दर्पण का जादू लाएगा खुशहाली

Mirorडॉ. ज्योति वर्धन साहनी
लेखक प्रख्यात ज्योतिषाचार्य हैं।
दर्पण एक ऐसा प्रतिबिम्ब है जो यदि किसी वास्तु विशेषज्ञ की सलाह लेकर भवन में सही जगह लगाया जाये तो वास्तु, सम्बन्धी बाहरी दुष्प्रभावों को रिक्लेर करने की अर्थात वापस भेेजने की क्षमता रखता है। कई तरह के मुख्य वास्तु दोषों को सही जगह दर्पण लगाकर समाप्त किया जा सकता है अथवा बुरे प्रभाव को काफी कम किया जा सकता है। वास्तु में तीनों प्रकार के दर्पण का उपयोग अलग -अलग दोषों के निवारण के लिए व सकारात्मक ऊर्जा के संचार के लिए किया जाता है। ये है (1) कॉनक्लेव मिरर या अवतल दर्पण। (2) कॉनवेक्स मिरर या उत्तल दर्पण (3) लुकिंग ग्लास या सामान्य दर्पण। कॉनक्लेव मिरर या अवतल दर्पण नकारात्मक ऊर्जा को नष्ट करता है व सकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न करता है। कॉनवेक्स मिरर या उत्तल दर्पण नकारात्मक ऊर्जा का वापिस लौटाता है व सकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न करता है, जबकि साधारण दर्पण प्रतिबिम्ब बनाकर दूरी को दोगुना करता है।
इतने उपयोगी दर्पण को टेड़ा मेड़ा, नुकीला, तिकोना, खंडित, विकृत, अथवा धब्बेदार कभी नहीं होना चाहिए। न ही दो दर्पणों को जोड़कर/मिलाकर लगाना चाहिए। गोल दर्पण सूर्य का प्रतिनिधित्व करता है। वर्गाकार तथा आयताकार दर्पण सर्वोत्तम रहते हैं। षटकोण या अष्टकोण दर्पण भी आवश्यकता अनुसार लगाये जा सकते हैं।
किसी भी भवन में अंदर कमरे में उत्तर दिशा मेें पूर्व की ओर व पूर्व दिशा में उत्तर अथवा ईशान दिशा की ओर साधारण दर्पण लगाना सर्वोत्तम माना जाता है क्योंकि इस क्षेत्रा को बढ़ाकर सकारात्मक ऊर्जा में परिवर्तित करने से सुख, समृद्धि व धन लाभ मिलता है। मैट्रो शहरों में फ्लैट संस्कृति होने के कारण कमरे में पूर्व या उत्तर दिशा में रोशनदान, खिड़की या दरवाजा न मिल पाने पर इन दीवारों पर दर्पण लगाने पर यह खिड़की व दरवाजे का कार्य करता है व घर में खुशहाली लाता है। लेकिन यह ध्यान रखना है कि उत्तर अथवा पूर्व की दीवार पर कमरे में दर्पण लगाने से हमारा बेड उसमें न दिखाई दें, क्योंकि बेडरूम में सोये व्यक्ति का शरीर दर्पण में दिखाई देने से निद्रा खराब होती है व बीमारियों फैलती हैं।
किसी भी भवन का ईशान कोण कटा हुआ हो तो यह भयंकर वास्तु दोष माना जाता है। किसी विद्वान वास्तुशास्त्राी से सलाह लेकर उचित आकार का वर्गाकार अथवा आयताकार दर्पण इस क्षेत्रा में लगाने से ईशान कोण का वास्तु दोष दूर किया जा सकता है। दर्पण अन्दर की दीवार पर लगाना चाहिए, कटे हुए ईशान कोण की बाहरी दीवार पर दर्पण हानि, कष्ट व विपत्ति ला सकता है। एक विशेष बात और ध्यान में रखनी चाहिए कि उत्तर पूर्व यानि ईशान में लगाने वाले दर्पण की पिछली तरफ का रंग हरा, क्रीम, सफेेद या नीला होना चाहिए, यदि पिछली तरफ की पालिश का रंग लाल अथवा पीला होगा तो धन लाभ का मार्ग अवरूद्ध हो जायेगा।
यदि आपका घर या व्यावसायिक स्थल का मुख्य द्वार दक्षिण-पश्चिम दिशा में है तो इस द्वार के बाहर की तरफ दरवाजे पर या दीवार पर उचित आकार का सामान्य दर्पण अथवा उत्तल दर्पण लगाकर इस वास्तु दोष को काफी कम किया जा सकता है। यदि आपका मुख्य द्वार पूर्व, उत्तर या ईशान दिशा में नहीं है व द्वार के सामने कोई विशेष बाधा भी है जैसे बिजली का ट्रान्सफार्मर या खंभा, बड़े तने का पेड़, श्मशान, पुलिस स्टेशन, चक्की, भट्टी, टी पाइंट इत्यादि हैं तो आप बाहरी दीवार पर ठीक बाधा के सामने गोल या आयताकार उत्तल या सामान्य दर्पण लगाकर इस विशेष वास्तु बाधा को काफी हद तक प्रभावहीन कर सकते हैं। कभी भी उत्तर, पूर्व या ईशान द्वार या खिड़की की बाहरी दीवार पर दर्पण न लगायें नहीं तो सामने से आने वाली सकारात्मक ऊर्जा भी वापिस चली जाएगी। घर में आजकल दो-तीन टायलेट/वाशरूम होने के कारण यह विशेष घ्यान रखिये कि उसमें लगने वाले दर्पण पूर्व या उत्तर की दीवार पर ही आये। किसी भी स्थिति में वाशवेसिन व दर्पण दक्षिणी या दक्षिण पश्चिम (नैऋत्य) दीवार पर न आये नही ंतो पूरे घर का वास्तु ही खराब हो जायेगा, क्योंकि तीनों वाशरूम घर के तीन अलग-अलग स्थानों पर स्थित होंगे। घर में दक्षिणी दिशा में पूर्व की ओर तथा पश्चिम दिशा में उत्तरी दीवार पर अन्दर की तरफ दर्पण लगाने से पारिवारिक सम्बन्धों में मधुरता व सफलता मिलती है साथ ही कार्य क्षेत्रा में आय बनी रहती है। भवन के केन्द्र स्थान अर्थात ब्रह्म स्थान पर फर्श पर या छत पर दर्पण कभी नहीं लगाना चाहिए। किसी भी फाइवस्टार होटल में आपको एक बड़े हाल में बीच में पिलर होने पर उसके चारों तरफ पूरे पिलर पर सामान्य दर्पण लगे अवश्य मिल जायेगें जो तांब के पिलर की रूकावट को समाप्त कर खुशनुमा माहौल बना देते है। यही तो है दर्पण का जादू।