प्रस्तावों में व्यक्त हुआ संकल्प

प्रस्तावों में व्यक्त हुआ संकल्प

गत 09 से 11 फरवरी, 2018 को नई दिल्ली में भारतीय धरोहर की राष्ट्रीय प्रतिनिधि बैठक संपन्न हुई। बैठक में देश भर से आए लगभग सौ प्रतिभागियों ने सहभागिता की। इस तीन दिवसीय बैठक में जहाँ धरोहर के अभी तक की उपलब्धियों, आगामी लक्ष्य, विस्तार योजना और भावी कार्यक्रमों के साथ-साथ देश के अनेक ज्वलंत मुद्दों पर भी चर्चा की गई। चर्चा के परिणामस्वरूप राष्ट्रीय प्रतिनिधिमंडल ने दो प्रस्ताव पारित किए।
पहले प्रस्ताव का विषय था – देश की ज्ञान-विज्ञान परंपरा पर विमर्श की आवश्यकता। यह एक विडंबना ही कही जा सकती है कि जब भी देश के विकास की बात होती है, हम हमेशा पश्चिम विशेषकर यूरोपीय और अमेरिका तथा आस्ट्रेलिया जैसे नवयूरोपीय देशों का मुख ही देखा करते हैं। भारत जैसे एक लंबे इतिहास और ज्ञान-विज्ञान की लंबी परंपरा वाले देश में ऐसा होते देखना निश्चित ही दुखद है। परंतु जब भी हम देश की ज्ञान-विज्ञान की परंपरा की बात करते हैं, उसे आज का बुद्धिजीवी वर्ग सीधे-सीधे अंधविश्वास कह दिया करता है। इसलिए आज आवश्यकता है कि देश में अपनी समृद्ध ज्ञान-विज्ञान परंपरा पर एक स्वस्थ चर्चा प्रारंभ की जाए। इससे न केवल शिक्षा सरल हो सकेगी, बल्कि वह अधिक उपयोगी भी होगी। भारत के अपने ज्ञान-विज्ञान को अपनाने से न केवल देश स्वस्थ होगा, बल्कि अधिक कार्यक्षम भी बनेगा। युवा नौकरियों के लिए नहीं भटकेंगे और स्वरोजगार खड़ा करने में समर्थ बनेंगे जो कि देश की हमेशा से परंपरा रही है। कुल मिला कर यह देश के आम आदमी के जन-जीवन को सरल बनाएगा, जो कि हम सभी का अभीष्ट है।
दूसरे प्रस्ताव का विषय था – कृषि में भारतीय परंपरा को मिले महत्व। भारत में खेती की एक लंबी परंपरा रही है। हजारों-लाखों वर्षों की परंपरा के कारण खेती हमारे जीवन में रची-बसी हुई थी। परंतु वर्ष 1947 में अंग्रेजों से स्वाधीनता मिलने के बाद हमारी सरकारों ने खेती के अपने परंपरागत तरीकों की उपेक्षा करके यूरोप में विकसित नए तरीकों को आजमाना प्रारंभ कर दिया। केवल सवा सौ वर्ष पहले स्वयं अंग्रेजों के बनाए कृषि आयोग ने अपनी रपट में लिखा था कि भारत की खेती इतनी उन्नत है कि अगले हजार वर्षों तक इन्हें कुछ सिखाने की आवश्यकता नहीं है। परंतु हम केवल सवा सौ वर्ष में ही उसे पिछड़ा मानने लगे। यूरोप की नकल करते हुए हमने हरित क्रांति की, जिसका परिणाम यह हुआ है कि पंजाब जैसे उपजाऊ प्रदेश की भूमि बंजर होने लगी है, औसत उत्पादन घटने लगा है, अनाज, फल तथा सब्जियां जहरीली हो गईं हैं और किसान आत्महत्या कर रहे हैं।
भारतीय धरोहर का यह स्पष्ट मानना है कि देश में रासायनिक खेती को हतोत्साहित करते हुए, उसे धीरे-धीरे पूरी तरह बंद कर देना चाहिए और गौआधारित खेती को ही बढ़ावा दिया जाना चाहिए। इसके लिए रासायनिक खादों को दिए जाने वाले अनुदान समाप्त किए जाने चाहिए और उस राशि का उपयोग गौवंश के संरक्षण और संवर्धन में किया जाना चाहिए। सरकार और राजनीतिक दलों को यह समझने की आवश्यकता है कि गौसंरक्षण भारत की आत्मा से जुडा विषय है और अगर हम इस कार्य में सफल हों तो देश का आर्थिक विकास स्वत: होगा।