बनाएं स्वाभिमानी समाज

1942 में जब भारतीय स्वतन्त्राता का आन्दोलन अपने चरम पर था अग्रेजों भारत छोड़ों का नारा सम्पूर्ण देष के कोने-कोने से तेज होने लगा तब अग्रेजों को यह लगा कि अब भारत पर शासन करना असम्भव हैं। उन्होंने भारत छोडने का मन बना लिया। तब भारत की अग्रेंज सरकार को अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति रूजवेल्ट ने एक सुझाव दिया कि आप भारत के बारे में जो भी कदम उठाए परन्तु यह ध्यान रखना कि भविष्य का भारत पष्चिम की छत्राछाया में जिए। यहाँ के लोग भारतीय नहीं इंडो-यूरोपियन कहलाए। आज उसी का प्रभाव हमारे समाज तथा तन्त्रा पर स्पष्टतः दिख रहा है। भारत में ’इण्डिया’ हो जाना भारतीय स्वयं को ’इण्डियन’ कहने में गर्व का अनुभव करते है। आज देष में जो हो रहा है वह निचले स्तर का यूरोप और अमेरिका का अनुकरण हो रहा है।
भारत पर यूरोप का वैचारिक प्रभाव 1820 से प्रारम्भ हो गया था परन्तु लगभग 1900 तक देष का राजनीतिक, शैक्षाणिक तथा व्यापारिक नेतृत्व यूरोप से प्रभावित लोगों के हाथों में चला गया। उसके पष्चात् जब स्वतन्त्राता का आन्दोलन जोर पकड़ने लगा तब यह प्रभाव थोड़ा कम हो गया। परन्तु 1945 के पष्चात् पष्चिमी प्रभाव के लोग फिर से आगे आये और उन्होंने ही देष को चलाने की बागडोर संभाली और जो देष के वृहत् समाज का संचालन व नेतृत्व कर रहे थे उन्हें पीछे खदेड़ दिया गया। आज हम देष के वृहत् समाज को पष्चिमी विचारों, विज्ञान, तकनीकी, षिक्षा तथा व्यवस्थाओं की जंजीरों में बांधकर दासत्व की दिषा में हैं। यूरोपियन भाषा यूरोपियन जीवन पद्वति, सफेद चमड़ी वाले अंग्रेज लोगों की श्रेष्ठ माना जाता है। भारतीय भाषायें अंग्रेजी भाषा की चाकरी करती नजर आ रही है। भारतीय भाषा बोलने वाले को चंद अंग्रेजी बोलने वाले लोग अपना गुलाम समझते है। अंग्रजी षिक्षा पद्वति ने भारतीय मन को निर्बल और हीन बना दिया है। इन सब परिस्थितियों को जन्म देने वाले लोग वही हैं जिन्होंने 1947 में भारत की सत्ता अंग्रेजों से अपने हाथ में ली। सत्ता हथियाने के बाद उन्होंने अंग्रेजी तन्त्रा को यथावत स्वीकार किया।
परिणाम है कि हम अपनी परम्पराओं अपने ज्ञान विज्ञान से दूर होते चले जा रहे हैं। अपने विष्व गुरुत्व को हम भूल गए हैं। विष्व को ज्ञान-विज्ञान में नहीं अपितु समग्रता की षिक्षा देने वाले भारत को अंग्रेजी पद्वति ने बौना बना दिया है। यह पद्वति हमें अरस्तु और प्लेटों के उस सिद्वान्त की ले जा रही हैं जिसका यह मानना हैं कि केवल कुछ वर्ग ही शासन करने तथा षिक्षा का अधिकारी है शेष सभी को शासकों का दासत्व स्वीकार करना होता है। भारत को इस सोच से मुक्ति के लिए भारतीय भाषाओं भारतीय व्यवस्थाओं और परम्पराओं को सुदृढ़ करने की आवष्यकता है। अपने देष विद्याओं मान्यताओं और अपनी श्रेष्ठ व्यवस्थाओं की ओर लौटना होगा। अपने स्व की पहचान अपनी धरोहर की रक्षा से ही हम पुनः विष्व गुरू बन सकते हैं। आज भारत उस दिषा की ओर अग्रसर हैं परन्तु इसके लिए अधिक गति देने की आवष्यकता है। केवल शासन नहीं सम्पूर्ण समाज को अपना दृष्टिकोण बदलने की आवष्यकता हैं। स्वाभिमानी समाज ही स्वाभिमानी भारत का निर्माता होता है।