भारतीय मानस का निर्माण हो शिक्षकों का दायित्व

समाज में शिक्षक की भूमिका काफी बड़ी है वह अपनी प्रतिभा से नए समाज का निर्माण करता है। शिक्षक का शिक्षण वैज्ञानिक पद्धति से होना चाहिए। शिक्षक को पाठ्यक्रम के साथ-साथ छात्रों को भारतीय प्राचीन ज्ञान विज्ञान परंपरा का ज्ञान भी देना चाहिए। वर्तमान समय में नवीन तकनीकी के प्रयोग से छात्रों को विषय सरलता से समझ आता है अतः शिक्षण में नवीन पद्धति का प्रयोग करना चाहिए। उपरोक्त बातें गत 25 जुलाई 2016 को भारतीय धरोहर और शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास द्वारा आयोजित एक दिवसीय शिक्षक कार्यशाला के उद्घाटन सत्रा में मुख्य वक्ता डॉ. के पी सिंह ने कहीं।
कार्यशाला में मुख्य रूप से अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ के संगठन मंत्राी श्री ओम पाल सिंह, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्राकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफ़ेसर बृजकिशोर कुठियाला, डॉक्टर के. पी. सिंह कुलपति, कृषि विश्वविद्यालय हिसार, डॉ. चांद किरण सलूजा अध्यक्ष संस्कृत भारती तथा राष्ट्रीय शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान के पूर्व अध्यक्ष डॉ. संतोष पांडा का मार्गदर्शन प्राप्त हुआ।
प्रथम सत्रा का विषय था भारतीय ज्ञान परंपरा और शिक्षक। अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ के संगठन मंत्राी श्री ओम पाल सिंह ने कहा शिक्षण मनोरंजक विधि से करना चाहिए, इससे छात्रा अधिक और शीघ्र सीखते हैं। शिक्षक को सरल स्वभाव और ज्ञान से परिपूर्ण होना चाहिए। उत्कृष्ट ज्ञानयुक्त और सरल स्वभाव के शिक्षक को छात्रा अधिक चाहते हैं और सम्मान करते हैं। भारतीय ज्ञान परंपरा को आगे बढ़ाने में शिक्षक की महत्वपूर्ण भूमिका है। इसलिए भारतीय ज्ञान परंपरा का भी ज्ञान छात्रों को देना चाहिए।
द्वितीय सत्रा में शिक्षा में नवाचार और शिक्षक विषय पर माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्राकारिता एवं सं चार विश्वविद्यालय कुलपति प्रोफ़ेसर बृजकिशोर कुठियाला ने कहा कि शिक्षक की भूमिका अति महत्वपूर्ण है। शिक्षक की सफलता छात्रों की सफलता पर निर्भर है। शिक्षक को अपने शिक्षण में नए विचारों का समावेश और शिक्षण में नई पद्धति का प्रयोग करना चाहिए। नई शिक्षा पद्धति से छात्रों में ग्रहण करने की क्षमता का विकास होता है छात्रों में प्राचीन भारत की गौरवमयी परम्परा ज्ञान कराना भी शिक्षक का धर्म है। छात्रों को भारत के विषय में जानकारी देने तथा भारतीय गौरव निर्माण करने में शिक्षक की भूमिका अति महत्वपूर्ण है।
उन्होंने कहा कि शिक्षक नए नए तरीकों से शिक्षण कार्य करे। नूतन विधि के प्रयोग में किसी प्रकार की कोई बाधा उत्पन्न नहीं होती। शिक्षक की सफलता नए प्रयोग करने में है। इसलिए शिक्षक को नए-नए प्रयोग करने चाहिए। सत्रा के अध्यक्ष के रूप में प्रोफेसर संतोष पांडा ने अपने उद्बोधन में कहा कि उन्होंने शिक्षक प्रशिक्षण पाठ्यक्रम में नए प्रयोग किये। पाठ्यक्रम में योग, स्वामी विवेकानंद, उपनिषद् आदि को सम्मिलित किया। इस कार्य में उन्हें किसी प्रकार की कोई बाधा नहीं हुई।
तृतीय सत्रा का विषय था भारतीय मानस निर्माण में शिक्षक की भूमिका। इस सत्रा में प्रसिद्ध शिक्षाविद् चांद किरण सलूजा ने कहा शिक्षक की राष्ट्र के निर्माण में अपनी भूमिका होती है। भारतीय मानस निर्माण में शिक्षक की महत्वपूर्ण भूमिका है। आज शिक्षा के मानक परिवर्तित हो गये हैं। शिक्षा का उद्देश्य धनोपार्जन मात्रा रह गया है। आज के समय में मानवीय मूल्यों का शिक्षा में समावेश करने के लिये शिक्षक को छात्रों के मन में भारतीय जीवन मूल्यों का रोपण करना चाहिए। आज छात्रा शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात धनार्जन के लिए अनैतिककार्य करने में भी संकोच नहीं करता। शिक्षकों का दायित्व है कि शिक्षण के माध्यम से छात्रों में भारतीय मानस का निर्माण करें। इस सत्रा में अपने अध्यक्षीय भाषण में माखनलाल चतुर्वेदी पत्राकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफ़ेसर बृजकिशोर कुठियाला ने कहा कि समाज में भारतीय मानस निर्माण करने में शिक्षक की भूमिका महत्वपूर्ण है। मानव जीवन में शिक्षा के चार चरण होते हैं जो जीने की शिक्षा जीवन की शिक्षा जीवनयापन की शिक्षा और आध्यात्मिक शिक्षा। भारतीय मानस तैयार करने शिक्षक की भूमिका सर्वाधिक है। शिक्षक की भूमिका छात्रा को नर से नारायण बनाने की होनी चाहिए।
भारतीय समाज में शिक्षा का यही उद्देश्य था कार्यशाला के संयोजक डॉ. कृष्णचंद्र पांडे ने कार्यशाला की भूमिका के रूप में अपने उद्बोधन में कहा कि शिक्षक केवल कक्षा या वर्ग का शिक्षक नहीं है। वह संपूर्ण समाज का शिक्षक है। समाज की शिक्षक से वही अपेक्षाएं हैं जो एक छात्रा को अपने शिक्षक से होती है। उन्होंने आचार्य चाणक्य के कथन की चर्चा करते हुए कहा कि स्वाभिमानी शिक्षक ही स्वाभिमानी समाज का निर्माण कर सकता है। शिक्षक यदि पराजय स्वीकार करता है तो राष्ट्र पराजित हो जाता है। अतः संस्कारयुक्त स्वाभिमानी समाज निर्माण करना शिक्षक का दायित्व है। कार्यशाला में दिल्ली प्रांत के लगभग 50 शिक्षकों ने भाग लिया। इस अवसर पर भारतीय धरोहर के चैयरमेन श्री रमेष कपूर, महामंत्राी श्री विजय शंकर तिवारी, संगठन महामंत्राी श्री प्रवीण शर्मा उपस्थित रहे। कार्यशाला के सत्रों का संचालन डॉ. प्रदीप कुमार और संजय स्वामी ने किया।