कालेजियम सिस्टम और न्यायपालिका का निर्णय

बजरंग मुनि
लेखक राजनीतिक चिंतक हैं।
प्रत्येक व्यक्ति का यह स्वाभाविक संस्कार होता है कि वह उपर वालों से अधिकतम स्वतंत्राता का प्रयास करता है, तथा अपने से नीचे वालों को कम से कम स्वतंत्राता देना चाहता है। लोकतंत्रा और तानाशाही में मूलभूत अंतर यह होता है कि तानाशाही में शासन का संविधान होता है, तथा लोकतंत्रा में संविधान का शासन। पश्चिम के लोकतांत्रिक देशों में संविधान का शासन है, तथा साम्यवादी देशों में शासन का संविधान। कई मुस्लिम देशों में तो राजशाही है जिसकी हम चर्चा नहीं कर रहे।
भारत का संविधान स्वतंत्राता के पूर्व बनना शुरु हुआ तथा उसे बनाने वालो में मुख्य भूमिका उन लोगों की थी, जो स्वतंत्राता संघर्ष में शामिल रहे। भीमराव अम्बेडकर पश्चिमी ढंग का लोकतंत्रा लाना चाहते थे। पण्डित नेहरु साम्यवाद, समाजवाद की तरफ झुके हुए थे और महात्मा गाँधी दोनों से हटकर लोकस्वराज्य का संविधान लाना चाहते थे। गाँधी की मृत्यु होते ही पंडित नेहरु और अम्बेडकर ने मिलकर एक मिश्रित प्रणाली का संविधान बना दिया, जो न तो साम्यवादी देशों की तरह पाँच-सात लोगों की कमेटी को निर्णायक अधिकार देता था, और न ही पश्चिमी तरीके से आम नागरिकों को संविधान में अंतिम हस्तक्षेप का। अर्थात् संविधान निर्माताओं ने बीच का मार्ग चुनते हुए जनता द्वारा निर्वाचित संसद को एक तानाशाह के रुप में स्वीकार कर लिया।
उन्होंने संसद को ही यह अधिकार दे दिया कि वह कानून भी बना सकती है, उसका पालन भी करा सकती है और जब चाहे तब संविधान में संशोधन करके उसे जनता की मुहर भी घोषित कर सकती है। इसका अर्थ हुआ कि गाँधी का लोकनियंत्रित तंत्रा, लोकनियुक्त तंत्रा में बदल गया। इन सबके होते हुए भी संविधान निर्माताओं ने न्यायपालिका तथा कार्यपालिका का स्वतंत्रा अस्तित्व बनाये रखा।
यह एक निर्विवाद सत्य है कि पंडित नेहरु तानाशाही प्रवृत्ति के थे। उन्होने सबसे पहले संविधान संशोधन करके राष्ट्रपति के अधिकारों को सीमित किया तथा संविधान में एक और संशोधन करके उन्होने न्यायपालिका को भी कमजोर कर दिया। कार्यपालिका ने तो आज तक कभी सिर उठाने का प्रयास नहीं किया, किन्तु न्यायपालिका अवसर की प्रतीक्षा करती रही। अवसर मिलते ही उसने स्वतंत्राता के प्रयास शुरु कर दिये।
सर्वाेच्च न्यायालय के न्यायाधीश पी एन भगवती के कार्यकाल में असंवैधानिक तरीके से भी जनहित याचिकाओं को स्वीकार करने का आदेश दे दिया गया, जो अब भी जारी है। सन् 1973 में केशवानंद भारती प्रकरण के माध्यम से न्यायपालिका ने दूसरा आक्रमण किया और संसद के संविधान संशोधन के असीम अधिकारो में मौलिक ढाँचे को अक्षुण्ण रखना अनिवार्य कर दिया। स्पष्ट है कि भारत की विधायिका पूरी तरह विश्वास खो चुकी थी, किन्तु समाज के पास गुलामी स्वीकार करने के अतिरिक्त कोई मार्ग नहीं था। अतः न्यायपालिका का यह निर्णय असंवैधानिक होते हुए भी प्रशंसनीय था। यहाँ तक कि केशवानंद भारती प्रकरण के निर्णय ने तो भारत के लोकतंत्रा को ही बचा लिया अन्यथा अब तक भारत में विधायिका के द्वारा लोकतंत्रा की क्या-क्या दुर्गति की गई होती, यह कल्पना से परे है। इसके लिए न्यायपालिका की जितनी प्रशंसा की जाये, उतनी कम है।
जब तक न्यायपालिका विधायिका की उच्छ्रंख्लता पर नियंत्राण करती रही, तब तक उसका समर्थन भी बढ़ता गया। किन्तु न्यायधीश भी तो मनुष्य ही होते हैं और इसी समाज से आते हैं। अतः नये आने वाले सदस्य यह याद नही रख सके कि लोकतंत्रा में न्यायपालिका भी तानाशाह नहीं हो सकती। न्यायपालिका ने एक तीसरा कदम उठाते हुए सर्वाेच्चता का सिद्धांत अपनाया और कालेजियम सिस्टम बनाकर विधायिका की सर्वाेच्चता पर अपनी सर्वाेच्चता स्थापित कर दी। न्यायपालिका को संविधान संशोधन की समीक्षा तथा उसे अवैध घोषित करने का अधिकार प्राप्त है। किन्तु उसे स्वयं संविधान में संशोधन करने का अधिकार प्राप्त नहीं है। न्यायपालिका ने वह किया और बदनाम विधायिका कुछ नहीं कर सकी।
धीरे-धीरे न्यायपालिका भी उच्छ्रंखल होती गई। न्यायपालिका ने विधायिका के सारे कार्य अपने पास समेट लिये,और घोषित कर दिया कि न्यायपालिका सर्वाेच्च है। न्यायपालिका द्वारा ऐसे-ऐसे निर्णय भी लिए जाने लगे, जो स्पष्ट रुप से अलोकतांत्रिक थे, किन्तु न तो विधायिका कुछ कर सकती थी और न ही जनता। न्यायपालिका ने तानाशाही तरीके से यह घोषित कर दिया कि राष्ट्रपति को कितने समय में फांसी की सजा प्राप्त व्यक्ति के बारे में अंतिम निर्णय करना होगा। न्यायपालिका ने यह भी घोषित कर दिया कि प्रधानमंत्राी को कितने महीने में किसी विषय पर अंतिम निर्णय करना होगा। किन्तु आज तक न्यायपालिका ने कभी यह घोषित नहीं किया कि न्यायपालिका की निर्णय करने की समयावधि क्या होगी?
बहुत जघन्य अपराधों में भी न्यायपालिका किसी समय सीमा में निर्णय करने में असफल रही। यहाँ तक कि न्यायपालिका ने निर्णय में देर होने का कारण भी न्यायाधीशों की कमी बता दिया, तथा न्यायपालिका ने अपराधियों के निर्दाेष छूट जाने का सारा दोष भी पुलिस पर डालना शुरु कर दिया। न्यायपालिका ने कार्यपालिका तथा विशेषकर पुलिस वालों के साथ बहुत ही अनुचित व्यवहार शुरु किया। न्यायपालिका ने पुलिस और कार्यपालिका को न्याय में सहायक न मानकर एक पक्षकार माना जो गलत था। स्पष्ट दिखता है कि न्यायपालिका का काम जजों की कमी के कारण उतना नहीं बढ़ा है, जितना उसके द्वारा अपना काम छोड़कर विधायिका या कार्यपालिका के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप से।
न्यायपालिका अपने आपराधिक निर्णय के काम छोड़कर जनहित याचिकाओं में आनंद अनुभव करने लगी। गंगा की सफाई कब हो और कैसे हो? उत्तरांचल में आई बाढ़ से प्रभावित लोगों को कैसी सहायता दी जा रही है? ऐसे मुद्दे न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्रा के नहीं है। यदि विधायिका अपना काम करने में असफल होगी तो उसके उपर जनता है, समाज है, न्यायपालिका नहीं। क्योंकि न्यायपालिका तो लोकतंत्रा के तीनों अंगो में समान स्तर की भूमिका रखती है। कल्पना करिये कि न्यायाधीशो की संख्या बहुत बढ़ा दी जाये तो इसकी क्या गारण्टी है कि न्यायपालिका अपना काम छोड़कर जनहित याचिकाओं में और वृद्धि नहीं कर देगी। क्योंकि किसी भी इकाई की जब सीमा टूटती है और सीमा तोड़ने में उसे आनंद आता है तो ऐसा आनंद बहुत खतरनाक रुप ले लेता है।
मैं इस पक्ष में नहीं हूँ कि संसद सर्वाेच्च है और उसे न्यायपालिका के जजों की नियुक्ति में हस्तक्षेप का अधिकार होना चाहिए। किन्तु मैं इस पक्ष में भी नही हूँ कि न्यायपालिका सर्वाेच्च हो और न्यायपालिका को ही जजों की नियुक्ति के असीम अधिकार होने चाहिए। हमें विधायिका सर्वाेच्च और न्यायपालिका सर्वाेच्च के विवाद में से किसी एक के पक्ष में न जाकर यह स्वीकार करना चाहिए कि दोनों में से कोई सर्वाेच्च नहीं है और सर्वाेच्च तो भारतीय संविधान है जिसके ऊपर सिर्फ और सिर्फ जनता ही है।
प्रश्न उठता है कि वर्तमान स्थिति में संसद द्वारा जज नियुक्ति कानून ठीक है या कालेजियम सिस्टम। मैं इस मत का हॅँू कि कोई न कोई एक नई प्रणाली विकसित की जानी चाहिए जो न्यायाधीशों की नियुक्ति कर सके। इस संबंध में मेरा एक सुझाव है कि जब तक कोई और साफ मार्ग न निकले तब तक कार्यपालिका, न्यायपालिका तथा विधायिका के एक एक प्रतिनिधि अर्थात् राष्ट्रपति, लोकसभा अध्यक्ष तथा सर्वाेच्च न्यायाधीश बैठकर यह निर्णय करें कि तीनों अंगो के बराबर-बराबर लोग बैठकर ऐसी नियुक्ति करना शुरु करें। राष्ट्रपति अपनी कार्यपालिका के लोगों को चुन सकते हैं, लोकसभा अध्यक्ष, प्रधानमंत्राी, विपक्ष के नेता तथा अन्य सांसदों को ले सकते है और सर्वाेच्च न्यायाधीश समान संख्या में न्यायधीशों को शामिल कर सकते हैं।
न्यायपालिका और विधायिका के बीच प्रारंभ टकराव घातक होगा। जब तक विधायिका बदनाम थी, तब तक न्यायपालिका को एक पक्षीय समर्थन मिलता रहा। किन्तु अब नरेन्द्र मोदी के आने के बाद राजनैतिक परिस्थितियाँ बदल चुकी है। अब यह टकराव एक पक्षीय रहेगा, ऐसी संभावना नहीं है और इस संबंध में हमारे लोकतंत्रा के तीनों अंगो को गम्भीरतापूर्वक विचार करके अपनी अपनी सीमायें निर्धारित करनी चाहिए।