धरोहर के संरक्षण का संकल्प

उन्नीसवीं शताब्दी में अंग्रेजों के भारत पर कब्जा करने से पहले भारत में केवल भारतीय सामाजिक चिंतन तथा आर्थिक विकास की नीतियों का ही पालन किया जाता था तब दुनिया भर के व्यापार में भारत की हिस्सेदारी 35 प्रतिशत थी किन्तु आज कहीं एक और दो प्रतिशत के बीच झूलती है। जमीन वही है, पर्वत, नदियां, जलवायु, खनिज, खेत-खलिहान, प्रतिभाएं सब कुछ वही हैं। फिर ऐसा क्या हो गया, जिसके कारण भारतीय जीवन मूल्य बदल गए। आर्थिक वृद्धि में गिरावट आ गई। ये यक्ष प्रश्न हमारे सामने खड़े है। हम किसी की आलोचना समालोचना पर ध्यान केन्द्रित नहीं कर रहे हैं अपितु पुन: भारत कैसे प्राचीन गौरव प्राप्त कर सके, इसका समाधान खोजने की प्रक्रिया में है।
भारतीय धरोहर संस्थान पिछले बारह वर्षों से देशभर के प्राचीन ज्ञान-विज्ञान के विद्वानों के साथ विमर्श करके भारत के सात्विक उत्थान का मार्ग खोज रहा है। गत बारह वर्षों के कार्य का लेखा-जोखा करने के लिए भारतीय धरोहर मंथन कार्यक्रम 17-18 दिसम्बर को चांदीवाला एस्टेट कालका जी में हुआ। देश भर से आए हुए राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य एवं विद्वान इसमें सहभागी बने। सर्वसम्मति से भारतीय धरोहर के प्रयासों को तीव्र गति से बढ़ाने का संकल्प किया गया।
विशेष रूप से भारतीय धरोहर द्विमासिक पत्रिका को अधिक से अधिक पाठकों तक पहुंचाने की बात की गई। मंथन में भाग ले रहे सभी विद्वानों के द्वारा देश भर के विश्वविद्यालय, महाविद्यालयों के जहां-जहां केन्द्र है वहां पाठक मंडलों को बनाने का संकल्प लिया गया ताकि भारतीय ज्ञान-विज्ञान की शोध परक जानकारी लोगों को मिल सके। तभी देश के जागरुक लोगों की इस दिशा में सक्रिय भूमिका हो सकेगी और अपनी परम्पराओं, संस्कृति विज्ञान का वैज्ञानिक एवं प्रामाणिक स्वरुप सबके सामने आ सकेगा। वनवासी क्षेत्रों में बहुत सारा विज्ञान आज भी संरक्षित है उस पर काम करने की आवश्यकता है। आज भी हमारे खान-पान को ग्रामीण क्षेत्रों में अपनाते हंै। इसका उनको पर्याप्त लाभ होता है। पर आधुनिकता का अन्धा अनुकरण हमारे आहार-विहार जो कि हमारे स्वस्थ जीवन की गारन्टी है, को अपनाने नहीं देता। इस दिशा में पत्रिका, गोष्ठियों और कार्यशालाओं के माध्यम से तेजी से बढऩे की आवश्यकता है ताकि सारे देशवासियों को स्वस्थ एवं सुखी बनाया जा सके।
एक महत्वपूर्ण संकल्प इस ”मंथनÓÓ में लिया गया जो अभियान के रुप में कदाचित पहले नहीं लिया गया। हमारे शरीर की अपनी प्रकृति होती है जिसकी जानकारी प्रत्येक व्यक्ति को होनी चाहिए। हमें हमारे ब्लडगु्रप तथा ज्योतिष राशि का ज्ञान होता है। उसका यथा योग्य लाभ भी मिलता है। पर यदि प्रकृति का ज्ञान हो जाए तो स्वस्थ जीवन पारिवारिक-सामाजिक समन्वय बनाने तथा अपने कार्य का चुनाव जिसमें सफलता मिलने की सम्भावना बढ़ जाती है। देश के सभी लोगों को अपनी प्रकृति को जानने की आवश्यकता अनुभव हो और प्रकृति का परीक्षण करने वाले विशेषज्ञ तैयार हों, इसके लिए एक देशव्यापी अभियान चलाने की योजना बनाई गई।
भारत की ज्ञान धरोहरों के संरक्षण के इस महा अभियान में सभी मित्रों का सहयोग वांछित है। सभी तन-मन-धन से जुटें तो भारत फिर से विश्वगुरू के रूप में स्थापित हो सकता है, इसमें लेशमात्र भी संशय नहीं है।