भारतीय कालगणना की प्राचीनता

Kaalganana 2रवि प्रकाश आर्य
लेखक राजकीय महाविद्यालय, सफीदों के प्राचार्य हैं।
स्टीफन हाकिंग ने जो कुछ भी अपनी पुस्तक ‘समय का संक्षिप्त इतिहास’ में लिखा है, लगभग वे सभी बातें सूर्य सिद्धांत में भी वर्णित हैं। सूर्य सिद्धांत भारतीय विज्ञान की एक ऐसी पुस्तक है जिसका अंग्रेजी अनुवाद वर्गीज ने 1865 के आसपास किया था। उस समय से सूर्य सिद्धांत दुनिया की सबसे अधिक बिकने वाली पुस्तक है। देखने की बात यह है कि उन्नीसवीं सदी में पाश्चात्य विज्ञान ने एस्ट्रोफिजिक्स यानी कि खगोल विज्ञान में कितना विकास किया था? कम से कम आज जितना विकास हुआ है, उतना तो नहीं ही हुआ होगा। उन्होंने हमारे विज्ञान की बातों को लिया और अपने ढंग से प्रस्तुत किया। यहां तक कि आप विज्ञान की किसी भी शाखा को उठा लें, पाश्चात्यों ने भारतीय विज्ञान का काफी अध्ययन किया। उदाहरण के लिए जिस पाइथागोरस प्रमेय को हम पढ़ते हैं, जोकि वास्तव में बोधायन प्रमेय है, वे पाइथागोरस भी भारत आए थे। यहां उन्होंने अध्ययन किया था। यह केवल मैं नहीं कह रहा हूँ। ई. पोलॉक ने अपनी पुस्तक इंडिया इन ग्रीस में इसका वर्णन किया है। वे कहते हैं कि पाइथागोरस तो बुद्ध का अनुयायी है। वह पाइथागोरस की इटिमोलोजी देते हुए उसे बुद्धगुरू कहता है। बुद्ध जिसका गुरू है, वह पाइथागोरस है। उस समय पश्चिम में विज्ञान के अध्ययन की व्यवस्था ही नहीं थी। यह सारी व्यवस्था भारत से ही वहाँ गई है।
वर्ष 1835 तक यूरोप में शिक्षा के नाम पर कोई स्कूल नहीं होता था। कुछ स्कूल थे जिसमें केवल राजनयिक परिवारों के बच्चे ही पढ़ सकते थे। वे भी केवल तीन ही विषय पढ़ते थे थियोलोजी, जिसमें बाइबिल पढ़ाई जाती थी, दूसरा लॉजिक और तीसरा विषय था व्याकरण का जिसका उपयोग बाइबिल समझने में होता था। ये जो कहते हैं कि हार्वर्ड सात सौ साल पुराना है या चेकोस्लोवाकिया का एक विश्वविद्यालय दावा करता है कि वह चार सौ वर्ष पुराना है और पहले वहां आइंसटीन पढ़ाते थे तो हमें पता होना चाहिए कि आइंसटीन स्वयं भी केवल आठवीं पास ही थे। हालांकि कोई भी व्यक्ति विज्ञान की बात कर सकता है, परंतु आज की भांति विश्वविद्यालयों की कल्पना तब वहां नहीं थी। हम जब नालंदा, तक्षशिला और विक्रमशिला विश्वविद्यालयों की बात करते हैं तो इनसे कई हजार वर्ष पहले चले जाते हैं। भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद् में एक बार यह प्रश्न उत्पन्न हुआ कि भारत के इतिहास का प्रारंभ कहां से माना जाए। इस पर मैंने कहा कि क्या यह आवश्यक है कि पूरी दुनिया के इतिहास को ईसा की नजर से देखा जाए? यह तो एक व्यक्तिकेंद्रित आधार है। भारत में एक ऐसा आधार रहा है जो किसी व्यक्ति, समुदाय, संप्रदाय आदि पर आधारित नहीं रहा है और जो पूर्णतः वैज्ञानिक रहा है, उसे स्वीकार किया जाए। यह कालगणना है युगों की। यह न केवल शुद्ध रूप से वैज्ञानिक आधार पर बनाई गई है, बल्कि यह संप्रदाय और व्यक्ति से निरपेक्ष भी है।
भारत में जो शब्द प्रयोग होते हैं, वे स्वयं में परिभाषा भी होते हैं। शब्द अपनी व्याख्या स्वयं प्रस्तुत करते हैं। उदाहरण के लिए भूगोल शब्द है। इसका शब्द ही बता रहा है कि धरती गोल है। यह एक बड़ी विशेषता है। इसी प्रकार काल शब्द का अर्थ है गणना या संख्या। काल का प्रारंभ होने का अर्थ है काल की गिनती का प्रारंभ होना। पश्चिम के वैज्ञानिकों का कहना है कि उन्होंने समय की काफी छोटी ईकाइयां ढूंढी हैं। मिनट, घंटे आदि निर्धारित किए। इस पर मैंने भारतीय ग्रंथों को खंगाला तो पाया कि भारत में काल की सबसे छोटी ईकाई त्राुटि प्रयोग की गई थी। इसकी परिभाषा दी गई कि कमल के पत्ते में सूई से छेद करने में जितना समय लगता है, वह त्राुटि का काल है। इसको यदि सेकेंड में नापा जाए तो यह एक सेकेंड का 33750वां भाग होता है। क्या यह बात नशे में लिख दी गई होंगी? इसके बाद सेकेंड आदि आते हैं। फिर काल की सबसे बड़ी ईकाई हमारे यहां थी 31 शंख वर्ष जिसे आज की शब्दावली में कहें तो 311 ट्रिलीयन वर्ष। कोई सोच भी नहीं सकता आज कि न्यूनतम ईकाई और महत्तम ईकाई में इतना बड़ा अंतर हो सकता है। क्या ऐसी गणनाएं बिना विज्ञान की जानकारी के संभव है?
काल की गिनती में सूर्य का बड़ा महत्व है। सूर्य सिद्धांत में एक बात कही गई है कि इस सृष्टि का जब प्रारंभ हुआ तो वह आधी रात से हुआ। आज भी पूरी दुनिया में दिन का परिवर्तन आधी रात से ही होता है। कालांतर में सूर्याेदय से दिन का प्रारंभ माना जाने लगा। हमारे सभी पंचांग सूर्याेदय पर ही आधारित हैं। एक सूर्याेदय से दूसरे सूर्याेदय तक के समय को सावन दिन कहते हैं। इसके बाद एक सौर दिन की गणना की गई। पृथिवी द्वारा सूर्य के परिक्रमा के पथ को 360 डिग्री में बांटा गया है। वेदों में इसकी काफी चर्चा मिलती है। इसमें आक्षेप किया जाता है कि वेद में वर्ष 360 दिन का है, तो वैदिक ऋषियों को वर्ष की पूरी जानकारी नहीं थी, क्योंकि आज हमें पता है कि एक वर्ष 365.24 दिन का होता है। परंतु इसमें भी एक बड़ा विज्ञान है।
जब पृथिवी और अन्य ग्रह सूर्य से अलग हुए, तब उनका परिक्रमा पथ सूर्य के निकट था। आज हम जानते हैं कि पूरा ब्रह्मांड विस्तारित हो रहा है, फैल रहा है। प्रारंभ में पृथिवी का परिक्रमा काल 360 दिनों का ही रहा होगा। आज उसका परिक्रमा पथ बढ़ जाने के कारण उसका परिक्रमा काल भी बढ़ गया है। इसी प्रकार चंद्रमा के दिन का भी परिगणन किया गया है। इसे नाक्षत्रा दिन कहते हैं। चंद्रमा का पृथिवी पर सबसे अधिक प्रभाव पड़ता है। चंद्रमा के कारण ही पृथिवी पर बड़े तूफान आते हैं। वह अपने गुरूत्व के बल से धरती के पूरे पानी को अपनी ओर खींच लेता है। इसलिए भारतीय कालगणना में चंद्रमा को काफी महत्वपूर्ण माना गया।
अब कहा जाता है कि यह जानकारी तो मिश्र के लोगों के पास भी थी, इसे भारत की मौलिक खोज कैसे मान लिया जाए। तो उनसे यह प्रश्न पूछा जाना चाहिए कि सप्ताह के सातों दिनों के नाम जो कि पूरी दुनिया में एक समान ही हैं, कैसे रखे गए? यह कोई और बता ही नहीं सकता, क्योंकि उन्हें यह पता ही नहीं है। वास्तव में ये नाम भारत में ही रखे गए और बड़े ही वैज्ञानिक तरीके से रखे गए हैं। दिन के 24 घंटों में से प्रत्येक घंटा प्रत्येक ग्रह का माना जाता है तथा दिन का पहला घंटा जिस ग्रह से प्रारंभ होता है, उसी ग्रह के नाम पर दिन का नाम रखा गया। इसे समझने के लिए आप सौर मंडल को देखें। सबसे पहले सूर्य के निकलने से दिन का प्रारंभ होता है, इसलिए पहले दिन का नाम रखा गया रविवार। सौर मंडल के केंद्र में सूर्य है, परंतु यदि हम पृथिवी को केंद्र में रख दें तो सूर्य के बाद पृथिवी के बाद चंद्रमा आता है, उसके नाम पर सोमवार रख दिया गया। इसी क्रम में शेष दिनों के नाम रखे गए।
अब सवाल उठता है कि महीनों के नाम कैसे रखे गए। इसमें भी बड़ी वैज्ञानिकता है। अपने यहां पूर्णिमा से महीना समाप्त होता है। पूर्णिमा का अर्थ ही है मास पूर्ण। अंग्रेजी महीनों के नाम कैसे रखे गए? सप्तम्बर, अष्टम्बर, नवम्बर, दसम्बर। इस प्रकार दिसम्बर तो दसवां महीना हुआ, उसे बारहवां कैसे मानते हैं? वास्तव में फरवरी ही बारहवां महीना है। हालांकि उन्हें पता ही नहीं था कि वर्ष में बारह महीने होते हैं। जूलियन कैलेंडर में दस ही महीने हुआ करते थे। इसे अद्यतन किया गया जूलियस सीजर के समय में जब उसने मिश्र की राजकुमारी क्लियोपेट्रा से शादी की और क्लियोपेट्रा के साथ आए ज्योतिषियों ने उनके दस महीनों को बढ़ा कर बारह महीने किए। फिर महीनों में कितने दिन हों, इसका उन्हें कोई ज्ञान नहीं था। कोई इनसे पूछे कि फरवरी को 28 या 29 दिन का मानने के पीछे क्या वैज्ञानिकता है? कोई उत्तर ही नहीं है। जुलियस सीजर ने अपने नाम पर जुलाई महीना बनवाया तो उसमें 31 दिन रखवा दिए। अगस्टस के नाम पर रखे गए महीने में भी 31 दिन रख दिये गए। मार्स चूंकि युद्ध का देवता है तो मार्च में भी 31 दिन रख दिए। बंदरबाँट वाला हिसाब-किताब है।
हमारे यहां महीनों के नाम चंद्रमा की राशि के नक्षत्रों के अनुसार किया गया है। उदाहरण के लिए पूर्णिमा का चंद्रमा जब चित्रा नक्षत्रा में होता है तो उस महीने का नाम चौत्रा रखा। अब चंद्रमा का एक मास 30 चंद्र तिथियों यानी कि 29 दिन 12 घंटे के सौर मास के बराबर होता है। इस प्रकार 10-11 चांद्र महीने बीतने पर सौर मास से लगभग एक महीना पीछे रह जाता है। इसलिए हरेक वर्ष एक महीना अधिक जोड़ा जाता है, जिसे हम मलमास करते हैं। इस प्रकार हमारा वर्ष केवल चांद्र वर्ष न होकर सौर-चांद्र वर्ष है और हमारे ऋषियों को इन दोनों वर्षों के बारे में ठीक ज्ञान था।
इसी प्रकार हमने युगों की गणना की। युगों की गणना सृष्टि रचना से जुड़ी हुई है। हमारे सारे ग्रह-नक्षत्रा सृष्टि के प्रारंभ में अश्विनी नक्षत्रा में थे। सृष्टि रचना के प्रारंभ के बाद ये जब फिर पहली बार उसी नक्षत्रा में आए तो इसमें समय लगा चार लाख बत्तीस हजार वर्षों का। इसे कहा गया कलियुग। जब ये दोबारा उसी नक्षत्रा में आए तो उसे कहा द्वापर, तिबारा आए तो कहा त्रोता और चौथी बार आए तो कहा कृत। इस प्रकार इन चारों युगों की गणना की गई। इन्हें जोड़ा जाए तो कुल 43 लाख 20 हजार वर्ष के काल को हमने एक महायुग कहा। हमारे यहां शब्द संख्या के वाचक भी हैं। जैसे ब्रह्म शब्द एक का द्योतक है, आदित्य बारह का द्योतक है। इसी प्रकार धर्म दस संख्या का द्योतक है क्योंकि धर्म दस लक्षणों वाला होता है। इसलिए महायुग को धर्म कहा गया।
समय इसके आगे भी चलता है तो हमारे ऋषि भी इस गणना से आगे बढ़े। उन्होंने देखा कि चंद्रमंडल पृथिवी का चक्कर लगाता है, पृथिवीमंडल सूर्य का चक्कर लगाती है और सौर मंडल भी प्रजापिता परमेष्ठी मंडल का चक्कर लगा रहा है। यूरोप को तो यह बात पहले पता ही नहीं थी। वहां कहा जाता था कि जहाँ तक बाइबिल की बात है सूर्य पृथिवी का चक्कर लगाता है परंतु जहाँ तक विज्ञान की बात है पृथिवी सूर्य का चक्कर लगाती है। अब आधुनिक विज्ञान के लोग भी मानने लगे हैं कि सूर्य भी चक्कर लगा रहा है। उनके अनुसार सूर्य को अपना चक्कर पूरा करने में 28 करोड़ वर्ष लगता है परंतु वैदिक ऋषियों के अनुसार यह समय 32 करोड़ वर्षों का है। इसमें दो ही बातें संभव है कि या तो आज के वैज्ञानिकों के अनुसार सूर्य का परिक्रमा-पथ छोटा है या सूर्य की गति कम हो गई है।
वैदिक ऋषि आगे कहते हैं कि यह परमेष्ठी मंडल यानी आकाशगंगा स्वयंभू मंडल का चक्कर लगा रहा है। यह बात भी आज वैज्ञानिक मानने लगे हैं। वैदिक गणना के अनुसार इसमें एक मनवन्तर कहा गया। एक मनवन्तर यानी 71 महायुग और एक कृतयुग। इस समय के बीतने में ध्रुव बदल जाते हैं। आज का विज्ञान भी ध्रुवों के बदलने की बात को स्वीकारने लगा है। वैदिक गणना इससे आगे की भी है। यह गणना न केवल पूरी तरह वैज्ञानिक है, बल्कि आज के विज्ञान से भी कहीं अधिक तर्कसंगत और प्रामाणिक है।