झारखण्डी संस्कृति देशज सौन्दर्य का आलोक

रणेन्द्र
लेखक झारखंड सरकार में खेल निदेशक हैं।
झारखण्ड की अपनी विशिष्ट संस्कृति निर्विवाद रूप से यहाँ की देशज आदिवासी संस्कृति है। दामोदर घाटी की गोद में हजारों वर्ष पूर्व पली-बढ़ी। प्रकृति पर विजय नहीं बल्कि उसकी पूजा और उसके साथ सामंजय करती सामुदायिकता एवं सामूहिकता पर आधारित, श्रम रस में रची पगी, उत्सवधर्मी संस्कृति आदिवासियत की विशेषता है। यह सत्य है कि 19वीं सदी के पूर्वार्द्ध से ही बहिरागतों की तेज लहर के कारण जनगणना की सांख्यिकी में उसकी आबादी का प्रतिशत घटते-घटते 30 प्रतिशत के आसपास रह गया है किन्तु खुदकट्टीदारी गाँवों के बसाने के समय दैनिक आवश्यकता की पूर्ति हेतु जो कारीगर जातियाँ साथ-साथ बसाई गई थीं, जिन में से अधिकतर अनुसूचित जातियों का था एवं कुछ पिछड़ी जातियाँ भी थी, उनकी भी जीवन-शैली, रहन-सहन, पूजा-पाठ, पर्व-त्योहार लगभग एक समान थे। मूल खुदकट्टीदार आदिवासी गोत्रा का सरना ही पूरे गाँव का सरना था। सबके खेतों में भरपूर फसल हो, इसके लिए पाहन उसी सरना में सरहूल के पर्व के दिन प्रतीक के तौर पर पहनाईन के संग विवाह रचाते हैं। यह उर्वरता के लिए आकाश और धरती का विवाह है। इसलिए प्रकृति के विविध रंगो के अनुरूप नाचती-गाती, दुख-सुख झेलती आदिवासियों-सदानों की एकरूप संस्कृति झारखण्ड के जंगलों में विकसित हुई। जिसे सभी ने अंगीकार किया।
प्रसिद्ध विद्वान डॉ. रामदयाल मुण्डा का भी यह मानना है कि, ’झारखण्ड संस्कृति की पहचान का आधार यहाँ की आदिवासी संस्कृति की विरासत ही है। हम यह मानकर चलते है कि यहाँ का गैर-आदिवासी भी उसके आदिवासीपन के कारण ही झारखण्डी है।’ (आदिवासी अस्तित्व और झारखण्डी अस्मिता के सवाल पृ. 29)

Cover_Jharkhandआलोकित लोक की विशिष्टताएँ
झारखण्डी देशज संस्कृति की चार मुख्य विशेषताएँ अनायास ही ध्यान आकर्षित करती हैं, यथा-
प्रकृति के साथ समभाव
सामुदायिकता में प्रबल आस्था
श्रमरस में पगा स्वभाव
स्त्राी के प्रति सहज सम्मान-समानता का भाव
प्रकृति के साथ सहज समभाव
जहाँ वैदिक धर्म अद्वैतवादी दर्शन के तहत ’सोऽहम्’ का उद्घोष करता हरेक जीव में ईश्वर के अंश की शाश्वत उपस्थिति को रेखांकित करता, एक समतावादी जीवन दृष्टि सौंपता है, तो झारखण्डी आदिवासी दर्शन भी अपने सरना या आदिधर्म के सिद्धांत और व्यवहार में अद्वैत दर्शन के साथ ताल मिलाता दिखता है। नदियों, पर्वतों आदि में चेतनता तलाशने वाले सनातन वैदिक धर्म की भांति झारखण्डी आदिवासी दर्शन भी निर्जीवों तक में ईश्वर की उपस्थिति का अहसास करता है, उन्हें पूजनीय मानता है।
गांव के निकट साल/शाल/साखू वृक्षों का पवित्रा समूह ही सरना स्थल है। वहीं सर्वोच्च देवता सिंगबोंगा या धरमेस की पूजा-अर्चना होती है। सरना स्थल के सबसे ऊँचे शाल पर ग्रामदेवता हातूबोंगकों का निवास माना जाता है। पहाड़, मरांग बुरूबोंगा हैं, महोदव-महादनिया है। नदियाँ इकिरबोंगा के रूप में आराध्या हैं आदि।
झारखण्डी जन-जीवन के सारे पर्व त्यौहार प्रकृति से जुड़े है चाहे वह सरहूल हो या करमा, फागू हो या सोहराय। आदिवासी समाज के लिए सारा जीवजगत या वनस्पति जगत अन्य-नहीं हैं बल्कि अन्यन्य है। वे अपने गोत्रा की शुरूआत किसी जीव या वनस्पति से मानते हैं और वे उनके लिए पवित्रा टोटम होते हैं।
झारखण्डी समाज की मान्यता आज भी यही है कि प्रकृति से उतना ही लिया जाए कि अगली पीढ़ी को भी विरासत में सब कुछ मिल सके। तार्किक-वैज्ञानिक सस्ट्नेबल डेवलप्मेन्ट, सतत-विकास के सिद्धान्त भी यही बात कहते हैं।

सामुदायिकता में प्रबल आस्था
झारखण्डी समाज-संस्कृति की धुरी ही सामुदायिकता है। वैसे भी कृषि आधारित जन-जीवन की अर्थव्यवस्था सामुदायिकता पर निर्भर होती है। संयुक्त परिवार के कई जोडे़ हाथ ही कृषि उत्पादन की श्रम आधारित प्रणाली को संभाल पाते हैं। झारखण्ड में रोपनी, कटनी और खलिहान तक फसल ढोने का कार्य पूरा टोला मिलकर निभाता है। सब एक-दूसरे की मदद करते है। यह प्रथा-परम्परा ’मदईत’ कहलाती है। दरअसल झारखण्डी समाजिकता ’मदईत’ और ’सहिया’ जैसे सरस परम्पराओं से ही जीवन्तता प्राप्त करती है।
झारखण्डी समाज की सामुदायिक जीवन-शैली गाँव की सामूहिक बैठकी, जिसे यहाँ ’अखड़ा’ कहा जाता है, में भी दिखती है। गाँव के बुजुर्ग अखड़ा के साप्ताहिक बैठकों में बहुमत से नहीं सर्वसम्मति से गाँव के विवादों का निपटारा करते आ रहे हैं। यह उनकी ग्राम स्वशासन की सदियों पुरानी विरासत है।
झारखण्ड के पाँचवी अनुसूची वाले इलाकों में उपर्युक्त स्वशासन की त्रिस्तरीय व्यवस्था रही है। शहरीकरण और बहिरागतों की बाढ़ ने निश्चित तौर पर उक्त त्रिस्तरीय स्वशासी प्रणाली को कमजोर किया है किन्तु मूण्डा, हो और संताल बाहुल्य ग्रामीण इलाकों में वह स्वशासी व्यवस्था अभी भी जीवन्त है।
झारखण्डी सामुदायिक जीवन-दर्शन पर डॉ रोज केरकेट्टा कुछ यूँ प्रकाश डालती हैं, ’’हमारे पूर्वज कहा करते थे कि यहाँ ही हवा, पानी और मिट्टी में ही यह गुण है कि यहाँ आते ही लोग यहाँ आते ही लोग यहाँ के हो जाते हैं। यहाँ यह सहृदयता है कि आधी रोटी हम खूद खाते, आधी मेहमान को खिलाते हैं। हमारे नृत्य संगीत को देखिए कहीं एकल राग-ताल नहीं है। सब सामूहिक, सब सामुदायिक, सभी सहयोगी, सब समान, सब में सहिष्णुता। बाकी अन्य समाजों में जाति-भेद, वर्ण-भेद जिस तरह से विद्यमान है वहा यहाँ नहीं दिखता। (स्त्राी महागाथा की महज एक पंक्ति पृ. 75)

jharkhand-cultureश्रमरम में पगा स्वभाव
झारखण्ड के देशज समाज, संस्कृति और जल-जंगल-जमीन पर आधारित जीवन-शैली ने मानव-स्वभाव को श्रमरस में पगाया है। श्रम करना सहज स्वभाव है, बिना मेहनत किए, दूसरे की मेहनत की चोरी कर भोजन करने वाला तोंदल-लेदहा व्यक्ति यहाँ ’दिकू’ माना जाता है। यह भावना ‘केवलाघो भवति केवलादि’ यानी अकेला खाने वाला पाप खाता है, के वैदिक भाव का ही एक स्वरूप है। समाज में आपका ओहदा कुछ भी हो, आप ग्राम प्रधान (मुण्डा, मांझी) हों या कई गाँवों के मुण्डाओं-मांझियों के ऊपर मानकी साहब या परगनैत हों या ग्राम पुजारी पाहन-पुजार हों, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, खेतों में हल-कुदाल चलाना, खेती-खलिहानी के काम निपटाना इनकी दिनचर्या के हिस्से हैं।

स्त्राी के प्रति सहज सम्मान-समानता का भाव
झारखण्डी समाज सहज रूप से अपनी स्त्रिायों के सम्मान और बराबरी का भाव से भरता रहा है। झारखण्डी समाज अपनी स्त्रिायों को सहज रूप से ’सयानी’ सम्बोधित करता है। यह ’सयानी’ शब्द उसके सयानेपन, उसकी बुद्धिमता, उसके मस्तिष्क के सौन्दर्य को रेखांकित करता है। झारखण्ड समाज-संस्कृति का एक रूप उसके अनवत संघर्षरत रहने, उलगुलान (क्रांति) की परम्परा-विरासत को कायम रखने का भी है। इतिहास के पन्ने गवाह हैं कि ऐसे सारे संघर्षों, उलगुलानों-क्रान्तियों में स्त्रिायों की बराबर की भागीदारी रही है। चाहे रोहतासगढ़ के किले पर हुए आक्रमण से उराँव-सŸाा को बचाने के लिए सिनगीदई और कइलीदई के नेतृत्व में हुए युद्ध और उन युद्धों में मिले तीन बार विजय की स्मृति हो या 1831-32 ईस्वी के हो-मुण्डा-उराँव विद्रोह में बाबा वीर भगत और अपने भाईयों उदयकरण, गिरिधर, हलधर के साथ शहीद होने वाली बहने रूनिया झुनिया की वीरता की दास्ताँ हो या 1855-56 ई0 के संताल हूल में सिद्धो-कानू-चाँद-भैरव के साथ बहनें फूलो और झानो के नेतृत्व में लड़े गये छापामार युद्ध के विवरण हों या धरती आबा बिरसा मुण्डा के साथ संघर्षरत उनकी दोनों पत्नियाँ, गया मुण्डा की पत्नी माकी, बेटियाँ थानी, नागी और लम्बू की बहादुरी की कहानियाँ, सबके सब केवल झारखण्डी संस्कृति में स्त्रिायों की महŸाा, बराबरी और सम्मान को ही रेखांकित करते हैं।

झारखण्ड का इतिहास: एक दृष्टि
भारतीय इतिहास की पुस्तकों से झारखण्ड’ का इतिहास और इसके जननायक प्रायः अनुपस्थित हैं। भारत इतिहास का सामान्य अर्थ इन्द्रप्रस्थ से लेकर पाटलिपुत्रा तक का इतिहास मात्रा ही है। प्राचीन काल के भारतीय इतिहास में यह क्षेत्रा मगध के अंतर्गत ही सम्मिलित माना गया है। तुर्क-मुगल काल में यह क्षेत्रा झारखण्ड के नाम से प्रख्यात हुआ। संभवतः जंगल-झाड़ की अधिकता के कारण। बुकानन के मत में काशी से लेकर बीरभूम तक सारे पहाड़ी प्रदेश को झारखंड कहते थे। दक्षिण में वैतरणी नदी इसकी सीमा थी। अकबरनामा के अनुसार छोटानागपुर खास तथा उड़ीसा के ट्रिव्युटरी स्टेट झारखंड कहलाते थे।
मुंडाओं का छोटानागपुर-प्रवेशः महाभारत युद्ध में मुंडाओं के भाग लेने का उल्लेख मिलता है। भीष्म पर्व में संजय भीष्म की सेना का वर्णन करते हुए कहता है कि इसके वाम अंग में करूषों के साथ मुंड, विकुंज, और कुडिवर्ष हैं। पाण्डवों ने मुंडों के मित्रा जरासंघ का वध किया था। अतः पाण्डवों के शत्राु कौरवों का साथ देना मुंडों के लिए स्वाभाविक था। प्राचीन मुंडारी संगीत में भी इस युद्ध का संकेत है।
असुरों का प्रभावः सूर्य के दक्षिणायन होने पर छोटानागपुर में मुंडाओं का तेजोदय हुआ। मुंडाओं एवं असुरों की प्राचीन गाथाओं से इस महत्वपूर्ण घटना का आभास मिलता है। शरत्चन्द्र राय ने मुंडा जाति का गहन अध्ययन प्रस्तुत करते हुए इस तथ्य का संकेत किया है। अनेक प्रमाणों के आधार पर उनका अनुमान है कि मुंडा जाति छोटानागपुर में पश्चिम दिशा से 600 ई. पूर्व प्रविष्ट हुई।
नागवंशियों का छोटानागपुर-प्रवेशः जनमेजय का नागयज्ञ, मध्यदेश एवं बिहार एक ऐतिहासिक दिग्दर्शन नामक ग्रंथों में प्राचीन नाग जाति के कृतित्वों का विस्तृत विवरण उपलब्ध है। वेणीराम महथा कृत नागवंशावली, घासीराम कृत नागवंशवली झूमर एवं छोटानागपुर महाराजा दृपनाथ शहदेव द्वारा बैसाख बदी 1, संवत् 1844 को भारत के तत्कालीन गवर्नर को दिए गए वंश-विवरण एवं तालिका-1 के साथ उक्त गं्रथों के संबंधित भागों के अध्ययन से छोटानागपुर के नागवंशी राजाओं के संबंध में बहुत सी महŸवपूर्ण बातें सर्वथा स्पष्ट हो जाती हैं, जिनमें प्रस्तुत संदर्भ में, निम्नलिखित विशेष बातें ध्यान देने योग्य हैं।
1. ईस्वी सन् के प्रारंभिक दिनों में इस नाग जाति ने अपनी खोई हुई शक्ति वापस पा ली थी। पूरा मध्यदेश इनके प्रभुत्व में था। विदिशा, वाकाट एवं कांतिपुरी-मिर्जापुर में इनकी राजधानियाँ थी। इन लोगों ने कुषाणों के मुलुन-मुरुण्ड, मुंडा-शासकों पर अधिकार प्राप्त किया था और कई-कई बार अश्वमेध यज्ञ किए थे। निश्चित ही इस क्रम में इनकी एक शाखा छोटानागपुर में स्थापित हुई होगी। छोटानागपुर में नागवंशी राज्य स्थापना का श्रेय फणिमुकुट राय को प्राप्त हुआ था।
वर्ष 1615 ई. में जहाँगीर ने नूरजहाँ के भाई इब्राहिम खाँ को बिहार का सूबेदार बनाया। तुजुकी जहाँगीरी में इब्राहिम खाँ के खुखरा विजय का विस्तृत विवरण है। उसके अनुसार 1616 ई. में यह आक्रमण हुआ। शंख नदी को अधिकार में ले लिया गया जहाँ हीरा मिलता था। नागवंशी राजा दुर्जन साल गिरफ्तार हुए और बारह वर्ष ग्वालियर के किले में कैदी की तरह गुजारे। अंत में हीरा पहचानने की निपुणता के कारण बादशाह ने अन्य बन्दी राजाओं के साथ उसे मुक्त किया। 1628 ई. में नागवंशियों ने मुगलों को 6000 रू. सालाना-मालगुजारी देना स्वीकार कर अधीनता स्वीकार ली थी।
वर्ष 1765 में शाह आलम-।। द्वारा ईस्ट इंडिया कंपनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी मिली। इस तरह झारखंड (बिहार की दीवानी अंग होने के कारण) अंग्रेज राज के अंतर्गत एक कर चुकाने वाला जिला बन गया।

स्वाधीनता संग्राम और झारखंड

झारखंड में अंग्रेजी शासन की यह अवधि आंतरिक गड़बड़ी और अशांति की अवधि थी। देश के आदिवासी इलाकों में तत्काल प्रतिकार के स्वर सुनाई पड़ते हैं। क्रान्तियो के ये सिलसिले भारत के इतिहासकारों की आँखों में उँगली डाल कर कुछ समझाने की कोशिश कर रहे हैं।
1. 1765-1805: ’खेरा-मांझी-महतो (चुआड़) क्रान्ति
2. 1766-80ः राजमहल में पहाड़िया क्रान्ति
3. 1784 संताल परगना में तिलका मांझी के नेतृत्व में क्रान्ति
4. 1820-21: सिंहभूम की हो क्रान्ति
5. 1831-32: महान कोल (हो, मुण्डा, उराँव) क्रान्ति
6. 1831-32 चान्हों सिलगांई के वीर बुधु भगत की क्रान्ति: इस क्रान्ति को अलग से रेखांकित करने की आवश्यकता इसलिए है कि 13 फरवरी 1832 को कैप्टन इम्पे के नेतृत्व की ब्रिटिश फौज से युद्ध करते वीर बुधु भगत उनके पुत्रा हलधर-गिरिधर-उदयकरण, उनकी पुत्रियाँ रुनिया-झुनिया, भाई-भतीजे, गोत्रा के अन्य डेढ़ सौ से दो सौ सदस्यों ने एक साथ शहादतें दीं। भारतीय या विश्व इतिहास में एक परिवार के इतने सदस्यों की शहादत अपने आप में अतुलनीय है।
7. 1831-33ः मानभूम और सिंहभूभ में भूमिज क्रान्ति
8. 1837 सिंरिंगसिया घाटी की लड़ाई।
9. 1855-57: महान संताल क्रान्ति (हल)ः- 1855-57 का विद्रोह संताल इतिहास की एक ऐसी घटना है जो उनकी चेतना का अभिन्न अंग बन गयी है। यह संताल विद्रोह शोषण की लंबी अवधि का परिणाम था। संतालों के बीच बढ़ते हुए असंतोष को विप्लव का रुप देने का श्रेय भोगनाडीही निवासी सिद्धू और कान्हू नामक दो संजान भाइयों को है। ये और इनके कम प्रभावशाली भाई चाँद और भैरव वास्तव में समस्त आन्दोलन के प्राण थे।
13 जून, 1855 ई. को दस हजार संताल भगनाडीही में एकत्रित हुए और वहाँ सिद्ध और कान्हू ने उनके सामने घोषित किया कि भगवान की आज्ञा है कि संताल लोग अत्याचारियों के पंजे से निकल जाने की चेष्टा करें। 16 जुलाई 1855 पीरपैंती युद्ध मेजर बरोज की सेना की हार संताल विद्रोहियों द्वारा। 21 जुलाई 1855 वीरभूम के युद्ध, लेफ्टिनेंट टोल मेइन की बड़ी सेना की हार संताल विद्रोहियों द्वारा। ये दो महत्वपूर्ण घटनाएँ हैं जिसकी पृष्ठभूमि पर 1857 की क्रान्ति की नींव रखी गयी।
10. 1857-59 सिपाही विद्रोह
11. 1857-59ः सिंहभू में पोड़ाहाट के राजा अर्जुन सिंह के नेतृत्व में विद्रोह
12. 1857-59ः पलामू में नीलांबर और पीतांबर के नेतृत्व में विद्रोह
13. 1857 हजारीबाग के भुइयाँ टिकैंतों का आन्दोलन
14. 1871 भगीरथी माँझी के नेतृत्व में खरवार आन्दोलन
15. 1881-82 पलामू में कोरवा विद्रोह
16. 1859-95ः सरदारी लड़ाई या मुल्की लडाई
17. 1880 तेलगां खंड़िया के नेतृत्व में खड़िया लोगों के बीच आन्दोलन
18. 1895-1900: बिरसा आन्दोलन (उलगुलान)
19. 1914 टाना भगत आन्दोलन
तत्पश्चात् 1947 तक आजादी की लडाई में भागीदारी यानी उलगुलानों की अन्तहीन कड़ियाँ यहाँ दिखती है।

अनूठी थी असुर जनजाति की लौह शिल्प कला

asur_janjati3डॉ. दिवाकर मिंज
प्रॉक्टर, रांची विश्वविद्यालय, रांची
असुर जनजाति झारखण्ड की अन्य जनजातियों के बीच अपनी अलग पहचान रखती है। ये प्राचीन काल से ही लौहकर्मी के रूप में विख्यात है। ये लोहा गलाने में निपुण थे। लोहा गलाना प्राचीन काल में उनका एक मुख्य पेशा था। प्राचीन भारतीय इतिहास के कई विवरणों में असुरों से संबंधित तथ्य प्राप्त होते हैं। मुण्डाओं को यहाँ से खदेड़े जाने पर असुर मध्य प्रदेश के जंगलों में चले गये। वे सरगुजा के पाहन क्षेत्रा में रहते थे। यह क्षेत्रा कोरवा राजा के राज्य क्षेत्रा में आता था। एक दिन कोरवा राजा के यहाँ जब कार्यक्रम था तो असुर अपने भटियों में लोहा गलाने का कार्य कर रहे थे। इसमें कोरवा राजा तथा उपस्थित मेहमान अप्रसन्न हुए क्योंकि उस खेत में धुँआ ही धुँआ भर गया था। कोरवा के क्रोध होकर असुरों को अपने सिपाहियों द्वारा उस क्षेत्रा से खदेड़ दिया। असुर वहाँ से गुमला, लोहरदगा के पाट क्षेत्रों में आकर बस गये। यह पाट क्षेत्रा उनके लिए कई दृष्टि से उपयुक्त था। एक तो बार-बार खदेड़े जाने के कारण वे अब सुरक्षित रहना चाहते थे। यह स्थान जंगल पहाड़ों से भरा था जो बाहरी आक्रमणों से उन्हें सुरक्षा प्रदान कर सकता। दूसरा उनका मुख्य पेशा लोहा गलाने का था जिसके लिए भी यह स्थान उपयुक्त था। अतः वे इन पाट क्षेत्रों में स्थायी रूप से निवास करने लगे।
वर्तमान समय में असुर जनजाति के बीच से लोहा गलाने की पारंपरिक कला लुप्त हो चुकी है लेकिन इस बात के स्पष्ट प्रमाण मिलते है कि असुर पारंपरिक लौहकर्मी थे। इसने वर्षांे पहले झारखण्ड क्षेत्रा की जनजातियों के बीच अपनी सेवा दी थी। यह जनजातीय समाज में उनकी महत्वपूर्ण स्थिति को दर्शाता है। हम असुर तथा मुण्डा दंतकथाओं से भी इनके लौहकर्मी होने के प्रमाण पाते है। वेरियर एल्विन (1963) ने असुर क्षेत्रा का 19 वर्षो में दो बार भ्रमण किया तथा भ्रमण के बाद उन्होंने असुर जनजाति को पारंपरिक लौहकर्मी की संज्ञा दी। इससे हमें पता चलता है कि भारत के स्वतंत्राता प्राप्ति के बहुत बाद तक इस जनजाति में लौह कार्य जारी रखा था। बाद के वर्षों में इस्पात तथा कल-करखानों के खुल जाने पर इनके इस कार्य में बाधा आई तथा धीरे-धीरे इन्होंने अपनी लौह कला को त्याग दिया। यह एक विडम्बना है कि आधुनिक तकनीक ने इस जनजाति की प्राचीन तकनीक को पूरी तरह नष्ट कर दिया है।
असुर जनजाति प्राचीन काल में लौह-कार्य से पूरी तरह से जुड़ी थी और यह उनकी अर्थव्यवस्था का प्रमुख आधार था। उन्होंने इतनी विशिष्ट तकनीक द्वारा झारखण्ड के अन्य जनजातियों की लौह से संबंधित आवश्यकताओं की पूर्ति की थी। जिस परिवेश में इनका निवासस्थान है। वहां लोहा और भट्ठी में जलाने के लिए लकड़ी-कोयला उपलब्ध हो जाता था। सर्वप्रथम पलामू जिला के राजस्व अधिकारी श्री फोबिस (1861) ने असुर से संबंधित जानकारी प्राप्त की थी। लोहा पिघलाने की विधि पर गुप्ता (1976) ने प्रकाश डालते हुए लिखा है कि नेतरहाट पठारी क्षेत्रा में असुरों द्वारा तीन तरह के लौह अयस्कों की पहचान की गयी थी। पहला पोला (मेग्नीटाइट), दूसरा विच्छी (हिमेटाईट), तीसरा गोटा (लैटेराइट से प्राप्त हिमेटाईट)। असुर अपने अनुभवों के आधार पर केवल देखकर इन अयस्कों की पहचान कर लिया करते थे तथा उन स्थानों को चिह्नित कर लेते थे। लौह गलाने की पूरी प्रक्रिया में असुर का सम्पूर्ण परिवार लगा रहता था। इस प्रक्रिया में सर्व प्रथम साल वृक्ष को कच्चे अवस्था मे काट लिया जाता था। तथा उससे कोयला बनाया जाता था। हरे वृक्षों को काट कार कोयला बनाने के पीछे कारण यह था कि इससे प्राप्त कोयला अत्यधिक ताप सृजित करता था। इस कार्य के लिए जिस भट्ठी का ये उपयोग करते थे वह प्रायः जलस्रोतों तथा दरी, चुआ या नदी के किनारे होता था।
झारखण्ड में सम्पूर्ण देश का 40 प्रतिशत भण्डार है। झारखण्ड में तीन अरब टन से अधिक लौह अयस्क के भंडार है, जो पलामू जिला में अवस्थित है। सिंहभूम शैलक्रम को लौह अयस्क का पलामू भी है। इसके अलावा नेतरहाट, लोहरदगा के पाट क्षेत्रों की चट्टानें अत्यधिक अल्युमिन युक्त है जिसमें लौह अंश प्रर्याप्त है। असुर जनजाति इन्ही लौह अयस्क प्राप्ति वाले स्थानों में निवास करते है। इनका प्रमुख रूप से निवास स्थल झारखण्ड के पाट नेतरहाट, लोहरदगा, पलामू आदि में देखा गया है। इसके अलावा सिंहभूम धनबाद में भी है। ये अभी भी लौह अयस्क बहुलता वाले क्षेत्रा है।
चूंकि इनके घर लौह अयस्क प्राप्ति के स्थान से काफी दूर होते थे अतः ये लौह अयस्क को गलाने के लिए जंगल में ही भट्ठियों का निर्माण करते थे। ये लोहे गलाने के इन भट्ठों को चमुआ भी करते थे। असुर लगभग 3 फीट ऊँचा भट्ठा बनाते थे जिसका मुँह बहुत बड़ा नहीं होता था। यह भट्ठा मिट्टी को गीला करके बनाया जाता था। लोहा गलाने के लिए बनी भट्ठी में ये दीरी टुकु (असुरी भाषा में) अर्थात् लौह अयस्क के पत्थर को डाल देते थे। इस लौह पत्थर को गलाने के लिए जंगलों से सखुआ पेड़ काटकर चारकोल बनाया जाता था या फिर भारी मात्रा में लकड़ी का प्रयोग किया जाता था। इस भट्ठे में नीचे दो जगह छोटे छेद बने होते थे एक छेद से लोहे में मिश्रित कचड़ा निकल जाता था जिसे असुर गेरा टुकु कहते थे। शुद्ध लोहा नीचे बैठ जाता था जिसे असुर गरम रहने पर ही पीट-पीटकर आकार देते थे। इस प्रकार असुरों ने लोहे गलाने की इस विशिष्ट तकनीक का अविष्कार किया था। उनके दंत कथाओं में भी उनके लोहे की भटियों का वर्णन मिलता है। वे साल वृक्ष को कच्चे में ही काटकर कोयला बनाते थे। क्योंकि इससे अधिक ताप प्राप्त होता था और पत्थरों को गलाने के लिए काफी ज्यादा ताप की आवश्यकता होती थी। असुर जनजाति के लोग लोहा गलाने के कार्य में काफी निपुण थे।
भट्ठियों में लोहा गलाने में इन्हें काफी धीरज रखना पड़ता था क्योंकि आधुनिक कारखानों की तरह ये कम समय में विगलित नहीं होते थे। इन्हें गलाने में बहुत ज्यादा समय लगता था। इसके अतिरिक्त उच्च ताप को भी बनाये रखना पड़ता था। असुर काफी निपुणता के साथ अपने पारंपरिक कार्य को करते थे। यह कार्य वे पीढ़ी दर-पीढ़ी अपने बुजुर्गांे से सीखते थे।
असुर लोग लोहा को गलाने के बाद उनसे कई लौह उपकरणों का निर्माण करते थे, जिसके कारण इस जनजाति को एक शिल्पी एवं दस्तकारी जनजाति के रूप में भी जाना जाता है। ये लोहे से प्रमुख रूप से कृषि संबंधित उपकरण, लोहे के वाणाग्र तथा कई घरेलू कार्य में प्रयुक्त वाली चीजें बनाते थे। वे गाँव में सभी लोहे से संबंधित उपकरणों की आवश्यकता की पूर्ति करते थे। छठी शताब्दी ई.पू. में कई साहित्यिक स्रोतों से पता चलता है कि मगध का दक्षिणी क्षेत्रा हाथियों तथा लोहे के लिए प्रसिद्ध था। इस बात की पूरी संभावना है कि यह क्षेत्रा झारखण्ड ही था, जहाँ खानों की बहुतायत है। ऐसा संभव है कि प्राचीन काल में असुर जनजाति अस्त्रा-शस्त्रा के निर्माण से भी जुड़े रहे होंगे और इस कार्य में सिद्धहस्त रहे होंगे।
इस प्रकार असुरों की लौह-प्रविधि अत्यंत ही उत्कृष्ट थी। इनके लिए पारंपरिक लौहकर्मी की संज्ञा उचित है। असुर जनजाति की विशिष्टता उनके इसी पेशे से प्रकट होती है। वे इस कार्य से आर्थिक रूप से भी जुड़े थे। इसके अलावा वे स्थानांतरित कृषि कार्य से भी जुड़े हुए थे।
बाद के वर्षो में आधुनिक इस्पात के कारखाने खुलने से उनकी यह कला प्रभावित हुई तथा केवल यह इनकी नाममात्रा की पहचान बनकर रह गई है। अंग्रेजों की वन नीति के कारण पेड़ की कटाई करना बंद हो गया जिससे इन्हें लोहा गलाने के लिए उपयुक्त मात्रा में लकड़ी प्राप्त नहीं होने लगी। इन सब के कारणों ने उन्हें अपनी इस कला को त्यागने पर मजबूर कर दिया। अभी इस जनजाति के लोग ज्यादातर बॉक्साइड के खानों में काम कर अपने जीवन-यापन करने के लिए मजबूर है। चूँकि बॉक्साईड के खान इनके निवास क्षेत्रा के पाट में ही है। अशिक्षित तथा गरीबी के कारण इन्हें कोई और काम नहीं मिल पाता है। पठारी क्षेत्रा होने के कारण कृषि योग्य भूमि का भी अभाव है। इन विषम परिस्थिति में असुर जनजाति अपने लौह-कार्य छोड़ अपनी अस्तित्व की रक्षा के लिए प्रयासरत है।
वर्तमान समय में झारखण्ड में रह रहे असुर समुदाय के लोग काफी परेशानियों का सामना कर रहे हैं। लोहा गलाने और बनाने की परंपरागत आजीविका के खात्मे तथा खदानों के कारण तेजी से घटते कृषि आधारित अर्थव्यवस्था ने असुरों को गरीबी के कगार पर ला खड़ा किया है। नतीजतन पलायन, विस्थापन एक बड़ी समस्या बन गई है। असुर समुदाय के लोग अपने कला-कौशल के कारण जाने जाते थे। लेकिन, अब इनकी कला कौशल को बचाये रखना मुश्किल होता जा रहा है। अब लगता है असुर जाति केवल हमें किस्से-कहानियों में ही सुनने को मिलेंगे। कभी प्रचीन काल में दुश्मनों के छक्के छुड़ा देने वाले असुर आज की तारीख में अपनी जिंदगी की लड़ाई लड़ रहे हैं। ऐसे में इनके कला कौशल और संस्कृति के संरक्षण की जरूरत है।

झारखंड की लौह कला का उत्कृष्ट नमूना टांगीनाथ धाम

Tanginath 1असुर जनजाति की समृद्ध लौह परंपरा का एक शानदार नमूना गुमला जिले के जंगलों में स्थित है। यह नमूना है एक लोहे का त्रिशूल या फरसा जिसमें जंग नहीं लगता। यह फरसा टांगीनाथ धाम में पाया जाता है। टांगीनाथ धाम, झारखंड राज्य मे गुमला शहर से करीब 75 किमी दूर तथा रांची से करीब 150 किमी दूर घने जंगलों के बीच स्थित है। इस जगह का परशुराम से गहरा नाता है। यहाँ पर आज भी भगवान परशुराम का फरसा ज़मीं मे गड़ा हुए है। झारखंड में फरसा को टांगी कहा जाता है, इसलिए इस स्थान का नाम टांगीनाथ धाम पड़ गया। धाम में आज भी भगवान परशुराम के पद चिह्न मौजूद हैं।
यहाँ पर गड़े लोहे के फरसे की एक विशेषता यह है कि हज़ारों सालों से खुले मे रहने के बावजूद इस फरसे पर ज़ंग नहीं लगी है। और दूसरी विशेषता यह है कि ये जमीन मे कितना नीचे तक गड़ा है इसकी भी कोइ जानकारी नही है। एक अनुमान 17 फ़ीट का बताया जाता है।
वर्ष 1989 में पुरातत्व विभाग ने टांगीनाथ धाम मे खुदाई की थी। खुदाई में उन्हें सोने चांदी के आभूषण सहित अनेक मूल्यवान वस्तुएं मिली थी। लेकिन कुछ कारणों से यहां पर खुदाई बन्द कर दी गई और फिर कभी यहां पर खुदाई नही की गई। खुदाई में हीरा जड़ित मुकुट, चांदी का अर्धगोलाकार सिक्का, सोने का कड़ा, कान की सोने की बाली, तांबे की बनी टिफिन जिसमें काला तिल व चावल रखा था, आदि चीजें मिलीं थीं। हो सकता है कि वहां पर और खुदाई की जाती या आज भी की जाये तो हमे टांगीनाथ के बारे मे कुछ नई जानकारी प्राप्त हो सके।
टांगीनाथ धाम के विशाल क्षेत्रा मे फैले हुए अनगिनत अवशेष यह बताने के लिए काफी है कि यह क्षेत्रा किसी जमाने मे हिन्दुओं का एक प्रमुख तीर्थ स्थल रहा होगा लेकिन किसी अज्ञात कारण से यह क्षेत्रा खंडहर मे तब्दील हो गया और भक्तों का यहां पहुंचना कम हो गया। रही सही कमी सरकारी उपेक्षा और नक्सलवाद ने कर दी। लेकिन अब लगता है कि धाम की कुछ दशा सुधरने वाली है क्योंकि धाम के सुंदरीकरण के लिए झारखंड सरकार के पर्यटन विभाग ने गुमला जिला प्रशासन को 43 लाख रुपए आवंटित किए हैं।
यहाँ पर सैकड़ों की संख्या मंे प्राचीन शिवलिंग और मूर्तियां बिखरी पड़ी है लेकिन उनके रख रखाव और सुरक्षा का यहां कोई प्रबन्ध नही है। टांगीनाथ धाम के निवासियों को स्थानीय सांसद और केंद्रीय कृषि राज्य मंत्राी श्री सुदर्शन भगत से आशा है कि वे इसके पुनरूद्धार के लिए अवश्य प्रयास करेंगे। उल्लेखनीय है कि जब श्री भगत प्रदेश में मंत्राी थे, तो उन्होंने इस पर एक पुस्तिका का प्रकाशन करवाया था जिसके बाद सरकार का इस ओर ध्यान गया था।