ऐसे खाएं अलसी को

ममता रानी
लेखिका स्वतंत्र पत्रकार हैं।

आ अब लौट चलें। यह हिंदी फिल्म का एक पुराना गाना गीत है जो हमारी आज की स्थिति पर बिल्कुल फिट बैठता है। अब वह दिन आ गया है जब हमें अपने पुराने दिनों में वापस लौटना होगा। कम से कम जीवनशैली और खानपान के बारे में तो यह कहा ही जा सकता है। आज हम किसी भी आहार या पोषण विशेषज्ञ से बात करें या फिर कुछेक जीवनशैलीजन्य बीमारियों के लिए किसी डॉक्टर से सलाह लें, तुरंत अलसी के सेवन की राय दे दी जाती है। चाहे आपके बाल झड़ रहे हों या आपको मधुमेह हो या फिर रक्तचाप की समस्या हो, आज सभी को अलसी का सेवन करने के लिए कह दिया जाता है।
अलसी, जो आज न तो आसानी से मिलती है और न ही उसे खाना इतना सरल रह गया है। जिन्हें मिल भी जाता है, वे यही पूछते रहते हैं कि इसे आखिर खाया कैसे जाए। अधिक नहीं, यदि हम केवल 30-40 वर्ष पहले गाँवों के खान-पान को याद करें या फिर अपने घर के बुजुर्गों से पूछें कि वे स्वस्थ रहने के लिए क्या करते थे, तो संभवतः न केवल हम कई बीमारियों से बच जाएंगे, बल्कि दवाओं पर होने वाले खर्चों से जेब भी हल्की नहीं होगी। मुझे याद आता है कि हमारी दादी-नानी अक्सर अलसी का सेवन करती थी। मेरे बचपन में बिहार के गाँवों में दैनंदिन जीवन में अलसी का भरपूर प्रयोग किया जाता था। अलसी को वहां तीसी कहा जाता है। हमारी नानी तीसी की बड़ियां बना कर रखती थी। सुबह-सुबह उसे थोड़ा सा तवे पर तेल में भुन कर वह खा लिया करती थी। अलसी की बड़ियों को वर्ष भर संभाल कर रखा जा सकता है। अलसी के परांठे और लड्डू भी बनाए जाते थे। लोग उन्हें बड़ी रुचि और स्वाद से खाते थे और साथ में पोषण भी पाते थे।
मुझे यह भी ध्यान में आता है कि अलसी की खेती बड़ी आसानी से हो जाया करती थी। उसमें पानी और मेहनत दोनों ही कम लगते थे। यही कारण था कि हमारे गाँवों में सरसों के बाद तीसी या अलसी का तेल ही अधिक प्रयोग में लाया जाता था। केवल घरों में ही नहीं, बल्कि बाजार के हलवाई भी पकौड़ियां तथा जलेबी अलसी के तेल में ही बनाया करते थे। अलसी की खली गाय-भैंसों को खिलाई जाती थी। अलसी के तेल में एक अलग प्रकार की गंध हुआ करती थी। आज डॉक्टरों का कहना है कि असली के तेल के धुंए से जुकाम, साइनस जैसे रोग ठीक होते हैं।
ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर इतनी बहुप्रचलित तथा लाभकारी चीज का उपयोग एकदम से बंद क्यों हो गया? यह चिंतन के साथ-साथ शोध का भी विषय है। आखिर क्यों डालडा और रिफाइन जैसे नुकसानदेह तेलों का इतना प्रचार किया गया? क्यों अलसी के तेल को खाने वाले लोगों को हेय निगाहों से देखा जाने लगा। अलसी के तेल को लोग गरीबों का तेल कहने लगे। स्वाभाविक ही था कि स्वयं को थोड़ा सा भी समृद्ध मानने वाले लोग इसका उपयोग छोड़ देते थे। आज हालात ऐसे हो गए हैं कि नई पीढ़ी इसे पहचानती तक नहीं है।
बहरहाल, हम थोड़ी-सी मेहनत और सूझबूझ से अपने परिवार तथा बच्चों को फिर से अलसी खाने के लिए प्रेरित कर सकते हैं। उन्हें यह बताया जाना चाहिए कि कैसे हमारे बुजुर्ग स्वस्थ रहकर लंबी आयु जीया करते थे और कैसे मोटे अनाजों और गाढ़े तेलों का उपयोग किया जाता था। अलसी का तेल गाढ़ा होता है। इसके प्रति उन्हें जागरूक करें। कुछ काम तो ओमेगा 3 आदि की बात कहकर आज के डॉक्टर भी कर दे रहे हैं। साथ ही अलसी के व्यंजनों को बनाना भी सीख लें। इससे उसका सेवन करना सरल हो जाएगा।
ध्यान रखें कि अलसी को साबूत नहीं खाया जा सकता, क्योंकि साबूत अलसी पचती नहीं है। इसी प्रकार अलसी का पाउडर अधिक दिनों तक रखा नहीं जा सकता। वह खराब हो जाता है। उसे पीसने के बाद ताजा ही सेवन करना होता है। यहां अलसी के दो व्यंजनों की विधियां प्रस्तुत हैं।


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अलसी की बडिय़ां

सामग्री – अलसी – 250 ग्राम, धुली मसूर की दाल दृ 100 ग्राम, नमक, अजवाइन और काली मिर्च पाउडर स्वादानुसार
विधि:-  धुली मसूर की दाल को तीन घंटों तक भिगो कर रखें। फिर उसे धोकर मिक्सी में पीस लें। अलसी को ठीक से धोकर छन्नी से छान लें और दाल की पीठी में मिला दें। इसमें नमक, अजवाइन और काली मिर्च का पाउडर स्वादानुसार मिला लें। इस मिश्रण की छोटी-छोटी, अंगूर या चेरी के आकार की बड़ियां बना लें। इसे तेज धूप में सुखाएं। ध्यान रखें, जब धूप तेज निकलती हो, तभी बड़ियां बनाएं। सूख जाने पर इसे एयरटाइट डब्बे में भर कर रख लें। जब भी खाना हो, इसे हल्के तेल में भून कर या तल कर खाएं। खाने में यह काफी कुरकरी लगती है। इसे चाय के साथ स्नैक्स के रूप में भी खाया जा सकता है और भोजन पर पापड़ की तरह भी खाया जा सकता है। यह भोजन का स्वाद तो बढ़ाता ही है, अलसी के सारे फायदे भी मिलते हैं। इसे बच्चे भी बड़ी रूचि से खाते हैं।


alsi_parantheअलसी के परांठे

सामग्री –  अलसी 100 ग्राम, गुड़ 50 ग्राम, आटा 250 ग्राम
विधि:- अलसी को चुनकर साफ कर लें। फिर इसे एक कड़ाही या फ्राइंग पैन में सूखा भूनें। भुनते हुए इसे लगातार चलाते रहें ताकि यह जले नहीं। कुछ मिनटों में ही अलसी तड़कने लगेगी। उसकी थोड़ी खुशबू आने पर इसे उतार लें और मिक्सी में पीस लें। गुड़ को भी कद्दूकस कर लें। अलसी पाउडर और गुड़ को मिला लें।
आटे को पराठे के हिसाब से गूंद लें। इसकी लोई बना लें और उसमें 35-40 ग्राम भरावन भर कर उसे गोल बेल लें। इसे तवे पर सेंक लें। घी या मक्खन लगाकर गरम-गरम खाएं। यह परांठा काफी स्वादिष्ट भी होता है और पौष्टिक भी।