गौ हत्या पर पूर्ण प्रतिबन्ध से ही बढेगा सामाजिक सद्भाव

सुबोध कुमार
लेखक गौ एवं वेद विशेषज्ञ हैं।


देश में एक नई समस्या परोस दी गई है मॉब लिंचिंग की। मॉब लिंचिंग यानी भीड़ की हिंसा। भीड़ विवेकशून्य होती है और इसलिए भीड़ के न्याय को न्याय नहीं माना जाता। इसे मात्स्य न्याय या जांगल न्याय कहा जाता है। इसमें दोषी को सफाई देने की व्यवस्था नहीं होती। सीधे आरोप और निर्णय होते हैं। मनुष्यों में मात्स्य न्याय को सही नहीं माना गया और इसलिए राज्य की स्थापना की गई। अपराध का निर्णय करने और उस पर दंड की व्यवस्था देने के लिए ही राज्य यानी शासन की स्थापना की जाती है। राज्य या शासन को धर्म के आधार पर दंड की व्यवस्था देनी होती है। यदि कहीं धर्म का शासन या राज्य न हो तो ऐसे में वहाँ स्वाभाविक रूप से मात्स्य न्याय होने लग जाएगा। यही मूल समस्या है।
देश का वर्तमान शासन तंत्र धर्म से विमुख है। वह स्वयं विवेकशून्य हो रहा है और इसलिए वह दोषी और अपराधियों को पहचान ही नहीं पा रहा है। वह वास्तविक अपराध को रोकने के प्रयास नहीं कर रहा है। ऐसी धर्महीन अराजकता की स्थिति में स्वाभाविक ही है कि देश में मात्स्य न्याय या जांगल न्याय चलने लगे। वही हो भी रहा है। दुर्भाग्यवश देश का मीडिया भी उतना ही धर्मविमुख है और इसलिए वह इस स्थिति की सही मीमांसा करने की बजाय इसे मॉब लिंचिंग का गलत नाम देकर लोगों को ध्यान भटकाने का प्रयास कर रहा है। मॉब लिंचिंग वास्तव में एकाएक एकत्रित हुई भीड़ द्वारा क्षणिक आवेश में किसी की हत्या किए जाने को कहते हैं। जिन घटनाओं को मॉब लिंचिंग कहा जा रहा है, उनमें न तो कोई भीड़ है, न एकाएक एकत्र हुए लोग हैं और न ही कोई क्षणिक आवेश है। इन घटनाओं की एक लंबी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है। उस लंबे इतिहास के कारण पैदा हुआ सामाजिक वैमनस्य है। उस सामाजिक वैमनस्य को शासकीय उपेक्षा द्वारा और बढ़ावा दिया गया है। परिणाम है ये घटनाएं जो वास्तव में मात्स्य न्याय के कारण घट रही हैं और जो वास्तव में शासन की असफलता को प्रदर्शित करती हैं, समाज की उग्रता को नहीं।
इन घटनाओं की पृष्ठभूमि में इतिहास है मजहबी कारणों से मुसलमानों द्वारा किए जाने वाले गौहत्या का। इस गौहत्या के कारण गौप्रेमी हिंदू समाज के मन में आवेश पैदा हुआ जो कि लंबे काल तक जारी रहने के कारण विद्वेश में परिणत हो गया है। यह एकदम स्वाभाविक बात है। इन घटनाओं का मूल हिंदुओं में बढ़ती असहिष्णुता नहीं, बल्कि निरंतर होती और बढ़ती गौहत्याएं हैं। यदि शासन कठोरता से कथित मॉब लिंचिंग की घटनाओं का मूल हिंदुओं में बढ़ती असहिष्णुता नहीं, बल्कि निरंतर बढ़ती गौहत्याएं हैं। समाज में सौहार्द स्थापित करने के लिए बहुसंख्यक हिंदुओं की भावनाओं का सम्मान करते हुए गौवध पर संवैधानिक प्रतिबंध लगाना चाहिए। जब तक यह नही होता भारत में हिंदू और मुस्लिमों के बीच सौहार्द स्थापित नही हो सकता। वेदों में ऐसी स्थिति का बहुत ही सटीक वर्णन है। इस विषय पर अथर्व वेद में निम्न कथन मिलता है – ”जब तक गौहत्यारे का आरोप सिद्ध नहीं हो जाता और उसे मृत्युदंड देने के लिए विष का प्रबंध नहीं होता, उस गौहत्यारे को एक अंधेरी कोठरी में बंद रखना चाहिए। तदोपरान्त गौ के हत्यारे को विष दे कर मार डालें।”
वेदों में गौहत्यारे और गौप्रेमी गौरक्षकों के बीच वैमनस्य पैदा होने का विस्तार से वर्णन पाया जाता है। वेद कहते हैं कि यदि गौहत्या होती है तो गौहत्यारों और गौरक्षकों में ऐसा वैमनस्य पैदा होता है जो पीढ़ीयों तक जाता है। इससे अंतत: समाज का नुकसान होता है। अथर्ववेद के अगले मंत्र में कहा गया है ”यदि गौहत्यारों को मारने वालों को दंड दे दिया जाए, तो भी मृत ब्रह्मगवी गौहत्यारे का पीछा करती है और अगले जन्म में भी उसके प्राणों को नष्ट कर देती है। वह समाज के भविष्य को नष्ट कर देती है। “तात्पर्य यह है कि यदि गौहत्यारों का उत्पीडऩ करने वाले को दंडित कर भी दिया जाए तो भी इससे समाज में कटुता समाप्त नहीं होती और इससे समाज का भविष्य अच्छा नहीं रहता। इसका कारण बताते हुए अगला मंत्र कहता है ”गौहत्यारों और गौरक्षकों के कुलों में उत्पन्न बैर उनके पौत्रों तक जाता है। यह बैर कितनी पीढिय़ों तक जाएगा, यह गौ के प्रति श्रद्धा पर निर्भर करता है।”
अथर्ववेद का अगला मंत्र बताता है कि गौहत्या से समाज में हिंसा का वातावरण बनता है और राष्ट्र की समृद्धि भी क्षीण होती है। इन मंत्रों में कहा गया है
1. गौमांस का व्यापार समाजिक अशांति की पापवृत्ति को प्रकट करता है और गोमांस का प्रयोग हृदय की कठोरता को प्रकट करता है।
2. गौमांस पकाने के प्रयास विष रूप है और इन का प्रयोग कष्ट प्रद रोगादि ज्वर रूप है। बौद्ध ग्रंथ सुतनिपात के अनुसार माता पिता, भाई तथा अन्य सम्बंधियों के समान गाय हमारी श्रेष्ठ सखा हैं। पूर्वकाल में केवल तीन ही रोग थे – इच्छा, भूख और क्रमिक ह्रास। परंतु पशुघात और मांसाहार के कारण अठानवे रोग पैदा हो गए।
3. गौमांस को पकाना पाप है। गोमांस का पकाना जीवन को दु:स्वप्नों जैसा दुखदायी बना देता है।
4. गौमांस का प्रयोग यक्ष्मा जैसे अनुवांशिक रोगों से भावी संतानों की जड़ काट देता है।
5. गौमांस सेवन करने वालों में अज्ञानता – मोटी अकल होती हैं। पकते मांस की गंध से शोक, निराशा पैदा होती है जो विष समान है।
6. गौमांसाहार के प्रोत्साहन से शारीरिक तेज नष्ट हो जाता है और समाज में रोग बढ़ते हैं।
7. गौमांस के सेवन से क्रोध वृत्ति और हिंसक भावना बढ़ते हैं।
इस प्रकार वेद स्पष्ट शब्दों में बता रहे हैं कि यदि हम समाज में सौहार्द और प्रेम बनाए रखना चाहते हैं तो हमें गौ की रक्षा सुनिश्चित करनी होगी। गौ की रक्षा होगी तो झगड़े का कारण नहीं रहेगा। साथ ही गौमांस के दुष्परिणामों से भी समाज की रक्षा होगी। आज जिन झगड़ों को मॉब लिंचिंग कहा जा रहा है और गौरक्षकों को हतोत्साहित करने के जो प्रयास हो रहे हैं, वे पूरी तरह समाज के अहित में हैं। इससे समाज में और कटुता ही बढ़ेगी जो अंतत: हिंसा को ही बढ़ावा देगी।
इसलिए सरकार को चाहिए कि वह गौहत्या पूरी तरह बंद करवाए, मीडिया आदि समाज के अन्य अंगों को चाहिए कि वह गौहत्या और गौमांसभक्षण के दुष्परिणामों से समाज को अवगत कराए। जब गौप्रेमियों को यह भरोसा होगा कि शासन गौहत्या के मामले में न्याय करेगा, तभी यह जांगल न्याय की आवश्यकता तथा प्रवृत्ति समाप्त होगी। तभी हिंसा की ये घटनाएं बंद होंगी और समाज में सौहार्द बढ़ेगा।
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नेपाल में गायों को मिला प्रसूति भत्ता
मिसाल बना नेपाल

गाय को हम माँ कहते हैं, परंतु वास्तव में उन्हें माँ कहने का अधिकर नेपाल की सिदिंवा पंचायत को है। सिदिंवा पंचायत संभवत: विश्व की पहली पंचायत है, जिसने गायों को मातृत्व का अधिकार प्रदान किया है। पिछले दिनों सिदिंवा ग्रामपालिका ने एक प्रस्ताव पारित किया है कि उसके क्षेत्र के जिस भी किसान के घर गाय ब्याएगी, उस किसान को गाय और उसके बच्चे के समुचित देख-रेख के लिए बीस हजार रूपये प्रसूति भत्ता दिया जाएगा। ग्रामपालिका ने यह निर्णय गाँवों में पशुपालन को प्रोत्साहन देने के लिए लिया है। इसके बदले में शर्त रखी गई है कि किसान को प्रत्येक दिन उस गाय से न्यूनतम सात लीटर दूध निकालना होगा। इसमें एक शर्त यह भी है कि ब्याने के पहले छह महीने में गाय के केवल दो थन और उसके बाद केवल तीन थन से ही दूध निकालना होगा, ताकि उसके बच्चे को भरपूर दूध मिल सके। यह शर्त इसलिए है कि किसान भत्ते की राशि का प्रयोग प्रसूता गाय की देखभाल में ही करे।
वहाँ के पशु चिकित्सकों का मानना है कि स्थानीय नस्ल की गाय को भी यदि अच्छा खाने को मिले तो वह सात लीटर दूध आसानी से दे सकती है। इसके लिए गाय विटामिन आदि से युक्त पौष्टिक खाना खिलाने की जानकारी भी किसान को दी जा रही है। उल्लेखनीय बात यह है कि वर्तमान में वहाँ की स्थिति यह है कि यदि किसी को दूध की चाय पीनी हो तो दुकानवाले को एक दिन पहले बताना पड़ता था, तभी वह दूध की व्यवस्था कर पाता था। ग्रामपालिका को आशा है कि उसकी इस पहल से वहाँ दूध का उत्पादन बढ़ जाएगा।
किसानों ने इस योजना को हाथों-हाथ लिया है और इससे उत्साहित होकर ग्रामपालिका ने अगले वित्तीय वर्ष में इसका बजट तीन गुना करने की योजना बनाई है। पहले यहाँ के गाँवों में बड़े परिमाण में पशुपालन होता था, परंतु बीच में वह परंपरा खंडित हो गई थी। उस पुरानी परंपरा को फिर से स्थापित करने के लिए ग्रामपालिका ने यह अभिनव पहल की है। यहाँ यह जानकारी भी उल्लेखनीय है कि नेपाल में गोबर गैस से रसोई बनाने का काम बड़े पैमाने पर होता है। वहाँ के सभी 75 जिलों में दो लाख से अधिक गोबर गैस संयंत्र लगे हुए हैं। हाल ही में गोबर गैस से वहाँ सीएनजी भी बनाई जाने लगी है। सीएनजी वर्तमान में सर्वाधिक प्रदूषणमुक्त ऊर्जास्रोत है। स्वाभाविक ही है कि गाय का महत्व वहाँ काफी बढ़ रहा है। यही कारण है कि नेपाल ने गाय को अपना राष्ट्रीय पशु घोषित किया है और गाय की हत्या करने पर वहाँ तीन वर्ष के कारावास का दंड दिया जाता है।
नेपाल से भारत सीख ले सकता है। यदि भारत में गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित किया जाए और साथ ही गोबर गैस संयंत्रों को स्थापित करने पर काम हो तो इसके कई लाभ हो सकते हैं। सबसे पहला लाभ तो यही है कि देश की ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति प्रदूषणरहित तरीके से हो सकेगी। गाँव-गाँव में मँहगी एलपीजी ले जाने की आवश्यकता नहीं रह जाएगी। दूसरी बात यह होगी कि इससे गौहत्या रूकेगी जिससे अनावश्यक चल रहा है संघर्ष समाप्त होगा। गौ का महत्व और आर्थिक उपयोग बढ़ जाएगा और गायों को केवल दूध के लिए नहीं, बल्कि गोबर के लिए भी पाला जाएगा। इसके लिए आवश्यक है भारत में भी नेपाल की भाँति कुछ अभिनव सोचा जाए। यदि नेपाल जैसे देश में एक ग्रामपालिका गायों का प्रसूति भत्ता दे सकती है, तो गोपालक श्रीकृष्ण के भारत देश में यह क्यों नहीं हो सकता?