कालिदास, शकुन्तला और भारत का भविष्य

विश्व नाट्य विद्या का जनक संस्कृत के महाकवि कालिदास के अभिज्ञान शाकुन्तलम् को माना जाता है अभिज्ञानशाकुन्तलं का विश्व की अनेक भाषाओं मे अनुवाद हुआ विश्व के प्रसिद्ध नाटककारों को भी नाटक लिखने की प्रेरणा कालिदास से मिली। कालिदास के अभिज्ञान शाकुन्तलम् का वर्ष 1790 में अंग्रेजी भाषा में अनुवाद हुआ। जर्मन फारस्टर ने जब इसको पढ़ा तो वह अपनी प्रसन्नता के अतिरेक को नियन्त्रिात नहीं कर पाया और नाचने लगा। उसने जर्मन भाषा में अभिज्ञान शाकुन्तलम् का अनुवाद किया। वर्ष 1791 में शाकुन्तलं का जर्मन भाषा में अनुवाद प्रकाशित हुआ। आखिर क्या खास है अभिज्ञान शाकुन्तलम् में? जिसके लिए विदेशी विद्वानों ने इतना परिश्रम किया। भारतीय लोग शायद इससे अनभिज्ञ है। वास्तव में अभिज्ञान शाकुन्तलम् नाटक मानवीय मूल्यों को स्थापित करने वाला अनुपम ग्रन्थ है। कुछ दिनों पहले कलकत्ता की एशियाटिक सोसाइटी द्वारा शाकुन्तलम् के जर्मन में अनुवाद की 225वीं वर्षगांठ मनाई गयी, इसमंे जर्मन कंसुलेट भी आये थे। फारस्टर ने शाकुन्तलम् का जर्मन में अनुवाद किया। उन्होंने इसके अनुवाद के दो महत्वपूर्ण प्रयोजनों का उल्लेख किया। एक यह कि इससे सांस्कृतिक सहनशीलता का विकास होगा और दूसरा, इसके द्वारा मानव जीवन की विविधता का परिचय होगा। आज जब वैश्वीकरण की आंधी सांस्कृतिक विविधता को समाप्त करने पर तुली है। ऐसे समय में पारस्परिक सांस्कृतिक संवाद को आगे बढाने की जरूरत और भी प्रासंगिक है।
विश्व में भारत की पहचान ज्ञान के कारण है। ज्ञान-विज्ञान में अग्रगण्य देश भारत कभी विश्व गुरु कहलाता था। ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा लेने सम्पूर्ण विश्व से लोग यहाँ आते थे। तक्षशिला, नालन्दा, विक्रमशिला जैसे महान् विश्वविद्यालय इस देश में थे। यहां आकर विदेशी ज्ञानार्जन करते थे। वह समय था जब भारत की भाषा संस्कृत सर्वत्रा प्रतिष्ठित थी। समस्त ज्ञान के भण्डार संस्कृत ग्रन्थों में ही निहित थे संस्कृत के बड़े-बड़े विद्वान् लेखक राजाश्रय पाकर संस्कृत साहित्य का सृजन करते थे। कालिदास जैसे अनेक कवियों ने संस्कृत ग्रन्थों की रचना करके संस्कृत भाषा तथा भारत को गौरवान्वित किया। अनेक विदेशी विद्वानों ने अपनी भाषा में इन ग्रन्थों का अनुवाद किया मैक्समूलर ने तो वैदिक ग्रन्थों का अनुवाद किया कीथ ने लौकिक साहित्य का विशद् अध्ययन किया।
शाकुन्तलम् का वनवास भारत से हुआ, जर्मन ने उसे सहारा दिया। शाकुन्तलम् के वनवास की कथा भले ही पुरानी हो गयी हो लेकिन भारत से आज भी वह निष्कासित है। दुष्यन्त ने शकुन्तलम् को भुला दिया था। भारत ने भी अपनी ज्ञान परम्परा भुला दिया। भारत से ज्ञान की वह परम्परा आज भी निष्कासित है। अपनी भाषा, अपनी ज्ञान परम्परा का विस्मरण ही हमें आगे बढ़ने से रोकता है। हमें अपनी धरोहर को पहचानने की आवश्यकता है। दुष्यन्त ने मुद्रिका को देखकर शकुन्तला को पहचान लिया था, वह उसे खोजने निकल पड़ा। परन्तु आज हम जानकर भी अपनी ज्ञान-विज्ञान रूप शकुन्तला को पहचानना नहीं चाहते। उसे पहचानने तथा वापस लाने की आवश्यकता है। अपने स्वत्व को बचाने अपनी विस्मृत धरोहरों को पहचानना और उसे वापस लाना यह हमारा दायित्व है। तभी वास्तव में हमें भारतवंशी कहलाने का गौरव प्राप्त होगा। तभी तिरस्कृत शकुंतला को न्याय मिल सकेगा।