भारतीय दर्शन में प्रकृति और जल

Water_holiest river of Indiaअरुण तिवारी
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

हम स्वयं और हमारे पास-दूर जिस किसी वस्तु या क्रिया का अस्तित्व है, जो दिखती है और जो नहीं भी दिखती है, वही तो प्रकृति है। आइये, शब्दार्थानुसार प्रकृति को जानें। ’प्र’ का अर्थ है ’प्रकृष्ट’ और ’कृति’ से सृष्टि के अर्थ का बोध होता है। अतः जो सृष्टि करने में प्रकृष्ट अर्थात परम प्रवीण है, वही प्रकृति है। ’प्र’ प्रथम अर्थ मंे है और ’कृति’ सृष्टि अर्थ में। सतोगुण के अर्थ में ’प्र’ शब्द, रजोगुण के अर्थ मंे ’कृ’ और तमोगुण के अर्थ में ’ति’ शब्द है। स्पष्ट है कि जो त्रिगुणात्मक स्वरूप वाली है, वही सर्वशक्ति संपन्न होकर सृष्टि विषयक कार्य में प्रधान है। अतः वही प्रकृति भी है और प्रधान भी।

प्रकृति के प्रकार, अंश और कलायें

उक्त गुणों के आधार पर राधा, लक्ष्मी, सरस्वती, वेदमाता सावित्राी और दुर्गा प्रकृति के पांच प्रकट रूप हैं। ग्ंागा, तुलसी, जरत्कारु, देवसेना, मंगलचण्डी और वसुन्धरा.. प्रकृति देवियों के छह प्रधान अंश हैं। स्वाहा, दक्षिणा, स्वधा, स्वस्ति, पुष्टि, तुष्टि, सम्पति, धृति, क्षमा, रति, मुक्ति, दया, प्रतिष्ठा, कीर्ति और क्रिया, प्रकृति की ऐसी कलायें हैं, जिनके बिना सारा संसार विच्छिन्न सा हो जाता है। शांति, लज्जा, बुद्धि, मेधा, स्मृति, मूर्ति, श्री, प्रभा, दहिका और योगनिद्रा साथ छोड़ दें, तो समस्त संसार मूर्ख और मृतक समान हो जाये।

काल की तीन पत्नियां हैं, संध्या, रात्रि और दिवस। लोभ की दो भार्या हैं, क्षुधा और पिपासा। अधर्म की एक भार्या है, मिथ्या और एक भाई है, कपट। काल की दो पुत्रियां हैं, ज़रा और मृत्यु। श्रद्धा और भक्ति, वैराग्य की दो परमादरणीय पत्नियां हैं। इसी तरह देवमाता अदिति, गायों को उत्पन्न करने वाली सुरभि और दैत्यों की माता, दिति, कद्रू, विनाता और दनु नामक देवियां मिलकर सृष्टि का काम संभालती हैं। ये सभी प्रकृति की कलायें हैं। रोहिणी, संज्ञा, शतरूपा, शची, तारा, अरुन्धती, अहिल्या, अनसूया, देवहूति, प्रसूति, मेनका, लोपमुद्रा, आहूति, वरुणी, क्षमा, विन्ध्यावली आदि भार्या को भी प्रकृति की कला मानकर सम्माननीय समझना चाहिए। भगवती प्रकृति में विराजमान होने के कारण, परमात्मा को भगवान कहते हैं।

प्रकृति की सृष्टि प्रक्रिया

द्युलोक और भूलोक के बीच में आकाश को रखा। जल के ऊपर तैरती पृथ्वी को स्थापित किया। उसकी दशों दिशायें निश्चित की; साथ ही काल, मन, वाणी, क्रोध और रति की सृष्टि की। भावों के अनुरूप सृष्टि करने की इच्छा से सात प्रजापतियों को उत्पन्न किया, मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलत्स्य, पुलह, क्रतु और वसिष्ठ। सृष्टि कार्य के कारण, पुराणों ने इन्हे भी ब्रह्मा ही निश्चित किया है। इन सातों से सात दिव्य वंश बने। फिर ब्रह्मा ने विद्युत, रोहित, इन्द्रधनुष, पक्षी तथा मेघों की रचना की। फिर यज्ञों की सिद्धि के लिए चार वेद प्रकट किए। वंश वृद्धि से अपने अंग से पुरुष और स्त्राी उत्पन्न किए। पुरुष का नाम मनु और स्त्राी को अयोनिजा शतरूपा कहा गया। मनु के नाम से ’मनवन्तर’ काल माना गया।

आकाशस्याधिपो विष्णुग्नेश्चैव महेश्वरी।

वायोः सूर्यः क्षितेरीशो जीवनस्य गणाधिपः।।

विष्णु आकाश के, सूर्य वायु के, शक्ति अग्नि की, गणेश जल के और शिव पृथ्वी के अधिपति हैं। यह तो भारत के प्रकृति दर्शन की एक छोटी सी झलक है, संपूर्ण चित्रा कैसा होगा? खुद जाकर देखिए।

जल

जल, ऊर्जा का स्त्रोत है। मनुस्मृति के प्रथम अध्याय (सृष्टि) का दसवें मंत्रा कहता हैः

आपो नारा इति प्रोक्ता आपो वै नरसूनवः।

तासू शेते स यस्माच्च तेन नारायणः स्मृतः।।

इसका मतलब है कि जल, नर से प्रकट हुआ है, इसलिए इसका नाम ’नार’ है। भगवान इसमें अयन करते हैं यानी सोते हैं, इसलिए उन्हे नारायण कहा गया। भारतीय जल दर्शन कहता है कि पहले जल की रचना हुई; फिर जल से ही सूर्य, ब्रह्म हुए। ब्रह्म द्वारा रचित स्वर्गलोक, भूलोक, आकाश, विद्युत, मेघमण्डल, नदियां, पहाड़ और नाना प्रकार की वनस्पतियां, सभी जल से ही प्रकट हुए।

जल विज्ञान

कहां कुआं बनायें? कहां न बनायें? इनके वास्तु प्रभाव क्या होंगे? निर्जल प्रदेश में जामुन, गूलर, अर्जुन, निर्गुण्डी, बेर, ढाक, जंगली अंजीर, कम्पिल्लक, सप्तपर्ण, करंज, महुआ, कदम्ब, शमी, तिलक, ताड़, कपित्थ, अश्मन्तक, हरिद्रवृक्ष, तेदूं, बेल, आम्रतक, वरूणक, भल्ला, अंकामल, पिण्डार, शिरीष अंजन, बला, धतूरा, बेर, कुशा, कटैली, खजूरी, ढाकव कनेर, पीलू, बहेड़ा आदि झाड़ की स्वाभाविक उपस्थिति, उनकी टहनियों के झुकाव, फल-फूल, रंग, उनसे निश्चित दिशा व गहराई पर मिट्टी की बांबी, सफेद संाप, गोहनुमा सफेद छिपकली, पैर पटकने पर भूमि से आने वाली आवाज, भूमि का रंग आदि के विश्लेषण से भूमिगत जल की उपस्थिति व स्थिति की पहचान करना। सोचिए, यदि हो जाये, तो कितना अद्भुत ज्ञान है यह! न मशीन की जरूरत, न जगह-जगह निरर्थक खुदाई की।

जोहड़, एनीकट, खेत तलाई, मेड़बन्दी, खुला टांका, बंद टांका, जल कुइयां, ताल, पाल, झाल, जाबो, कूलम, आपतानी, जाने कितने प्रकार के परंपरागत जल ढांचांे का ज्ञान, अभी भी भारत के गंवई समाज के बीच मौजूद है। जरूरत है, तो उसे संजोने की, प्रोत्साहित करने की।

एक चित्रा: हमारी नदियां

गंगा, सरस्वती, सिन्धु, चन्द्रभागा, यमुना, सतलुज, व्यास, झेलम, रावी, गोमती, धूतपापा, बाहुदा, दृषद्वती, देविका, चक्षु, निष्ठीवा, गण्डकी और कौशिकी – ये हिमालय घाटियों से निकली हुई नदियां हैं। देवस्मृति, देववती, वातघ्री, वेण्या, चन्दना, सदानीरा, मही, चंबल, वृषी, वेदवती, क्षिप्रा और अवन्ती – ये सभी पारियात्रा यानी पर्वत का अनुसरण करने वाली नदियां हैं। सोन, महानदी, नर्मदा, सुरथा, क्रिया, मन्दाकिनी, दशार्णा, चित्राकूटा, पिशाचिका, अतिलघुश्रोणी, विपाषा, शैवला, सधेरूजा, शक्तिमती, शकुनी, त्रिदिवा, क्रमु और वेगवाहिनी – ये सभी ऋक्षपर्वत की संतानें हैं।

चित्रा, पयोष्णी, निर्विन्ध्या, तापी, वेणा, वैतरणी, सिनीवाली, कुमुद्वती, तोया, महागौरी, दुर्गा और अंतशिला – ये सभी सरितायें, विन्ध्याचल पर्वत की घाटियों से निकलती हैं। गोदावरी, भीमरथी, कृष्णवेणा, तुंगभद्रा, सुप्रयोगा और पापनाशनी – ये श्रेष्ठ नदियां, सहयगिरि की शाखाओं से प्रकट हुई हैं। कृतमाला, ताम्रपणी, पुष्पवती, उत्पलावती – शीतल जलयुक्त ये नदियां, मलयांचल से निकलती हैं। पितृकुल्या, सोमकुल्या, ऋषिकुल्या, वजुला, त्रिदिवा, लाकंलिनी और वंशकरा – ये नदियां, महेन्द्र पर्वत से प्रकट हुईं। सुविकाला, कुमारी, मनुगा, मनदगामिनी, क्षया और पलाशिनी – ये नदियां, शुक्तिमान पर्वत से निकलती हैं।