प्रयोगशालाओं की रानी पत्तागोभी

जवाहर लाल कौल
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।
रोम में एक पुरानी कहानी कही जाती है। बीमारियों से तंग आकर शासकों ने एक बार गुस्से में नगर के सभी चिकित्सकों को बुलवाया और पूछा कि साम्राज्य में लोग इतनी बड़ी संख्या में बीमार क्यों हो रहे हैं। अलग-अलग विषेषज्ञों ने अलग-अलग दलीलें दी, लेकिन कोई यह नहीं बता सका कि आखिर कारण क्या है और न ही किसी ने निष्चित तौर पर आष्वासन दिया कि उनके पास इसका उपचार है। कुपित शासकों ने आदेष दिया कि जब चिकित्सकांे के बस की ही बात नहीं तो उनका यहां क्या काम। और सभी चिकित्सकों को देष निकाला दे दिया। कई वर्ष तक रोमन जनता परंपरागत घरेलू उपचार पर चलते हुए केवल गोभी के पत्ते कच्चे चबा कर या पका कर खाते रहे। जब सारा नगर स्वस्थ हो गया, तभी चिकित्सकों को वापस प्रवेष की अनुमति मिली। कहानी कितनी सच है, पता नहीं, लेकिन इसमें जो अंतर्निहित संदेष है, वह सच है। पचास वर्ष पहले तक भी अगर किसी आधुनिक चिकित्सक को बताया जाता कि बीमारी का उपचार सही भोजन से भी किया जा सकता है तो वह इसे दकियानूसी विचार मान कर उड़ा देता। लेकिन पिछले तीस-चालीस वर्षों में इस सोच में भारी बदलाव आया है। यह बदलाव कुछ ऐसे गम्भीर रोगों के कारण आया, जिनके सामने एलोपैथी ने हाथ खडे़ कर दिए थे। कैंसर ऐसी ही बीमारी है जो आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के आसाधारण विकास के बावजूद सुरसा के मुंह की तरह लगातार फैल रही है।

पत्तागोभी की बात छेड़ी थी तो पत्तागोभी की ही बात आगे बढ़ाएं। अमेरिका के मिनिसोटा विष्वविद्यालय के डाक्टर वैटनबर्ग काफी समय से यह मानते थे कि गोभी एक चमत्कारी सब्जी है और इसमें ऐसे गुण हैं, जो गम्भीर बीमारियों को रोकने में समर्थ हैं। उनका तर्क था कि हम दषकों से हवा, पानी और भूमि के साथ ही अपने शरीर को अनावष्यक रासायनिक पदार्थों से भरते रहे हैं जैसे कि वह कोई कूड़ेदान हो। इनमंे ही अनेक तो कैंसर पैदा करने वाले या उसे फैलने में सहायता करने वाले तत्त्व भी होते हैं। क्यों न अपने शरीर में ऐसे प्राकृतिक पदार्थ भी डाले जाएं जो इन रोगाणुओं को रोक सकते हैं। क्यों न अपने तन में स्थाई पुलिस बिठाई जाए? डाक्टर ली वैटनबर्ग ने 1960 के बाद से ही दिखा दिया था कि किस प्रकार छोटी-छोटी सब्जियों में ऐसे रासायनिक तत्व होते हैं जो कोषिकाओं में पहुंच कर कैंसर जैसे रोग को भी वहीं रोक लेते हैं और कालांतर में समाप्त कर देते हैं। अगर हम इन षाक-सब्जियों को खाते रहे तो एक प्रकार का कवच पैदा होता है जो रोगों को आगे बढ़ने नहीं देता। इसे वे रासायनिक प्रतिरक्षा कहते हैं जो बीमारी के पश्चात् होने वाली कीमीयोथेरेपी का उल्टा है। थैरेपी रोग होने पर होती है, यह रोग होने को रोकती है। वैटनबर्ग का विचार क्रांतिकारी था लेकिन वैज्ञानिक मानने को तैयार नहीं थे कि पत्तागोभी जैसी सस्ती वस्तु इतनी महंगी चिकित्सा को ही अनावष्यक बना सकती है।

वर्ष 1970 के बाद बैफलो नगर में न्यूयार्क स्टेट विष्वविद्यालय के डाक्टर सैक्सन ग्राहम को वैटनबर्ग पर विष्वास हो गया था। आरम्भ से ही वे एक विचित्रा प्रकार का प्रयोग करते रहे थे। उन्होंने इसके लिए बहुत सारे स्वयंसेवकों को चुना और उनसे पूछा कि वे हर मास कितनी सब्जियां खाते हैं और कितनी मात्रा में। सब्जियों में पत्तागोभी और उसी वर्ग की कई सब्जियां शामिल कर ली थी। इन स्वयंसेवकों में बहुत से अंतड़ियों के कैंसर के रोगी थे। यह रोग उत्तर अमेरिका के गोरे लोगों में बड़ी संख्या में पाया जाता है। उन्हें कई चौंकाने वाले तथ्य मिले। जिन लोगों ने बताया कि वे बहुत सब्जी खाते हैं उन्हें कैंसर का सबसे कम खतरा था। सब्जियों में भी जो पत्तागोभी का सेवन करते थे, वे लगभग इस रोग से सुरक्षित ही थे। लेकिन सबसे बड़ा तथ्य यह था कि जितनी मात्रा मे व्यक्ति पत्तागोभी का सेवन करता था, उतनी ही मात्रा में उसमें कैंसर के प्रति सुरक्षा मिलती है। इस बात को ‘डोज रेस्पांस’ या मात्रा परिणाम कहा जाता है। यानी जैसे हम औषधि की मात्राओं के अनुसार रोग को घटते देखते हैं और आष्वस्त होते हैं कि इलाज सही हो रहा है, वैसा ही प्रभाव गोभी के सेवन से हो रहा था। यह उसकी रोगषामक क्षमता का प्रमाण था। इससे अचानक गरीब पत्तागोभी की किस्मत चमकी और वह चिकित्सा वैज्ञानिकों की प्रिय वस्तु बन गई, प्रयोगषाला की रानी। आज कैंसररोधक संगठन करोड़ों डालर इस सब्जी पर अनुसंधान करने के लिए खर्च करते हैं।

इस संदर्भ में यह जान लेना आवष्यक है कि ये चमत्कारी विषेषता केवल पत्तागोभी में ही नहीं है। यह विषेषता पत्तागोभी जैसी हर सब्जी में होती है। फूल गोभी में भी होती है। पष्चिम में पाई जानी वाली ब्रोकली और पूर्व के देषांे में पाए जाने वाली कई लम्बे पत्तों वाली सव्जियंा जैसे चीनी बोगचाय आदि में भी ये गुण मिलते हेैं। प्रयोग सबसे अधिक पत्तागोभी पर हुए हैं, इसलिए वह सबसे आगे है।

काया का प्रहरी गाजर

carrot
गाजर ने दुनिया के बड़े-बड़े चिकित्सा वैज्ञानिकों को परेषान कर दिया है। उन्हें लगता है उनकी हालत उस गधे की सी हो रही है जिस पर बैठा चालक उसे गाजर दिखा कर ललचा रहा है, लेकिन गाजर खाने के लिए जितना वह तेज भागता है गाजर भी उतनी ही तेजी आगे भागती जाती है। उन्हें मालूम है कि गाजर में रोग निवारण के करामाती गुण हैं, लेकिन वे असल में क्या हैं, यह आज भी पता नही कर पाए हैं। नित नई बातें सामने आतीं हैं इस मामूली सी वनस्पति के बारे में। दषकांें पहले वैज्ञानिक यह जान गए थे कि गाजर से कई प्रकार के रोगों को रोका जा सकता है। गाजर की इस विषेषता के लिए उन्होंने इसमें प्राप्त एक रासायनिक पदार्थ माना जिसे केरोटिन नाम दिया गया। लेकिन फिर पता चला कैरोटिन के भीतर कुछ है जो कैंसर जैसे रोग को भी रेाक सकता है। यह तो चिकित्सक जान चुके थे कि कैंसर विटामिन ए की कमी के कारण होता है और इस विटाामिन को अक्सर पषुओं संे प्राप्त किया जाता था। अचानक पता लगा कि वनस्पति, खासकर गाजर से भी इसे प्राप्त किया जा सकता है। बीटा कैरोटिन भी इसका बड़ा स्रोत है। बीटा कैरोटिन शरीर में जा कर विटाामिन ए में बदल जाता है। इसी से माना जाने लगा कि गाजर कैंसर से लड़ने का प्रमुख साधन बन सकता है।

वैज्ञानिक रिचर्ड शेक्ले ने 200 व्यक्तियों पर परीक्षण करके दिखाया कि कहीं से भी प्राप्त विटाामिन से नही केवल गाजर से प्राप्त विटाामिन से ही रोग को थामा जा सकता है। लेकिन गाजर के बारे में सबसे महत्त्वपूर्ण फैसला स्वर्गीय डाक्टर मेरिलीन मेनकिस ने सुनाया जो उस समय जानॅ हाप्किन्स विष्वविद्यालय के पब्लिक हेल्थ विभाग की प्रसिद्ध प्रयोगषाला में काम कर रही थी। उन्होंने प्रयोगों से दिखाया कि जिन लोगांे के रक्त में बीटा कैरोटिन की मात्रा जितनी कम होती है उनको कैंसर होने की संभावना उतनी ही अधिक होती है। इसलिए उन्होने सलाह दी कि लोगों को प्रतिदिन कम से कम एक गाजर तो खाना ही चाहिए। नई खोजों के अनुसार गाजर में उपलब्ध बीटा कैरोटिन केवल विटाामिन ए को ही उपलब्ध नहीं करवाता अपितु कुछ और भी करता है। यह सामान्य विटाामिन ए से अधिक एक एंटीऑक्सिडेंट भी है जो शरीर में मुक्त रूप से घूम रहे खतरनाक ऑक्सीजन अणुओं को नष्ट कर सकते हैं। यानी यह कैंसर को सूंघ कर कोषिकाओं को स्वतंत्रा रूप से सुरिक्षित करता है।

लेकिन इस संदर्भ में कुछ चेतावनियां भी दी गई हैं और कुछ महत्त्वपूर्ण सुझाव भी। बीटा कैरोटिन का सबसे अधिक उपयोग फेफड़ों के कैंसर में हो सकता है।। कुछ चिकित्सक चेतावनी देते हैं कि जितनी मात्रा में और जिस नियमितता से हम अपनी छाती में सिगरेट का धुआं भरते रहते हैं उसके सामने गाजर तो क्या कोई और चमत्कारी शाक भी हाथ खड़े कर सकती है। वे नही मानते कि मानव जाति जिस पैमाने पर अपने आप को प्रदूषित करने पर तुली हुई है उसमें खान-पान ही उसका इलाज कर सकता है। यानी खान-पान की चिकित्सा तो तभी कारगर होगी, जब मनुष्य स्वयं भी अपने आप पर नियंत्राण रखना सीखे।

एक महत्त्वपूर्ण सुझाव ब्रिटिष कोलम्बिया के कैंसर विषेषज्ञ डाक्टर हैंस स्टिच ने दिया है। उनका कहना है प्रकृति किसी चिकित्सक की तरह एक विषेष रोग के लिए गोली नहीं देती, वह कई प्रकार की औषधि एक साथ देती है जो कई वनस्पतियो में कम या अधिक मात्रा में पाई जाती है। इसलिए केवल एक नहीं, कई वनस्पति पदार्थों का प्रयोग करने से एक ‘कोक्टेल प्रभाव’ पड़ता है। यानी वे वनस्पति पदार्थ मिल कर सामूहिक प्रभाव डालते हैं और कई रोगों का एक साथ उपचार करते हैं। ठीक यही प्रभाव उन लोागें पर पड़ता ही रहता होगा जो सही अनुपात में सही आहार लेते हैं। एक और महत्त्वपूर्ण बात यह है कि भले ही इस विषेष औषधि पदार्थ का नाम गाजर के नाम पर हो क्योंकि गाजर पर ही आरम्भ में प्रयोग हुए थे। लेकिन बीटा कैरोटिन पर केवल गाजर का ही एकाधिकार नहीं है। अनेक अन्य शाकों में यही गुण पाया जाता है, जैसे पालक हो या हरा फूल गोभी या कोई और गहरे रंग का शाक, सलाद आदि, सबमें यह गुण होता है।