क्या अफवाहों से प्रेरित हुए डॉ. अम्बेडकर

पुस्तक का नाम – तथ्यों के आलोक में अम्बेडकर
लेखक – डॉ. त्रिभुवन सिंह, मूल्य – 200 रूपये मात्र,
उपलब्धता: यह पुस्तकhttps://www.amazon.in/ से खरीदी जा सकती है।


हाल में फैज अहमद फैज की नज्म ‘बस नाम रहेगा अल्लाह का’ पर विवाद हुआ तो उसके पक्ष में यह लिखा गया कि एक नज्म अपने अंदर कई अर्थ छुपाए रखती है। उसे शाब्दिक अर्थो से नहीं समझा जा सकता। जबकि ‘बस नाम रहेगा अल्लाह का’ को पढ़कर स्पष्ट होता है कि इससे अधिक साफ शब्दों में कोई शायर क्या इस्लामिक स्टेट के संबंध में लिख सकता था? जब फैज अहमद फैज के बचाव में कई कम्यूनिस्ट इतिहासकार भी सामने आए और उन्होंने कुतर्क कर—करके पाकिस्तान कम्यूनिस्ट पार्टी के संस्थापकों में से एक फैज की वकालत की। उनकी वकालत पर हंसी आनी ही थी क्योंकि रोमिला थापर से लेकर इरफान हबीब तक वही सारे लोग हैं, जिन्होंने भारतीय इतिहास के साथ छेड़छाड़ किया। जिन्होंने तथ्यों को किनारे लगाकर अपने मुताबिक काल्पनिक कहानियों को इतिहास का नाम दे दिया।

उन्होंने संस्कृत के श्लोक का विकृत अर्थ करते हुए कभी नहीं सोचा कि क्या वे श्लोक के दार्शनिक पक्ष के साथ न्याय कर रहे हैं? एक श्लोक अपने अंदर कई अर्थ समेटे हुए हो सकते हैं। क्या वे अनुवाद करते हुए, लेखक के मन की थाह लेने में सफल हुए। उन्होंने मनचाहा अनुवाद किया और उनके मित्रों ने दो हजार जगह उस गलत अनुवाद को उद्धृत कर दिया। अब जिसे इस मुर्खता का इल्म है, वह जाकर कहां—कहां उस गलत अनुवाद को सही करता फिरेगा? इस तरह बड़ी धूर्तता के साथ इस देश में बड़े—बड़े झूठ को स्थापित किया गया है।
मैक्समुलर जो संस्कृत ग्रंथों पर पूरे अधिकार से लिख रहा था। उनके संबंध में आज तक पता नहीं चला कि उसने संस्कृत की पढ़ाई किस गुरूकुल में की? अब ऐसे कई तथ्यों को केन्द्र में रखकर डॉक्टर त्रिभुवन सिंह ने ‘तथ्यों के आलोक में डॉक्टर अंबेडकर, शुद्र कौन थे, अवलोकन और समीक्षा’ के नाम से एक किताब लिखी है। यह किताब अनामिका प्रकाशन, तुलाराम बाग, प्रयागराज से आई है।

जैसाकि इस किताब के शीर्षक से अनुमान लगाया जा सकता है कि इस किताब को लिखने की प्रेरणा लेखक को डा अम्बेडकर को पढ़ते हुए मिली। डॉ अम्बेडकर अपनी किताब शूद्र कौन थे में गलत व्याख्या/अनुवाद के शिकार हुए। बहरहाल, डॉ. अम्बेडकर की पुस्तक ‘शूद्र कौन थे’ की चर्चा से पहले थोड़ी मैक्समुलर की बात कर लेते हैं। पुस्तक के अनुसार मैक्समुलर की नीयति उसके द्वारा 1868 में आरगोइल के ड्यूक को लिखे पत्र से स्पष्ट हो जाती है जो भारत में ब्रिटिश सेक्रेटरी आफ स्टेट के पद पर नियुक्त थे। मुलर ने दिसम्बर 16, 1868 को लिखा — ”भारत का प्राचीन धर्म विनाश के कगार पर है और ऐसे में ईसाइयत अपने पांव नहीं पसारती, कन्वर्जन नहीं होता तो यह गलती किसकी होगी?
इससे स्पष्ट होता है कि मैक्समूलर की भारत में भूमिका अकादेमिक ना होकर पूरी तरह से राजनैतिक और चर्च के एजेन्ट के तौर पर भारत में कन्वर्जन को बढावा देने वाले मिशनरी की थी। वह भारतीयों के ईसाई रिलिजन में कन्वर्जन के प्रबल समर्थकों में था।

सन 1492 के बाद भारत की खोज में निकले यूरोप के आक्रांताओं ने विश्वभर के गैर ईसाई देशों पर आक्रमण किया और उनकी जर जोरू जमीन पर जबरन कब्जा किया। बहुत से देशों के ‘देसी निवासियों’ का उन्होंने समूल विनाश किया और उन पर भी आज मालिक की तरह काबीज हैं। जैसे अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया।

1757 में ब्रिटिश आक्रांताओं ने भारत पर कब्जा करने के उपरांत यहां की धन संपदा लूटी और उसके कृषि शिल्प वाणिज्य का भी विनाश किया। इसके साथ ही साथ अपने अपराधों पर पर्दा डालने हेतु उन्होंने भारत के बारे में गलत सूचनाओं, भ्रांतियों, फेंटेसी और अफवाहों के माध्यम से उसके इतिहास और समाजशास्त्र की मनमानी और गलत व्याख्या की। इन फेंटेसी और सूचनाओं पर आधारित गलत व्याख्या को उन्होंने विश्व एकेडमीया में, फिनोलॉजी, इंडोलॉजी या साइंस ऑफ लैंग्वेज के नाम से वैज्ञानिक सत्य का मूलम्मा लगाकर प्रसारित और प्रचारित किया।

तत्कालीन शिक्षित भारतीयों ने उनके द्वारा उपलब्ध कराई गई सूचनाओं को अंतिम सत्य मानकर अपने लेख और पुस्तकों में उन सूचनाओं का भरपूर उपयोग किया। अनेक ग्रंथ लिखे। उन गलत व्याख्याओं और संदर्भो से डॉक्टर अंबेडकर तक प्रभावित होने से बच नहीं पाए। 1946 में डॉ अम्बेडकर द्वारा लिखी गई पुस्तक शूद्र कौन थे भी उन्हीं फेंटेसी और अफवाहों पर आधारित रचना है। यह बात संदर्भों के साथ डॉ त्रिभुवन सिंह की किताब कहती है।

डॉ. सिंह सरकार के प्रति अपना आक्रोश प्रकट करते हुए लिखते हैं— इस पुस्तक को सरकारी खर्चे पर छपवा और बंटवा कर, अफवाहों को वैधानिकता प्रदान की जा रही है।
भारतीय संस्कृति और परम्पराओं के संबंध में समाज में जो विकृत सूचनाओं का प्रसार हुआ है, उसके पीछे कहीं ना कहीं संस्कृत के अल्पज्ञानियों द्वारा किए गए अनुवाद महती भूमिका रही है। संभव है कि यह अल्पज्ञान से अधिक भारतीय संस्कृति के प्रति उनके द्वेष का परिणाम हो। लेकिन इक्कीसवीं सदी में जब हम वामपंथ के अफवाह तंत्र और कन्वर्जन के गिरोह की निशानदेही कर चुके हैं फिर संस्कृत ग्रंथों के विकृति को दूर करने और उसके अनुवाद के पुनर्लेखन के काम में बाधा क्या है? यह प्रश्न जब आप 164 पृष्ठ की इस किताब को पढ़ लेंगे तो जरूर आपके अंदर भी उठेगा।

आशीष कुमार अंशु