त्याग में छिपा है भोग का सही मार्ग

भारत विश्व का सबसे प्राचीन लोकतान्त्रिक राष्ट्र है। मानव जाति का विकास सर्व प्रथम इसी धरा से आरम्भ हुआ। सभ्यता की पहली किरण इसी भूमि से निकली। वैश्विक ज्ञान-विज्ञान के आदि स्रोत वेदों का उद्भव इसी पवित्र धरा में हुआ। ऋषियों मुनियो की पुण्यभूमि भारत मानवीय संस्कृति और सभ्यता की जननी है। ज्ञान-विज्ञान के प्रत्येक क्षेत्र में भारत ऋषियों जिन्हें आज की परिभाषा में वैज्ञानिक नाम दिया गया है, ने प्राणिमात्र के कल्याणार्थ, मानवीय मूल्यों से युक्त सम्पूर्ण व्यवस्था बनाई। इन व्यवस्थाओं की वैज्ञानिकता के प्रमाण हमारे ग्रन्थों में है। मनुष्य और प्रकृति दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। दोनों का सन्तुलन रहने पर ही मानवीय हितों की रक्षा एव प्रकृति का संरक्षण होता है। प्रकृति ने अपने अंक में न केवल मानवीय कल्याण की अपितु प्राणिमात्र के कल्याण के लिए सभी तत्वों को संजोया हुआ है। प्रकृति के साथ मित्र भाव से रहने की शिक्षा हमारे ऋषियों ने दी। प्रकृति के कण-कण में देवता है। प्रत्येक तत्व में सर्वशक्तिमान परमात्मा का निवास है। यह विश्वास ही हमें प्रकृति के प्रति आदरभाव निर्माण करता है। इसी दर्शन के कारण ही सर्तभूत हितेरता: और सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया:, सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित दु:ख भाग् भवेत:।ÓÓ का भाव निर्माण हुआ। इससे ही त्यागवृत्ति का निर्माण हुआ। यही त्यागवृत्ति हमें समन्वय सिखाती है। इससे एकात्मभाव का निर्माण होता है।
भारतीय ऋषियों ने ज्ञान-विज्ञान के जो भी प्रतिमान स्थापित किये, उन सभी में प्राणिमात्र का कल्याण निहित है। सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, दर्शन, शिक्षा, भौतिक आदि सभी क्षेत्रों में उच्चतम स्तर तक चिंतन किया है। सभी स्तरों पर विचार करते समय मानवीय मूल्यों और प्रकृति संरक्षण का ध्यान रखा है। इन सब की अभिव्यक्ति के लिए एव समायोजन के लिए अध्यात्म शब्द को निष्पादित किया। इसी लिए प्रत्येक क्षेत्र का विकास अध्यात्म विकास के साथ हो तभी सम्यक् विकास सम्भव है। विज्ञान के किसी भी प्रकार के विकास के साथ अध्यात्म का समायोजन होना चाहिए, तभी मानवीय मूल्यों की रक्षा एवं प्राणिमात्र का कल्याण सम्भव है। एकांगी उन्नति विनाश का कारण होती है। पश्चिम जगत आज एकांगी भौतिक उन्नति के कारण आज त्रस्त है। उस मायाजाल से बाहर निकलने का मार्ग खोज रहा है। इसके लिए उसे भारतीय ऋषियों द्वारा स्थापित मानबिन्दुओं एवं जीवन रचना को अपनाने के लिए बाध्य होना पड़ रहा है। भारतीय ऋषियों ने समाज व्यवस्था को सुचारु संचालन के लिए त्यागवृत्ति का निर्माण किया। अर्थ प्रबधन के लिए भी अपनी अपनी आय का एक निश्चित भाग सामाजिक एव राष्ट्रीय उन्नति के लिए रखने की व्यवस्था दी। जिससे सामाजिक सन्तुलन भी रहे आदि त्यागवृत्ति भी दृढ़ हो। यह त्यागवृत्ति ही समाज और राष्ट्र के प्रति आत्मीय भाव का निर्माण करती है। यही दृष्टि सभी भारतीय अर्थ चिन्तकों की भी रही है। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में भारतीय दृष्टि रहने से ही हम समस्त प्राणियों के प्रति एकात्मभाव रख सकते है। यही मार्ग प्रकृति के साथ अपनत्व का मार्ग है। यही सुख का मार्ग है। इसी दृष्टि से ही आत्म कल्याण और जगत का हित सम्भव है।