देश का स्वास्थ्य सुधारने के लिए जरूरी है अपनी प्रकृति का ज्ञान

आयुर्वेद के अनुसार यदि व्यक्ति अपने खान-पान और रहन सहन को अपनी प्रकृति के अनुसार रखे तो उसके बीमार पडऩे की संभावना बहुत कम हो जाती है। हमारा मानना है कि अब समय आ गया है कि आयुर्वेद जगत जिसका मानना है कि आयुर्वेद न केवल एक चिकित्सा प्रणाली है बल्कि जीवन जीने का विज्ञान भी है, और सरकार प्रत्येक नागरिक को उसकी प्रकृति बताने का अभियान आरम्भ करें ………

आजादी के बाद से ही स्वास्थ्य और शिक्षा देश की सरकारों का मुख्य मुद्दा रहा है। देश के जन-जन को स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध हों, सरकार इसके लिए जीतोड़ कोशिश करती नजर आती है। गांव-गांव में चिकित्सा केंद्र खोले गए हैं और आज भी खोले जा रहे हैं। दवाएं नि:शुल्क उपलब्ध कराई जा रही हैं। हजारों करोड़ का बजट आबंटित किया जा रहा है। इसी वर्ष केवल स्वास्थ्य मंत्रालय का बजट 23 हजार करोड़ से कुछ अधिक का ही है। इन सबके बावजूद देश स्वस्थ हो रहा हो, ऐसा दिखता नहीं है। मलेरिया और डायरिया जैसी पुरानी बीमारियां तो अपने जलवे दिखा ही रही हैं, अनेक ऐसी बीमारियां सामने आ रही हैं, जिनका कि पहले किसी ने नाम तक भी नहीं सुना था। लोग सोच भी नहीं सकते थे कि मोटापा भी कभी बीमारी बन जाएगा। पीलिया हेपेटाइटिस (बी और सी) बनने के बाद कहीं अधिक भयावह हो गया है तो तनाव और अवसाद भी बीमारी बन चुके हैं। एलर्जी और पाचन-तंत्र की कमजोरी से तो संभवत: लगभग हर कोई आज पीडि़त है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर ऐसा हो क्यों रहा है? क्यों आज स्वस्थ खान-पान रखने वाला व्यक्ति भी उतना ही बीमार है जितना कि एक कुपोषित व्यक्ति? समस्या कहां है?
गत 03 से 05 जुलाई को नई दिल्ली में हुई एक मंथन कार्यशाला में इस सवाल का उत्तर मिलता है। भारतीय धरोहर द्वारा आयोजित इस कार्यशाला का विषय था अपनी प्रकृति को अवश्य जानें। इस विषय में ही न केवल उपरोक्त सवालों का उत्तर छिपा है बल्कि इसमें ही देश की स्वास्थ्य समस्या का भी समाधान छिपा है। प्रकृति का अर्थ होता है स्वभाव या बनावट। आयुर्वेद के अनुसार जन्म लेते ही हरेक व्यक्ति की एक प्रकृति तय हो जाती है। उस प्रकृति के अनुसार ही उसके शारीरिक और मानसिक रचना और अन्यान्य स्वभाव व आदतें निर्धारित होती हैं। उसका मोटा या दुबला होना, पढऩे में तेज या कमजोर होना, चंचल या स्थिर होना, यहां तक कि उसे कौन-सी और किस प्रकार की बीमारियां होंगी या हो सकती हैं, भी उसकी इस प्रकृति पर ही निर्भर करता है। अक्सर हम पाते हैं कि कोई व्यक्ति गर्मी के मौसम में भी आइसक्रीम खा ले तो उसे जुकाम हो जाता है और कोई जाड़े में भी आइसक्रीम खाता रहता है, पर उसे कुछ नहीं होता। ऐसा होता है उनकी प्रकृति के कारण।
आयुर्वेद, जो न केवल एक चिकित्सा प्रणाली है बल्कि जीवन जीने का विज्ञान भी है, कहता है प्रत्येक व्यक्ति को अपनी प्रकृति का ज्ञान अवश्य होना चाहिए। यदि उसे अपनी प्रकृति का ज्ञान हो तो वह अपना खान-पान और रहन-सहन उसके अनुसार रखे तो उसके बीमार पडऩे की संभावना बहुत कम हो जाती है ……… हमारा मानना है कि अब समय आ गया है कि सरकार और आयुर्वेद जगत प्रत्येक नागरिक को उसकी प्रकृति बताने का अभियान आरम्भ करें। आयुर्वेद की इस शिक्षा को जन-जन तक पहुंचाने के अभियान की एक शुरूआत थी यह कार्यशाला। इस कार्यशाला में देश भर से 50 से अधिक विद्वान, अनुभवी और सुशिक्षित वैद्यों ने सहभागिता की। साथ ही बड़ी संख्या में नवस्नातक वैद्य भी इस कार्यशाला में पूरे उत्साह से भाग ले रहे थे। तीन दिन तक चली इस कार्यशाला में प्रकृति को जानने के महत्व से लेकर उसे जाना कैसे जाए और प्रकृति-परीक्षण से देश के जन-स्वास्थ्य के संरक्षण और आयुर्वेद की स्थापना के साथ-साथ आयुर्वेदाचार्य वैद्यों की जीविका के संरक्षण जैसे विस्तृत विषयों पर गहन चिंतन, मनन और मंथन किया गया।
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) की तर्ज पर बनाए जा रहे अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान के निदेशक डा. अभिमन्यु कुमार ने प्रकृति की महत्ता को स्पष्ट करते हुए बताया कि भारत में तो अभी इसके प्रति अधिक जागरूकता नहीं आई है, परंतु विदेशों में इसके प्रति काफी उत्सुकता है। वहां लोग अपनी प्रकृति जानने और उसके अनुसार अपने पूरे जीवन की रचना का नियोजन करने में काफी रूचि ले रहे हैं। उन्होंने अपने ऐसे कई अनुभव बताए जिनमें प्रकृति के ज्ञान से अनेक लाइलाज बीमारियों के इलाज किए जाने में अमेरिका के कई प्रमुख चिकित्सा संस्थान न केवल रूचि ले रहे हैं बल्कि वे इस पर प्रयोग भी कर रहे हैं। उनकी यह बात खासतौर पर महत्वपूर्ण थी कि प्रकृति के अनुकूल न होने पर दवाइयां भी असर नहीं करती हैं और इसलिए प्रकृति को पहचान कर यदि दवाएं दी जाएं तो रोगी शीघ्र स्वस्थ होगा। डा. कुमार ने कहा कि वे प्रकृति के विषय पर लंबे समय से शोध कर रहे हैं और अपने कैरियर की जिस ऊंचाई पर वे आज हैं, इसका श्रेय भी प्रकृति पर किए उनके शोध कार्य को ही है। उन्होंने बताया प्रकृति पर उनके शोध का लाभ लेने के लिए यूरोप और अमेरिका से उन्हें करोड़ों रूपये वार्षिक के पैकेज का प्रस्ताव मिल रहा है, परंतु वे अभी देश को ही अपनी सेवाएं देना चाहते हैं। उनका स्पष्ट कहना था कि यह विषय जनता के स्वास्थ्य से जुड़ा तो है ही आयुर्वेदाचार्यों के कैरियर से भी जुड़ा है।
कार्यशाला में आए लगभग सभी वैद्य इस बात पर एकमत थे कि आयुर्वेद के अनुसार चिकित्सा की पहली सीढ़ी ही प्रकृति परीक्षण है। जिस प्रकार आज एलोपैथिक चिकित्सक इलाज से पहले कई प्रकार के परीक्षण करते हैं उसी प्रकार आयुर्वेद भी इलाज से पहले रोगी का प्रकृति परीक्षण करने की सलाह देता है। इसमें अंतर केवल इतना है कि एलोपैथिक परीक्षण केवल रोग तक सीमित होते हैं और इस कारण तात्कालिक होते हैं, वहीं आयुर्वेद का प्रकृति परीक्षण व्यक्ति के पूरे जीवन काम आता है। रोग का इलाज करने से साथ-साथ इसके आधार पर वह अपने पूरे जीवन की योजना बना सकता है। इस बात को स्पष्ट करते हुए आयुर्वेद विश्वविद्यालय, जामनगर, गुजरात के डा. महेश व्यास ने कहा कि आयुर्वेद का स्वास्थ्य के प्रति दृष्टिकोण अन्य सभी चिकित्सा पद्धतियों से बिल्कुल अलग है। आयुर्वेद शारीरिक, मानसिक, मनोवैज्ञानिक, आध्यात्मिक आदि सभी स्तरों पर स्वास्थ्य सुनिश्चित करने पर जोर देता है। इसे प्राप्त करने के लिए आयुर्वेद के पास इसके अपने अनोखे और मौलिक सिद्धांत और पद्धति है जिसमें त्रिसूत्र, दिनचर्या, ऋतुचर्या, रसायन, प्रकृति आदि शामिल हैं।
डा. व्यास ने कहा कि गर्भ में शिशु का विकास होते समय ही उसके वात-पित्त-कफ रूपी दोषों का समन्वय तय हो जाता है और तदनुसार उसकी प्रकृति सुनिश्चित हो जाती है जो उसकी मृत्यु तक उसके साथ रहती है। यह प्रकृति उसकी आंतरिक और बाह्य शारीरिक संरचना, मानसिकता आदि का निर्धारण करती है। यही उसका मूल स्वभाव होती है। इसे बदलना संभव नहीं होता। लगभग सभी विद्वानों ने इस पर सहमति जताई कि प्रकृति बदलती नहीं है।
आयुर्वेद के अनुसार मनुष्य की प्रकृति को दो भागों में बांटा जा सकता है – देह प्रकृति (शारीरिक) और मानस प्रकृति (मानसिक)। देह प्रकृति वात, पित्त और कफ से निर्धारित होती है तो मानस प्रकृति सत्व, रज और तम से। आयुर्वेद और यूनानी तिब्बिया कॉलेज, नई दिल्ली की डा. निशि अरोड़ा ने अपने प्रस्तुतिकरण में बताया कि आयुर्वेद में मनुष्य की तीन प्रकार की प्रकृतियों का वर्णन पाया जाता है। ये तीन प्रकृतियां हैं सात्विक, राजसिक और तामसिक और ये तीनों प्रकृतियां मनुष्य के मन से संबंध रखती हैं। डा. अरोड़ा का कहना था कि मानस प्रकृति के ज्ञान से व्यक्ति अपना कैरियर निर्धारण बेहतर तरीके से कर सकता है और इससे वह तनाव, अवसाद आदि मानसिक व्याधियों से भी बच सकता है।
डा. अरोड़ा ने भगवद् गीता और आयुर्वेद का समन्वय करते हुए कहा कि मनुष्य में सत्व गुण के बढऩे से ही स्वास्थ्य अच्छा होता है। रजस् और तमस् गुणों का आधिक्य विविध प्रकार के रोगों को बढ़ाता है। प्रकृति परीक्षण द्वारा यदि हम अपनी मानसिक प्रकृति को जान लें तो सत्व गुण को बढ़ाने के विशेष उपाय किए जा सकते हैं और फिर बीमारियों से भी बचा जा सकता है। इसमें योग की विशेष भूमिका होती है। उन्होंने कहा कि मानस प्रकृति पूर्वजन्म के कर्मों से तय होती है।
सवाल उठता है कि यदि प्रकृति का मनुष्य के स्वास्थ्य से इतना गहरा संबंध है तो आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के परीक्षण में उसका पता क्यों नहीं चलता? या फिर इसे ऐसे कहें कि क्या वात, पित्त और कफ के प्रभाव को आधुनिक परीक्षणों द्वारा भी समझना संभव है? हालांकि आयुर्वेद का अपना विज्ञान है और इसकी तुलना में आधुनिक विज्ञान काफी नया है परंतु इसे आधुनिक विज्ञान द्वारा भी समझा जाए, इसके लिए प्रसिद्ध आयुर्वेदाचार्य डा. भावना पाराशर ने आयुर्जिनोमिक्स का एक पूरा नया विभाग ही खड़ा कर दिया है। आयुर्वेद की एक विलक्षण मेधा और साथ ही आधुनिक विज्ञान में भी उतनी ही गति रखने वाली डा. भावना पाराशर ने वात, पित्त, कफ के जेनेटिक व मॉलिक्यूलर संबंधों को तलाशने की कोशिश की और उन्हें यह देख कर काफी संतुष्टि का अनुभव हुआ कि आयुर्वेद का विज्ञान आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की कसौटी पर भी उतना ही खरा है।
डा. भावना पाराशर ने अपने शोधकार्य की जानकारी देते हुए बताया कि आधुनिक चिकित्सा विज्ञान भी अब इतना तो जान ही गया है कि एक ही दवा हरेक व्यक्ति पर एक जैसा काम नहीं करती। इसलिए आज दुनिया में पर्सनलाइज्ड दवाओं यानी व्यक्ति के अनुरूप दवा की मांग और चलन बढऩे लगा है। आखिर क्यों एक दवा किसी पर काम करती है और किसी पर नहीं करती? इसका कारण व्यक्ति की प्रकृति हो सकती है। उन्होंने बताया कि प्रकृति के भेद को आधुनिक भाषा में कोशिका के अवकलन की प्राथमिक प्रक्रिया द्वारा समझाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि आयुर्जिनोमिक्स की सहायता से न केवल व्यक्ति के लिए सर्वाधिक उपयुक्त दवाएं बनाई जा सकती हैं, बल्कि संभावित रोगों का निराकरण भी किया जा सकता है।
डा. भावना ने कहा कि देखा जाए तो स्थानीय खान-पान की विविधता को भी इस प्रकृति से समझा जा सकता है। स्थान विशेष के प्रभाव के कारण लोगों की प्रकृति निर्धारित होती है और उस स्थान पर उस प्रकृति के अनुकूल भोज्य पदार्थ भी होते हैं। जैसे भारत के समुद्रीय तट पर लोग कोकम का काफी प्रयोग करते हैं। कोकम से समुद्रीय जलवायु के प्रभाव का काफी हद तक निराकरण होता है।
इस प्रकार यह समझा जा सकता है कि आयुर्वेद का प्रकृति परीक्षण कोई नीम हकीम वाली चीज नहीं है। यह एक पूरी तरह वैज्ञानिक प्रक्रिया है और आधुनिक विज्ञान के परीक्षणों द्वारा भी इसे समझा जा सकता है। सवाल उठता है कि इस प्रकृति को जानने के मापदंड क्या-क्या हैं? क्या आयुर्वेद में ऐसा कोई मानक दिया गया है जिससे लोगों की प्रकृति को जांचा जा सके? यदि हां तो आज के वैद्य प्रकृति परीक्षण क्यों नहीं करते? क्या प्राचीन काल में चरक आदि आयुर्वेदप्रणेताओं द्वारा विकसित मापदंडों का आज के हिसाब से मानकीकरण किया गया है? इस सवालों पर कार्यशाला पर गहन मंथन किया गया। प्रसिद्ध प्रकृति विशेषज्ञा और आयुर्वेदाचार्या डा. सुरेंद्र कटोच ने इस विषय पर प्रकाश डालते हुए बताया कि उन्होंने विभिन्न आयुर्वेद विश्वविद्यालयों के साथ मिल कर प्रकृति परीक्षण के मापदंडों पर गहन शोध किया है।
डा. कटोच ने बताया कि प्रकृति परीक्षण का उद्देश्य है शरीर को प्रसन्नता प्रदान करना। प्रकृति परीक्षण के तीन स्तर होते हैं। पहला स्तर है शार्ङधर संहिता का। शार्ङधर संहिता में एक प्रश्नावली दी गई है उसके आधार पर प्रकृति की प्रारंभिक पहचान की जा सकती है। दूसरे स्तर पर इससे अधिक गहन जांच के लिए उन्होंने शारीरिक परीक्षण का एक प्रपत्र तैयार किया है जिसे भरने में हो-तीन घंटे लगाने पड़ते हैं। उस प्रपत्र को भरने से पहले उसके शब्दावली को समझना आवश्यक होता है जिससे सही जानकारी भरी जा सके। तीसरे स्तर में व्यक्ति का शारीरिक और मानसिक प्रकृति का परीक्षण किया जाता है और इसमें दो से तीन दिन लगते हैं। डा. कटोच का कहना था कि अनेक आयुर्वेदिक शब्दों के सामान्य अर्थ से काम नहीं चलता, उन्हें परिभाषित करके समझाना पड़ता है। उदाहरण के लिए कृश शब्द का सामान्य अर्थ दुबला होता है परंतु कई बात मांसल व्यक्ति भी कृश की श्रेणी में आ सकते हैं। इसके लिए नसों की स्थिति आदि भी देखनी चाहिए। जन्म के समय की स्थिति भी इसमें महत्व रखती है। जन्म के समय शिशु यदि कृश रहा हो तो बाद में मांसल होने पर भी कृशता के अन्य लक्षणों दिख सकते हैं और उसे कृश ही माना जाना चाहिए।
इस प्रकार डा. कटोच ने प्रकृति परीक्षण का पूरा प्रपत्र तैयार करके उसका परीक्षण भी किया। परीक्षण के लिए तीन अलग अलग वैद्यों से एक ही व्यक्ति का प्रकृति परीक्षण करवाया गया। व्यक्ति और प्रपत्र समान होने के कारण वैद्य अलग होने पर भी परिणाम समान आने चाहिए थे। प्रारंभ में ऐसा नहीं हो पा रहा था। अलग-अलग वैद्य शब्दों के अलग-अलग अर्थ करते थे, इससे परिणाम बदल जाया करते थे। इसलिए काफी परिश्रमपूर्वक ऐसे सभी शब्दों को चिह्नित करके पारिभाषित किया गया और वैद्यों को बताया गया। उसके आधार पर प्रपत्र तैयार करके उसका परीक्षण किया गया। तब परिणाम सही आए। डा. कटोच ने अपने प्रपत्र का कॉपीराइट भी करवा रखा है।
डा. कटोच का अनुभव है कि प्रकृति के परीक्षण से न केवल लोगों की सेवा की जा सकती है, बल्कि इसमें अच्छा कैरियर भी बनाया जा सकता है। रोगों का निदान या इलाज करने से कहीं अच्छा और प्रभावकारी कार्य प्रकृति का परीक्षण करना है। उन्होंने बताया कि उनका अपना अनुभव है कि इससे लोगों को न केवल उनके स्वास्थ्य संबंधी सलाह दी जा सकती है, बल्कि इसके द्वारा उनके जीवन के नौकरी, विवाह, व्यवसाय आदि विविध आयामों पर भी मार्गदर्शन किया जा सकता है। उन्होंने एक उदाहरण देते हुए बताया कि एक घरेलू महिला कुछ काम करके अपने पति की सहायता करना चाहती थी परंतु वह काफी कम पढ़ी-लिखी थी। उसका प्रकृति परीक्षण करते हुए पता चला कि उसकी रूचि खाना बनाने में है और वह काफी अच्छा खाना बनाती भी है। डा. कटोच ने उसे टिफिन सेवा चलाने की सलाह दी। उसने टिफिन सेवा शुरू किया और आज वह काफी व्यस्त रहने लगी है। इस प्रकार देखा जाए तो प्रकृति परीक्षण केवल स्वास्थ्य के लिए ही नहीं बल्कि जीवन में सफलता पाने के लिए भी काफी सहायक हो सकता है। इसके माध्यम से छात्रों की कैरियर काउंसलिंग भी की जा सकती है। उन्हें उनकी प्रकृति, स्वभाव और रूचि के अनुसार क्षेत्रों का विकल्प सुझाया जा सकता है। इससे वे बेहतर परिणाम दे पाएंगे और सफल हो सकेंगे।
प्रकृति परीक्षण में सबसे बड़ी समस्या मानक प्रक्रिय की ही है। डा. सुरेंद्र कटोच ने एक प्रक्रिया विकसित की है। इसी प्रकार भारत सरकार के सीसीआरएएस विभाग की उपनिदेशक डा. भारती भी एक टीम बनाकर प्रयास कर रही हैं। चूंकि यह प्रयास सरकारी विभाग द्वारा किया जा रहा है, इसलिए इसमें देश के सभी प्रमुख आयुर्वेद संस्थानों को भी सहभागी बनाया गया है। आयुर्वेद में बताए गए प्रकृति के प्रकारों का वर्णन करते हुए डा. भारती ने बताया कि प्रकृति परीक्षण करने के कई सारे मापदंड स्पष्ट नहीं हैं। अनेक शब्दों की परिभाषा उपलब्ध नहीं है। शास्त्रों में जो तरीके बताए गए हैं, उन्हें आज की भाषा में समझना और परिभाषित करना आवश्यक है। साथ ही उनको मापने के तरीके ढूंढने होंगे। डा. भारती ने बताया कि इस पर गंभीर कार्य किया जा रहा है और शीघ्र ही प्रकृति परीक्षण का एक मानक तैयार करके देश को सौंप दिया जाएगा।
इस कार्यशाला का समापन करते हुए आयुष विभाग, भारत सरकार के सलाहकार डा. डी. सी कटोच ने कहा कि प्रकृति के ज्ञान के बल पर बिना दवाओं के भी लोगों की चिकित्सा की जा सकती है। वैसे भी आयुर्वेद में औषध की भूमिका केवल 25 प्रतिशत ही है। इसलिए प्रकृति का परीक्षण महत्वपूर्ण है। उन्होंने आयुर्वेद की वैश्विक भूमिका की चर्चा करते हुए कहा कि आज पूरी दुनिया भारत की ओर देख रही है। योग और आयुर्वेद से बहुत आशाएं जुड़ी हुई हैं। आज वैज्ञानिक भी इसकी ओर देख रहे हैं। इसलिए यह हमारा दायित्व है कि हम इसे समझें और इसके लिए कार्य करें।
चौधरी ब्रह्मप्रकाश चरक संस्थान के निदेशक डा चंदोला ने भी इस बात पर जोर दिया और एक अनुभव साझा करते हुए बताया कि मधुमेह के रोगियों पर किए गए एक प्रयोग में पाया गया था कि कफ प्रकृति के लोगों में यह कम प्रभावी होता है जबकि वात प्रकृति के लोगों में शुरूआत से ही रक्त में शर्करा की मात्रा काफी अधिक हुआ करती थी और पित्त प्रकृति के लोगों में तनाव के कारण मधुमेह काफी बढ़ जाता था। इस परीक्षण से यह साबित हुआ था कि एक ही बीमारी मधुमेह होने पर भी सभी मरीजों का इलाज एक ही प्रकार से नहीं किया जा सकता। लोगों की प्रकृति के अनुसार ही उसका इलाज भी करना होगा। यह बात अन्य रोगों के बारे में भी सच है।
इस पूरी कार्यशाला से एक बात साफ हो गई कि यदि लोगों को स्वस्थ रखना हो तो दवाओं और अस्पतालों के कहीं अधिक आवश्यक है उनकी प्रकृति का ज्ञान। उन्हें अपनी प्रकृति के बारे में जागरूक बनाना, उनकी प्रकृति के अनुकूल आहार-विहार की उन्हें जानकारी देना और उसके पालन के लिए उन्हें प्रेरित करना। कहा जा सकता है कि यदि इसे प्रारंभ से यानी कि बाल्यावस्था से ही लागू किया जाए तो संभवत: देश की स्वास्थ्य समस्या 70-80 प्रतिशत तक दूर की जा सकती है। इसके लिए न केवल बालकों के प्रकृति परीक्षण की व्यवस्था की जानी चाहिए, बल्कि विद्यालयों में इसे पढ़ाया भी जाना चाहिए ताकि प्रारंभ से ही लोगों को इसका अभ्यास हो जाए। प्रकृति परीक्षण न केवल देश का स्वास्थ्य ठीक करेगी, बल्कि देश का स्वास्थ्य बजट भी कम कर देगी।