गाय होंगी तो रेगिस्तान भी होंगे हरे-भरे

सुबोध कुमार
लेखक गौ एवं वेद विशेषज्ञ हैं।


वशामेवामृतमाहुर्वशां मृत्युमुपासते।
वशेदं सर्वमभवद्‌ देवा मनुष्या असुरा: पितर ऋषय:।।
अथर्व 10-10-26
इस मंत्र का अर्थ है – प्रकृति की शक्ति अनश्वर (अमृतमान) है। यह शक्ति प्रकृति को गौ (सब शाकाहारी जीवों) से प्राप्त होती है। उनके (गौ इत्यादि के) नष्ट होने से प्रकृति का भी नष्ट होना अनिवार्य है और प्रकृति मत्र्य हो जाती है। गौआधारित समाज में प्रकृति समान रूप से देवता स्वरूप मनुष्यों, असुरों, पितरों, ऋषियों आदि सभी का आधार बनती है।
इस मंत्र को ठीक से समझना हो तो हमें सीरिया, ईराक, अरब आदि देशों को देखना चाहिए। ये सभी देश एक समय में कृषि और पशुपालन प्रधान देश थे। पुरातत्व के नवीनतम अनुसंधानों से यह आज पता चलता है कि सीरिया, ईराक, अरब के इलाके में विकसित हुई सुमेर सभ्यता में आज से लगभग साढ़े सात हजार वर्ष पूर्व काफी अच्छी कृषि होती थी। कृषि का आधार पशुपालन हुआ करता था। साफ है कि उस काल में इन इलाकों में अधिकांश लोग शाकाहारी ही रहे होंगे। इसका यह अर्थ भी है कि इन इलाकों में आज जैसा मरूस्थल नहीं रहा होगा। अवश्य इन इलाकों में भी अच्छी उपजाऊ भूमि रही होगी। ऐसे में प्रश्न उठता कि एक हरा-भरा कृषियोग्य प्रदेश रेगिस्तान कैसे बन गया?
इस प्रश्न का उत्तर हमें मिलता है दक्षिण अफ्रीका के एक देश रोडेशिया में किए गए एक प्रयोग से। यह प्रयोग वहाँ अनेक जैवविज्ञानियों ने एक समूह बना कर किया था। इसके प्रमुख थे एलेन सेवॅरी। उन्होंने वहाँ के जंगलों को समाप्त होने से बचाने के लिए उन जंगलों में रहने वाले सभी 10 हजार हाथियों को मार दिया। उनका विचार था कि ये हाथी पेड़ों को नष्ट करते हैं और इससे जंगल खत्म हो रहा है। इस प्रक्रिया में उन्हें 25 वर्ष लगे। परंतु इसके बाद उनके ध्यान में आया कि हाथियों के मारे जाने के बाद से जंगल और भी तेजी से समाप्त होने लगे।
एलेन सेवॅरी ने इस पर विशेष काम किया और उन्होंने इन जंगलों में गाय लाकर छोड़ दीं। बड़ी संख्या में हाथी लाना तो संभव नहीं था। इसलिए गाय लाई गईं। इसका परिणाम हुआ कि कुछ वर्षों में जंगल फिर से हरे-भरे होने लगे। वैज्ञानिक अनुसंधान से यह पता चला कि जिस भूमि में गौ का एक किलो गोबर फैला दिया जाता है, उस भूमि में वर्षा के नौ लीटर जल को आद्र्रता के रूप में समेटने के रखने की सामथ्र्य आ जाती है, जिससे वहाँ हरियाली पुन: उत्पन्न हो जाती है। जिन क्षेत्रों में शाकाहारी गौ इत्यादि पशु नहीं थे वहां पर हुई वर्षा का जल भूमि से बह जाता था, गोबर मिली भूमि की तरह भूमि में संचित नहीं हो पाता। इस विषय पर ऋग्वेद 8.72.12 का मंत्र है गावं उपावतावतं महीयज्ञस्य रप्सुदा। उभा कर्णा हिरण्यया।। यानी जहां गोपालन होता है वहां की भूमि में आद्र्रता बनी रहती है। वहां के निवासी इतने समृद्ध होते हैं कि वे कानों में सोने के कुण्डल पहनते हैं।
एलेन सेवॅरी ने भी इसका यह निष्कर्ष निकाला कि शाकाहारी पशु जमीन को उपजाऊ बनाते हैं और इससे वहाँ पेड़-पौधे लगने में आसानी होती है। यदि हम रोडेशिया और एलेन सेवॅरी के इस प्रयोग के निष्कर्षों के आधार पर विचार करें तो कहा जा सकता है कि दुनिया में सर्वत्र मानव सभ्यता पशुपालन और कृषि पर इसलिए ही निर्भर रही है और जहाँ जहाँ से मनुष्यों ने शाकाहार को त्याग कर मांसाहार को बड़े पैमाने पर अपनाया, वहाँ रेगिस्तान जैसे हालात पैदा हो गए।
यही कारण है कि एक समय खेती और पशुपालन में सबसे आगे रहने वाले सुमेर सभ्यता के वारिस केवल मांसाहार और शाकाहारी गौ इत्यादि पशुओं का संरक्षण न करने से मरुस्थल बन चुके हैं। यदि वे आज भी भारतीय परंपरा से गौपालन करें, उनका गोचर तैयार करें और धीरे-धीरे शाकाहार की ओर बढ़ें तो वहाँ की भूमि एक बार फिर से मरूस्थल से हरी भरी हो सकती है। विश्व भर में केवल भारतवर्ष की ही संस्कृति सृष्टि के आदि काल से जीवित है तो इसका मुख्य कारण भारतवर्ष की गौ-संरक्षण और शाकाहारी आहार व्यवस्था ही है।