चाणक्य नीति राजकोष का अपव्यय और गबन

प्रो. लल्लन प्रसाद
लेखक प्रसिद्ध अर्थशास्त्री हैं।

नीरव मोदी और पंजाब बैंक घोटाले ने देश को स्तब्ध कर दिया है। इसलिए नहीं कि ऐसा घोटाला पहले नहीं हुआ। ऐसे घोटाले तो पहले भी बहुत होते रहे हैं, परंतु यह एक सरकारी बैंक का मामला था। सरकारी बैंक एक प्रकार से सरकार का राजकोष ही होता है। राजकोष आज की जनतान्त्रिक व्यवस्था में केवल सरकारी खजाने तक सीमित नहीं होता, सरकारी प्रतिष्ठान सरकारी कम्पनियां, सरकारी बैंक और सरकारी विभाग सभी राष्ट्र की सम्पत्ति होते हैं, उनके द्वारा धन का व्यापक लेन देन होता है, राजधन का सदुपयोग अर्थव्यवस्था को मजबूत करता है और खुशहाली लाता है। दुरुपयोग राष्ट्र को कमजोर करता है राजधन के सही उपयोग और रक्षा प्रशासनिक अधिकारियों की जिम्मेदारी होती है। जब राजतन्त्र था तब भी राजा अपने मंत्रियों और अधिकारियों द्वारा कर वसूली और व्यय पर नियन्त्रण रखता था। जनतात्रिक व्यवस्था में राष्ट्राध्यक्ष (राष्ट्रपति या प्रधानमन्त्री, जिसके हाथों में वास्तविक सत्ता हो) मन्त्रियों और अधिकारियों को राजधन की उगाही व्यय और रक्षा सम्बन्धी निर्देश देता है वित्त मन्त्रालय की इस सम्बन्ध में अहम भूमिका होती है।
इसलिए प्रश्न खड़े होते हैं कि आखिर सरकार अपने ही कोष के मामले में इतना लापरवाह कैसे हो गई? यदि सरकार अपने ही कोष के प्रति इतनी लापरवाह हो तो वह जनता के कोष की सुरक्षा कैसे करेगी? ऐसे में यह देखने की आवश्यकता प्रतीत होती है कि क्या राजकोष की सुरक्षा के लिए प्राचीन भारत में कोई विधान किया गया था, यदि हाँ तो क्या उससे आज की सरकारों को कुछ सीखने की आवश्यकता है?
कौटिलीय अर्थशास्त्र राजनीति और अर्थनीति का एक प्रमुख ग्रंथ है। कौटिल्य ने केवल सिद्धांत नहीं बताए थे, बल्कि उन सिद्धांतों के आधार पर पूरे भारतवर्ष में कई सौ वर्षों तक राज्य भी सफलतापूर्वक चलता रहा था। कौटिल्य ने इस संबंध में काफी महत्वपूर्ण बातें बताई हैं। वे कहते हैं – राज्य के सारे कार्य कोष पर निर्भर हैं। इसीलिए राजा को चाहिये कि सबसे पहले कोष पर ध्यान पर ध्यान दे। कौटिल्य अर्थशास्त्र में राजकोष के विकास और उसकी रक्षा के लिए जो प्रावधान किये गये हैं वे आज भी प्रासंगिक है। सरकारी सम्पत्ति का ह्रास जिन कारणों से होता है उसकी विकास व्याख्या कौटिल्य अर्थशास्त्र में मिलती हैं। आठ प्रमुख कारण बताये गए हैं।
1. प्रतिबन्ध- धन वसूल करके अपनी निगरानी में न रखना, अपने अधिकार में रखकर भी सरकारी खजाने में जमा न करना।
2. प्रयोग- सरकारी धन का अपने हित में लेन—देन करना।
3. व्यवहार- सरकारी धन से अपना व्यापार चलाना।
4. अवस्तार- समय सीमा धन की वसूली न करना, मियाद बीत जाने पर देनदार को रिश्वत खाने के लिए तंग करना।
5. परिहापण- कुशासन के कारण आय में कमी और व्यय में वृद्धि करना।
6. उपभोग- राजधन का उपयोग स्वयं करना और दूसरों को कराना।
7. परिवर्तन- राजधन के द्रव्यों को दूसरे द्रव्यों से बदल देना।
8. अपहार- प्राप्त सरकारी धन को रजिस्टर में न चढ़ाना। नियमित व्यय को रजिस्टर में चढ़ाकर भी भुगतान न करना, प्राप्ति से मुकर जाना।
कोष क्षय के लिए जिम्मेदार अधिकारियों से रकम वसूली और सजा के प्रावधान नुकसान की मात्रा को ध्यान में रखकर निर्धारित करनी चाहिये। जो भी अधिकारी जिम्मेदार हों, उन्हें सजा मिलनी चाहिए। तभी प्रशासन भ्रष्टाचार मुक्त हो सकता है, उपर्युक्त आठ कारणों से कोष क्षय की सजा कौटिल्य अर्थशास्त्र में इस प्रकार निर्धारित की गई है।
कोषक्षय के उपर्युक्त आठ कारणों के अलावा सरकारी धन का गबन एक गम्भीर कारण है जो दण्डनीय अपराध की श्रेणी में आ जाता है। कौटिल्य अर्थशास्त्र में सरकारी सम्पत्ति के अपहरण के चालीस प्रकार के प्रकार बताये गए हैं। कुछ प्रमुख प्रकार इस प्रकार हैं। आयी सम्पत्ति को रजिस्टर में न दिखाना, रिश्वत लेकर छोड़ देना, एक व्यक्ति से प्राप्त राशि दूसरे के खाते में दिखा देना भुगतान कम करना अधिक लिख देना, अमीष्ट वस्तु की जगह दूसरी वस्तु दिखा देना, खरीद कीमत से अधिक कीमत खाते में दिखाना, अल्प मूल्य की सम्पत्ति बहुमूल्य सम्पत्ति की जगह दर्ज कर देना, व्यक्ति से वसूली रकम सामूहिक वसूली खाते में डाल देना, दो दिन का वेतन देकर चार दिन की इंट्री दिखाना, कर्मचारियों की संख्या वास्तव में काम पर लगे लोगों से अधिक दिखाना, सरकारी माल की तौल में घपला करके स्वयं उपार्जन करना, एक जरिये से आयी रकम दूसरे जरिये में डाल देना आदि।
रिश्चत लेकर हिसाब में हेरा फेरी और गबन के लिए जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों के विरुद्ध कड़ी सजा के प्रावधान की आवश्यकता है। कौटिल्य अर्थशास्त्र में विधान है कि ऐसे लोगों के विरुद्ध संदेह की भनक मिलते ही सभी सम्बन्धित अधिकारियों और कर्मचारियों से पूछ ताछ शुरू कर देनी चाहिये। कोई भी यदि झूठा बयान दे तो उसे भी वही सजा दी जाय जो अपहरण के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार है। अपहरणकर्ता के बारे में जानकारी उद्घाटित करने और उससे प्रजा को हुई हानि की पूर्ति सरकार की जिम्मेदारी है। गबन करने वाले के विरुद्ध यदि एक से अधिक अभियोग हों और वह उनमें से किसी को स्वीकार न करे तो एक अभियोग साबित हो जाने पर सभी अभियोगों के लिए उसे दोषी करार दिया जाय और सजा भी उसी प्रकार हो। गबन किये हुए पूरे धन से यदि कुछ के सबूत भी मिल जाय तो पूरी गबन की हुई राशि पर उसे सजा दी जाय।
कौटिल्य आगे कहते हैं, यदि अपहरणकर्ता के बारे में कोई जरूरी सूचना देता है तो उसे पारितोषिक दिया जाए। सूचना देने वाला सरकारी कर्मचारी हो तो उसे अपहरण धन का बारहवां हिस्सा, यदि बाहर का व्यक्ति हो तो उसे छठा हिस्सा दिया जाय। आज के संदर्भ में यदि बड़ी रकम हो तो इस नियम का पालन कठिन होगा किन्तु इसके पीछे जो भावना है वह सही है। व्हिसिल ब्लोअर को इनाम देने से बाकी लोगों का हौसला बढ़ता है, लोग सही सूचना देने के लिए आगे आते है। साथ ही अर्थशास्त्र में इस बात का भी प्रावधान है कि यह इनाम के लालच में कोई झूठी सूचना देकर किसी को फंसाना चाहता है तो उसके विरुद्ध कार्यवाही होनी चाहिए। उसे शारीरिक या आर्थिक दण्ड देना चाहिए। किसी अपराधी को छोडऩा नहीं चाहिये। रिश्वत लेकर अपराधी के पक्ष में बयान देने वाला कौटिल्य के मतानुसार मृत्युदण्ड का अधिकारी होता है।
राजधन के अपहरण करने वाले अधिकारियों के लक्षण के बारे में भी कौटिल्य अर्थशास्त्र में जानकारी दी गयी है। यदि अधिकारी की आमदनी थोड़ी है किन्तु खर्चे बड़े करता है तो वह अपहरणकर्ता हो सकता है। गुप्तचरों द्वारा ऐसे लोगों के बारे में सूचना इक_ी की जानी चाहिये। जो अधिकारी सरकारी आय में नियामित रूप से कमी दिखाता है, वह भी अपहरणकर्ता हो सकता है, अक्षमता और आलस्य आदि के कारण हुआ अपहरण भी दण्डनीय है। सरकार को खुश करने के लिए यदि अधिकारी आय से अधिक रकम नियमित रूप से दिखाता है, वह भी संदेह के घेरे में आ जाता है। ऐसा करके वह लोगों का शोषण करता है, इसके लिए वह भी दण्ड का भागी होता है। यदि ऐसा अधिकारी नियम के विरुद्ध आये धन को अपने व्यक्तिगत प्रयोग में लाता है तो उसे कठोर दण्ड दिया जाना चाहिये। कर्मचारियों पर होने वाले व्यय में जो कटौती करके बचत दिखाता है, वह मजदूरों का पेट काटता है। उसे भी अपहरणकर्ता की श्रेणी में रखना चाहिये और दण्डित करना चाहिये।
सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों द्वारा सरकारी धन के अपव्यय और अपहरण को कौटिल्य अर्थशास्त्र में कोई असाधारण बात नहीं मानी गयी है। इसे मनुष्य स्वभाव की एक कमजोरी के रूप में देखा गया है। जैसे जीभ में रखा हुआ शहद या जहर का स्वाद लिये बिना रहा नहीं जा सकता, वैसे ही अर्थसंबंधी कार्यों पर नियुक्त अधिकारी थोड़ा स्वाद न ले, यह असम्मव है।
मानव स्वभाव की इस कमजोरी को दृष्टि में रखते हुए शासन का यह कर्तव्य है कि अर्थाधिकारियों और कर्मचारियों की गतिविधियों के प्रति सजग रहे और जो भी सरकारी सम्पत्ति का दुरुपयोग या अपहरण करते हैं, उनके विरुद्ध कड़ी कारवाई करे, उनकी सारी सम्पत्ति छीन ले, उन्हें उच्च पदों से गिराकर छोटे पद पर नियुक्त कर दे, ताकि कोई अधिकारी या कर्मचारी भविष्य में इस तरह के अपराध का साहस न कर सकें।
ईमानदार और न्यायपूर्वक प्रशासन करने वाले अधिकारियों को पुरस्कृत करने की बात भी कौटिल्य अर्थशास्त्र में कही गयी है। जो अधिकारी राजधन का अपहरण नहीं करते, वरन न्यायपूर्वक अपने कर्तव्य का निर्वाह करते हुए शासन को समुद्ध करते है, ऐसे लोगों को सम्मानपूर्वक उच्च पदों पर रखा जाय।
अधिकारी और कर्मचारी ईमानदारी से न्यायपूर्वक अपने कर्तव्य का निर्वहन करें और भ्रष्टाचारमुक्त स्वच्छ प्रशासन दें। इसके लिए यह भी आवश्यक है कि देश का सर्वोच्च शासक और उसके मन्त्रीगण भी निष्ठापूर्वक ईमानदारी से अपने पदों का निर्वाह करें। अपने व्यवहार से उदाहरण प्रस्तुत करें। पुरानी कहावत है जैसा राजा, वैसी प्रजा। आजादी के बाद जनता जिस लोक का कल्याणकारी राज्य के सपने देखती थी, वह यदि आज तक पूरी नहीं हुई है, तो इसका एक बहुत बडा कारण है, वर्षो से जड़ जमाया भ्रष्टाचार जिसमें अनेक शीर्ष नेता एवं बड़े अधिकारी लिपटे थे। देश का सौभाग्य है कि आज एक ऐसा प्रधानमन्त्री सत्ता में आया है जो कहने का साहस कर रहा है न खाऊंगा, न खाने दूंगा। चाणक्य नीति कहती है, धर्मात्मा राजा के राज्य की प्रजा धर्मात्मा, पापी के राज्य की प्रजा पापी और मध्यमवर्गीय राजा के राज्य की प्रजा मध्यम होती है। आज यदि देश की जनता भ्रष्ट हो रही है तो इसमें कहीं न कहीं सरकार में बैठे नेताओं का ही दोष है।