क्या वेदों में पशुबलि और मांसाहार का विधान है?

डॉ. विवेक आर्य

लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।

वेदों के विषय में सबसे अधिक प्रचलित अगर कोई शंका हैं तो वह हैं कि क्या वेदों में पशुबलि, माँसाहार आदि का विधान हैं? इस भ्रान्ति के होने के मुख्य-मुख्य कुछ कारण हैं। सर्वप्रथम तो पाश्चात्य विद्वानों जैसे मैक्समुलर, ग्रिफ्फिथ आदि द्वारा यज्ञों में पशुबलि, माँसाहार आदि का विधान मानना, दूसरा मध्य काल के आचार्यों जैसे सायण, महीधर आदि का यज्ञों में पशुबलि का समर्थन करना, तीसरा ईसाईयों, मुसलमानों आदि द्वारा माँस भक्षण के समर्थन में वेदों कि साक्षी देना, चौथा साम्यवादी अथवा नास्तिक विचारधारा के समर्थकों द्वारा सुनी-सुनाई बातों को बिना जाँचें बार बार रटना।

किसी भी सिद्धांत अथवा किसी भी तथ्य को आँख बंद कर मान लेना बुद्धिमान लोगों का लक्षण नहीं हैं। हम वेदों के सिद्धांत की परीक्षा वेदों की साक्षी द्वारा करेगे जिससे हमारी भ्रान्ति का निराकरण हो सके।

क्या वेदों में मांस भक्षण का विधान हैं?

वेदों में मांस भक्षण का स्पष्ट निषेध किया गया हैं।) जैसे, हे मनुष्यों! जो गौ आदि पशु हैं वे कभी भी हिंसा करने योग्य नहीं हैं (यजुर्वेद 1ध्1)

जो लोग परमात्मा के सहचर प्राणी मात्रा को अपनी आत्मा का तुल्य जानते हैं अर्थात जैसे अपना हित चाहते हैं वैसे ही अन्यों में भी बरतते हैं। यजुर्वेद 40ध्7)

हे दांतों, तुम चावल खाओ, जौ खाओ, उड़द खाओ और तिल खाओ। तुम्हारे लिए यही रमणीय भोज्य पदार्थों का भाग हैं। तुम किसी भी नर और मादा की कभी हिंसा मत करो अथर्ववेद (6ध्140ध्2)

जो लोग नर व मादा और अंडों के नाश से उपलब्ध हुए मांस को कच्चा या पकाकर खाते हैं, हमें उनका विरोध करना चाहिए। (अथर्ववेद 8ध्6ध्23)३

निर्दाेषों को मारना निश्चित ही महापाप है, हमारे गाय, घोड़े और पुरुषों को मत मार। (अथर्ववेद 10ध्1ध्29)२९

इन मन्त्रों में स्पष्ट रूप से यह सन्देश दिया गया हैं कि वेदों के अनुसार मांस भक्षण निषेध हैं।

वेदों में यज्ञ और पशु बलि

यज्ञ की महता का गुणगान करते हुए वेद कहते हैं कि सत्यनिष्ठ विद्वान लोग यज्ञों द्वारा ही पूजनीय परमेश्वर की पूजा करते हैं। यज्ञों में सब श्रेष्ठ धर्मों का समावेश होता हैं। यज्ञ शब्द जिस यज् धातु से बनता हैं उसके अर्थ हैं, देवपूजा, संगतिकरण और दान। इसलिए यज्ञो वै श्रेष्ठतमं कर्म का कथन मिलता है। यज्ञ न करने वाले के लिए वेद कहते हैं कि जो यज्ञमयी नौका पर चढ़ने में समर्थ नहीं होते, वे कुत्सित, अपवित्रा आचरण वाले होकर यही इस लोक में नीचे-नीचे गिरते जाते हैं। एक ओर वेद यज्ञ की महिमा को परमेश्वर की प्राप्ति का साधन बताते हैं, तो दूसरी और वैदिक यज्ञों में पशुबलि का विधान कैसे संभव है?

यज्ञ में पशु बलि का विधान मध्यकाल की देन हैं। प्राचीन काल में यज्ञों में पशु बलि आदि प्रचलित नहीं थे। मध्यकाल में जब गिरावट का दौर आया तब मांसाहार, शराब आदि का प्रयोग प्रचलित हो गया। सायण, महीधर आदि के वेद भाष्य में मांसाहार, हवन में पशुबलि, गाय, अश्व, बैल आदि का वध करने की अनुमति थी जिसे देखकर मैक्समुलर, विल्सन, ग्रिफ्फिथ आदि पाश्चात्य विद्वानों ने वेदों से मांसाहार का भरपूर प्रचार कर न केवल पवित्रा वेदों को कलंकित किया अपितु लाखों निर्दाेष प्राणियो को करवा कर मनुष्य जाति को पापी बना दिया।

यह समझने की बात है कि एक ओर वेदों में जीव रक्षा और निरामिष भोजन का आदेश हैं तो दूसरी ओर उसके विपरीत उन्हीं वेदों में पशु आदि की यज्ञों में बलि देने का विधान तर्कसंगत नहीं लगता। वेदों में यज्ञों में पशु बलि के विरोध में अनेक मन्त्रों का विधान हैं। जैसे, यज्ञ के विषय में अध्वर शब्द का प्रयोग वेद मन्त्रों में हुआ हैं जिसका अर्थ निरुक्त के अनुसार हिंसा रहित कर्म हैं।

हे ज्ञान स्वरुप परमेश्वर, तू हिंसा रहित यज्ञों (अध्वर) में ही व्याप्त होता हैं और ऐसे ही यज्ञों को सत्यनिष्ठ विद्वान लोग सदा स्वीकार करते हैं (ऋग्वेद 1/1/4)

यज्ञ के लिए अध्वर शब्द का प्रयोग ऋग्वेद 1/1/8, ऋग्वेद 1/14/21,ऋग्वेद 1/128/4 ऋग्वेद 1/19/1, ऋग्वेद 3/21/1, सामवेद 2/4/2, अथर्ववेद 4/24/3, अथर्ववेद 1/4/2 इत्यादि मन्त्रों में इसी प्रकार से हुआ हैं। चारों वेदों में अनेक मन्त्रों में अध्वर शब्द का प्रयोग बतलाता है कि वेदों में हिंसारहित यज्ञ का ही उपदेश है।

वेदों में यज्ञ को श्रेष्ठतम कर्म के नाम से पुकारते हुए कहा गया है कि पशुओं की रक्षा करे (यजुर्वेद 1/1)। पति पत्नी के लिए उपदेश हैं कि पशुओं की रक्षा करे (यजुर्वेद 6/11)। हे मनुष्य, तुम दो पैर वाले अर्थात अन्य मनुष्यों एवं चार पैर वाले अर्थात पशुओं की भी सदा रक्षा कर (यजुर्वेद 14/8)।

इस प्रकार चारों वेदों में दिए अनेक मन्त्रों से यह सिद्ध होता हैं कि यज्ञों में हिंसारहित कर्म करने का विधान हैं एवं मनुष्य का अन्य पशु पक्षियों की रक्षा करने का स्पष्ट आदेश है।

इस पर यह पूछा जा सकता है कि क्या वेदों में वर्णित अश्वमेध, नरमेध, अजमेध, गोमेध में घोड़ा, मनुष्य, गौ की यज्ञों में बलि देने का विधान नहीं हैं? मेध का मतलब है मारना जिससे यह सिद्ध भी होता है। परंतु मेध शब्द का अर्थ केवल हिंसा नहीं है। मेध शब्द के तीन अर्थ हैं – मेधा अथवा शुद्ध बुद्धि को बढ़ाना, लोगो में एकता अथवा प्रेम को बढ़ाना और हिंसा। इसलिए मेध से केवल हिंसा शब्द का अर्थ ग्रहण करना उचित नहीं है।

जब यज्ञ को अध्वर अर्थात ‘हिंसा रहित‘ कहा गया है, तो उसके सन्दर्भ में ‘मेध‘ का अर्थ हिंसा क्यों लिया जाये? बुद्धिमान व्यक्ति ‘मेधावी‘ कहे जाते हैं और इसी तरह लड़कियों का नाम मेधा, सुमेधा इत्यादि रखा जाता है, तो क्या ये नाम क्या उनके हिंसक होने के कारण रखे जाते हैं या बुद्धिमान होने के कारण?

अश्वमेध शब्द का अर्थ यज्ञ में अश्व कि बलि देना नहीं है, अपितु शतपथ 13/1/6/3३ और 13/2/2/3 के अनुसार राष्ट्र के गौरव, कल्याण और विकास के लिए किये जाने वाले सभी कार्य अश्वमेध हैं। इसी प्रकार गौमेध का अर्थ यज्ञ में गौ की बलि देना नहीं है, अपितु अन्न को दूषित होने से बचाना, अपनी इन्द्रियों को वश में रखना, सूर्य की किरणों से उचित उपयोग लेना, धरती को पवित्रा या साफ़ रखना है। ‘ गौ’ शब्द का एक और अर्थ हैं पृथ्वी। पृथ्वी और उसके पर्यावरण को स्वच्छ रखना भी ‘गौमेध’ कहलाता है। नरमेध का अर्थ मनुष्य की बलि देना नहीं हैं अपितु मनुष्य की मृत्यु के बाद उसके शरीर का वैदिक रीति से दाह संस्कार करना नरमेध यज्ञ है। मनुष्यों को उत्तम कार्यों के लिए प्रशिक्षित एवं संगठित करना भी नरमेध या पुरुषमेध या नृमेध यज्ञ कहलाता है। अजमेध का अर्थ बकरी आदि की यज्ञ में बलि देना नहीं है, अपितु अज कहते हैं बीज, अनाज या धान आदि को। इसलिए अजमेध का सही अर्थ कृषि की पैदावार बढ़ाना हैं। अजमेध का सीमित अर्थ अग्निहोत्रा में धान आदि की आहुति देना है।

एक और शंका की जाती है कि यजुर्वेद 24/29 में हस्तिन आलभते अर्थात हाथियों को मारने का विधान हैं? ’लभ्’ धातु से बनने वाला आलम्भ शब्द का अर्थ मारना नहीं अपितु अच्छी प्रकार से प्राप्त करना, स्पर्श करना या देना होता हैं। उदाहरण के लिए पारस्कर सूत्रा 2/2/16 में कहा गया हैं कि आचार्य ब्रह्मचारी का आलम्भ अर्थात हृदय का स्पर्श करता हैं। यहाँ पर आलम्भ का अर्थ स्पर्श आया हैं। पारस्कर सूत्रा 1/8/8 में ही आया हैं कि वर वधु के दक्षिण कंधे के ऊपर हाथ ले जाकर उसके हृदय का स्पर्श करे। यहाँ पर भी आलम्भ का अर्थ स्पर्श आया हैं। अगर यहाँ पर आलम्बन शब्द का अर्थ मरना ग्रहण करे तो यह कैसे युक्तिसंगत एवं तर्क संगत सिद्ध होगा? इससे सिद्ध होता हैं कि आलम्भ शब्द का अर्थ ग्रहण करना, प्राप्त करना अथवा स्पर्श करना हैं। इस प्रकार उपरोक्त उद्धरण में हस्तिन शब्द का अर्थ अगर हाथी ले तो इस मंत्रा में राजा को अपने राज्य के विकास हेतु हाथी आदि को प्राप्त करना, अपनी सेनाओं को सुदृढ़ करना बताया गया है। यहाँ पर हिंसा का कोई विधान नहीं हैं।

एक शंका यह की जाती है कि वेद, ब्राह्मण एवं सूत्रा ग्रंथों में संज्ञपन शब्द आया है जिसका अर्थ पशु को मारना है। वास्तव में संज्ञपन शब्द का अर्थ हैं ज्ञान देना दिलाना तथा मेल कराना। अथर्ववेद 6/10/14-15 में लिखा हैं कि तुम्हारे मन का ज्ञानपूर्वक अच्छी प्रकार (संज्ञपन) मेल हो, तुम्हारे हृदयों का ज्ञानपूर्वक अच्छी प्रकार (संज्ञपन) मेल हो। संज्ञपन शब्द का मेल के स्थान पर हिंसापरक अर्थ करना अज्ञानता का परिचायक हैं।

क्या वेदों में गायों के वध करने का आदेश हैं?

गोघ्न शब्द में हन धातु का प्रयोग हैं जिसके दो अर्थ बनते हैं हिंसा और गति। गोघ्न में उसका गति अथवा ज्ञान, गमन, प्राप्ति विषयक अर्थ हैं। मुख्य भाव यहाँ प्राप्ति का हैं, अर्थात जिसे उत्तम गौ प्राप्त कराई जाये। वास्तव में हिंसा के प्रकरण में वेद का उपदेश गौ की हत्या करने वाले से दूर रहने का हैं। ऋग्वेद 1/114/10 में लिखा हैं जो गोघ्न गौ कि हत्या करनेवाला है, वह नीच पुरुष है, वह तुमसे दूर रहे।

वेदों के कई उदाहरणों से पता चलता है कि ‘हन्’ का प्रयोग किसी के निकट जाने या पास पहुंचने के लिए भी किया जाता है। उदहारण में अथर्ववेद 6/101/1 में पति को पत्नी के पास जाने का उपदेश है। इस मंत्रा का यह अर्थ कि पति पत्नी के पास जाये उचित प्रतीत होता हैं ना कि पति द्वारा पत्नी को मारना उचित सिद्ध होता हैं। इसलिए हनन का केवल हिंसा अर्थ गलत परिप्रेक्ष्य में प्रयोग करना भ्रम फैलाने के समान है।

इसी प्रकार ऋग्वेद के मंत्रा 10/68/3 में अतिथिनीर्गाः का अर्थ अतिथियों के लिए गौ किया गया हैं जिसका तात्पर्य यह प्रतीत होता हैं कि किसी प्रतिष्ठित व्यक्ति के आने पर गौ को मारकर उसके मांस से उसे तृप्त किया जाता था। यहाँ पर जो भ्रम हुआ हैं उसका मुख्य कारण अतिथिनी शब्द को समझने में की गई गलती हैं। यहाँ पर उचित अर्थ बनता हैं ऐसी गौएं जो अतिथियों के पास दानार्थ लाई जायें, उन्हें दान की जायें। मोनियर विलियम्स  ने भी अपने संस्कृत इंग्लिश शब्दकोश में अतिथिग्व का अर्थ जिसके पास अतिथि प्रेम वश जाये, ऐसा किया हैं। श्री ब्लूमफिल्ड ने भी इसका अर्थ अतिथियों को गौएं भेंट करनेवाला ही किया हैं।

एक भ्रान्ति यह भी है कि वेदों में बैल को खाने का आदेश हैं। वेदों में जैसे गौ के लिए अघन्या अर्थात् न मारने योग्य शब्द का प्रयोग है, उसी प्रकार से बैल के लिए अघ्न्य शब्द का प्रयोग हैं। यजुर्वेद 12/73 में अघन्या शब्द का प्रयोग बैल के लिए हुआ हैं। इसकी पुष्टि सायणाचार्य ने काण्वसंहिता में भी की हैं। इसी प्रकार से अथर्ववेद 9/4/17 में लिखा हैं कि बैल सींगों से अपनी रक्षा स्वयं करता हैं, परन्तु मानव समाज को भी उसकी रक्षा में भाग लेना चाहिए। अथर्ववेद 9/4/19 मंत्रा में बैल के लिए अधन्य और गौ के लिए अधन्या शब्दों का वर्णन मिलता हैं। इन उदहारणों से यह सिद्ध होता हैं कि गौ के साथ साथ बैल कि रक्षा का वेद सन्देश देते हैं।

एक और शंका की जाती है कि वेद में वशा/बन्ध्या अर्थात वृद्ध गौ अथवा बैल (उक्षा) को मारने का विधान हैं। इस शंका का कारण ऋग्वेद 8/43/11 मंत्रा के अनुसार बन्ध्या गौओं कि अग्नि में आहुति देने का विधान बताया गया हैं। यह सर्वथा अशुद्ध है। इस मंत्रा का वास्तविक अर्थ निघण्टु 3/3 के अनुसार यह हैं कि जैसे महान सूर्य आदि भी जिसके प्रलयकाल में (वशा) अन्न व भोज्य के समान हो जाते हैं। इसका शतपथ 5/1/3 के अनुसार अर्थ हैं पृथ्वी भी जिसके लिए (वशा) अन्न के समान भोज्य हैं ऐसे परमेश्वर की नमस्कारपूर्वक स्तुतियों से सेवा करते हैं। वेदों के विषय में इस भ्रान्ति के होने का मुख्य कारण वशा, उक्षा, ऋषभ आदि शब्दों के अर्थ न समझ पाना हैं।

यज्ञ प्रकरण में उक्षा और वशा दोनों शब्दों के औषधिपरक अर्थ का ग्रहण करना चाहिए, जिन्हें अग्नि में डाला जाता हैं। सायणाचार्य एवं मोनियर विलियम्स के अनुसार उक्षा शब्द के सोम, सूर्य, ऋषभ नामक औषधि हैं। वशा शब्द के अन्य अर्थ अथर्ववेद 1/10/1 के अनुसार ईश्वरीय नियम वा नियामक शक्ति हैं। शतपथ 1/8/3/15 के अनुसार वशा का अर्थ पृथ्वी भी है। अथर्ववेद 20/103/15 के अनुसार वशा का अर्थ संतान को वश में रखने वाली उत्तम स्त्राी भी हैं। इस सत्यार्थ को न समझ कर वेद मन्त्रों का अनर्थ करना निंदनीय हैं।

एक तर्क दिया जाता है कि वेदादि धर्म ग्रंथों में माष शब्द का उल्लेख हैं जिसका अर्थ मांस खाना हैं। माष शब्द का प्रयोग ‘माषौदनम्‘ के रूप में हुआ है। इसे बदल कर किसी मांसभक्षी ने मांसौदनम् अर्थ कर दिया हैं। यहाँ पर माष एक दाल के समान वर्णित है। इसलिए यहाँ मांस का तो प्रश्न ही नहीं उठता। आयुर्वेद (सुश्रुत संहिता शरीर अध्याय) गर्भवती स्त्रिायों के लिए मांसाहार को सख्त मना करता है और उत्तम संतान पाने के लिए माष सेवन को हितकारी कहता है। इससे स्पष्ट होता है कि माष शब्द का अर्थ मांसाहार नहीं अपितु दाल है। फिर भी अगर कोई माष को मांस ही कहना चाहे, तब भी मांस का निरुक्त 4/1/3 के अनुसार अर्थ होगा मननसाधक, बुद्धिवर्धक और मन को अच्छी लगने वाली वस्तु जैसे फल का गूदा, खीर आदि।

प्राचीन ग्रंथों में मांस अर्थात गूदा खाने के अनेक प्रमाण मिलते है। जैसे, चरक संहिता में आम्रमांसं (आम का गूदा), खजूरमांसं (खजूर का गूदा) और तैत्तरीय संहिता 2/32/8८ (दही, शहद और धान) को मांस कहा गया है। इससे यही सिद्ध होता हैं कि वेदादि शास्त्रों में जहाँ पर माष शब्द आता हैं अथवा मांस के रूप में भी जिसका प्रयोग हुआ है, उसका अर्थ दाल अथवा फलों का मध्य भाग अर्थात् गूदा हैं।

यजुर्वेद के 25 अध्याय में सायण, महीधर, उव्वट, ग्रिफ्फिथ, मैक्समुलर आदि ने अश्व के हिंसापरक अर्थ किये हैं। इसका मुख्य कारण वाजिनम् शब्द के अर्थ को न समझना हैं। वाजिनम् का अश्व के साथ-साथ अन्य अर्थ हैं शूर, बलवान, गतिशील और तेज। यजुर्वेद के 25/34 मंत्रा का अर्थ करते हुए सायण लिखते हैं कि अग्नि से पकाए, मरे हुए तेरे अवयवों से जो मांसरस उठता है, वह वह भूमि या तृण पर न गिरे, वह इच्छित देवों को प्राप्त हो। इस मंत्रा का अर्थ स्वामी दयानंद लिखते हैं, हे मनुष्य जो ज्वर आदि से पीड़ित अंग हो उन्हें वैद्य जनों से निरोग कराना चाहिए क्योंकि उन वैद्य जनों द्वारा जो औषध दिया जाता हैं वह रोगीजन के लिए हितकारी होता हैं एवं मनुष्य को व्यर्थ वचनों का उच्चारण न करना चाहिए, किन्तु विद्वानों के प्रति उत्तम वचनों का ही सदा प्रयोग करना चाहिए।

अश्व की हिंसा के विरुद्ध यजुर्वेद 13/47 मंत्रा का शतपथकार ने पृष्ठ 668 पर अर्थ लिखा हैं कि अश्व की हिंसा न कर। यजुर्वेद 25/44 के यज्ञ में घोड़े की बलि के समर्थन में अर्थ करते हुए सायण लिखते हैं कि हे अश्व! तू अन्य अश्वों कि तरह मरता नहीं क्यूंकि तुझे देवत्व प्राप्ति होगी और न हिंसित होता है क्यूंकि व्यर्थ हिंसा का यहां अभाव हैं। प्रत्यक्ष रूप में अवयव नाश होते हुए ऐसा कैसे कहते हो? इसका उत्तर देते हैं कि सुंदर देवयान मार्गों से देवों को तू प्राप्त होता हैं, इसलिए यह हमारा कथन सत्य हैं।

इस मंत्रा का स्वामी दयानंद अर्थ करते हैं कि जैसे विद्या से अच्छे प्रकार प्रयुक्त अग्नि, जल, वायु इत्यादि से युक्त रथ में स्थित हो के मार्गों से सुख से जाते हैं, वैसे ही आत्मज्ञान से अपने स्वरुप को नित्य जान के मरण और हिंसा के डर को छोड़कर दिव्य सुखों को प्राप्त हो।

क्या इंद्र देवता बैल खाते हैं?

इंद्र द्वारा बैल खाने के समर्थन में ऋग्वेद 10/28/3 और 10/86/14 का उदाहरण दिया जाता है। यहाँ पर वृषभ और उक्षन् शब्दों के अर्थ से अनभिज्ञ लोग उनका अर्थ बैल कर देते हैं। ऋग्वेद में लगभग 20 स्थलों पर अग्नि को, 65 स्थलों पर इंद्र को, 11 स्थलों पर सोम को, 3 स्थलों पर पर्जन्य को, 5 स्थलों पर बृहस्पति को, 5 स्थलों पर रूद्र को वृषभ कहा गया हैं । व्याख्याकारों के अनुसार वृषभ का अर्थ यज्ञ हैं। ऋग्वेद में उक्षन् शब्द का प्रयोग अग्नि, सोम, आदित्य, मरुत आदि के लिए हुआ है। जब वृषभ और उक्षन् शब्दों के इतने सारे अर्थ वेदों में दिए गये हैं तब उनका व्यर्थ ही बैल अर्थ कर उसे इंद्र को खिलाना युक्तिसंगत एवं तर्कपूर्ण नहीं हैं। इसी सन्दर्भ में ऋग्वेद में इंद्र के भोज्य पदार्थ निरामिष रुपी धान, करम्भ, पुरोडाश तथा पेय सोमरस हैं ना कि बैल को बताया गया हैं।

इन प्रमाणों से यही सिद्ध होता हैं कि यज्ञ में किसी भी पशुबलि का कोई भी विधान वेदों के सत्य उपदेश के अनुकूल नहीं हैं एवं जो कुछ भी मध्य काल में प्रचलित हुआ वह वेदों के मनमाने अर्थ करने से हुआ हैं।