प्रकृति से पाएं जीवन में सफलता

अभिमन्यू कुमार
लेखक अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के निदेशक हैं।

मनुष्य के जन्म के समय उसकी प्रकृति का निर्धारण होता है। विशेषकर गर्भाधान के समय ही बच्चे की प्रकृति का निर्धारण हो जाती है। आधुनिक जेनेटिक विज्ञान के अनुसार भी माता-पिता के जेनेटिक गुण बच्चे को मिलते हैं। आयुर्वेद में भी इसकी चर्चा की गई है। हमारी केवल शब्दावली अलग है। हम कहते हैं कि माता-पिता की प्रकृति के अनुसार ही बच्चे की प्रकृति तय होती है। इसके अलावा माता-पिता का रहन-सहन, सोच-विचार और खान-पान का भी बच्चे की प्रकृति पर प्रभाव पड़ता है। गर्भाधान करने के स्थान, उस समय के मौसम आदि का भी इस पर प्रभाव पड़ता है।
आयुर्वेद के अनुसार शरीर में तीन दोष होते हैं। तीनों दोष अवस्था के अनुसार प्रभावी होते हैं। उदाहरण के लिए बाल्यावस्था में कफ का प्रभाव अधिक रहता है, युवावस्था में पित्त और वृद्धावस्था में वात प्रभावी रहता है। मनुष्य की प्रकृति एक स्थाई व्यवस्था है। वह कभी भी बदलती नहीं है। प्रकृति का अर्थ हुआ शरीर में दोषों की वह स्थिति जो हमेशा स्थाई होती है। परंतु इसके अलावा दोषों की एक स्थिति और होती है, जो बदलती रहती है। इस प्रकार दोषों के दो स्तर होते हैं। बदलने वाले दोषों का स्तर हमारे खान-पान, सोच-विचार, मौसम, आहार-विहार आदि से प्रभावित होती है। जैसे कि यदि हम चाय पी लें तो इससे हमारे अंदर पित्त बढ़ जाए। परंतु यह अस्थाई परिवर्तन होता है। आयुर्वेदिक जीवनशैली में हम जिस प्रकृति की बात करते हैं, वह स्थाई है। इस स्थाई और अस्थाई दोष-स्थितियों में न्यूनतम अंतर रहना चाहिए। तभी हम पूरी तरह स्वस्थ रह सकते हैं। कई बार यह पूछा जाता है कि सर्वाेत्तम प्रकृति कौन सी है। हमारा उत्तर होता है कि सभी प्रकृतियां सर्वाेत्तम हैं, बस वे संतुलित रहें। यदि वे संतुलन में हैं, तो लाभ मिलेगा अन्यथा हानि होगी।
दोषों के ये दोनों स्तरों का प्रभाव गर्भाधान के समय बच्चे की प्रकृति के निर्धारण पर भी पड़ता है। एक तो माता-पिता की प्रकृति और दूसरे तत्कालीन परिस्थिति में दोषों की स्थिति. दोनों मिल कर ही बच्चे की प्रकृति तय करते हैं। इसका अर्थ यह है कि आयुर्वेद में जेनेटिक इंजिनियंरिंग का सिद्धांत पूरी तरह लागू होता है। यदि आज हम डिजायनर बेबी यानी कि मनचाही संतान की बात करते हैं, तो हम यहां भी उसे लागू कर सकते हैं। यदि हमें बच्चे के माता-पिता की प्रकृति ज्ञात है और उसके संयोग से यदि हम सर्वाेत्तम परिणाम चाहते हैं, तो उनके आहार-विहार में परिवर्तन करके मनचाही संतान पा सकते हैं। आहार-विहार से माता-पिता के अस्थायी दोषों में तात्कालिक परिवर्तन आता है, परंतु वह परिवर्तन बच्चे के लिए स्थाई हो जाता है।
आज की जेनेटिक इंजिनियरिंग तो गर्भाधान के बाद जीन से छेड़छाड़ करती है, परंतु हमारी कोशिश उससे पहले की है। हमारा तरीका आधुनिक तरीके से अधिक अच्छा है क्योंकि यह प्राकृतिक तरीका है। गर्भाधान के बाद की जाने वाली छेड़छाड़ में विकृति होने की भी संभावना रहती है, जबकि प्राकृतिक ढंग से किये जाने वाले परिवर्तन में कोई विकृति नहीं हो सकती।

मानव स्वास्थ्य में प्रकृति की भूमिका
एक बार प्रकृति का निर्धारण हो जाने के बाद वह जीवन भर हमारे साथ रहती है। यदि हमारा खान-पान या जीवनशैली इसके अनुसार नहीं होगी तो हमें कठिनाई होगी। इससे हमारा स्वास्थ्य भी बिगड़ सकता है। शारीरिक स्वास्थ्य से लेकर मानसिक स्वास्थ्य तक। यहां तक कि अपने जीवन में कौन व्यक्ति किस क्षेत्रा में अधिक अच्छा कर सकता है, यह भी प्रकृति के ज्ञान से जाना जा सकता है। कुल मिला कर देखें तो मनुष्य का स्वास्थ्य और सफलता दोनों ही इस पर निर्भर हैं।
मनुष्य पशुओं से किस बात में अलग है? एक सामान्य कहावत है कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। सामाजिक प्राणी हम अपने संबंधों के कारण बनते हैं। प्रकृति के ज्ञान से हम किसके साथ कैसा व्यवहार करें, यह भी जान सकते हैं। उदाहरण के लिए भिन्न-भिन्न प्रकृति के लोगों से हाथ मिलाने का तरीका भिन्न-भिन्न होगा। यदि की कफ प्रकृति का व्यक्ति है तो उसे अच्छा लगेगा कि आप हाथ मिलाते हुए उसे दूसरे हाथ से भी सहारा दें। उसे अंदर से अच्छा महसूस होगा। कफ में मूलतः दो महाभूतों का प्रभाव रहता है – जल और पृथिवी। जब महाभूत भावनाओं से जुड़ा हुआ है। इसका अर्थ हुआ कि इस प्रकार के लोग थोड़े अधिक भावुक होते हैं। भावुक होने में एक खतरा यह भी होता है कि व्यक्ति अवसाद में भी जा सकता है। उसमें पृथिवी महाभूत भी जुड़ा होने के कारण वह जिधर भी जाएगा अति पर चला जाएगा। सकारात्मक गया तो भी और नकारात्मक गया तो भी। ऐसे लोगों को अवसाद से निकालना कठिन भी होता है।
ऐसे लोगों के साथ यदि अधिक जोर से या सख्ती से हाथ मिलाया जाए तो उन्हें अच्छा नहीं लगता। और यदि हम दूसरे हाथ से सहारा देकर हाथ मिलाते हैं तो उसे लगता है कि वह भावनात्मक स्तर पर जुड़ पा रहा है। हमने इन बातों को कई बार आजमाया हुआ है। पहली बार हमने इसका प्रयोग किया था 1998 में। दिल्ली में एक परफेक्ट हेल्थ मेला लगता है। उसमें ही पहली बार हमने इसका प्रयोग किया था। वह हमारे जीवन के लिए भी एक महत्वपूर्ण मोड़ था क्योंकि उस समय ही हमें प्रकृति की ताकत का पता चला था। वहां हम कई सारे परिवारों को टूटने से बचा पाए। उससे पहले हम कभी सोचते भी नहीं थे कि प्रकृति का स्वास्थ्य के अलावा भी कोई और उपयोग होता होगा।
उस समय हमें लगा कि फैमिली काउंसिलिंग में भी इनका पूरा उपयोग किया जाना चाहिए। अब हम यह सुझाव देते हैं कि शादी में कुंडली मिलाओ चाहे नहीं मिलाओ, प्रकृति अवश्य मिलवा लो। किसी के साथ आपको अस्थाई संबंध रखना है या फिर स्थाई संबंध, यह आप प्रकृति से तय कर सकते हैं। आमतौर पर पति-पत्नी की प्रकृति एक-दूसरे के विरूद्ध होनी चाहिए। हालांकि समान प्रकृति का होने पर तात्कालिक तौर पर आकर्षण होता है, परंतु बाद में झगड़े होने लगते हैं। जैसे पति-पत्नी दोनों ही वात प्रकृति के हों तो दोनों ही अधिक बोलने के आदि होंगे। ऐसे में सुनेगा कौन? फिर झगड़ा ही तो होगा। इसी प्रकार यदि दोनों पित्त प्रकृति के हैं तो दोनों के पास अपना अहंकार है। इसलिए तात्कालिक संबंधों के लिए तो समान प्रकृति का होना अच्छा प्रतीत होता है, परंतु लंबे समय के संबंधों के लिए समान प्रकृति का होना ठीक नहीं है। अलग-अलग प्रकृति और एक-दूसरे की पूरक प्रकृति का होना लाभकारी रहेगा। जैसे यदि एक वात प्रकृति का और दूसरा कफ प्रकृति का हो तो एक बोलेगा और दूसरा सुनेगा। कफ प्रकृति को थोड़ा प्रोत्साहन की आवश्यकता होती है।
बच्चों के कैरियर बनाने में भी प्रकृति की काफी भूमिका है। हमने इस पर काफी प्रयोग किए हैं और सफलता भी पाई है। वास्तविक जीवन में भी इसका प्रयोग किया है और अच्छे परिणाम पाए हैं। बच्चों की प्रकृति के अनुसार ही उसके लिए खेलों का चयन करना चाहिए। यदि हम उसकी प्रकृति के विपरीत खेल में उसे भेजेंगे, तो वह संभव है कि मेहनत करके कुछ कर ले परंतु, बहुत आगे नहीं बढ़ पाएगा। उदाहरण के लिए दौड़ प्रतियोगिता है। वात प्रकृति के बच्चे के लिए छोटी दूरी की दौड़ तो ठीक रहेगी, परंतु मैराथन दौड़ नहीं। वात की प्रकृति के कारण बच्चा प्रारंभ तो तेजी से करेगा, परंतु उसकी ऊर्जा जल्दी ही समाप्त भी हो जाएगी। मैराथन की दौड़ के लिए तो कफ प्रकृत्ति का बच्चा ठीक रहेगा। पित्त प्रकृति के बच्चे अभ्यास करने में भी प्रतियोगिता करने लगते हैं और जीतने पर काफी जोर देते हैं। उन पर थोड़ा नियंत्राण करना होता है।
इसीप्रकार शिक्षा के मामले में बच्चों की प्रकृति का ज्ञान होना लाभकारी है। हम देखते हैं कि कुछ बच्चे पढ़ाए जाने पर तुरंत ही समझ जाते हैं, कुछ थोड़ा उदाहरण आदि दिए जाने पर समझते हैं, कुछ को तर्क देकर समझाना पड़ता है। यह उनकी प्रकृति से सीधे-सीधे संबंधित है। वात प्रकृति वाला बच्चा सबसे अधिक तेजी से विषय को ग्रहण करता है, लेकिन वह भूलता भी उतनी ही तेजी से है। इसलिए उसके लिए दोहराना काफी महत्वपूर्ण है। कफ प्रकृति का बच्चा हो सकता है कक्षा में कुछ भी नहीं समझा हो, परंतु जब वह एक बार समझ लेगा, तो उसे दोहराने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। उन्हें थोड़ा विस्तार से और उदाहरणों के साथ विषय समझाना चाहिए। पित्त प्रकृति के बच्चे को तर्क से समझाना होता है।
पढ़ाई के बाद कैरियर के चुनाव में भी प्रकृति का काफी उपयोग हो सकता है। वात प्रकृति के लोगों को हम आइडिया जेनेरेटिंग मशीन कहते हैं यानी उनके पास हमेशा 2-4 आइडिया रहता ही है, लेकिन वे उस पर काम-वाम नहीं करते। इसलिए उनके विचार बेकार चले जाते हैं। अब जहां हमें आइडिया ही चाहिए, काम करने वाले लोग दूसरे हैं, उसके लिए ऐसे लोग चुने जा सकते हैं। इस प्रकार के लोग अच्छे कंसल्टेंट हो सकते हैं। जहां हमें बैठ कर काम करवाना हो, वहां कफ प्रकृति का व्यक्ति होना चाहिए। जहां बैठना भी हो और निर्णय भी लेना हो, वहां पित्त-कफ या फिर कफ-पित्त प्रकृति का व्यक्ति हो तो अच्छा रहेगा।
यह तो नियोक्ता की दृष्टि से हमने विचार किया। अब यदि हम व्यक्ति की दृष्टि से विचार करें तो व्यक्ति को अपने कार्य और शेष जीवन में संतुलन बैठाने की भी आवश्यकता पड़ेगी। यदि कफ प्रकृति का व्यक्ति कार्यालय में बैठ कर काम कर रहा है, तो उसे घर पर अपने लिए इससे अलग जीवनचर्या बनानी होगी। अन्यथा वह शीघ्र ही बीमार पड़ेगा और उसकी कार्यक्षमता प्रभावित होने लगेगी। तात्पर्य यह है कि यदि वह अपनी प्रकृति के अनुकूल व्यवसाय या नौकरी चुनता है तो वह अच्छा प्रदर्शन करेगा लेकिन फिर उसे स्वस्थ रहने के लिए अपनी शेष समय में अपनी प्रकृति के विपरीत जीवनचर्या अपनानी होगी।
यही कारण है कि आज के समय में एक नया विचार आया है वर्क-लाइफ बैलेंस यानी कि व्यावसायिक जीवन संतुलन। आज के प्रबंधन में यह काफी प्रचलित शब्द है। देखा जाता है कि व्यक्ति अपने काम में तो काफी सफल है, पंरतु सामाजिक और पारिवारिक जीवन में वह पूरी तरह शून्य है। आज की जो नई पीढ़ी है, वह कैरियर में तो काफी सफल है परंतु उनके परिवार सफल नहीं हो रहे हैं। उनका वैवाहिक जीवन झगड़ों से भरा है, तलाक हो रहे हैं। इसका कारण यही है।
वात प्रकृति का व्यक्ति यदि सेल्स का काम कर रहा हो तो वह सफल हो जाएगा, परंतु उसे अपने शेष समय में आराम करना चाहिए। यदि वह काम के अलावा भी भागदौड़ का काम करता रहेगा तो वात की विकृति हो जाएगी। इसके लिए उसे अपने आहार-विहार का ध्यान रखना होगा। जैसे वह ताजा और गरम खाना खाए, स्निग्ध पदार्थों का सेवन करे, पर्याप्त आराम करे, तो वह अपनी प्रकृति का सर्वाेत्तम गुणों का लाभ उठा पाएगा।
प्रकृति को जानने की सही आयु लगभग 11-12 साल है जब बच्चा थोड़ा समझदार हो जाता है। प्रकृति की जानकारी के लिए जो समाज में जागरूकता चाहिए, उसके लिए विशेष प्रयास किए जाने की आवश्यकता है। समस्या यह है कि आज के आयुर्वेद के चिकित्सक भी प्रकृति की महत्ता को नहीं समझते हैं। उन्होंने आयुर्वेद को भी एलोपैथ के ढर्रे पर चला रखा है। आयुर्वेद के अपने सिद्धांत हैं और उन पर काम किए जाने की आवश्यकता है। जब मैं स्नातक कर रहा था, तब आयुर्वेद के सिद्धांतो को पढ़ना काफी अरूचिकर हुआ करता था। इनका प्रायोगिक पक्ष तो पढ़ने में रूचिकर लगता था, परंतु मूल सिद्धांतों को पढ़ने से छात्रा कतराते थे या उन पर कम ध्यान देते थे। इसलिए आज शैक्षणिक पाठ्यक्रम में भी थोड़ा बदलाव लाने की आवश्यकता है कि उन सिद्धांतों को प्रयोगों के साथ जोड़ कर पढ़ाया जाए।

आयुर्वेदिक अभिभावकत्व
आज बालकों की देखभाल एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है। संयुक्त परिवार तो रहे नहीं, एकल परिवार को बच्चों के लालन-पालन में समस्या आती है तो वे इसकी कार्यशालाओं में जाते हैं। हम भी प्रयास कर रहे हैं कि लोगों को लालन-पालन के आयुर्वेदिक तरीके सिखाए जाएं। इसके लिए हमें कुछ वर्ष पहले एक घटना से प्रेरणा मिली थी। उस समय हमें मुंबई से एक जैन परिवार ने पत्रा लिखा था कि वे अपने बच्चे को आयुर्वेदिक तरीके से लालन-पालन करना चाहते हैं। इसके लिए वे चाहते थे कि वहां ऐसे युवा गृहस्थों के समूह में इस विषय पर कुछ बताएं। उस समय हमने यह प्रयोग किया था।

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