गीताप्रेस के सच्चे कला-उपासक

गुंजन अग्रवाल
लेखक द कोर पत्रिका के कार्यकारी संपादक हैं।


गीताप्रेस की पहचान न केवल 1,800 से अधिक हिंदू-धार्मिक साहित्यों के प्रकाशन और विश्वभर में उनके प्रचार-प्रसार के लिए है, अपितु उसके सभी प्रकाशनों— श्रीमद्भगवद्गीता के विभिन्न संस्करण, श्रीमद्वाल्मीकीयरामायण, महाभारत के विभिन्न संस्करण, पुराणों, सूर एवं तुलसी-साहित्य, आदि और विशेषकर गीताप्रेस के मुखपत्र कल्याण में प्रकाशित बहुरंगी और श्वेत-श्याम चित्रों से भी कम नहीं है। दुनियाभर में फैले करोड़ों अध्यात्मप्रेमी इन चित्रों के प्रशंसक हैं। ये चित्र इतने पसंद किये जाते हैं कि आज भी इन चित्रों को लाखों धर्मप्रेमियों ने अपने घरों में पुराने एलबमों में सहेज रखा है। “40 और 80” के दशक के मध्य निर्मित, इन 10,000 से अधिक चित्रों को गीताप्रेस अनेक बार ‘कल्याण’ और अन्य ग्रंथों में प्रकाशित कर चुकी है और आज भी कर रही है। ये चित्र बड़े-बड़े कैलेण्डर के रूप में भी छप चुके हैं, घर-घर में सुशोभित हैं और भारतीय चित्रकला अमूल्य निधि हैं। उल्लेखनीय है कि इन चित्रों के आधार पर देश के अनेक मन्दिरों में प्रतिमाओं का निर्माण भी हुआ है।
सर्वश्री विनय कुमार मित्रा (बी.के. मित्रा : 1884-1974), जगन्नाथप्रसाद गुप्त (1900-1960) और भगवानदास (1917-?) नामक चित्रकारों (जे.एन. प्रसाद, इन्द्र शर्मा, धनुष, आदि कुछ अन्य नाम भी लिए जा सकते हैं जिन्होंने कम संख्या में चित्र बनाए हैं) द्वारा बनाए गए इन चित्रों की इतनी महत्ता है कि ये चित्र जन-जन के हृदय में ऐसे रच-बस गए हैं कि हिंदू देवी-देवताओं का ध्यान करते ही इन चित्रों में अंकित छवि ही सर्वप्रथम उभरकर आती है। ऐसा लगता है मानो देवी-देवता, ऐसे ही होते हैं और चित्र से निकलकर खड़े होने ही वाले हैं।
‘बी.के. मित्रा’, ‘जगन्नाथ’ और ‘भगवान’ गीताप्रेस की स्थापना के समय से ही कल्याण के आदि सम्पादक भाईजी श्री हनुमानप्रसादजी पोद्दार (1892-1971) से जुड़े। पोद्दारजी ने भी इन चित्रकारों से गीताप्रेस के लिए हिन्दू देवी-देवताओं और अन्य पौराणिक प्रसंगों पर आधारित चित्र बनवाते समय यह सदैव ध्यान रखा कि ये चित्र बिलकुल शास्त्रीय रीति से सर्वांग सुन्दर बनाए जाएं, अर्थात उनके आभूषण, तिलक, आयुध, वस्त्र, आसन, प्रभामंडल, आदि बनाने में शास्त्रों का कड़ाई से पालन हो। इतना ही नहीं, यह भी ध्यान रखा गया गया कि कहीं किसी चित्र में अश्लीलता न आ जाए। पोद्दार जी स्वयं इन चित्रों का बारीकी से निरीक्षण करके ही उनकी ब्लॉक बनने के लिए प्रेस को भेजते थे। यदि कोई चित्र उनको पसंद नहीं आता, तब उसे प्रकाशित नहीं किया जाता था। ऐसे हज़ारों अप्रकाशित चित्र गीताप्रेस की फाइलों में पड़े हुए हैं।
मैं अपने बचपन से ही इन चित्रों को अपने घर में आनेवाली ‘कल्याण’ पत्रिका में देखा करता था। मेरे पिताजी गीताप्रेस के अधिकृत विक्रेता भी थे, इसलिए गीताप्रेस से प्रकाशित अन्य ग्रन्थ भी हमारे ‘पुस्तक-भण्डार’ में आते थे। उन सभी पुस्तकों में बाहर-भीतर कहीं-न-कहीं इन चित्रों का उपयोग जरूर होता था। मुझे ये चित्र इतने पसंद आते थे कि मैं प्राय: कल्याण से उन चित्रों को निकालकर अपने पास रख लिया करता था और उनकी नक़ल उतारने का प्रयास करता था। बहुत ढूँढऩे पर इन चित्रकारों के विषय में कुछ सूचना मिली है, जिन्हें आपलोगों के समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूँ।

विनय कुमार मित्रा
विनय कुमार मित्रा, काशी-नरेश के निजी सचिव श्री अक्षय कुमार मित्रा के पाँचवें और सबसे छोटे सुपुत्र थे। विनय का जन्म जुलाई, 1884 में वाराणसी में हुआ था। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा भी वाराणसी के आस-पास हुई। विनय कुमार के दो बड़े भाई— उपेन्द्र कुमार मित्रा एवं जितेन्द्र कुमार मित्रा भी चित्रकार थे। ये सभी भाई धार्मिक चित्रों के प्रति काफ़ी लगाव रखते थे। विनय कुमार मित्र बचपन से ही लकड़ी के कोयले से दीवारों पर चित्र बनाना और उनमें रेखाओं के माध्यम से उभार लाना, कला के क्षेत्र में इनका पदार्पण था। सगे-सम्बन्धियों के लिए विवाहादि अवसरों पर ये दीवारों पर देवी-देवताओं का चित्र बनाया करते थे। इस शौक को उपजते देख इनके एक पड़ोसी ने इनको कागज, पेन्सिल, रबर, आदि खरीदकर दिया। यह अभ्यास धीरे-धीरे बढ़ता गया और कालांतर में ये धार्मिक चित्र बनाने में सिद्धहस्त हो गये। ये एक जन्मजात चित्रकार थे। इन्होंने इस कला के लिए किसी गुरु का सहारा नहीं लिया। इनकी इसी निष्ठा को देखकर झूँसी (प्रयाग) के सन्तप्रवर प्रभुदत्त ब्रह्मचारी (1885-1990) ने इनको अपने पास बुलाया और चित्र बनाने को कहा। वहीं पर इनकी मुलाकात श्री हनुमान् प्रसाद जी पोद्दार से हुई। पोद्दार जी ने इनको गीताप्रेस आने का आग्रह किया। उन्हीं के साथ मित्रा जी गोरखपुर आये और गीताप्रेस में हिंदू पौराणिक ग्रंथों के आधार पर चित्र बनाना आरम्भ कर दिया। गीताप्रेस से निकलेवाले श्रीमद्वाल्मीकीयरामायण, कल्याण, श्रीमद्भगवद्गीता में उन्होंने 4,500 से अधिक रंगीन चित्रों, हजारों रेखाचित्रों एवं श्वेत-श्याम चित्रों का सृजन किया।
विनय कुमार मित्रा, गीताप्रेस के अवैतनिक चित्रकार थे और उनके बनाए चित्र गीताप्रेस में विक्रय के लिए भी उपलब्ध होते थे। चित्रों की बिक्री से प्राप्त राशि ही विनय कुमार मित्रा की आमदनी थी। उनके द्वारा बनाए रंगीन चित्रों का मूल्य 40 से 60 रुपये प्रति चित्र (आकार लगभग 12&15 इंच) था, रेखाचित्र 5 रुपये प्रति चित्र तथा श्वेत-श्याम चित्र 25 रुपये प्रति चित्र के हिसाब से बेचे जाते थे। विनय कुमार मित्रा, चित्रकला के सच्चे साधक थे। विनय कुमार मित्रा ने भगवान् राम, कृष्ण के बाल्यकाल से लेकर युवावस्था तक के कई चित्र बनाए। मित्रा जी अपने चित्रों के लिए इंग्लैण्ड में निर्मित केण्ट पेपर व वाट्समैन पेपर का उपयोग करते थे। वे वाश-पेंटिंग ज्यादा बनाते थे और पोस्टर या ट्यूब-रंगों का प्रयोग करते थे।
दिनांक 14 जुलाई, 1974 को इस महान् कलासाधक का गोरखपुर के उत्तरी हुमायूँपुर क्षेत्र में अपने आवास में निधन हो गया। गीताप्रेस एवं गीता वाटिका में श्री मित्रा द्वारा निर्मित कई बड़े-बड़े चित्र लगाए गए हैं, इनमें कुछ तैल चित्र व कुछ जलरंग चित्र हैं। मित्रा जी द्वारा निर्मित सभी चित्र गीताप्रेस के लीला चित्र मन्दिर में सुरक्षित हैं और दर्शकों के अवलोकनार्थ प्रदर्शित किए गए हैं।

जगन्नाथ प्रसाद गुप्त
चित्रकला की ‘गीताप्रेस-शैली’ के विकास में चित्रकार ‘जगन्नाथ’ का महान् योगदान रहा है। अमेरिका द्वारा आपको ‘नोटेड हिंदू इलेस्ट्रेटर’ की सम्मानिक उपाधि प्राप्त थी।
जगन्नाथ प्रसाद गुप्त का जन्म 1909 में गोरखपुर के अलीनगर-निवासी छब्बू राम के तृतीय सुपुत्र के रूप में हुआ था। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा-दीक्षा भी गोरखपुर में ही हुई। चित्रकला के प्रति इनमें आरम्भ से ही रुझान था। सन् 1936 से 1953 तक दिल्ली, बम्बई, जयपुर, रतनगढ़, मथुरा आदि में रहते हुए इन्होंने अपनी कला का विकास किया।
जगन्नाथ प्रसाद गुप्त बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। दिनांक 25 नवम्बर, 1949 को ‘मेढ़ बन्धु कला शिक्षा प्रचार समिति’ की स्थापना इनके सतत प्रयत्नों से हुई, जिसका प्रधान कार्यालय ‘कल्याण स्टूडियो’, अलीनगर, गोरखपुर में था। इसी के तत्त्वावधान में 1953 में ‘अखिल भारतीय स्वर्णकार सम्मेलन’ का आयोजन ‘अग्रवाल भवन’ (आर्य नगर, गोरखपुर) में किया गया, जिसमें हस्तनिर्मित विभिन्न अनोखी वस्तुओं की प्रदर्शनी लगी, जैसे— मिश्री की डली पर सोने-चाँदी के तारों से निर्मित मक्खी, एक दाने चावल पर 121 अक्षरों की नक्काशी, चने के दाल पर चाँदी का हाथी, इत्यादि। जगन्नाथ जी ने एक शिल्प विद्यालय, फोटोग्राफी एवं प्लास्टिक कारखाना भी खोला।
जगन्नाथ प्रसाद गुप्त ने गीताप्रेस के लिए अनगिनत चित्र बनाए। ये अपने बनाए चित्रों के नीचे अपना नाम ‘जगन्नाथ’ अथवा ‘जग.’ लिखा करते थे। इनके द्वारा निर्मित चित्र आज भी गीताप्रेस के लीला चित्र मन्दिर में प्रदर्शित हैं। जगन्नाथ जी ने ‘कल्याण’ के अतिरिक्त ‘गीता’, ‘धर्म’, ‘सरिता’, ‘संगीत’, ‘आरोग्य’-जैसी पत्रिकाओं के लिए भी चित्र बनाये। गीताप्रेस से प्रकाशित 6 खण्डों में सम्पूर्ण महाभारत में सैकड़ों की संख्या में जो बहुरंगी, श्वेत-श्याम और रेखाचित्र छपे हुए हैं, वे जगन्नाथ जी की कूची से निकले हैं।
पोद्दार जी के अनुरोध पर जगन्नाथ जी ने भारत के भिन्न-भिन्न देवालयों की शैलियों का समावेश करके गीताप्रेस के मुख्य द्वार का मॉडल बनाया था, जो हमारे समक्ष इनकी कला का नमूना बनकर खड़ा है। 21 अप्रैल, 1955 को तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने इसका उद्घाटन किया था। इसी मॉडल से आकर्षित होकर गोरक्षनाथ मन्दिर के तत्कालीन महन्त महन्त दिग्विजयनाथ (1894-1969) ने गोरक्षनाथ मन्दिर का मॉडल बनाने का कार्यभार भी जगन्नाथ जी के कन्धों पर डाला। महन्त दिग्विजयनाथ के आदेशानुसार जगन्नाथ जी ने गोरक्षनाथ मन्दिर का भी अद्भुत मॉडल तैयार किया। गोरक्षनाथ का वर्तमान मन्दिर इसी मॉडल के आधार पर बनाया गया है। गीतावाटिका, गोरखपुर में राधाष्टमी के शुभ अवसर पर सुसज्जित राधा-माधव के अनेक चित्रों तथा अग्रवाल भवन (अलीनगर, गोरखपुर) के मुख्य हॉल में महाराजा अग्रसेन आदि के आदमकद सुन्दर तैलचित्रों में जगन्नाथ प्रसाद गुप्त जी की अनोखी कला-साधना का परिचय मिलता है। दिनांक 22 जनवरी, 1960 को मात्र 51 वर्ष की आयु में इस महान् कलासाधक का देहावसान हो गया।

भगवानदास
‘भगवान’ के नाम से सुप्रसिद्ध भगवानदास गीताप्रेस के महान् चित्रकारों में से एक थे। इनका जन्म 10 मई, 1917 को गोरखपुर के उत्तरी हुमायूँपुर नामक मुहल्ले में हुआ था। इनकी शिक्षा-दीक्षा गोरखपुर में ही हुई। 15 साल की उम्र में ही इनमें चित्रकला के प्रति रुझान जाग्रत् हुआ। प्रारम्भ में इन्होंने बिना गुरु के सान्निध्य में चित्रकला का अभ्यास किया, किन्तु बीस की उम्र पार करते ही मार्गदर्शन हेतु एक गुरु की आवश्यकता महसूस हुई। प्रसिद्ध चित्रकार विनय कुमार मित्रा से इन्होंने चित्रकला की बारीकियाँ सीखीं। भगवानदास ने महान् गुरु के महान् शिष्य के रूप में ख्याति अर्जित की।
गीताप्रेस से प्रकाशित ‘कल्याण’, ‘श्रीरामचरितमानस’, ‘श्रीमद्भागवतमहापुराण’, ‘हनुमान चालीसा’ के अतिरिक्त अन्य जनोपयोगी पुस्तकों में रंगीन, श्वेत-श्याम और रेखाचित्र बनाकर ‘भगवान’ ने गीताप्रेस के साथ सनातन-धर्म की अमूल्य सेवा की।
भगवानदास ने वैद्यनाथ आयुर्वेद भवन तथा डाबर के प्रतीक-चिह्नों का निर्माण किया। 1950 के दशक में इन्होंने प्रसिद्ध फि़ल्म-अभिनेता श्री पृथ्वीराज कपूर (1906-1972) का एक आदमकद रंगीन चित्र बनाया, जिसपर मुग्ध होकर कपूर साहिब इनको बम्बई ले जाना चाहते थे। पर भगवान ने गोरखपुर में अपनी भक्ति-रचना के चलते बम्बई जाने से इनकार कर दिया।
भगवान अपने सादे पहनावे और मधुर स्वभाव के लिए जाने जाते थे। इन्होंने कभी भी पैसे के पीछे भागने की प्रवृत्ति नहीं दिखाई। जब कभी इन्हें पैसे की आवश्यकता होती थी, एक चित्र बनाकर गीताप्रेस को बेच देते थे। इनके चित्रों की कीमत उस समय (50 के दशक में) 100 से 200 रुपये तक थी।