तपस्वी इतिहासकार थे डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल

गुंजन अग्रवाल
लेखक द कोर पत्रिका के कार्यकारी संपादक हैं।


प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं कला के महान् अध्येता, ज्ञान के अक्षय भण्डार डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल इस युग की एक महान् विभूति थे। वह एक ही साथ लेखक, टीकाकार, इतिहासकार, कला-मर्मज्ञ, पुरातत्त्ववेत्ता, मुद्राशास्त्री, दार्शनिक, लिपिशास्त्री, शब्दशास्त्री, भाषाशास्त्री और अन्वेषक थे।
वैदिक-औपनिषदीय और पौराणिक साहित्य के गूढ़ तत्त्वों को सरल-सरस भाषा में सुधी समाज के समक्ष रख ज्ञानांजन प्रदान करनेवाले वासुदेवशरण अग्रवाल का जन्म 07 अगस्त, 1904 को उत्तर प्रदेश के मेरठ जनपद में स्थित खेड़ा नामक ग्राम में श्री गोपीनाथ अग्रवाल (1883-1958) के यहाँ हुआ था। लाला झब्बामल शाह जी अग्रवाल (1860-1940) वासुदेवशरण के पितामह थे। डॉ. अग्रवाल ने अपनी पुस्तक ‘गीता-नवनीत’ की भूमिका में अपनी वंश-परम्परा का विस्तृत वर्णन किया है।
वासुदेवशरण अग्रवाल का बचपन लखनऊ में व्यतीत हुआ। सन 1916-17 में प्रतापगढ़ के एक संस्कृत विद्वान् पं. जगन्नाथ से उन्होंने संस्कृत का प्रारम्भिक, किन्तु गहन अध्ययन किया। 1929 में काशी हिंदू विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर करने के पश्चात् लखनऊ विश्वविद्यालय से 1941 में डॉ. राधाकुमुद मुखर्जी के निर्देशन में ‘इण्डिया एज नोन टू पाणिनि’ विषय पर पीएच.डी. तथा 1946 में वहीं से डी. लिट्. की उपाधि प्राप्त की।
डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल के कृतित्व एवं तज्जनित यश का अमर आधार संस्कृत एवं हिंदी के अनेक ग्रन्थों का उनके द्वारा किया हुआ ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक अध्ययन तथा व्याख्या है। संस्कृत में कालिदास एवं वाणभट्ट के ग्रन्थों से लेकर पुराण एवं महाभारत तक तथा हिंदी में विद्यापति के अवह_ काव्य से लेकर जायसी के अवधी भाषा के अमर महाकाव्य ‘पद्मावत’ तक विशाल एवं बहुआयामी ग्रन्थरत्न उनके अवगाहन के विषय रहे हैं।
डॉ. अग्रवाल ‘नागरी प्रचारिणी पत्रिका’ के सम्पादक, मथुरा संग्रहालय के अध्यक्ष, लखनऊ संग्रहालय के अध्यक्ष, सेंट्रल एशियन एंटिक्विटीज म्यूजियम के सुपरिंटेंडेंट और राष्ट्रीय संग्रहालय, दिल्ली के अध्यक्ष रहे। राष्ट्रीय संग्रहालय की स्थापना में इनका महत्त्वपूर्ण योगदान रहा था। इसके अतिरिक्त उन्होंने ‘हिंदी विश्वकोश’ के ललितकला विषय के सम्पादक के रूप में अपनी सेवाएँ दीं। सन् 1951-52 में वह काशी आ गए और काशी हिंदू विश्वविद्यालय के कला एवं स्थापत्य विभाग के आचार्य एवं अध्यक्ष तथा ‘कॉलेज ऑफ इण्डोलॉजी’ (भारती महाविद्यालय) में आचार्य का पद सुशोभित किया।
डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल ने अपना अधिकांश सृजन हिंदी में करके इतिहासलेखन में एक बहुत बड़ी रिक्तता की पूर्ति की। ब्रिटिश शासनकाल में शोध-कार्य की थीसीस अंग्रेजी में ही जमा करनी पड़ती थी, इसलिए उनको पाणिनि पर अंग्रेजी में थीसिस लिखनी पड़ी, जिससे वह बेचैन थे। अपने निजी व्यय से उसका हिंदी-संस्करण पाणिनिकालीन भारतवर्ष प्रकाशित करके ही उन्हें संतोष पड़ा। पाणिनिकालीन भारतवर्ष भारतविद्या का अनुपम ग्रन्थ है। इसमें उन्होंने पाणिनि की अष्टाध्यायी के माध्यम से तत्कालीन भारत की संस्कृति एवं जीवन-दर्शन पर विशद प्रकाश डाला है।
डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल ने हिंदी में 36 एवं अंग्रेजी में 23 ग्रंथों की रचना की। उनकी प्रसिद्ध कृतियाँ हैं: मेघदूत: एक अध्ययन, हर्षचरित: एक सांस्कृतिक अध्ययन, मथुरा टेराकोटाज, पद्मावत (मूल और ‘संजीवनी’ व्याख्या), कादम्बरी: एक सांस्कृतिक अध्ययन, भारत-सावित्री (3 खण्ड), मार्कण्डेयपुराण: एक सांस्कृतिक अध्ययन, कीर्तिलता (ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक अध्ययन तथा ‘संजीवनी’ व्याख्या सहित), मथुरा-कला, गीता-नवनीत, भारतीय कला इत्यादि।
डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल ने वैदिक संस्कृति व साहित्य, धर्म-दर्शन, पुरातत्त्व, संग्रहालय, मूर्तिकला, वास्तुकला, शिल्पकला, मुद्राशास्त्र, चित्रकला, साहित्य, पुराणेतिहास, आख्यान, महाकाव्य, प्रतीकविज्ञान, भारतीय समाज, आदि अनेक विषयों पर सहस्राधिक निबन्ध लिखे। 1925 से 1966 (निधन-वर्ष) के मध्य उनके 515 प्रकाशित निबन्धों और पुस्तकों की सूची प्राप्त होती है। देहावसान के दो दशक के भीतर उनके 101 निबन्ध प्रकाशित हुए। डॉ. अग्रवाल द्वारा विभिन्न पुस्तकों के लिए लिखी गई भूमिका की संख्या भी कम नहीं है।