एकात्म मानवदर्शन

ज्ञानेंद्र बरतरिया
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं
देश इन दिनों पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जन्मशती मना रहा है। तमाम घरेलू और वैश्विक कारणों से, इन दिनों “राष्ट्रवाद” शब्द भी फिर चर्चा में है। भारत में, भारतीय राष्ट्रवाद को बहुत सरलता से पंडित दीनदयाल उपाध्याय से और एकात्म मानवदर्शन से जोड़ दिया जाता है। जन्मशती मनाए जाने के कारण ही सही, एकात्म मानवदर्शन भी इन दिनों चर्चा में है।
पंडित दीनदयाल उपाध्याय भारतीय राष्ट्रवाद के न प्रथम प्रणेता थे, न अंतिम। लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि वे भारतीय राष्ट्रवाद के अद्वितीय प्रस्तोता थे। यूरोप से भिन्न, भारतीय राष्ट्रवाद कोई नस्लीय, भौगोलिक, मौसमी, औद्योगिक, सैनिक, वैज्ञानिक या मनोवैज्ञानिक बीमारी नहीं है। न उसे स्वयं को सिद्ध करने के लिए लगातार किसी न किसी शत्राु की आवश्यकता होती है, जिसकी खोज में यूरोप, अमेरिका, रूस और मध्य पूर्व, सब लगे हुए हैं। भारतीय राष्ट्रवाद “स्व” की बात करता है। शत्राु के विपरीत, भारतीय राष्ट्रवाद “स्व” की खोज करता है और ऐसे करता है कि सारे विश्व को स्वयं में समाहित कर लेता है, उस “स्व” को संवारता-सुधारता है, उसे युगानुकूल और देशानुकूल बनाता है और इतना सब करके भी किसी के लिए खतरा नहीं बनता है। यह बात, पहली नजर में व्याहारिक प्रतीत नहीं होती। लेकिन अगर एकात्म मानवदर्शन को समझने की चेष्टा की जाती है, तो यही बात बहुत सहज और सरल भी लगने लगती है।
पंडित दीनदयाल उपाध्याय की एकात्म मानवदर्शन की खोज एक सहज प्रश्न से उत्पन्न हुई मानी जा सकती है। भारत को अंग्रेजों से स्वतंत्राता मिल चुकी थी। नयी सरकार सत्ता में थी, उसकी प्रणाली भी थी और पंडित दीनदयाल उपाध्याय का सहज सा प्रश्न यह था कि इस स्वतंत्राता में “स्व” क्या है। प्रणाली वही, सोच वही और समझ भी वही जो अंग्रेजों की थी। फिर इसमें “स्व” क्या है?
इतिहास पढ़ने और पढ़ाने के बिन्दुओं को रेवड़ियों की तरह चीन्हे जाने की परम्परा ने भारत के बौद्धिक लोक में एक ऐसे समाज का सृजन कर डाला है, जिसमें कई लोगों की समझ न केवल अधूरी होती है, बल्कि समझ के एकांगी होने को ही सही सोच समझा जाता है। आज पंडित दीनदयाल उपाध्याय के बारे में अधिकांश लोगों की अधिकांशतः नासमझी का एक बड़ा पहलू यह है। इस नासमझी और इतिहास की उन रेवड़ियों की बहुलता फिर एक बार उस दीनदयाल प्रश्न पर लौटने के लिए प्रेरित करती हैं- इसमें “स्व” क्या है? आइए देखते हैं-
परिभाषा से हम सोशलिस्ट और सेक्युलर, हालांकि डेमोक्रेटिक, और मजबूरन रिपब्लिक हैं। इसमें “स्व” क्या है?
परिभाषा से हम वाघा सीमा से तिनसुकिया सीमा तक, कन्याकुमारी से चीनी विवादित सीमा तक उन लकीरों के बीचे फैले देश हैं, जिन्हें अंग्रेजों ने कागजों पर खींचा था।इसमें “स्व” क्या है? फिर उस मूल प्रश्न पर लौटें – इसमें “स्व” क्या है?
उत्तर पहले, व्याख्या बाद में के सिद्धांत से चलें, तो हम बहुत कुछ एक क्लेप्टोक्रेसी हैं। क्लेप्टोक्रेसी की धुरी भ्रष्टाचार है, भ्रष्टाचार की धुरी हमारा सोशलिस्ट और सेक्युलर होना है। कैसे? की संक्षिप्त शंका का निवारण आगे किया जाएगा। सोशलिस्ट और सेक्युलर होना इसलिए जरूरी है, क्योंकि इंडिया मूलतः एक आइडिया है और इसके आइडिया होने पर जितना जोर दिया जाता है, उतना वह इंडिया कम होता जाता है और अंततः सिर्फ एक आइडिया रह जाता है। और चूंकि उस आइडिए के लिए भी, सिद्धांततः यह जरूरी होता है कि आइडिया ऑफ इंडिया के अनुरूप हो। इसलिए वह आइडिया सोशलिस्ट और सेक्युलर होने का होता है। इस आइडिया और सेक्युलरिज्म का घोल ऐसा है कि वह धर्मविहीन सेक्युलर होने की हद तक जाने के बावजूद कॉमन सिविल कोड को स्वीकार नहीं कर सकता है। इसमें “स्व” क्या है?
परिभाषा से हम कृषि प्रधान देश हैं। हमारी कृषि इतनी है या उतनी है। और वैसी ही लहलहा रही है, जैसा बीज अंग्रेज रोंप कर गए थे। जोत वैसे ही छोटी होती जा रही है, जैसे अंग्रेजों के जमाने में होती थी। भारत का कृषि प्रधान होना, पिछले कई वर्षों से, किसानों की आत्महत्याओं के रूप में व्यक्त होता आ रहा है। किसानों की आत्महत्याओं के प्रश्न को थोड़ा भी कुरेदें, तो बात कृषकों को मिलने वाले या मिल सकने वाले वित्त पर भी पहुंचती है और बाजार पर भी, पानी-मौसम और डब्लूटीओ पर भी। इस वित्त को संस्थागत ढंग से उपलब्ध कराया जाता है, ठीक उस ढांचे पर, जो ढांचा अंग्रेज प्रभुओं ने 1934 के रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया एक्ट के साथ लाए गए कृषि वित्त संबंधी अधिनियमों से बनाया था। लगान पद्धतियां निश्चित रूप से बदल गईं, लेकिन बाकी ज्यादा कुछ नहीं। भारत की आधी जनता के कृषि पर निर्भर होने, और इस नाते अभिशप्त होने के आंकड़े के अलावा इसमें “स्व” क्या है?
हम रेल प्रधान देश हैं। जैसी रेल अंग्रेजों ने हमें सौंपी थी, उसमें हम आज तक मात्रा 10-12 हजार किलोमीटर की वृद्धि कर सके हैं, बाकी उन्हीं की खींची लकीरों को हम कभी चौड़ा करते रहे, कभी उनके दोनों तरफ बिजली के खंभे लगाते रहे। इसमें “स्व” क्या है? हम बाबू प्रधान देश हैं। हमारी बाबूगीरी परिभाषित है। अधिकांशतः अगर वह भ्रष्ट नहीं होगी, तो अड़ंगेबाज तो जरूर ही होगी। वह भारत पर राज करने के लिए है। आइडिया ऑफ इंडिया के अनुरूप है। इसमें “स्व” क्या है?
हमारी एक सशक्त अनुशासित सैनिक शक्ति है। लेकिन उस सैनिक का ध्यान आजकल किन बातों पर ज्यादा जा रहा है? क्या अनुशासन सशर्त हो सकता है? लेकिन क्या अनुशासन सशर्त नहीं होता जा रहा है? फिर इसमें “स्व” क्या है? हम संसदीय प्रणाली वाले देश हैं। अंग्रेजों ने हमें यही प्रणाली दी भी थी। हम उसका इस्तेमाल अड़ंगे डालने से लेकर क्षुद्र राजनीति करने में किया जा रहा है। देश के गंभीर विषयों पर विचार करने में संसद की क्षमता पर गहरे प्रश्न चिन्ह लगे हुए हैं। इसमें “स्व” क्या है?
आइडिया ऑफ इंडिया और मैकाले की खींची रेखाओं के पाले में पलती और भी ढेरों संस्थाएं हैं। उनमें भी हमारा “स्व” कहीं नहीं है। उससे भी गंभीर बात यह है कि अब कई बार उनका इष्ट मैकाले भी नहीं रह गया है, वे मुक्त लेकिन परम आवेशित कणों की तरह व्यवहार करते/करती हैं, लेकिन अवमानना के दंडभय से सभी की चर्चा नहीं की जा सकती है। इसमें “स्व” क्या है? हम सॉफ्टवेयर निर्यातक देश हैं। इन सॉफ्टवेयरों का प्रयोग पश्चिम में होता है। वहां वे शिक्षा और स्वास्थ्य से लेकर उत्पादन और वाणिज्य में प्रयोग किए जाते हैं। इसमें “स्व” क्या है?
ऐसी सूची अंतहीन हो सकती है। एक सभ्य-संतुष्ट देश को ऐसी सूची बनाने की भी आवश्यकता महसूस नहीं होनी चाहिए। लेकिन हममें से कुछ लोगों को हो सकती है। कौन से कुछ लोग? साधारणतः वे, जो या तो वैचारिक कारणों से प्रतिष्ठान से असहमत हैं, या इस कारण असहमत हैं कि उन्हें प्रतिष्ठान से प्रतिष्ठा नहीं मिल रही है।
प्रतिष्ठान से प्रतिष्ठा कैसे मिलती है? प्रतिष्ठान से मिलने वाली प्रतिष्ठा “ठोस” भी हो सकती है, “तरल” भी और “गैस” (वायु) भी। भौतिक ठोस, तरल और गैस की तरह प्रतिष्ठान से मिली प्रतिष्ठा भी एक ही तत्व के तीन रूप भी हो सकते हैं। साधारण ताप और दाब में यह सारे रूप तरल होने की प्रवृत्ति रखते हैं। अगर आप चाहते हैं कि आपकी प्रतिष्ठा तरल न हो, तो आपको विशेष ताप और दाब बनाए रखने के लिए विशेष प्रयास करना होता है। इस बात को साधारण तौर पर भी महसूस किया जा सकता है। जैसे सारे टीचर सम्माननीय नहीं हो जाते हैं, और सम्मानीय टीचरों को सम्मान बचाए रखने के लिए बहुत कुछ खोना होता है।
तरल प्रतिष्ठा भ्रष्टाचार को सर्वशक्तिमान मानकर चलती है। उसका आधार सभी की प्रतिष्ठा के तरल होने और तरल बने रहने में होता है। प्रतिष्ठान के भीतर के इस सदाचार को प्रतिष्ठान के बाहर भ्रष्टाचार,और बीच की अवस्थाओं में सोशलिस्ट और सेक्युलर कहा जाता है। दोनों की अवधारणा का आधार बिन्दु एक ही है- आप सत्ता से कुछ पा सकते हैं और तब पा सकते हैं, जब आप उसके पात्रा न हों, और सत्ता आपको कुछ दे सकती है और तब दे सकती है, जब आप उसके पात्रा न हों। अगर आप ठीक से बर्तन मांज सकते/सकती हैं, तो सत्ता आपको माननीय भी बना सकती है और महामहिम भी। पर सत्ता के जूठे बर्तनों तक आपकी पहुंच होना आवश्यक है। जूठन तक पहुंच जब होड़ में बदल जाती है, तब वह लोकतंत्रा का चोंगा ओढ़कर जिस तरल व्यवस्था को जन्म देती है, उसे क्लेप्टोक्रेसी कहा जाता है। इसमें “स्व” क्या है?
अगर ये प्रश्न दीनदयालजी ने आज उठाए होते, तो हम कल्पना कर सकते हैं कि वह निश्चित रूप से इस प्रणाली की समीक्षा का सुझाव देते। प्रणाली की समीक्षा का सुझाव खतरनाक माना जाता है। क्योंकि स्थापित के स्थानच्युत होने के बाद और विकल्प के स्थान लेने के पहले के छोटे से अंतराल में अराजकता पैठ कर जाती है। उसके कारण ट्रांसफर ऑफ पॉवर भी ठीक से नहीं हो पाता है। लेकिन क्या यह भय नहीं है? क्या हम इस समीक्षा को वास्तव में अनंतकाल के लिए टाल सकते हैं? क्या हमारे न चाहने भर से समीक्षा नहीं होगी? और अगर नहीं ही होगी, तो क्या वर्तमान प्रतिष्ठान इस राष्ट्र के साथ तालमेल बैठाकर हमारा साथ निभा सकेगा? क्या हम उसी को अपने “स्व” की सरोगेट मां बनाकर खुश हो सकेंगे?
इन प्रश्नों के जिस भी उत्तर की कल्पना करें, आपको एक प्रश्न का उत्तर स्वतः मिल जाएगा। वह यह कि इतिहास पढ़ने और पढ़ाने के बिन्दुओं को रेवड़ियों की तरह चीन्हे जाने की परम्परा क्यों जरूरी मानी गई होगी? क्यों भारत के बौद्धिक समाज का एक वर्ग अपनी नासमझी पर गर्व करता होगा?
पुनश्च, इसमें “स्व” क्या है?