आज जो ग्लोबल वार्मिंग हो रहा है, ओजोन परत का क्षरण हो रहा है, ये विज्ञान के कारण नहीं हो रहा है, यह तकनीकी के कारण हो रहा है। हम ऐसी तकनीकी का विकास कर रहे हैं, जो प्रकृति के अनुकूल नहीं है। तकनीकी का विकास प्राचीन काल में भी हुआ। वृहद् विमानशास्त्र एक बहुत बड़ा ग्रंथ है। उसमें उल्लेख है कि विमानों में वातावनुकूलन कैसे किया जाए। जयपुर का हवामहल देखें। वह भी वातावनुकूलित है। तो प्रकृति के अनुकूल भी ऐसी तकनीकी है जिसका प्रयोग करके मानव जीवन की दीर्घता और सुविधा दोनों ही बढ़ाई जा सकती है। परंतु ऐसी तकनीकी जिससे मानव का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाए, वह कैसी तकनीकी कही जाएगी?
इसलिए ज्ञान और विज्ञान की जितनी समझ प्राचीन काल में हमारे ऋषियों को, हमारे विज्ञानियों को थी, ज्ञान और विज्ञान की उतनी समझ आज के विज्ञानियों को नहीं है। यदि उन्हें यह समझ होती तो हम प्रकृति के अनुकूल रहने वाली तकनीकी का विकास करते। तकनीकी का विकास करने से पहले उसकी उपादेयता पर विचार करते। अभी यह हो रहा है कि हम व्यावसायिकता के कारण तकनीकी का विकास और उपयोग करते हैं और बाद में हमें पता चलता है कि यह तो बड़ी घातक है, यह सस्टेनेबल नहीं है। यह तो पृथिवी पर मानव जीवन को समाप्त कर देगी।
आज हमने विमान बनाए हैं, कारें, बस, ट्रेनें आदि वाहन बनाए हैं। इनसे आवागमन सुगम हुआ है। परंतु ये किससे चलते हैं – कोयला, पेट्रोलियम आदि से। धरती को फोड़ कर उसके अंदर से निकाले जाने वाले इन पदार्थों को वैदिक ग्रंथों में पूरीष्याग्नि कहा गया है। संस्कृत में पूरीष का अर्थ होता है मल-मूत्र। ब्राह्मण ग्रंथों में कहा गया है कि धरती पर पूरीष्याग्नि भी विद्यमान है, जो इस ब्रह्मांड का, इस पार्थिव जगत का मल-मूत्र है। उससे भी ऊर्जा पैदा की जा सकती है। यह भी कहा गया है कि ईश्वर इसे पृथिवी के गर्भ में छिपा कर रखा है, ताकि इससे प्रदूषण न फैले। परंतु आज हम उसी पूरीष्याग्नि को खोद-खोद कर निकाल रहे हैं। उसका प्रयोग कर रहे हैं। इनसे भारी प्रदूषण हो रहा है। वैदिक ग्रंथों में पृथिवी के अंदर की भूगर्भीय ऊर्जा जिसे आज जियोथर्मल इनर्जी कहा जाता है, का भी उल्लेख है। वेदों का कहना है कि हम उस ऊर्जा का प्रयोग करें। हम जो गोमेध, अश्वमेध आदि यज्ञों के बारे में सुनते हैं, वे वास्तव में इन्हीं ऊर्जा स्रोतों का विकास करने के संबंधित हैं।
आज माना जाता है कि हवन में गाय को काट कर बलि चढ़ाना ही गोमेध है, घोड़े को काट कर बलि चढ़ाना अश्वमेध है और मनुष्य की बलि चढ़ाना नरमेध है। वास्तव में यह भ्रम हमारी तकनीकी शब्दावली को न समझने के कारण है। वहाँ गौ का अर्थ है पृथिवी। पृथिवी की भूगर्भीय ऊर्जा का संचयन करना ही गोमेध है। इसी प्रकार कृषि के लिए पृथिवी को तैयार करना भी गोमेध है। इसी प्रकार अश्व का अर्थ होता है सूर्य। सूर्य की किरणों के उपयोग से सौर ऊर्जा का संचयन ही अश्वमेध है। क्या हम वेदों में वर्णित इन ऊर्जा स्रोतों का उपयोग करेंगे तो हम पिछड़े बन जाएंगे? ऐसा नहीं है। ज्ञान और विज्ञान व्यक्ति को पिछड़ा नहीं बनाता, वह उसे आगे बढऩे में सहायता देता है।
आयुर्वेद में हमने वात, पित्त और कफ की बात की। इसमें अवैज्ञानिक क्या है? आज एलोपैथिक चिकित्सा को मुख्य और आयुर्वेद को वैकल्पिक चिकित्सा कहा जाता है। आयुर्वेद वैकल्पिक कैसे हो सकता है? वह तो बिल्कुल प्रकृति के अनुसार है। वात कहते हैं वायु को, पित्त कहते हैं अग्नि को और कफ कहते हैं जल को। इन सबसे ही यह ब्रह्मांड बना है। ऋषि कहता है कि ब्रह्म तत्व से आकाश तत्व की सृष्टि होती है, आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल और जल से पृथिवी बनती है। आकाश स्थान का काम दे रहा है और पृथिवी आधार बनी हुई है तो शेष तीन तत्व वायु, अग्नि और जल ही ब्रह्मांड में सक्रिय भूमिका निभाते हैं।
वायु की कमी और अधिकता से ब्रह्मांड में क्या-क्या होता है? शरीर में भी उसकी कमी और अधिकता से समस्याएं पैदा होती हैं। इसी प्रकार अग्नि और जल की कमी और अधिकता से ब्रह्मांड में हम ऊथलृपुथल होते देख सकते हैं। शरीर में भी इनकी अधिकता और कमी से समस्याएं होती हैं। हमारे यहाँ ऋषियों ने कहा कि ब्रह्मांड में भी वायु, अग्नि और जल का संतुलन चाहिए होता है और उसी प्रकार शरीर में भी वात, पित्त और कफ का संतुलन चाहिए होता है। इस संतुलन से ही प्रकृति और शरीर दोनों ठीक रहेंगे। जीवेम् शरद: शतम् की कल्पना दवाइयां खाने से तो पूरी होगी नहीं। प्रकृति के अनुरूप जीवन जीने से ही होगी। एक प्रसिद्ध वैदिक विद्वान हुए हैं, पंडित श्रीपाद दामोदर सातवलेकर। वे ड्राइंग के शिक्षक थे और उसमें उनके योगदान के लिए उन्हें पद्मश्री मिला। सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने संस्कृत और वेदों का अध्ययन करना प्रारंभ किया। उन्होंने कहा कि यदि वेद ज्ञान-विज्ञान के ग्रंथ हैं और सत्य हैं तो वैदिक जीवन जीने पर मेरी आयु सौ वर्ष की होनी चाहिए। उन्होंने वैदिक पद्धति से ही जीवन जीए। वेदों पर उनके काम के लिए भी उन्हें पद्मभूषण का सम्मान प्राप्त हुआ और वे 118 वर्ष की आयु तक जीए।
तात्पर्य यह है कि वैदिक पद्धति से जीवन जीने से हम शतायु हो सकते हैं। आज की अवस्था क्या है? कहा जाता है कि दुनिया का सबसे युवा देश हम हैं। क्यों हैं, क्योंकि हम अधिक आयु तक जी ही नहीं पाते। अधिक आयु तक नहीं जा पाते क्योंकि हमने अपनी उस परंपरा को छोड़ दिया। यदि विज्ञान और तकनीकी है तो हमें लंबी आयु जीना चाहिए, स्वस्थ रहना चाहिए। क्या ऐसा हो पा रहा है? वर्ष 1881 में अंग्रेजों ने पहली जनगणना की। उसमें उन्होंने पाया कि भारत के पाँच लोगों में से चार लोग स्वस्थ हैं, केवल एक व्यक्ति बीमार है। आज हमने चिकित्साशास्त्र में बड़ी प्रगति की है, एम्स आदि बड़े-बड़े अस्पताल खोले हैं, परंतु आयुर्विज्ञान की दृष्टि से कहूँ तो एक भी व्यक्ति इस देश में आज स्वस्थ नहीं है, जो गोली न खाता हो। एलोपैथी की दृष्टि से कहूँ तो पाँच में से एक व्यक्ति स्वस्थ हो सकता है, चार तो उसमें भी बीमार हैं। यदि हम उन्नीसवीं शताब्दी से और पीछे चले जाएं तो कोई व्यक्ति बीमार ही नहीं पड़ता था।
आयुर्वेद का लक्ष्य है स्वस्थस्य स्वास्थ्य रक्षणम्, आतुरस्य रोगनिदानम् यानी स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा और बीमार व्यक्ति के रोग निदान करना। एलोपैथ तो पहले व्यक्ति के बीमार पडऩे का इंतजार करता है। यह लक्ष्य का अंतर है। दुख की बात यह है कि आज कुछ मापदंड बना दिए गए हैं और ये मापदंड अमेरिका आदि देशों के द्वारा बनाए गए हैं। एक मापदंड बनाया गया है कि कौन अमीर देश हैं और कौन गरीब। उन्होंने इसके लिए मापदंड निश्चित किया है लोगों की बचत जमापूंजी को। जिसके पास अधिक बचत जमापूंजी है, वह देश अमीर है और जिसके पास कम है वह गरीब देश है। अगर हम यह मापदंड बदल कर यह कर दें कि जिन देशों के पास सर्वाधिक प्राकृतिक संसाधन हैं, वे अमीर और जिनके पास कम हैं, वे गरीब तो क्या होगा? तो फिर आज के गरीब देश अमीर हो जाएंगे। गलत मापदंड पर अमीरी का प्रमाणपत्र लेने के बाद इसके आधार पर गरीब निर्धारित किए गए देशों पर दबाव डाला जाता है कि वे अपनी मुद्रा की विनिमय दर कम करें। इससे उनके प्राकृतिक संसाधन कम से कम मूल्य में उनको मिल सके और उनके उत्पाद अधिक से अधिक दामों में बिकें। यह सब केवल एक छलावा है।
हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि उन्नसवीं शताब्दी में टॉयनबी लिखता है कि भारत एक ऐसा देश है जिसमें पिछले पाँच हजार वर्षों से दुनिया भर से सोना चाँदी आ रहा है, बाहर जाता ही नहीं है। हम तो पूरी दुनिया को सामानों की आपूर्ति करते थे, उनके सोने-चाँदी के बदले में हमारे वस्त्र, वस्तुएं, गरम मसाले आदि जाते थे। ऐसे देश में एकदम से ऐसा अकाल आ गया, यहाँ विज्ञान भी समाप्त हो गया, सारी चीजें नष्ट हो गईं, ऐसा कैसे हुआ? इसे समझने के लिए भारतीय ज्ञान-विज्ञान की परंपरा पर विमर्श आवश्यक है और केवल विमर्श करने की नहीं, बल्कि उस पर काम करने की आवश्यकता है। आप आज गाँवों के अनपढ़ लोगों को भी देखें तो उनके पास परंपरा से बहुत सारा ज्ञान-विज्ञान है। परंतु वे अनपढ़ हैं, इसलिए वह क्वालीफायड नहीं है। आज आवश्यकता है कि ऐसे परंपरा से विद्वान लोगों के ज्ञान को संग्रहित कर उनका मापदंडीकरण कर दिया जाए। उन्हें सम्मान और धन दें तो यह ज्ञान-विज्ञान की परंपरा फिर से देश का कल्याण कर सकती है। यह ज्ञान-विज्ञान काफी सस्ता भी है। एलोपैथ के चिकित्सक रोग का पता लगाने के लिए मंहगी-मंहगी जाँच करते हैं। एक गरीब आदमी कैसे अपना इलाज करवाएगा? दूसरी ओर आयुर्वेद का वैद्य नाड़ी देख कर ही रोग बता देता है। इससे सस्ता इलाज क्या हो सकता है?
हमारे देश की जो स्थितियां हैं, हमें उसके अनुसार तकनीकी और विज्ञान चाहिए। यहाँ यूरोप के तरीके लागू करने की आवश्यकता नहीं है। हमें अपनी परंपरा और स्थिति पर लज्जित होने की भी आवश्यकता नहीं है। मैं एक बार हॉलैंड गया हुआ था। वहाँ एक संग्रहालय में एक व्यक्ति मुझे देख कर हँसा और बोला, भारत में केवल दो प्रतिशत लोगों के पास ही कारें हैं। मैंने कहा कि बिल्कुल, परंतु भारत के दो प्रतिशत लोग हॉलैड की जनसंख्या से अधिक हैं। उनसे हम तुलना क्यों करें? हमारे भी दो करोड़ लोग तो काफी समृद्ध हैं। परंतु हमारे यहाँ जनसंख्या और परिस्थितियाँ अलग हैं और उनका निवारण हमें अपने तरीके से ही करना होगा। उसके लिए हमें अपने परंपरागत ज्ञान-विज्ञान पर ही काम करना होगा। लघु और कुटीर उद्योग ही हमारी परंपरा थी, उससे ही हमने विकास किया था। आज भी हम उससे ही विकास कर सकते हैं।
11 फरवरी, 2018 को नई दिल्ली में आयोजित भारतीय धरोहर की अखिल भारतीय वार्षिक बैठक में दिए गए भाषण के संपादित अंश