झारखंडी संस्कृति के संरक्षण को समर्पित है सरकार

झारखंडी संस्कृति के संरक्षण को समर्पित है सरकार

रघुवर दास, मुख्यमंत्री झारखंड

देश के धरोहरों की चर्चा करें तो झारखंड का स्थान अतिविशिष्ट माना जा सकता है। झारखंड मूलतः जनजातीय इलाकों के लिए जाना जाता है। झारखंड के लोग न केवल अपनी कला-संस्कृति के लिए दुनिया में जाने जाते हैं, बल्कि लोहा निर्माण जैसी शुद्ध रूप से तकनीकी और वैज्ञानिक पद्धतियों के लिए भी देश में प्रसिद्ध रहे हैं। प्राकृतिक सौंदर्य के साथ-साथ देश के आयुर्वेदिक ज्ञान को भी झारखंड ने बखुबी समृद्ध किया है। इसलिए जब बिहार से अलग होकर जब झारखंड अलग प्रदेश बना तो लोगों को आशा जगी कि संभवतः अब इस प्रदेश के लोगों का कुछ भला हो सकेगा। परंतु राजनीति अपनी ही गति से चलती है और जनजातीय समाज के मुख्यमंत्रियों के होने के बावजूद कोई ठोस प्रगति देखने को नहीं मिली। रघुवर दास हालांकि जनजातीय समाज से नहीं हैं, परंतु झारखंड की संस्कृति में उतने ही रचे-बसे और डूबे हुए हैं। उनके अल्प कार्यकाल में ही सरकार ने झारखंडी संस्कृति को राष्ट्रीय फलक पर लाने के कई प्रयास प्रारंभ कर दिए हैं। इन सब विषयों पर भारतीय धरोहर ने उनसे बातचीत की। प्रस्तुत हैं उसके प्रमुख अंश

झारखण्ड की संस्कृति देश की प्राचीन वैदिक संस्कृति की भांति प्रकृति प्रेमी और प्रकृति संरक्षक है। इस पर्यावरण संरक्षक व एकात्म भाव को बढ़ाने के लिए आपकी ओर से क्या-क्या प्रयास हो रहे है?

झारखण्ड भू-भाग में रहनेवाले सदियों से प्रकृति के प्रति समर्पित रहे है। आज भी वे उसी प्रकार से प्रकृति के प्रति अपना अनुराग रखते है। आज भी आप आदिवासी बहुल इलाकों में निकले तो आपको पता लग जायेगा कि यहां की संस्कृति ने किस प्रकार भारतीय संस्कृति को प्राणवायु दे रखा है। आज भी झारखण्ड में रहनेवाले टाना भगतों के समूह का जीवन आध्यात्मिकता और सदाचार में विश्वास रखनेवाले लोगों के हृदय पर अपना गहरा प्रभाव छोड़ता है। यहीं नहीं संथाल का इलाका हो या पलामू का इलाका। हर जगह झारखण्ड की संस्कृति बहुत कुछ कह देती है। न तो हम कल प्रकृति से अलग थे और न आज है। हम तो मानते है कि प्रकृति के बिना हम रह ही नहीं सकते। जल-जंगल-जमीन तो हमारे प्राण है, इनकी रक्षा करना, इनके प्रति सम्मान का भाव रखना, वसुधैव कुटुम्बकम का मान रखना, हमनें यहीं से सीखा है।
हमने अपने देश की प्राचीन संस्कृति के संवर्धन के लिए देवघर में संस्कृत विश्वविद्यालय की खोलने की भी घोषणा की है और इस ओर प्रयास भी तेज है। यहीं नहीं रक्षा-शक्ति विश्वविद्यालय का उद्घाटन और यहां पढ़ाई का सत्रा भी प्रारंभ हो चुका है, जिससे साफ पता लगता है कि हमने अपनी संस्कृति को बचाने के लिए किस प्रकार कार्य करना प्रारंभ किया है।

झारखण्ड में एक समय बड़े पैमाने पर हुए मतांतरण से यहां की संस्कृति पर काफी खतरा मंडरा रहा था। सरकार झारखण्ड की संस्कृति पर मंडरा रहे उस खतरे के प्रति कितनी गंभीर है और उसके संरक्षण के लिए क्या प्रयास कर रहे है?

यहा के लोग, आज भी अपने धर्म के प्रति अडिग है। सभी को अपने धर्म के प्रति विश्वास रखने, उसके अनुसार आचरण करने की स्वतंत्राता है। राज्य सरकार ने झारखण्ड की संस्कृति को बचाये रखने के लिए हमेशा से प्रयास किया है, क्योंकि झारखण्ड के लिए उसका धर्म-संस्कृति मूल आधार है। हमारे आदिवासी भाई-बहनों को किसी भी प्रकार की दिक्कत न हो, इसके लिए हम सजग है।
झारखण्ड के जनजातीय लोग एक समय में विख्यात तकनीशियन रहे हैं, उदाहरण के लिए असुर जनजाति के लोग जंगरोधी इस्पात बनाने के लिए काफी प्रसिद्ध रहे हैं। आज वे अपनी जमीन और तकनीक दोनों से ही वंचित है। क्या सरकार उनकी तकनीक और उनके माध्यम से उनके अस्तित्व की रक्षा के लिए कुछ उपाय करने का विचार कर रही है?

आप सही कह रहे हैं। सर्वप्रथम लौह उत्पादन की जो बात आती है, वह यहीं का इलाका है। प्राचीन काल से ही हमारे असुर जन-जाति के लोगों ने जंगरोधी इस्पात का आविष्कार किया। उन्हें प्राचीन काल से ही लोहे को गलाने, उससे नाना प्रकार के औजार बनाने, कृषि से जुड़ी हुई कुदाल, खुरपी, हसियां बनाने में महारत हासिल थी, आज भी कई इलाकों में इस प्रकार की पद्धित से सामग्रियां बनायी जा रही है, फिर भी इस प्रकार के उत्पादन में गिरावट आयी है, लोग इस प्रकार के कार्यों से विमुख हुए है। आधुनिकता का असर है, हमारे आदिवासी भाई-बहनें कदम से कदम मिलाकर नये झारखण्ड के निर्माण की ओर कदम बढ़ाये है।
हमने इनके विकास के लिए कई निर्णय लिये है, कई स्तरों पर कार्य हो रहा है। ग्रामीण विकास विभाग इस दिशा में बेहतर काम कर रहा है, यहीं नहीं हमने जो पंचायत सचिवालय की जो परिकल्पना की, उसके मूल में इन जन-जातियों की विकास की ही भावना बलवती होती है।

झारखण्ड की लोक-कलाएँ भी पर्यावरणीय दृष्टि से जागरुक है और उनका कला महत्व भी काफी है परंतु देश में नृत्य की बात होने पर आमतौर पर भरत नाट्यम, कत्थक की भांति झारखण्ड के नृत्यों की चर्चा कम ही होती है। क्या सरकार उनके प्रोत्साहन के लिए कोई योजना बना रही है?

आप यह नहीं कह सकते कि झारखण्ड के नृत्यों की चर्चा देश में कम होती है। मैं तो कहता हूं कि झारखण्ड के नृत्य में तो वो जादू है कि जब यहां ढोल-नगाड़े बजते है तो इन ढोल-नगाड़ों की जादूई आवाज में प्रकृति भी नृत्य करती नजर आती है। मैं दावे के साथ कहता हूं कि जब आप जंगलों या झारखण्ड के गांवों दृ पंचायतों में हमारे झारखण्ड के नृत्य को देखेंगे तो आप स्वयं को रोक ही नहीं पायेंगे, आप भी नृत्य करने लगेंगे। आज भी झारखण्ड का छऊ पूरे विश्व में अपनी छटा बिखेर रहा है।
जब आप सरायकेला-खरसावां जाये या जमशेदपुर जाना हो तो देखे कि कैसे लोग दूर-दूर से यहां आकर छऊ का आनन्द लेते है और इसका प्रशिक्षण प्राप्त कर स्वयं को धन्य-धन्य कर रहे है। मैं इस बात को स्वीकार करता हूं कि जैसा भरत-नाट्यम और कत्थक को सम्मान मिला है, वैसा यहां के नृत्य को नहीं मिला, पर इतना जरूर है कि जब देश के नृत्य-संगीत की बात होगी तो बिना झारखण्ड के छऊ, सोहराई, सरहुल नृत्य और यहां के लोकनृत्य के बिना देश का नृत्य-संगीत कभी पूरा नहीं होगा।

अपने देश की ज्ञान-विज्ञान परंपरा काफी समृद्ध रही है। चाहे आयुर्वेद रहा हो या फिर ज्योतिष इनका लोहा पूरी दुनिया मानती रही है। झारखण्ड सरकार भारतीय ज्ञान- विज्ञान के प्रोत्साहन के लिए क्या प्रयास कर रही है?

भारत की ज्ञान-विज्ञान की परंपरा अतिप्राचीन है और उसमें झारखण्ड की भूमिका अहम है। आज भी झारखण्ड के जंगलों, पहाड़ों में ऐसी-ऐसी जड़ी-बूटियां प्राप्त होती है कि वो दूसरे जगह नहीं मिलती। आज भी देखेंगे कि भारत में आयुर्वेद दवा निर्माण से जुड़ी कई कंपनियां झारखण्ड में पहले से ही रूचि दिखाती रही है। ये बताता है कि हम आयुर्वेद में कहां है, यहां का तो कण-कण आयुर्वेद का पोषक है। आज भी झारखण्ड के जंगलों में हमारे आदिवासी भाई-बहने अपनी कई बीमारियों का उपचार स्वयं ही कर लेते है, क्योंकि उन्हें झारखण्ड के जंगलों में प्राप्त जड़ी-बूटियों-औषधियों का ज्ञान है, जिससे वे रोज-रोज की बीमारी को तो दूर करते ही है, कई असाध्य बीमारियों का भी इलाज कर देते है, यहीं कारण है कि हमने राज्य में प्राप्त बहूमूल्य औषधियों और जड़ी-बूटियों के बेहतर उत्पादन के लिए स्वास्थ्य विभाग को विशेष जिम्मेवारियां सौंपी है।