कितना सही है वैदिक वाङ्मय का पाश्चात्य कालक्रम

गुंजन अग्रवाल

लेखक अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना में शोध सहायक हैं

वैदिक वाङ्मय के काल-निर्धारण पर एक बार फिर से चर्चा और बहस प्रारम्भ हुई है। अबतक ऐसा प्रतीत हो रहा था कि वैदिक वाङ्मय की प्रचलित तिथियाँ अकाट्य सत्य हैं और इनमें संशोधन की कोई आवश्यकता ही नहीं है। वस्तुतः वैदिक वाङ्मय ही नहीं, अपितु भारतीय इतिहास के काल-निर्धारण में पाश्चात्य विद्वानों ने दुर्धर्ष परिश्रम किया है। एक इतिहासकार के शब्दों में कहें, तो उन्होंने ‘आसुरी पराक्रम’ दिखाया है। एक दूसरे इतिहासकार के शब्दों में कहें, तो ‘यदि यह कार्य वह न करते, तो भारतीय इतिहास और भारतवर्ष पर उनका बहुत बड़ा उपकार होता’।

पिछले दो-ढ़ाई सौ वर्षों में इतिहास के क्षेत्रा में जितना अनुसन्धान हुआ है और भारतीय व पाश्चात्य इतिहासकारों ने भारत के संबंध में जितना लिखा है, वह एक शब्द में कहें तो ‘विध्वंसक’ है। भारतीय इतिहासकार तो लकीर पीट रहे हैं और अपनी मूर्खता का परिचय दे रहे हैं। उन्हें न तो अपने महान् पूर्वजों पर अभिमान है और न ही वे अपने पूर्वजों की वाणी और लेखन पर भरोसा ही कर रहे हैं, फलतः यूरोप का इतिहासकार हमें हमारा इतिहास बता और पढ़ा रहा है। भारत का इतिहास, यूरोप का इतिहासकार निश्चित कर रहा है और भारतीयजन उसे सहर्ष स्वीकार कर रहे हैं।

वैदिक वाङ्मय से जुड़े कुछ प्रश्नों के उत्तर की खोज में हम आज भी अँधेरे में भटक रहे हैं। पहला प्रश्न तो सीधे-सीधे यह है कि ये ग्रन्थ किस काल की रचनाएँ हैं? यदि इन्हें 1500-1200 ई. पू. का माना जाए, तो भारत पर आर्यों के आक्रमण को सत्य मानने में कोई हर्ज नहीं है और बल्कि यह तिथि ही चीख-चीखकर यह कह रही है कि 1500 ई.पू. में भारत पर आक्रमण करनेवाले आर्यों ने वेदों की रचना की थी। लेकिन साहित्य, पुरातत्त्व और विज्ञान यानि डी.एन.ए. से जब यह सिद्ध हो चुका है कि भारत पर आर्यों ने आक्रमण नहीं किया था और यहाँ पर सभी एक गुणसूत्रा के लोग हैं, तो इसका तात्पर्य क्या यह नहीं हुआ कि वेद भारत के अपने लोगों की रचनाएँ हैं? और वेदों के संबंध में जो भ्रान्तियाँ पाश्चात्यों ने फैलाई थीं, क्या वे सब झूठी और बकवास हैं? क्या हम भारतीयों को अपने ग्रंथों के काल-निर्धारण के लिए स्वयं अपने ग्रन्थों पर और अपनी परम्परा पर निर्भर नहीं रहना चाहिये?

दूसरा प्रश्न इसी से जुड़ा हुआ है कि हम वैदिक वाङ्मय के काल-निर्धारण के लिए यूरोपीय प्राच्यविदों के निष्कर्षों को इतना अधिक महत्त्व क्यों दे रहे हैं? क्या हमारे देश में विद्वत्ता की परम्परा समाप्त हो गई है कि हमें आयातित ज्ञान पर निर्भर रहना पड़ रहा है? हम इस यूरोप-केन्द्रित दुराग्रह से कब बाहर निकलेंगे? हम अपने प्राचीन गौरव को, प्राचीन इतिहास को समझने को क्यों तैयार नहीं हैं? हमारे सामने वह कौन-सा मोटा पर्दा लगा हुआ है कि जिससे हमें पाँच हज़ार वर्ष के पीछे का इतिहास दिखाई ही नहीं देता और हम भारतीय इतिहास को पाँच हज़ार वर्ष के भीतर ठूँसने में ही गौरवान्वित हो रहे हैं? हम यह क्यों भूल जाते हैं कि अभी सौ साल पहले तक पूरा यूरोप यही समझ रहा था और ईसाइयत से प्रभावित अभी भी आधा यूरोप यही समझ रहा है कि दुनिया 23 अक्टूबर, 4004 ई.पू. को बनी है? जब सम्पूर्ण पाश्चात्य जगत् का इतिहास ही 6,019 वर्षों का है, तब उनके बनाए हुए निष्कर्ष कहाँ तक विश्वसनीय और मानने योग्य हैं, यह सोचने की बात है। जो सभ्यता संसार को 6,019 वर्षों से मान रही है, वह भारतीय सभ्यता को क्यों लाखों-करोड़ों वर्ष का समझेगी और वेदादि शास्त्रों को क्यों अनादि-अपौरुषेय मानेगी?

हम यह भी क्यों भूल जाते हैं कि अभी 68 वर्ष पूर्व तक अंग्रेज़ इस देश के स्वामी थे। उन्होंने यूरोप के विद्वानों से भारत का विकृत इतिहास लिखवाया और इस तरह से लिखवाया जिससे भारतीयों को काहिल-ज़ाहिल सिद्ध किया जा सके। लगभग दो सौ वर्षों तक भारत के लोगों को वह इतिहास पढ़ाया गया । हमने पढ़ा कि भारत साँपों-सपेरों और नंगे-भूखे साधुओं का देश है और यहाँ धर्म-प्रचार के लिए ईसाई-मिशनरियों की आवश्यकता है। जिस मैक्समूलर ने वैदिक सूक्तों की एक बड़ी संख्या को बालकोचित और अत्यन्त निम्न कोटि का बताया था, उसी मैक्समूलर के वैदिक वाङ्मय के काल पर निकाले गए निष्कर्ष को भारतीय विद्वान् ब्रह्मवाक्य मान बैठे और उसे ही घसीटते रहे।

तीसरी बात यह है कि हम प्रायः इतिहास की पुस्तकों में ‘वैदिक काल’ या ‘उत्तरवैदिक काल’ या ‘पूर्ववैदिक काल’ के बारे में पढ़ते हैं । यह ‘वैदिक काल’ या ‘पूर्व वैदिक काल’ या ‘उत्तर वैदिक काल’ क्या है? कौन-सा काल वैदिक है और कौन-सा अवैदिक? क्या वेद भूतकाल के लिए थे और उसी समय के समाज के लिये उनका उपयोग होता था? ये सब बातें पाश्चात्य और उनके पदानुगामी भारतीय विद्वानों के मस्तिष्कों में सबसे पहले आती हैं। क्या हिंदुओं के जीवन में, उनके रोम-रोम में वेद अब भी विद्यमान नहीं हैं? क्या हमारे समस्त संस्कार, नित्यकर्म अब भी उन्हीं वेदमंत्रों से नहीं हो रहे हैं, जिन्हें अब से पाँच या दस या बीस हज़ार वर्ष या 1,97,29,49,117 वर्ष पूर्व गाते थे? इसलिए ‘वैदिक काल’ शब्दावली पूर्णतः भ्रामक और भारतीय परम्परा के विरुद्ध है।

एक बात यह भी है कि भारतीयों ने इतिहास में काल की अवधारणा को आत्मसात करते हुए भी और कालगणना का प्रचलन करने के बाद भी ‘अमुक घटना कितने वर्ष पूर्व घटी’ या ‘अमुक व्यक्ति कब पैदा हुआ’ या ‘अमुक ग्रंथ कब लिखा गया’ इस बात को सिद्ध करने की कभी चिन्ता नहीं की। यह तो पाश्चात्य विद्वानों की चर्चा का विषय है और उन्होंने ही दुनिया की सारी सभ्यताओं के अवशेषों को खोद-खोदकर उनकी कालगणना की है। उनकी ही चर्चा का विषय है कि अमुक ग्रंथ कब लिखा गया, अमुक व्यक्ति कब पैदा हुआ या अमुक घटना कब घटित हुई। वस्तुतः जिसके पास हज़ार रुपये हो, वह उसे ही सँभालने में लगा रहता है, लेकिन अरबपति व्यक्ति हज़ार-पाँच हज़ार रुपये पर ध्यान भी नहीं देता । पाश्चात्य जगत् का इतिहास ही 6,019 वर्ष की परिधि के अंतर्गत है, पाश्चात्य विद्वान् उसे ही बहुत मानते हैं और तारीख़, सन्, संवत्, एरा, ए.डी., बी.सी., क्रोनोलाजी, टाइमलाइन इन सबको घोंट-घोंटकर पीते रहते हैं। दूसरी ओर भारत का इतिहास सनातन काल से चला आ रहा है, कालक्रम में इसे बाँधना असम्भव है। इसलिए वैदिक ऋषियों ने सभी घटनाओं की तिथियाँ नहीं दी हैं। तिथियाँ देना तो दूर, किसी ग्रन्थ पर अपना नाम तक नहीं लिखा है। इसमें आश्चर्य लगनेवाली कोई बात ही नहीं है। सभ्यताओं का तुलनात्मक अध्ययन करने पर हमें हमारे वैदिक ऋषियों की विशेषता समझ में आयेगी।

एक और गम्भीर प्रश्न यह है कि हम काल-निर्धारण के लिए पुरातत्त्व, भूगर्भविज्ञान और रेडियोकार्बन डेटिंग यादि स्थूल विज्ञान पर अत्यधिक निर्भर होते जा रहे हैं। हम यह भूल रहे हैं कि विज्ञान की ये शाखाएँ यूरोपीयों द्वारा आविष्कृत हैं जो उनकी समझ और उनके इतिहास पर जितनी सटीक बैठती हैं, उतनी भारतीय इतिहास पर नहीं। पाश्चात्य विद्वान् उत्खनन से प्राप्त वस्तुओं के आधार पर किसी सभ्यता का काल-निर्धारण या उसके वैशिष्ट्य का आकलन करते हैं। भूगर्भविज्ञान यह कहता है कि भूमि की ऊपरी परत बराबर धूल-मिट्टी से ढंकती रहती है । इसी से प्राचीन सामग्रियाँ पुरानी होकर सड़ती हैं । लकड़ी, कपड़ा, कागज आदि तो शीघ्र सड़ता है और पत्थर, लोहा तथा दूसरी धातुओं में भी परिवर्तन होते हैं । पृथिवी की ऊपरी परत जेसै-जैसे मोटी होती जाती है, वैसे-वैसे नीचे ढंकी वस्तुओं पर दबाव बढ़ता जाता है । इस प्रकार अधिक दबाव से भूमि के नीचे दबे सभी पदार्थ टूटकर एकाकार हो जाते हैं । वहाँ किसी पदार्थ का बने रहना सम्भव नहीं । इस प्रकार खुदाई से प्राप्त सामग्री एक निश्चित समय से अधिक पुरानी हो ही नहीं सकती । इस सामग्री में भी समय जितना पुराना होगा, प्राप्त पदार्थ उतने ही सड़े, दुर्बल होंगे । इसलिये यदि हमें प्राचीनकाल के वस्त्रा और काग़ज़ नहीं मिले तो इसका अर्थ यह नहीं कि उस समय लोग नंगे रहते थे और उस समय केवल पाषाण का ही उपयोग होता था । यदि हमें प्राचीनकाल की बस्तियाँ नहीं मिलीं तो इसका अर्थ यह नहीं है कि उस समय मानव ही नहीं थे । ये ‘पाषाणयुग’ और ‘धातुयुग’ कपोल-कल्पित हैं, उस समय की बस्तियाँ पाने की आशा हम कैसे कर सकते हैं? इसलिए भारतीय इतिहासकारों को इन तकनीकों का इस्तेमाल बहुत सोच-समझकर करना चाहिये अन्यथा भयंकर भूल की सम्भावना रहती है।

अभी एक दशक से इतिहास में एक नयी खोज सामने आई है, और वह है ‘ऐस्ट्रानोमिकल डेटिंग’ । यह तो सभी जानते हैं कि प्राचीन संस्कृत-ग्रंथों में घटनाओं के सन्दर्भ में ग्रह-नक्षत्रों-राशियों की स्थिति का पर्याप्त वर्णन मिलता है। यदि उन ग्रह-नक्षत्रा की स्थिति का सही मिलान किया जाए, तो यह सम्भव है कि वह घटना कब घटित हुई थी, इसका सही-सही पता लग जाये। परन्तु इसमें कठिनाई यह है कि ग्रह-नक्षत्रा सूर्य की परिक्रमा करते हुए एक निश्चित समयावधि के बाद पुनः उसी स्थान पर आ जाते हैं। प्लेनेटोरियम साफ्टवेयर में पिछले 8-10 हज़ार वर्षों के ग्रह-नक्षत्रों के आँकड़े डाल दिए गए हैं और उन्हीं के आधार पर वह साफ्टवेयर गणना करता है। उदाहरण के लिए वाल्मीकि रामायण में वर्णन है कि पुत्रोष्टि यज्ञ की समाप्ति के पश्चात् जब छह ऋतुएँ (1 वर्ष) बीत गयीं, तब 12वें मास में चौत्रा मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को पुनर्वसु नक्षत्रा और कर्क लग्न में कौसल्या ने दिव्य लक्षणों से युक्त श्रीराम को जन्म दिया। उस समय पाँच ग्रह (सूर्य, मंगल, शनि, गुरु और शुक्र) अपने-अपने उच्च स्थान पर विराजमान थे तथा लग्न में चन्द्रमा के साथ बृहस्पति विराजमान थे। उपर्युक्त आँकड़े को डा. पी.वी. वर्तक ने प्लेनेटोरियम साफ्टवेयर में डालकर श्रीराम का समय 7323 ई.पू. निर्धारित किया है, लेकिन डा. पुष्कर भटनागर ने एक दूसरे साफ्टवेयर के आधार पर श्रीराम का समय 5114 ई.पू. निश्चित किया है। वास्तव में ये दोनों ही आँकड़े त्राुटिपूर्ण और भ्रामक हैं। पहली त्राुटि तो यह है कि भारतीय परम्परा के अनुसार श्रीराम त्रोतायुग में हुए थे जो 12,96,000 वर्षों का होता है। यदि हम श्रीराम को त्रोतायुग के अन्तिम वर्षों में मान लें, तो भी श्रीराम कम-से-कम 9 लाख वर्ष पूर्व के हैं, क्योंकि द्वापर ही 8,64,000 वर्षों का होता है।् लेकिन भारतीय परम्परा के अनुसार श्रीराम 24वें त्रोता और द्वापर की सन्धि में हुए थे जो आज से 1,81,49,117 वर्ष पूर्व का समय है। प्लेनेटोरियम साफ्टवेयर तो 8-10 हज़ार वर्षों की गणना ही कर सकता है क्योंकि उसकी इतनी ही क्षमता हैप् 1,81,49,117 वर्षों में ग्रहों की स्थिति एक बार भी नहीं बदली होगी, ऐसा कौन कह सकता है? ऐसी स्थिति तो अनेक बार आई होगी। इसलिए केवल साफ्टवेयर के आधार पर निष्कर्ष निकालना नितांत भ्रमपूर्ण होगा।

‘संकल्प-पाठ’ में हम अपने इतिहास की अति सूक्ष्म कालगणना करते हैं। लेकिन दुर्भाग्य से हिंदुओं की इस महान् विशेषता को केवल पौराहित्य कर्म तक सीमित समझा गया है और इसपर आगे कोई अनुसन्धान की आवश्यकता ही नहीं समझी गयी। वस्तुतः ‘संकल्प-पाठ’ में भारतवर्ष का आजतक का सम्पूर्ण इतिहास एक ही श्लोक में पिरोया हुआ है।